गुरुवार, 2 सितंबर 2021

👉 छुरे की धार पर नचिकेता चलेगा

आर्य श्रेष्ठ! आचार्य मही ने यम से विनीत निवेदन किया- नचिकेता कुमार ही तो है, उसके साथ इतनी कठोरता मुझसे देखी नहीं जाती। दस माह बीत गये नचिकेता ने गौ-दधि और जौ की सूखी रोटियों के अतिरिक्त कुछ खाया नहीं, अन्य स्नातक और स्वयं मेरे बच्चे भी रस युक्त, स्वाद युक्त भोजन करते हैं फिर नचिकेता के साथ ही यह कठोरता क्यों?

यमाचार्य ने हंसकर कहा- देवी! तुम नहीं जानती आत्मा को, ब्रह्म को प्राप्त करने का उपाय ही यही हैं साधना को ‘समर’ कहते हैं युद्ध में तो अपना प्राण भी संकट में पड़ सकता कोई आवश्यक नहीं कि विजय ही उपलब्ध हो। अभी तो नचिकेता का अन्न संस्कार ही कराया गया है। ब्रह्म विराट् है, अत्यन्त पवित्र है, अग्नि रूप है। शरीर समर्थ न होगा तो नचिकेता उसे धारणा कैसे करेगा। छोटी सी लकड़ी दस मन बोझ नहीं उठा सकती टूट जाती है पर तपाई दबाई और पिटी हुई उतनी बड़ी लोहे की छड़ पचास मन भार उठा लेती है। नचिकेता का यह अन्न संस्कार उसके अन्नमय कोश के दूषित मलखरण, रोग और विजातीय द्रव्य निकाल कर उसे आत्मा के साक्षात्कार योग्य शुद्ध और उपयुक्त बना देगा। छुरे की धार पर चलने के समान कठिन है पर नचिकेता साहसी और प्रबल आत्म जिज्ञासु है ऐसा व्यक्ति ही यह साधना कर सकता है।

गुरु माता के विरोध की अपेक्षा भी नचिकेता का अन्न संस्कार यमाचार्य ने एक वर्ष चलाया। और उसके बाद उन्होंने नचिकेता को प्राणायाम के अभ्यास प्रारम्भ कराये। प्राणाकर्षण, लोम-विलोम सूर्य वेधन उज्जयी और नाड़ी शोधन आदि प्राणायाम के अभ्यास कराते हुए कुछ दिन बीते उसके प्रभाव से नचिकेता के मुख मंडल पर कांति तो बढ़ी पर उसका आहार निरन्तर घटता ही चला गया।

गुरुमाता यह देखकर पुनः दुःखी हुई और बोली-स्वामी ऐसा न करो- नचिकेता किसी और का पुत्र है कठोरता अपने बच्चों के साथ बरती जा सकती है औरों के साथ नहीं।

यमाचार्य फिर हँसे और बोले-भद्रे! शिष्य अपने पुत्र से बढ़कर होता है, नचिकेता के हृदय में तीव्र आत्मा जिज्ञासायें हैं वह वीर और साहसी बालक आत्म-कल्याण की, साधनाओं की हर कठिनाई झेलने में समर्थ है इसीलिये हम उसे पंचाग्नि विद्या सिखा रहे हैं। आर्यावर्त की पीढ़ियाँ कायर और कमजोर न हो जायें और यह आत्म विद्या लुप्त न हो जाये इस दृष्टि से भी नचिकेता को यह साधना कराना श्रेयस्कर ही है। माना कि उसका आहार कम हो गया है पर प्राण स्वयं ही आहार है। आत्मा-अग्नि रूप है, प्राण और प्रकाशवान् हैं, वह प्राणायाम से पुष्ट होती है, इसी से उसे हर पौष्टिक आहार मिलते हैं मनोमय कोश के नियन्त्रण के लिये ‘प्राणायाम” कोश का यह परिष्कार आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।

एक वर्ष प्राण-साधन में बीता। नचिकेता को अब यमाचार्य ने मन के हर संकल्प को पूरा करने का अभ्यास कराया। नचिकेता सोता तब अचेतन मन की पूर्व जन्मों की स्मृति स्वप्न पटल पर उमड़ती उसमें कई ऐसे पापों की क्रियायें भी होती जिन्हें प्रकट करने में आत्मा-ग्लानि होती है, नचिकेता को वह सारी बातें बतानी पड़ती, गुरुमाता ने उससे भी नचिकेता को बचाने का यत्न किया पर यमाचार्य ने कहा- आत्मा-ग्लानि और कुछ नहीं पूर्व जन्मों के पापों के संस्कार मात्र हैं जब तक मन नितान्त शुद्ध नहीं हो जाता तब तक आत्म-बेधन का मनोबल कहाँ से आयेगा। मन की गांठें खोलने का इससे अतिरिक्त कोई उपाय भी तो नहीं है कि साधक अपनी इस जन्म की सारी की सारी गुप्त से गुप्त बातों को प्रकट कर अपने कुसंस्कार धोये स्वप्नों में परिलक्षित होने वालों में पूर्व जन्मों के पापों को भी उसी प्रकार बताये और उनकी शुद्धि का प्रायश्चित करे।

मनोमय कोश की शुद्धि के लिये नचिकेता को कृच्छ चान्द्रायण से लेकर गोमय, गौमूत्र सेवन करने तक की सारी प्रायश्चित साधनायें करनी पड़ीं। उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही साधना की कठोरता को देखकर गुरुमाता का हृदय करुणा रही साधना की कठोरता को देखकर गुरुमाता का हृदय करुणा से सिसक उठता पर यमाचार्य जानते थे कि आत्मा की ग्रन्थियाँ तोड़कर उसे प्रकट करने का समर कितना कष्ट साध्य है अतएव वे नचिकेता को तपाने में तनिक भी विचलित न हुए।

तीन वर्ष बीत गये, नचिकेता ने जीवन का कोई भी सुख नहीं जाना शरीर को उसने शुद्ध कर लिया पर शरीर क्षीण हो गया, प्राणों पर नियन्त्रण की विद्या उसने सीख ली, पर उससे मन क्षीण हो गया, मनोमय कोश को उसने जीत लिया पर उससे यश-क्षीण होता जान पड़ा। संकल्प विकल्प मुक्त नचिकेता अब इस स्थिति में था कि अपने मन को ब्रह्मरंध्र में प्रवेश कराकर सूक्ष्म जगत के विज्ञानमय रहस्यों की खोज करे और आत्मा तक पहुँचकर उसे सुभित करे, जगाये और प्राप्त करे। मन को दबाकर क्रमशः आज्ञा चक्र का भेदन करते हुए विद्या रूपिणी महाकाली की हलकी झाँकी होती तो उस विराट् रूप को देखकर नचिकेता का मन काँप जाता। पर दूसरे ही क्षण एक पुकार अन्तः करण से आती, मन और यह भौतिक सुख नचिकेता! यदि मिल भी गये तो इन्द्रियाँ उनका रसास्वादन कितने दिन तक कर सकती हैं तू तो उस अक्षर, अनादि आत्मा का वरण कर। पूर्णमासी का दिन, बसन्त-ऋतु-चार वर्ष से निरन्तर उग्र तप कर रहे नचिकेता का शरीर बिलकुल क्षीण पड़ गया था आज का दिन उसके जीवन में विशेष महत्व रखता है। मूलाधार स्थित कुण्डलिनी को जागृत करने की तिथि आज ही है। एक प्राण को दूसरे प्राण में समेटता हुआ नचिकेता मूलाधार तक जा पहुँचा उसने अपने संकल्प की चोट की उस आद्य शक्ति पर, चिर निद्रा में विलीन कुण्डलिनी पर उसका कुछ असर न हुआ इस पर नचिकेता ने तीव्र पर तीव्र प्रहार किये। चोट खाई हुई काल-रूपिणी महा सर्पिणी फुंसकार मारकर उठीं और उसने नचिकेता के मन को, स्थूल भाव को चबा डाला, जला डाला। नचिकेता आज मन न रहकर आत्मा हो गया, उसकी लौकिक-भौतिक वासनायें पूरी तरह जल गई वह ऋषि हो गया यह संवाद सारे संसार में छा गया। नचिकेता के यश की विमल पताका सारे संसार में लहराने लगी।

अब वह ब्रह्मा प्राप्ति के समीप था, ब्रह्म से वह किसी भी क्षण मिल सकता था तथापि अपने देश, अपने धर्म, अपनी महान् संस्कृति के उत्थान का संकल्प लेकर नचिकेता वहाँ से चल पड़ा और नव निर्माण के महान् कार्य में जुट गया। उसने इन पंचाग्नि विद्या का सारे संसार में प्रसार कर अमर साधक का श्रेय प्राप्त किया।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1971

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५७)

असीम को खोजें

सूर्य की दूरी पृथ्वी से सवा नौ करोड़ मील है। इसके बाद का सबसे निकटवर्ती तारा 2,50,00,00,00,00,000 मील दूरी पर है। अन्य तारे तो इससे भी लाखों गुनी दूरी पर हैं। इस दूरी का हिसाब रखने के लिए ‘प्रकाश वर्ष’ का नया पैमाना बनाया गया है। प्रकाश की किरणें एक सैकिण्ड में एक लाख छियासी हजार मील की चाल से चलती हैं। इस गति से चलते हुए प्रकाश एक वर्ष में जितनी दूरी तय करले उसे एक प्रकाश वर्ष कहा जायेगा। इस पैमाने के हिसाब से पृथ्वी से सूर्य की दूरी सिर्फ सवा आठ प्रकाश सैकिण्ड रह जाती है। इसके आगे किसी और तारे की खोज में आगे बढ़ा जाय तो सबसे निकटवर्ती तारा सवा चार प्रकाश वर्ष चल लेने के बाद ही मिलेगा।

ब्रह्माण्ड का 99 प्रतिशत भाग शून्य है। एक प्रतिशत भाग को ही ग्रह नक्षत्र घेरे हुए हैं। अनुमान है कि आकाश में सूर्य जैसे अरबों तारकों का अस्तित्व है। वह तारे आकाश गंगाओं से जुड़े हैं। वे उसी से निकले हैं और उसी से बंधे हैं। मुर्गी अण्डे देती है उन्हें सेती है और जब तक बच्चे समर्थ नहीं हो जाते उन्हें अपने साथ ही लिए फिरती है। आकाश गंगाएं ऐसी ही मुर्गियां हैं जिनके अण्डे बच्चों की गणना करना पूरा सिर दर्द है। हमारी आकाश गंगा एक लाख प्रकाश वर्ष लम्बी और 20 हजार प्रकाश वर्ष मोटी है। सूर्य इसी मुर्गी का एक छोटा चूजा है जो अपनी माता से 33000 प्रकाश वर्ष दूर रहकर उसकी प्रदक्षिणा 170 मील प्रति सैकिण्ड की गति से करता है। आकाश गंगायें भी आकाश में करोड़ों हैं। वे आपस में टकरा न जायें या उनके अण्डे-बच्चे एक-दूसरे से उलझ न पड़ें इसलिए उनने अपने सैर-सपाटे के लिए काफी-काफी बड़ा क्षेत्र हथिया लिया है। प्रायः ये आकाशगंगाएं एक-दूसरे से 20 लाख प्रकाश वर्ष दूर रहती हैं।

अब तक खोजे गये तारकों में सबसे बड़ा ‘काला तारा’ है। यह अपने सूर्य से 20 अरब गुना बड़ा है। यहां यह भूलना नहीं चाहिए कि सूर्य अपनी पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है। उस हिसाब से पृथ्वी की तुलना में काला तारा कितना बड़ा होगा उसे कागज पर जोड़ लेना तो सरल है पर उस विस्तार को मस्तिष्क में यथावत बिठा सकना बहुत ही कठिन है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९३
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ५७)

भक्ति वही, जिसमें सारी चाहतें मिट जाएँ
    
ब्रज में जो चैतन्य है,उनमें तो प्रेम चेतना है ही, जिन्होंने जड़ रूप धरा है- पर्वतराज गोवर्धन, भगवती यमुना, वे भी परात्पर प्रेम का साकार स्वरूप हैं। ब्रज में कोई भी अपने लिए कुछ नहीं चाहता- उन्हें शक्ति, सिद्धि, स्वर्ग, मोक्ष कुछ भी नहीं चाहिए। वे तो बस श्रीकृष्ण को अपने सर्वस्व का अर्पण करके प्रसन्न हैं। उनका यह समर्पण इतना प्रगाढ़ है कि वे कृष्ण के लिए कृष्ण का वियोग सहने के लिए भी तत्पर हैं।’’
    
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की धाराप्रवाह वाणी ने जैसे सबको सम्मोहित कर दिया। सभी स्तब्ध-जड़ीभूत हो गए। देवर्षि तो जैसे भावसमाधि में तिरोहित हो गए। वह यह भी भूल गये कि उन्हें अपने अगले भक्तिसूत्र को उद्घाटित करना है। उन्हें तो ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने स्वयं ही चेताया- ‘‘मेरी अनुभूतियाँ तो उतनी प्रगाढ़ नहीं हैं, देवर्षि तो भक्ति तत्त्व के मर्मज्ञ हैं। उन्हें ब्रजभूमि का व्यापक अनुभव है, अब वह कुछ कहें।’’ विश्वामित्र के इन वचनों से देवर्षि को रोमांच हो आया। उन्होंने कहा- ‘‘ब्रज तो बस ब्रज है। तभी तो स्वयं श्रीकृष्ण ने अपने सखा उद्धव से कहा था- ‘उद्धव मोहि ब्रज बिसरत नाहीं’ उद्धव मुझे ब्रज कभी नहीं भूलता। वहाँ की हवाओं में भी भक्ति घुली है, वहाँ         अपने लिए कोई कुछ नहीं चाहता। मेरा अगला सूत्र भी यही कहता है-
‘नास्त्येव तस्मिंस्तत्सुख सुखित्वम्’॥२४॥
    
उसमें (व्यभिचारी के प्रेम में) प्रियतम के सुख में सुखी होना नहीं है।’’ इस सूत्र के सत्य का उच्चारण करते हुए देवर्षि ने फिर से एक बार ऋषि आपस्तम्ब की ओर देखा। उन्हें अपनी पहली बातों पर संकोच हो रहा था। इस संकोच की धुंधली छाया उनके मुख पर अभी भी बनी हुई थी। उन्होंने संकोच से अपना सिर झुका लिया परन्तु देवर्षि अपने ही भावों में डूबे थे।
    
वे कह रहे थे- ‘‘इस सूत्र के सत्य को ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने स्पष्ट कर दिया है। सच यही है- भक्ति में, प्रेम में, प्रेमी भक्त अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता। उसकी कोई भी इच्छा नहीं होती। वह तो बस अपने प्रियतम का सुख चाहता है। उसकी एकमात्र चिन्ता, चाहत, त्वरा, अभिलाषा, अभीप्सा यही होती है कि मेरे आराध्य किस तरह से मुझसे प्रसन्न होंगे। ब्रज की गोपकन्याएँ इसी सबका साकार स्वरूप थीं। उनका सर्वस्व केवल कृष्ण के लिए था। अरे! वही क्यों? वहाँ के ग्वाल-बाल, बाबा नन्द, मैया यशोदा, पर्वतराज गोवर्धन, भगवती कालिन्दी, वहाँ के कदम्ब आदि वृक्ष सभी तो केवल कृष्ण प्रेम के लिए ही थे। भक्ति का सत्य तो ब्रज के धूलिकणों में है।’’ इतना कहकर देवर्षि फिर से भावों में खोने लगे। उन्हीं के साथ अन्य सभी भी भक्तिसरिता में अवगाहन करने लगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०३

👉 कुवें का मेंढक

एक कुवे मे एक मेंढक रहता था। एक बार समुद्र का एक मेंढक कुवे मे आ पहुंचा तो कुवे के मेंढक ने उसका हालचाल, अता पता पूछा। जब उसे ज्ञात हुआ कि वह मेंढक समुद्र मे रहता हैं और समुद्र बहुत बड़ा होता हैं तो उसने अपने कुवे के पानी मे एक छोटा-सा चक्कर लगाकर उस समुद्र के मेंढक से पूछा कि क्या समुन्द्र इतना बड़ा होता हैं?

कुंवे के मेंढक ने तो कभी समुद्र देखा ही नहीं था। समुद्र के मेंढक ने उसे बताया कि इससे भी बड़ा होता हैं।

कुंवे का मेंढक चक्कर बड़ा करता गया और अंत मे उसने कुंवे की दीवार के सहारे-सहारे आखिरी चक्कर लगाकर पूछा- “क्या इतना बड़ा हैं तेरा समुद्र ?”

इस पर समुद्र के मेंढक ने कहा- “इससे भी बहुत बड़ा?”

अब तो कुंवे के मेंढक को गुस्सा आ गया। कुंवे के अलावा उसने बाहर की दुनिया तो देखी ही नहीं थी। उसने कह दिया- “जा तू झूठ बोलता हैं। कुंवे से बड़ा कुछ होता ही नहीं हैं। समुद्र भी कुछ नहीं होता।”

मेंढक वाली ये कथा यह बताती हैं कि; जितना अध्ययन होगा उतना अपने अज्ञान का आभास होगा। आज जीवन मे पग-पग पर हमें ऐसे कुंवे के मेंढक मिल जायेंगे, जो केवल यही मानकर बैठे हैं कि जितना वे जानते हैं, उसी का नाम ज्ञान हैं, उसके इधर-उधर और बाहर कुछ भी ज्ञान नहीं हैं। लेकिन सत्य तो यह हैं कि सागर कि भांति ज्ञान की भी कोई सीमा नहीं हैं। अपने ज्ञानी होने के अज्ञानमय भ्रम को यदि तोड़ना हो तो अधिक से अधिक अध्ययन करना आवश्यक हैं, जिससे आभास होगा कि अभी तो बहुत कुछ जानना और पढ़ना बाकी हैं।

शुभ प्रभात। आज का दिन आप के लिए शुभ एवं मंगलमय हो।

👉 भक्तिगाथा (भाग ७७)

भक्तवत्सल भगवान के प्रिय भीष्म देवर्षि ने उन्हें सत्कारपूर्वक अपने पास बिठाया और इसी के साथ भक्तिसूत्र के अगले सत्य का उच्चारण किया- ‘तत्तु ...