मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

👉 चिंता नहीं चिंतन कीजिए

🔷 भारतवर्ष में सम्राट समुद्रगुप्त प्रतापी सम्राट हुए थे। लेकिन चिंताओं से वे भी नहीं बच सके। और चिंताओं के कारण परेशान से रहने लगे। चिंताओं का चिंतन करने के लिए एक दिन वन की ओर निकल पड़े।

🔶 वह रथ पर थे, तभी उन्हें एक बांसुरी की आवाज सुनाई दी। वह मीठी आवाज सुनकर उन्होनें सारथी से रथ धीमा करने को कहा और बांसुरी के स्वर के पीछे जाने का इशारा किया। कुछ दूर जाने पर समुद्रगुप्त ने देखा कि झरने और उनके पास मौजूद वृक्षों की आढ़ से एक व्यक्ति बांसुरी बजा रहा था। पास ही उसकी भेडें घांस खा रही थीं।

🔷 राजा ने कहा, 'आप तो इस तरह प्रसन्न होकर बांसुरी बजा रहे हैं, जैसे कि आपको किसी देश का साम्राज्य मिल गया हो।' युवक बोला, 'श्रीमान आप दुआ करें। भगवान मुझे कोई साम्राज्य न दे। क्योंकि अभी ही सम्राट हूं। लेकिन साम्राज्य मिलने पर कोई सम्राट नहीं होता। बल्कि सेवक बन जाता है।'

🔶 युवक की बात सुनकर राजा हैरान रह गए। तब युवक ने कहा सच्चा सुख स्वतंत्रता में है। व्यक्ति संपत्ति से स्वतंत्र नहीं होता बल्कि भगवान का चिंतन करने से स्वतंत्र होता है। तब उसे किसी भी तरह की चिंता नहीं होती है। भगवान सूर्य किरणें सम्राट को देते हैं मुझे भी जो जल उन्हें देते हैं मुझे भी।

🔷 ऐसे में मुझमें और सम्राट में बस मात्र संपत्ति का ही फासला होता है। बाकी तो सब कुछ तो मेरे पास भी है। यह सुनकर युवक को राजा ने अपना परिचय दिया। युवक ये जान कर हैरान था। लेकिन राजा की चिंता का समाधान करने पर राजा ने उसे सम्मानित किया।

संक्षेप में

🔶 चिंता, मानव मस्तिष्क का ऐसा विकार है जो पूरे मन को झकझोर कर रख देता है। इसलिए चिंता नहीं चिंतन कीजिए, ये सोचिए आप ओरों से बेहतर क्यों हैं? इस सवाल का जबाव यदि आप स्वयं से पूछते हैं तो आपकी चिंताओं का निवारण स्वयं ही हो जाएगा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 27 Dec 2017


👉 सहृदयता में जीवन की सार्थकता (भाग 2)

🔷 जिसने अपनी विचार धारा और भावनाओं को शुष्क, नीरस और कठोर बना रखा है, वह मानव जीवन के वास्तविक रस का आस्वादन करने से वंचित ही रहेगा । उस बेचारे ने व्यर्थ ही जीवन धारण किया और वृथा ही मनुष्य शरीर को कलंकित किया। आनन्द का स्त्रोत सरसता की अनुभूतियों में है। परमात्मा को आनन्द मय कहा जाता है। क्यों?- इसलिए कि वह सरस है, प्रेम मय है । श्रुति कहती है- “रसोवैसः” अर्थात्-वह परमात्मा रस मय है । भक्ति द्वारा प्रेम द्वारा-परमात्मा को प्राप्त करना संभव बताया गया है। निस्संदेह जो वस्तु जैसी हो उसको उसी प्रकार प्राप्त किया जा सकता है। परमात्मा दीनबन्धु करुणासिन्धु, रसिक बिहारी, प्रेम का अवतार, दया निधान, भक्त वत्सल है। उसे प्राप्य करने के लिए अपने अन्दर वैसी ही लचीली, कोमल, स्निग्ध, सरस भावनाएं पैदा करनी पड़ती है। भगवान भक्ति के वश में है जिनका हृदय कोमल है, भावुक है, परमात्मा उनसे दूर नहीं है।

🔶 आप अपने हृदय को कोमल, द्रवित, पसीजने वाला, दयालु, प्रेमी और सरस बनाइए। संसार के पदार्थों में जो सरसता का सौंदर्य का अपार भण्डार भरा हुआ है उसे ढूँढ़ना और प्राप्त करना सीखिए। अपनी भावनाओं को जब आप कोमल बना लेते है तो आपके अपने चारों ओर अमृत झरता हुआ अनुभव होने लगता है। जड़ वस्तुओं पर दृष्टि डालिए हर एक वस्तु अपने-2 ढंग की अनूठी है, वह अपने कलाकार की अमर कीर्ति का अपनी मूकवाणी द्वारा बड़ी ही भावुक भाषा में वर्णन कर रही है। मखमल सी घास, दूध के फेन से उज्ज्वल नदी नाले हँसते हुए पुष्प, खिलौने से सुन्दर कीट पतंग माता सी दयालु गौएं, भाई से साथी बैल, वफादार सेवक से घोड़े, स्वामिभक्त कुत्ते, जापानी खिलौने से चलते फिरते पक्षी, आप अपने चारों ओर देख सकते है। सिनेमा की सी चलती बोलती तस्वीरें सब तरफ घूम रही है, नाटक का सा अभिनय स्थान स्थान पर हो रहा है।

🔷 प्रकृति के कोमल दृश्यों का कवित्व मय भावुकता के साथ यदि आप निरीक्षण करें तो सर्वत्र सौंदर्य की अजस्र धारायें बहती हुई दिखाई देगी। तस्वीर सा यह सुन्दर संसार आपके दिल की मुरझाई कली को हरी कर देने की परिपूर्ण क्षमता रखता है। भोले भाले मीठी मीठी बातें करते हुए बालक, प्रेम की प्रतिमायें देवियाँ, करुणामय मातृत्व की मूर्तियाँ माताएं, अनुभव ज्ञान और शुभ कामनाओं के प्रतीक वृद्ध जन, यह सब ईश्वर की ऐसी आनन्दमय विभूतियाँ है जिन्हें देखकर मनुष्य का हृदय कमल के पुष्प के समान खिल जाना चाहिए।

🔶 पग पग पर आनन्द और उल्लास के ढेर हमारे सामने लगे हुए है, इन दिव्य तत्वों के द्वारा हम अपने को रात दिन आनन्द में सराबोर रख सकते है, फिर भी हाय! हम कैसे अभागे है कि जीवन को दुख शोकों से भरा रखते हैं। मनुष्य अपनी कोमल भावनाओं को जैसे जैसे जागृत करता जाता है वैसे ही उसे अमृत तत्व का रसास्वादन होने लगता है जिसके लिए सत चित आनन्द स्वरूप आत्मा इस हाड़ माँस कि शरीर में रहने को रजामन्द हुआ है, जिसके लोभ को संवरण न करके उसके मनुष्य शरीर धारण किया है। जीवन की सार्थकता कोमल वृत्तियों के मधुरता का रसास्वादन करने में है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- जून 1944 पृष्ठ 5
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1944/June/v1.5

👉 दुःखी संसार में भी सुखी रहा जा सकता है (भाग 4)

🔷 अपनी परिस्थितियों की अपेक्षा करना अथवा उन्हें भुला देना भी दुःख का एक बड़ा कारण है। बहुत से लोग अपनी यथार्थ स्थिति से आंख मूंदकर कल्पना के स्वप्न संसार में विचरण करते रहते हैं। दूसरों के कहने अथवा अपने ही भ्रम से अपने को क्या से क्या मान बैठते हैं। इसका विचार किये बिना कि हमारी परिस्थितियां क्या हैं, हम किस धरातल पर खड़े हैं, बड़ी महत्त्वाकांक्षायें पाल लेते हैं और उनके पीछे पागल बने रहते हैं। अपनी सहज स्वाभाविक स्थिति से हटकर अस्वाभाविक मार्ग अपना लेने से अधिकांश लोग जीवन भर दुःखी बने रहते हैं। अपनी सीमा और अपनी शक्ति से परे की आकांक्षायें बना लेना बड़ी भारी भूल है। ऐसे लोगों की आकांक्षायें कभी पूरी नहीं होती, जिससे वे सदा व्यग्र, दीन और दुःखी बने रहते हैं।

🔶 बहुत से भावुक व्यक्ति जब किसी बड़े आदमी को देखते हैं अथवा किन्हीं महापुरुषों का जीवन-चरित्र पढ़ते हैं तो तत्काल ही अपने को वैसा देखने की कामना करने लगते हैं। किन्तु अपनी स्थिति, योग्यता और क्षमता पर जरा भी विचार नहीं करते। विशेष व्यक्ति बनने की कामना बुरी नहीं। किन्तु इसकी पूर्ति केवल कल्पना के बल पर नहीं हो सकती। इसके लिये स्थिति, योग्यता और क्षमताओं को होना बहुत आवश्यक है। इनका विकास किये बिना केवल महत्वाकांक्षा पाल लेना जीवन में दुःखों को आमन्त्रित करना होता है। जिन व्यक्तियों का सामंजस्य उनकी परिस्थितियों से नहीं होता वह बहुधा दुःखी ही रहा करते हैं।

🔷 मनुष्य यदि सामान्य रूप से सुखी रहना चाहता है तो उसे अपनी परिस्थिति से परे की महत्त्वाकांक्षाओं का त्याग करना होगा। उसे अपनी सीमा में रहकर आगे के लिये प्रयास करना होगा। उन्हें प्रकृति के इस नियम में आस्था करनी ही होगी कि मनुष्य-विकास क्रम-पूर्वक होता है। सहसा ही कोई कामनाओं के बल पर ऊंचा नहीं उठ जाता। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी एक बनावट होती है। उसी की सीमा में धीरे-धीरे बढ़ते रहने पर ही वह बहुत कुछ कर सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1969 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/April/v1.33

👉 Significance of donating the Time (Part 1)

🔶 This is such a critical phase of time that no man believes other man. The clouds of terrorism are seen dispersed all around. You go out on the road but not sure of who walking with you or beside you would snatch your chain on knife-point, whom to believe? The character, the thought and the general behavior of man has so worsened that none would believe other if atmosphere is not changed. A bother will not believe his brother; a wife will not believe husband and vice versa; father will not believe son and son will not believe father; so valueless, so inferior and so mean time has come now because the nature is displeased with us.

🔷 The faith overall is seen being broken down all around. If  found easy, it rains somewhere heavily and when found easy, it allows droughts for long somewhere other ignoring the actual cyclic nature of environment. The weather has turned irregular. No one can say now for sure whether the there will be rain in usual season of rain or not. Also now nothing can be said whether cold will be there in usual winter season and so is about summer also. When the earthquake will come? No one can say when; when a volcano will break out? No one can say; when there will be a flood? No one can say. There is no regulation at all. The nature has gone wild, irregular and disordered on account of its annoyance with us.

🔶 It is such a dangerous time. Whether you feel you do not have any responsibility in such a crucial time? Whether you have no duty in this regard? Whether you have no sentiments? Have you have turned senseless? Has your heart become irony and stony? No, I feel so is not the position with all. However it is the case with majority of people that they have become valueless and wicked like an animal. I expect at least you not to concentrate yourself only on food and giving birth to a child all the time.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 धर्मतंत्र का दुरुपयोग रुके (भाग 3)

🔷 साथियों ! लोकसेवी तो हर जगह होने ही चाहिए। लोकसेवियों के बिना सत्प्रवृत्ति का विकास कैसे हो सकता है? इसलिए पहले हर गाँव में कितने ही लोकसेवी रहते थे और एक−दूसरे के गाँव में परिभ्रमण करते रहते थे। परिभ्रमण करने वाले ऐसे लोकसेवियों को संत-महात्मा भी कहा जा सकता है, विद्वान भी कहा जा सकता है, वे जब कभी भी आते थे, तो उनके ठहरने के लिए डाक बंगला चाहिए, धर्मशाला चाहिए। यह कहाँ से आए? इसलिए मंदिरों में इतनी गुंजाइश रखी जाती थी कि कभी दस पाँच आदमी बाहर से आ जाएँ, तो उनके भी ठहराने और खाने पीने का प्रबंध कर दिया जाए। इस तरीके से किसी जमाने में सत्प्रवृत्तियों के केंद्र मंदिर थे। मंदिरों को इसीलिए बनाया गया था। भगवान की पूजा अर्चना भी हो जाती थी, साथ ही भगवान को याद करने के बहाने मे आस्तिकता का प्रचार भी होता था।

🔶 मित्रो ! ये सब बातें ठीक हैं, परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि भगवान को उन सब चीजों की आवश्यकता थी, उनके बिना भगवान का कोई काम रुका पड़ा था। आरती अगर न उतारी जाए, तो भगवान नाखुश हो जाएँ, या उनका काम हर्ज हो जाए, ये कैसे हो सकता है? सूर्यनारायण और चंद्रमा भगवान की हर वक्त आरती उतारते रहते हैं। नवग्रहों से लेकर के तारामंडलों द्वारा हर क्षण उनकी आरती होती रहती है। फिर हमारे छोटे से दीपक की क्या कीमत हो सकती है? फूल सारे विश्व में उन्हीं के उगाए हुए हैं, चंदन के पेड़ उन्हीं ने उगाए हैं। फूल और चंदन अगर भगवान को नहीं मिलते, तो भगवान का क्या हर्ज था ?? मिठाई या भोजन भगवान को नहीं मिलता, तो क्या हर्ज था? राई के बराबर भी कुछ हर्ज नहीं था। भगवान को खाने-पीने की और पहनने-ओढ़ने की वास्तव में कतई जरूरत नहीं है।

🔷 ये सब चीजें भगवान को मंदिरों के माध्यम से जो भगवान के निमित्त चढ़ाई जाती हैं, उनके पीछे सिर्फ एक ही उद्देश्य छिपा था कि लोकसेवी को, जो एक तरीके से भगवान के प्रतिनिधि कहे जा सकते हैं। जिन्होंने अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की तिलाञ्जलि दी और अपनी व्यक्तिगत सुविधाओं को ताक पर रख दिया। जिन्होंने केवल लोकमंगल का ही ध्यान रखा, केवल भगवान के संदेशों का ही ध्यान रखा, भगवान का प्रतिनिधि न कहें तो क्या कहें? भगवान के प्रतिनिधियों को जीवनयापन करने के लिए निवास से लेकर भोजन, वस्त्र तक और दूसरी चीजों के खरच की आवश्यकता के लिए मंदिरों को बनाया गया। यह एक मुनासिब क्रम था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 2)

👉 आदि जिज्ञासा, शिष्य का प्रथम प्रश्न

🔷 विनियोग मंत्र पढ़ने के बाद हाथ के जल को पास रखे किसी पात्र में डाल दें। दरअसल यह विनियोग साधक को मंत्र की पवित्रता, महत्ता का स्मरण कराता है। मंत्र के ऋषि, देवता, बीज, शक्ति व कीलक की याद कराता है। साथ ही साधक के मन को एकाग्र करते हुए पाठ किए जाने वाले स्तोत्र मंत्र की शक्तियों को जाग्रत् करता है। ऊपर बताए गए विनियोग मंत्र का अर्थ है- ॐ (परब्रह्म का स्मरण) इस गुरुगीता स्तोत्र मंत्र के भगवान् सदाशिव द्रष्टा ऋषि हैं। इसमें कई तरह के छन्द हैं। इस मंत्र के देवता या इष्ट परमात्म स्वरूप सद्गुरुदेव हैं। इस महामंत्र का बीज ‘हं’ है, शक्ति ‘सः’ है, जो जगज्जननी माता भगवती का प्रतीक है। ‘क्रों’ बीज से इसे कीलित किया गया है। इस मंत्र का पाठ या जप सद्गुरुदेव की कृपा पाने के लिए किया जा रहा है।

🔶 इस विनियोग के बाद गुरुदेव का ध्यान किया जाना चाहिए।

🔷 ध्यान मंत्र निम्न है-
योगपूर्णं तपोनिष्ठं वेदमूर्तिं यशस्विनम्।
गौरवर्णं गुरुं श्रेष्ठं भगवत्या सुशोभितम्॥
कारुण्यामृतसागरं शिष्यभक्तादिसेवितम्।
श्रीरामं सद्गुरुं ध्यायेत् तमाचार्यवरं प्रभुम्॥

🔷 इस ध्यान मंत्र का भाव है, गौरवर्णीय, प्रेम की साकार मूर्ति गुरुदेव वन्दनीया माताजी (माता भगवती देवी) के साथ सुशोभित हैं। गुरुदेव योग की सभी साधनाओं में पूर्ण, वेद की साकार मूर्ति, तपोनिष्ठ व तेजस्वी हैं। शिष्य और भक्तों से सेवित गुरुदेव करुणा के अमृत सागर हैं। उन आचार्य श्रेष्ठ श्रीराम का, अपने गुरुदेव का साधक ध्यान करें।

🔶 ध्यान की प्रगाढ़ता में परम पूज्य गुरुदेव को अपना आत्मनिवेदन करने के बाद साधक को गुरुगीता का पाठ करना चाहिए। जिससे साधकगण उनके गहन चिन्तन से गुरुतत्त्व का बोध प्राप्त कर सकें। इसके पठन, अर्थ चिन्तन को अपनी नित्य प्रति की जाने वाली साधना का अविभाज्य अंग मानें।

🔷 गुरुगीता का प्रारम्भ ऋषियों की जिज्ञासा से होता है-

ऋषयः ऊचुः
गुह्यात् गुह्यतरा विद्या गुरुगीता विशेषतः।
ब्रूहि नः सूत कृपया शृणुमस्त्वत्प्रसादतः॥

🔶 नैमिषारण्य के तीर्थ स्थल में एक विशेष सत्र के समय ऋषिगण महर्षि सूत से कहते हैं- हे सूत जी! गुरुगीता को गुह्य से भी गुह्यतर विशेष विद्या कहा गया है। आप हम सभी को उसका उपदेश दें। आपकी कृपा से हम सब भी उसे सुनने का लाभ प्राप्त करना चाहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 10

👉 पत्नी त्याग - महापाप

🔷 उत्तानपाद के पुत्र और तपस्वी ध्रुव के छोटे भाई का नाम उत्तम था। यद्यपि वह धर्मात्मा राजा था फिर भी उसने एक बार अपनी पत्नी से अप्रसन्न होकर उसे घर से निकाल दिया और अकेला ही घर में रहने लगा।

🔶 एक दिन एक ब्राह्मण राजा उत्तम के पास आया और कहा- मेरी पत्नी को कोई चुरा ले गया है। यद्यपि वह स्वभाव की बड़ी क्रूर वाणी से कठोर, कुरूप और अनेक कुलक्षणों से भरी हुई थी, पर मुझे अपनी पत्नी की रक्षा, सेवा और सहायता करनी ही उचित है। राजा ने ब्राह्मण को दूसरी पत्नी दिला देने की बात कही पर उसने कहा- पत्नी के प्रति पति को वैसा ही सहृदय और धर्म परायण होना चाहिए जैसा कि पतिव्रता स्त्रियाँ होती है।

🔷 राजा ब्राह्मण की पत्नी को ढूँढ़ने के लिए चल दिया। चलते -चलते वह एक वन में पहुँचा जहाँ एक तपस्वी महात्मा तप कर रहे थे। राजा का अपना अतिथि ज्ञान ऋषि ने अपने शिष्य को अर्घ्य, मधुपर्क आदि स्वागत का समान लाने को कहा। पर शिष्य ने उनके कान में एक गुप्त बात कही तो ऋषि चुप हो गये और उनने बिना स्वागत उपचार किये साधारण रीति से ही राजा से वार्ता की।

🔶 राजा का इस पर आश्चर्य हुआ। उनने स्वागत का कार्य स्थगित कर देने का कारण बड़े दुःख, विनय और संकोच के साथ पूछा। ऋषि ने उत्तर दिया-राजन् आप ने पत्नी का त्याग कर वही पाप किया है। जो स्त्रियाँ किसी कारण से अपने पति का त्याग कर करती हैं। चाहे स्त्री दुष्ट स्वभाव की ही क्यों न हो पर उसका पालन और संरक्षण करना ही धर्म तथा कर्तव्य है। आप इस कर्तव्य से विमुख होने के कारण निन्दा और तिरस्कार के पात्र हैं। आपके पत्नी त्याग का पाप मालूम होने पर आपका स्वागत स्थगित करना पड़ा।

🔷 राजा को अपने कृत्य पर बड़ा पश्चाताप हुआ। उसने ब्राह्मण की स्त्री के साथ ही अपनी स्त्री को भी ढूँढ़ा और उनको सत्कार पूर्वक राजा तथा ब्राह्मण ने अपने अपने घर में रखा।

🔶 देवताओं की साक्षी में पाणिग्रहण की हुई पत्नी में अनेक दोष होने पर भी उसका परित्याग नहीं करना चाहिए। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने सद् व्यवहार से दुर्गुणी पति को सुधारती है वैसे ही हर पुरुष को पत्नीव्रती होना चाहिए और प्रेम तथा सद् व्यवहार से उसे सुधारता चाहिए। त्याग करना तो कर्तव्यघात है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 पूरा और खरा काम

🔷 किसी भी स्त्री या पुरुष के वास्ते इससे अधिक लज्जा और गिरावट की बात क्या होगी कि उसे एक काम को दुबारा करने के वास्ते कहा जाए कि उसने अपना काम ठीक तौर से नहीं किया है, अधूरा किया है। जो आदमी सम्मान प्राप्त करने की इच्छा करता है उसे कभी किसी काम को अधूरा और रद्दी न करना चाहिये। जो आदमी अपने मालिक की उपस्थिति में तो ठीक काम करता है किन्तु उसके पीठ फिरते ही सुस्ती से भद्दा काम आरम्भ करता है वह कभी बड़ा नहीं बन सकेगा, सद्गुण उसे दूर से ही प्रणाम करेंगे।

🔶 उच्च आदर्शों वाला आदमी हमेशा एक खरे आदमी के समान काम करता है, किराये पर रखे हुये आदमी के समान नहीं। ‘मुझे इतने पैसे मिलते हैं वैसा ही मुझे काम करना चाहिये’ इस विचार से प्रेरित होकर वह कभी अपनी कारीगरी को बट्टा न लगावेगा। वह अपनी कला की अच्छाई को मजदूरी के पैसों से नाप कर खराब न करेगा। उसे अपनी तरक्की के लिये न तो षडयंत्र बनाने की जरूरत होगी और न वेतन बढ़ाने के लिये किसी से कुछ कहना पड़ेगा। क्योंकि दुनिया इस कायदे को मानने के लिये बाध्य है कि जो आदमी योग्यता रखता है उसे पुरस्कार अवश्य मिलना चाहिये।

🔷 पूरे और खरे काम के सामने सबको झुकना पड़ता है। जो छोटे से छोटा काम निकम्मा, रद्दी, अधूरा किया जा सकता है वही परमात्मा की सेवा या अपना कर्तव्य समझ कर सारे चातुर्य तथा कला से अच्छी तरह भी किया जा सकता है।

✍🏻 श्रीमती लिली एल. एलन
📖 अखण्ड ज्योति से

👉 शत्रु से भी मनुष्यता का व्यवहार

🔷 बाजीराव पेशवा और हैदराबाद के नवाब में लड़ाई हो रही थी। मराठे जीत रहे थे। हारते हुए निजाम की फौज किले में अपनी प्राण रक्षा करने घुसी बैठी थी। धीरे धीरे उसकी रसद खत्म होने लगी। यहाँ तक कि एक दिन अन्न का स्टॉक बिल्कुल समाप्त हो गया।

🔶 निजाम ने अन्न की याचना पेशवा से की मंत्रियों ने सलाह दी कि यही मौका दुश्मन पर चढ़ाई करने का है। भूखी फौज को आसानी से जीता जा सकता है। पर पेशवा को यह बात नहीं रुची। उनने कहा- भूखों को मारना कायरता है। उनने तुरन्त बहुत सा अन्न निजाम के किले में पहुँचवा दिया। निजाम इस महानता के आगे नतमस्तक हो गये। उनने पेशवा से संधि कर ली।

🔷 युद्ध और शत्रुता में साधारणतः नैतिक नियमों की परवा नहीं की जाती पर भारतीय आदर्श इन विषम परिस्थितियों में भी अपनी अग्नि परीक्षा देकर विश्व भर में अपनी महानता सिद्ध करते रहे है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 गुरुगीता (भाग 1)

👉 आदि जिज्ञासा, शिष्य का प्रथम प्रश्न

🔷 गुरुपूर्णिमा के पुण्य पर्व पर प्रत्येक शिष्य सद्गुरु कृपा के लिए प्रार्थनालीन है। वह उस साधना विधि को पाना-अपनाना चाहता है, जिससे उसे अपने सद्गुरु की चेतना का संस्पर्श मिले। गुरुतत्त्व का बोध हो। जीवन के सभी लौकिक दायित्वों का पालन-निर्वहन करते हुए उसे गुरुदेव की कृपानुभूतियों का लाभ मिल पाए। शिष्यों-गुरुभक्तों की इन सभी चाहतों को पूरा करने के लिए प्राचीन ऋषियों ने गुरुगीता के पाठ, अर्थ चिन्तन, मनन व निदिध्यासन को समर्थ साधना विधि के रूप में बताया था। इस गुरुगीता का उपदेश कैलाश शिखर पर भगवान सदाशिव ने माता पार्वती को दिया था। बाद में यह गुरुगीता नैमिषारण्य के तीर्थ स्थल में सूत जी ने ऋषिगणों को सुनायी। भगवान व्यास ने स्कन्द पुराण के उत्तरखण्ड में इस प्रसंग का बड़ी भावपूर्ण रीति से वर्णन किया है।

🔶 शिष्य-साधक हजारों वर्षों से इससे लाभान्वित होते रहे हैं। गुरुतत्त्व का बोध कराने के साथ यह एक गोपनीय साधना विधि भी है। अनुभवी साधकों का कहना है कि गुरुवार का व्रत रखते हुए विनियोग और ध्यान के साथ सम्यक् विधि से इसका पाठ किया जाय, तो शिष्य को अवश्य ही अपने गुरुदेव का दिव्य सन्देश मिलता है। स्वप्न में, ध्यान में या फिर साक्षात् उसे सद्गुरु कृपा की अनुभूति होती है। शिष्य के अनुराग व प्रगाढ़ भक्ति से प्रसन्न होकर गुरुदेव उसकी आध्यात्मिक व लौकिक इच्छाओं को पूरा करते हैं। यह कथन केवल काल्पनिक विचार नहीं, बल्कि अनेकों साधकों की साधनानुभूति है। हम सब भी इसके पाठ, अर्थ चिन्तन, मनन व निदिध्यासन से गुरुतत्त्व का बोध पा सकें, परम पूज्य गुरुदेव की कृपा से लाभान्वित हो सके, इसलिए इस ज्ञान को धारावाहिक रीति से क्रमिक ढंग से प्रकट किया जा रहा है। अब से प्रत्येक महीने की अखण्ड ज्योति में मंत्र क्षमता वाले गुरुगीता के श्लोकों की भावपूर्ण व्याख्या की जाएगी।

🔷 लेकिन सबसे पहले साधकों को इसकी पाठविधि बतायी जा रही है। ताकि जो साधक इसके नियमित पाठ से लाभान्वित होना चाहें, हो सकें। गुरुगीता के पाठ को शास्त्रकारों ने मंत्रजप के समतुल्य माना है। उनका मत है कि इसके पाठ को महीने के किसी भी गुरुवार को प्रारम्भ किया जा सकता है। अच्छा हो कि साधक उस दिन एक समय अस्वाद भोजन करें। यह उपवास मनोभावों को शुद्ध व भक्तिपूर्ण बनाने में समर्थ सहायक  की भूमिका निभाता है। इसके बाद पवित्रीकरण आदि षट्कर्म करने के पश्चात् पूजा वेदी पर रखे गए गुरुदेव के चित्र का पंचोपचार पूजन करें। तत्पश्चात् दाँए हाथ में जल लेकर विनियोग का मंत्र पढ़ें-

ॐ अस्य श्री गुरुगीता स्तोत्रमंत्रस्य भगवान सदाशिव ऋषिः। नानाविधानि छंदासि। श्री सद्गुरुदेव परमात्मा देवता। हं बीजं। सः शक्तिः। क्रों कीलकं। श्री सद्गुरुदेव कृपाप्राप्यर्थे जपे विनियोगः॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 9

👉 पहले अपने अंदर झांको Pehle Apne Andar Jhanko

पुराने जमाने की बात है। गुरुकुल के एक आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विधा पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय...