मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

👉 गुरुगीता (भाग 2)

👉 आदि जिज्ञासा, शिष्य का प्रथम प्रश्न

🔷 विनियोग मंत्र पढ़ने के बाद हाथ के जल को पास रखे किसी पात्र में डाल दें। दरअसल यह विनियोग साधक को मंत्र की पवित्रता, महत्ता का स्मरण कराता है। मंत्र के ऋषि, देवता, बीज, शक्ति व कीलक की याद कराता है। साथ ही साधक के मन को एकाग्र करते हुए पाठ किए जाने वाले स्तोत्र मंत्र की शक्तियों को जाग्रत् करता है। ऊपर बताए गए विनियोग मंत्र का अर्थ है- ॐ (परब्रह्म का स्मरण) इस गुरुगीता स्तोत्र मंत्र के भगवान् सदाशिव द्रष्टा ऋषि हैं। इसमें कई तरह के छन्द हैं। इस मंत्र के देवता या इष्ट परमात्म स्वरूप सद्गुरुदेव हैं। इस महामंत्र का बीज ‘हं’ है, शक्ति ‘सः’ है, जो जगज्जननी माता भगवती का प्रतीक है। ‘क्रों’ बीज से इसे कीलित किया गया है। इस मंत्र का पाठ या जप सद्गुरुदेव की कृपा पाने के लिए किया जा रहा है।

🔶 इस विनियोग के बाद गुरुदेव का ध्यान किया जाना चाहिए।

🔷 ध्यान मंत्र निम्न है-
योगपूर्णं तपोनिष्ठं वेदमूर्तिं यशस्विनम्।
गौरवर्णं गुरुं श्रेष्ठं भगवत्या सुशोभितम्॥
कारुण्यामृतसागरं शिष्यभक्तादिसेवितम्।
श्रीरामं सद्गुरुं ध्यायेत् तमाचार्यवरं प्रभुम्॥

🔷 इस ध्यान मंत्र का भाव है, गौरवर्णीय, प्रेम की साकार मूर्ति गुरुदेव वन्दनीया माताजी (माता भगवती देवी) के साथ सुशोभित हैं। गुरुदेव योग की सभी साधनाओं में पूर्ण, वेद की साकार मूर्ति, तपोनिष्ठ व तेजस्वी हैं। शिष्य और भक्तों से सेवित गुरुदेव करुणा के अमृत सागर हैं। उन आचार्य श्रेष्ठ श्रीराम का, अपने गुरुदेव का साधक ध्यान करें।

🔶 ध्यान की प्रगाढ़ता में परम पूज्य गुरुदेव को अपना आत्मनिवेदन करने के बाद साधक को गुरुगीता का पाठ करना चाहिए। जिससे साधकगण उनके गहन चिन्तन से गुरुतत्त्व का बोध प्राप्त कर सकें। इसके पठन, अर्थ चिन्तन को अपनी नित्य प्रति की जाने वाली साधना का अविभाज्य अंग मानें।

🔷 गुरुगीता का प्रारम्भ ऋषियों की जिज्ञासा से होता है-

ऋषयः ऊचुः
गुह्यात् गुह्यतरा विद्या गुरुगीता विशेषतः।
ब्रूहि नः सूत कृपया शृणुमस्त्वत्प्रसादतः॥

🔶 नैमिषारण्य के तीर्थ स्थल में एक विशेष सत्र के समय ऋषिगण महर्षि सूत से कहते हैं- हे सूत जी! गुरुगीता को गुह्य से भी गुह्यतर विशेष विद्या कहा गया है। आप हम सभी को उसका उपदेश दें। आपकी कृपा से हम सब भी उसे सुनने का लाभ प्राप्त करना चाहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 10

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