शनिवार, 26 सितंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ३६)

बिन श्रद्घा-विश्वास के नहीं सधेगा अभ्यास

अभ्यास दृढ़ से दृढ़तर और दृढ़तम कैसे हो? यह समझने से पूर्व यह हृृदयंगम कर लेना चाहिये कि यह यह योग कथा केवल उन्हीं के लिए है, जिनकी आत्मचेतना में योग साधना के प्रति श्रद्घा है, विश्वास है, तड़प है, त्वरा है, तृषा है। महर्षि पतंजलि एवं परम पूज्य गुरुदेव का संवाद सिर्फ उन्हीं से है, जो इस संवाद में अपनी भागीदारी चाहते हैं। दोनों महर्षियों ने अपना खजाना खोल रखा है, पर कोई कोरा बुद्घिवादी इसे छू भी नहीं सकता, उसे साधक बनना ही होगा। अन्यथा गोस्वामी तुलसी बाबा के शब्दों में उसकी स्थिति कुछ ऐसी होगी-

करि न जाइ सर मज्जन पाना।
फिर आवइ समेत अभिमाना।
जो बहोरि कोउ पूछन आवा।
सर निन्दा करि ताहि बुझावा॥
    
अर्थात्- इस योग कथा के सरोवर में उनसे स्नान और जलपान तो किया नहीं जाता; वह इसके पास जा करके भी खाली हाथ अभिमान सहित लौट जाते हैं। यदि उनसे कोई पूछता है कि यह योग कथा कैसी है, तो वे इसकी अनेक तरह से निन्दा करके उसे समझाते है।
    
गोस्वामी जी महाराज आगे कहते हैं-
सकल विघ्न व्यापहिं नहि तेही।
राम सुकृपाँ बिलोकहि जेही॥
    
जो साधक हैं, जिन पर भगवान् की कृपा है, उन्हें कोई विघ्न नहीं सताते हैं। उन्हें इस योग कथा को समझने में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होगी। उनकी जाग्रत् आत्मचेतना योग के रहस्यों को बड़ी ही आसानी से ग्रहण कर लेगी।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ६७
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 1 April 2026

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