गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

👉 गुरु की तलाश

🔷 एक थे सेठ। वे गुरु की तलाश में थे। पर चाहते ऐसा थे, जो पहुँचा हुआ हो, ज्ञानी हो। बहुतों को जाँचा परखा पर कोई खरा न निकला। तलाश का अन्त न हुआ।

सेठानी ने कहा- ‘यह काम मेरे ऊपर छोड़ दें। जो मिला करे उसे मेरे पास भेज दिया करें। सेठ जी सहमत हो गये। एक झंझट टला।’

🔷 सेठानी ने पिंजड़े में एक कौआ पाला। जो भी महात्मा आया, उनसे यही कहतीं, देखिए मेरा पाला कबूतर अच्छा है न?

🔶 सन्त लोग आते। कबूतर कहाँ है? कैसा है? कहते। जब सेठानी अपनी बात पर अड़ी ही रहतीं, तो वे क्रोध में भरकर उलटी-सीधी बातें कहते और वापस चले जाते।

🔷 यही क्रम चलता रहा। बहुतेरे आये और सभी चले गये। कोई खरा उतरा नहीं। जो आवेश ग्रस्त हो चले, वे सन्त कैसे? जो सन्त नहीं वह गुरु योग्य कहाँ?

🔶 एक दिन एक वयोवृद्ध सन्त आये। सत्कार करने के उपरान्त सेठानी ने वही कौआ-कबूतर का सिलसिला चला दिया।

🔷 यह सन्त आवेश में नहीं आये। कौए और कबूतर का अन्तर समझाते रहे। न समझ पाने पर इतना ही कहकर चले गये- बेटे, हठ मत करना। तथ्य का पता लगाना। कोई सर्वज्ञ नहीं। हमसे आपसे भूल हो सकती है। सत्य को समझने के लिए मन के द्वार खुले रखने चाहिए। वे हँसते हुए चल दिये। क्रोध था न आवेश न मानापमान का भाव।

🔶 सेठानी ने सन्त को द्वार से वापस लौटा लिया। नमन किया और कहा- “जैसा चाहती थी, वैसा आपको पाया। कृपया हमारे परिवार के गुरु का उत्तरदायित्व ग्रहण करें।”

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 2 Feb 2018

👉 विचार एक मजबूत ताकत

🔶 शुभ सात्विक और आशापूर्ण विचार एक वस्तु है। यह एक ऐसा किला है, जिसमें मनुष्य हर प्रकार के आवेगों और आघातों से सुरक्षित रह सकता है। लेकिन मनुष्य को उत्तम विचार ही रखने और अपनी आदत में डालने अभ्यास निरंतर करना चाहिए। विचार फालतू बात नहीं है। यह एक मजबूत ताकत है। इसका स्पष्टï स्वरूप है। उसमें जीवन है। यह स्वयं ही हमारा मानसिक जीवन है। यह सत्य है। विचार ही मनुष्य का आदिरूप है। पानी में लकड़ी, पत्थर, गोली आदि फेंकने से जैसा आघात होता है, जैसा रूप बनता है, जो प्रभाव होता है, वैसा ही तथा उससे भी अधिक तेज आघात विचारों को फेंकने से होता है। मनुष्य के सृजनात्मक विचारों में नव-रचना करने की अदï्भूत शक्ति है। मनुष्य के जिस रंग, रूप, गुण, कर्म, संस्कार के विचार होते हैं, उसी दिशा में उसकी तीव्र उन्नति होती जाती है। जिसका मन सदा उत्साहपूर्ण रहता है और मन में बड़ा अधिकारी, लेखक, वक्ता, नेता आदि होने की इच्छा होती है, जिसका मन सदैव शून्य में, अपने मानसिक राज्य में बड़ी-बड़ी वस्तुओं की रचना किया करता है, वास्तव में एक दिन वह बड़ा हो जाता है। यही अनुभव की हुई बात है। जितने लोगों ने उन्नति की है या संसार में अमर नाम कमाया है, उन सभी ने विचारों की ही मुख्यता प्रत्येक कार्य में बताई है।
  
🔷 संकल्प में पूरी सच्चाई होनी चाहिए। रचना करने की शक्ति उन्हीं विचारों में होती है, जिनमें सच्चा विश्वास, दृढ़ श्रद्धा होती है। इस विश्व में सब कुछ आपको अपने आत्म विश्वास के अनुसार ही प्राप्त होगा। हमारे मिलने-जुलने से भी हमारे विचारों का बड़ा कार्य होता है, जो लोग प्रसन्नचित्त स्वभाव के होते हैं वे मन में सदा आनन्द के रस में ही डूबे रहते हैं। विपत्ति या कठिनाई आने पर भी वे शुभ विचारों में लीन रहते हैं। उनसे मिलने वाले दुखी और निराश व्यक्ति भी प्रसन्न हो जाता है। प्रसन्न विचारों वाले व्यक्ति जहां जाते हैं, सर्वत्र आनन्द ही आनन्द की वर्षा करते हैं।  इसके विपरीत ऐसे लोग भी हैं, जिनका चेहरे में क्रोध, चिंता, उत्तेजना, जलन से रहता है, उनका चेहरा बदसूरत दीखता है। उनके इर्द-गिर्द उदासी का वातावरण छाया रहता है।

🔶 उनके पास कोई जाना नहीं चाहता और न ही बात करना पसंद करता है। संसार में ऐसे ही मनुष्यों की आवश्यकता है, जिनका हृदय पवित्र प्रेम से पूर्ण हों और आनन्द के स्रोत हों। जिससे संसार में प्रेम, आनन्द और सुख का साम्राज्य हो। परमात्मा का भण्डार मनुष्य अंदर होते हुए भी वह प्रेम, आनन्द और सुख की भीख बाहर दूसरों से मांगता फिरता है। ईश्वर के राज्य में सब वस्तुएं उसी की हैं। फिर सीधे ईश्वर से ही क्यों नहीं मांगते? उस पर विश्वास क्यों नहीं करते? कारण यह है कि बचपन से ही तुम्हें इस बात की शिक्षा नहीं दी गई और संसार की देखा-देखी मनुष्य भी ऐसा ही करने लगे। सुख बाहर नहीं है। आपके मन की शांत और संतुलित स्थिति में है। इसी को शांत करने से, आनन्दमय मन:स्थिति उत्पन्न होती है। केवल ईश्वर पर पूर्ण विश्वास और उच्च भविष्य में विश्वास की आवश्यकता है।
  
🔷 एक धर्म में वर्णन है कि यदि तू मेरे नाम पर मांगे तो मैं अवश्य दूंगा। आगे कहा गया है कि यदि तू मांगता है तो विश्वास कर तू पाएगा। फिर तू अवश्य पा जाएगा। दुख यह है कि हम इन बातों को पढ़ कर भी अपना सुख बाहर ही ढंूढ़ते रहते हैं। हमें चाहिए कि हम अपने अंदर छिपे हुए आनन्द के भण्डार पर विश्वास करें।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन को बालक्रीड़ाओं में भटकने न दें (अन्तिम भाग)

🔷 वासनाओं की पूर्ति क्षण भर के लिए होती है दूसरे की क्षण दूने वेग से फिर उभर आती है। उसकी पूर्ति में प्रसन्नता अनुभव करना ऐसा ही है जैसे कुत्ता सूखी हड्डी चबाते हुए अपना ही जबड़ा घायल कर लेता है और उससे टपकने वाले खून को सूखी हड्डी का रस मानता है। चटोरपन और कामुकता की ललक को पूरी करने का प्रयत्न ठीक इस मूर्ख कुत्ते के समान है जो अपना ही जबड़ा घायल करता जाता है और लाभ कमाने की बात सोचता है। दाद खुजाकर अपने को लहू-लुहान कर लेने की तरह ही विषयासक्ति है। उससे मनुष्य अपनी ही जीवनी शक्ति को निचोड़ता और खोखला होकर बेमौत मरता है।

🔶 लोभ, मोह और अहंकार, वासना, तृष्णा और बड़प्पन यही विडम्बनाएँ आदि से अन्त तक मनुष्य के सिर पर भूत-पलीत की तरह चढ़ी रहती हैं और गहरे नशे की तरह विचारशीलता को कुँठित किये रहती हैं।

🔷 मन को समझाया जाना चाहिए कि जीवन सृष्टा की सर्वोपरि कलाकृति है वह अमानत के रूप में किसी महान प्रयोजन के लिए मिला है। इसे इस उपहासास्पद ढंग से न गँवाया जाये, जिससे समय निकल जाने पर पश्चात्ताप ही शेष रहे। शरीर की वास्तविक आवश्यकताएँ थोड़े से श्रम व समय में पूरी की जा सकती है फिर उन्हीं को बढ़ाते रहने और न पूरी हो सकने वाली विडंबनाएं रचने से क्या लाभ? 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1986 पृष्ठ 4

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1986/February/v1.4

👉 खाने तक में नासमझी की भरमार (भाग 1)

🔷 समझदारी का सदुपयोग यह है कि उसके सहारे सीधा रास्ता तलाश किया जाय और ऊँचा उठने, आगे बढ़ने में उपलब्ध शक्तियों को नियोजित किया जाय। इसके विपरीत यदि समझदारी कुचक्र रचने लगे, विनाश पर उतरे, उलटे रास्ते चले तो उससे हानि ही हानि है। इससे तो वे नासमझ अच्छे जो कछुए की तरह धीमी चाल चलते, लक्ष्य का ध्यान रखते और उछलने वाले खरगोश से आगे निकलकर बाजी जीतते हैं।

🔶 मनुष्य की तुलना में इस दृष्टि से वे पशु अधिक समझदार है जिन्होंने प्रकृति मर्यादाओं को अपनाये रखा हैं और मनुष्य के नागपाश तथा प्रकृति प्रकोप का सामना करते हुए भी अपना अस्तित्व बनाये रखा है। जो इन साधन रहित परिस्थितियों में भी मात्र अपनी काया, प्रकृति प्रेरणा और कठोर श्रम करने पर सम्भव हो सकने वाली निर्वाह व्यवस्था भर से काम चलाते और सुख-चैन की जिन्दगी जीते है। एक मनुष्य है जो विपुल वैभव का अधिष्ठाता होते हुए भी आये दिन ऐसे त्रास सहता हैं, जैसे पुराणों मे यमदूतों द्वारा नरक क्षेत्र मे पहुँचने पर दिये जाने का उल्लेख है। होना यह चाहिए था कि स्रष्टा के इस सुरम्य उद्यान में मनुष्य शरीरधारी देवोपम स्तर का निर्वाह करता और अपने प्रभाव क्षेत्र को स्वर्ग में अवस्थित नन्दन वन जैसे सुरम्य बनाकर रखता। पर दुर्भाग्य को देखा जाय, ठीक उलटी स्थिति में उसे दिन गुजारने पड़ रहे हैं।

🔷 सबसे निकटवर्ती, सबसे वफादार, सबसे उपयोगी अपना शरीर है। उसी पर सवारी गाँठ कर जीवन की लम्बी मंजिल पूरी की जाती है। इसी वैभव के सहारे इच्छा-अभिलाषाओं को पूर्ण करने का सुयोग मिलता है। जब तक वह सही है तब तक ही शान्तिपूर्वक रहना, विभिन्न प्रकार के रसास्वादन करना तथा प्रगति पथ पर आगे बढ़ सकना सम्भव होता है। वह गड़बड़ाये तो करते धरते कुछ नहीं बनता। दिन गुजरना तक कठिन पड़ता है। उलटे त्रास सहना पड़ता है। रोते-कलपते समय कटता है और साथी-सम्बन्धियों पर सेवा-सहायता करने से लेकर धन व्यय करने तक का भार लदता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Advantages of Worship-Intercession (Part 1)

🔷 Now I told people that results, accomplishments as explained in epics and PURANs can easily be attained, the effects as explained there can easily be created provided our way of worship (PUHA-PATH) of BHAGWAN is righteous. How that way is, has been told by me giving example. I presented my own example as how the routine-life of an endeavourer ought to be. I by giving my own example told that honesty should be incorporated in whatever we do. I did PUJA-UPASANA as if had been washing my body with soap. As we all use soaps of our choice on our bodies, so I have used name of RAM-RAM in my life.
 
🔶 I don’t wish to do any flattery with BHAGWAN. I hate flattery. I can’t beseech even BHAGWAN. I hate flattery. I cannot beseech even BHAGWAN. Why should I do that? It is not my nature to beseech very humbly to anybody, not even BHAGWAN. if BHAGWAN has some value, I too have that. I should beseech, but why?  I should request very politely to BHAGWAN, but why? I cannot grovel before anybody. If I do that, it will be before soul, before my mind and before my own competency.
 
🔷  I will request my PUSHARTH to go its way; I will request my mind, ‘‘O unlucky! You are going to spoil me. Where are you wandering? Why don’t you go on the righteous path? Why to deviate? If I had to beseech, I will do that before my soul and say, ‘‘you are flushed with power but why do you make me helpless? Why do you ask me to go door to door and why do you ask me to beseech very humbly before stones? When you have all, why should I go out and ask anybody? Why don’t you give me? So if I have to fight, I will do that with my soul & If I have to beg, I will beg of my soul.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 10)

🔷 मित्रो! जो कुछ भी जहाँ कहीं भी आपको कार्यक्रम और क्रियाकलाप सौंपा गया है, उस सारे क्रियाकलाप और कार्यक्रम मे हम यही लोगों से सुनना चाहेंगे, देखना चाहेंगे और पूछना-चाहेंगे कि हमारे जो भेजे हुए कार्यकर्ता थे, वे आपके कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे कि नहीं। वे आपके हाथ से हाथ मिलाकर काम कर रहे थे कि नहीं और आपके पाँव से पाँव मिलाकर चल रहे थे कि नहीं। आप एक वालेण्टियर के रूप में जाना, एक कार्यकर्ता के रूप में जाना। आप नेता के रूप में मत जाना।

🔶 आप गुरु के रूप में मत जाना। जहाँ कहीं भी आप गुरु का अन्दाज ले करके जायेंगे, नेता का अहंकार ले करके जायेंगे, तो फिर आप खाई पैदा करेंगे और खाई का कोई परिणाम आज तक अच्छा नहीं आया। आपको ऐसा ही करना चाहिए। जहाँ कहीं भी आप जाते हैं और हम भेजते हैं, वहाँ आपको इसी तरह से जाना चाहिए और आपको यही करना चाहिए, तो हमारा उद्देश्य पूरा हो जायेगा। और यही-सार्थक हो जायेगा, जिसके लिए हमने आपको बुलाया था और जिसके लिए हमने व्यवस्था बनाई थी। यह हुआ कार्य नम्बर एक।

🔷 कार्य नम्बर-दो यह है कि आप अपने मिशन को संगठित करना और अपने विश्वासों को डगमग मत होने देना। अपने विश्वासों को अस्त−व्यस्त मत होने देना। आपका विश्वास और आपका क्रियाकलाप असंख्य लोगों को आपके समान पैदा करके रहेगा। आप कच्चे आदमी होंगे, आप स्वयं कमजोर आदमी होंगे, तो आपका कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है। मित्रो! प्रभाव वाणी का नहीं पड़ता है, प्रभाव व्यवहार कुशलता का नहीं पड़ता है।

🔶 प्रभाव अगर वाणी का पड़ा होता और प्रभाव अगर व्यवहार कुशलता का पड़ा होता, तो न जाने क्या से क्या हो गया होता और न जाने क्या से क्या बन गया होता। लच्छेदार बात करने वालों और लम्बी-चौड़ी गप्पें हाँकनेवालों, रामायण की कहानियाँ कहने वालों और भागवत् की कहानियाँ कहने वालों और सतयुग की कहानियाँ कहने वालों की कमी है क्या? बरसात के मेढकों के तरीके से इसकी बाढ़ सी आ गयी है। आज संतों की, सत्संगियों की और बाबा जी की कथाओं की और कीर्तनों की बाढ़ आयी हुई है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 29)

👉 शंकर रूप सद्गुरु को बारंबार नमन्

🔷 सद्गुरु नमन के इन महामंत्रों में गहरा तत्त्व विचार है। इनमें वेदान्त का गहन बोध है। इनमें जो कुछ भी गाया है, उसे लौकिक बुद्धि से, कोरे पाण्डित्य से समझ पाना एकदम असम्भव है। इन्हें समझने के लिए शिष्य की श्रद्धा, साधक की आस्था और महातपस्वी की निर्मल चेतना चाहिए। गहरी, परिपक्व व परिष्कृत गुरुभक्ति से इन महामंत्रों का रहस्य मानवीय चेतना में समा सकता है, अन्यथा किसी भी तरह से नहीं। तो सबसे पहले इन महामंत्रों को समझने से पहले यह जान लें कि गुरुदेव केवल देह की दृष्टि से ही मनुष्य हैं, अन्यथा उनमें कोई मानवीय भाव नहीं है। उनका शरीर तो मनुष्य का है; परन्तु उसमें विद्यमान चेतना सर्वथा ईश्वरीय है। उनके जीवन के सम्पूर्ण क्रियाकलाप ब्राह्मी चेतना की ही अभिव्यक्ति है।

🔶 इस सत्य को आत्मसात् करने पर ही यह समझना सम्भव होता है कि ब्राह्मी चेतना के गुण, कर्म, स्वभाव ही अपने सद्गुरु के गुण-कर्म-स्वभाव हैं। जो ब्रह्म है, वही सद्गुरु है। बस फर्क है, तो इतना कि ब्रह्म निर्गुण-निराकार और निर्विशेष है और कृपालु सद्गुरु शिष्यों पर कृपा करने के लिए ब्रह्म का सगुण-साकार और सविशेष रूप हैं। इसमें भी असलियत यह है कि यह फर्क मात्र दिखता है, आभासी, दिखावटी और बनावटी है, असलियत में है नहीं। असलियत में तो गुरुदेव भगवान् साकार दिखते हुए भी निराकार हैं। एक कमरे में रहते हुए भी सर्वव्यापी हैं। अपनी बाहरी उपस्थिति के बावजूद शिष्यों के अन्तःकरण के स्वामी और अन्तर्यामी हैं।
  
🔷 परम कृपालु सद्गुरु की देह में जिस ब्रह्म चेतना का आवास-अधिष्ठान है, वही जगत् का कारण है। उसी के सत्य से जगत् की सत्ता और आनन्द है। उसी से सभी तत्त्व और सत्य प्रकाशित है, वही सारे सम्बन्धों का आधारभूत कारण है। चेतना की सभी अवस्थाएँ सद्गुरु चेतना से ही चैतन्य हैं। गुरु ही शिव है, वही विश्वरूप है। उनके इस स्वरूप को जानना अति कठिन है। कोरे बुद्धिपरायण लोग भला उनकी महिमा को क्या जाने। जो उनके लौकिक क्रिया कलापों को देखकर-समझकर यह कहता है कि मैं जान गया, वह उन्हें बिल्कुल भी नहीं जानता। जो भक्तिपूर्ण हृदय से उन्हें समर्पित हो जाता है, और यह कहता है कि हे प्रभु! मैं अज्ञानी आपको भला क्या जानूँ, वही उन्हें जानने का अधिकारी होता है। वही ब्रह्म है, उन्हें जानकर सब कुछ जान लिया जाता है। उन्हें नमन ही शिव-शक्ति और सृष्टि को नमन है। गुरु नमन के सत्य को जान लेने पर अन्य कुछ भी जानना शेष नहीं रहता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 51

👉 जीवन की सफलता

जीवन ऊर्जा का महासागर है। काल के किनारे पर अगणित अन्तहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं। इनकी न कोई शुरुआत है, और न कोई अन्त; बस मध्य है...