सोमवार, 13 अप्रैल 2020

👉 मन की तृप्ति

लस्सी का ऑर्डर देकर हम सब आराम से बैठकर एक दूसरे की खिंचाई मे लगे ही थे कि एक लगभग 70-75 साल की माताजी कुछ पैसे मांगते हुए मेरे सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गईं .. उनकी कमर झुकी हुई थी,. चेहरे की झुर्रियों मे भूख तैर रही थी .. आंखें भीतर को धंसी हुई किन्तु सजल थीं .. उनको देखकर मन मे ना जाने क्या आया कि मैने जेब मे सिक्के निकालने के लिए डाला हुआ हाथ वापस खींचते हुए उनसे पूछ लिया ..

"दादी लस्सी पिहौ का ? "
मेरी इस बात पर दादी कम अचंभित हुईं और मेरे मित्र अधिक .. क्योंकि अगर मैं उनको पैसे देता तो बस 2-4-5 रुपए ही देता लेकिन लस्सी तो 35 रुपए की एक है .. इसलिए लस्सी पिलाने से मेरे गरीब हो जाने की और उन दादी के मुझे ठग कर अमीर हो जाने की संभावना बहुत अधिक बढ़ गई थी!

दादी ने सकुचाते हुए हामी भरी और अपने पास जो मांग कर जमा किए हुए 6-7 रुपए थे वो अपने कांपते हाथों से मेरी ओर बढ़ाए .. मुझे कुछ समझ नही आया तो मैने उनसे पूछा ..
"ये काहे के लिए ?"
" इनका मिलाई के पियाइ देओ पूत ! "

भावुक तो मैं उनको देखकर ही हो गया था .. रही बची कसर उनकी इस बात ने पूरी कर दी !
एकाएक आंखें छलछला आईं और भरभराए हुए गले से मैने दुकान वाले से एक लस्सी बढ़ाने को कहा .. उन्होने अपने पैसे वापस मुट्ठी मे बंद कर लिए और पास ही जमीन पर बैठ गईं ...

अब मुझे वास्तविकता मे अपनी लाचारी का अनुभव हुआ क्योंकि मैं वहां पर मौजूद दुकानदार, अपने ही दोस्तों और अन्य कई ग्राहकों की वजह से उनको कुर्सी पर बैठने के लिए ना कह सका !

डर था कि कहीं कोई टोक ना दे .. कहीं किसी को एक भीख मांगने वाली बूढ़ी महिला के उनके बराबर मे बैठ जाने पर आपत्ति ना हो .. लेकिन वो कुर्सी जिसपर मैं बैठा था मुझे काट रही थी ..

लस्सी कुल्लड़ों मे भरकर हम लोगों के हाथों मे आते ही मैं अपना कुल्लड़ पकड़कर दादी के पड़ोस मे ही जमीन पर बैठ गया।

क्योंकि ये करने के लिए मैं स्वतंत्र था .. इससे किसी को आपत्ति नही हो सकती .. हां! मेरे दोस्तों ने मुझे एक पल को घूरा.. लेकिन वो कुछ कहते उससे पहले ही दुकान के मालिक ने आगे बढ़कर दादी को उठाकर कुर्सी पर बिठाया और मेरी ओर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर कहा ..
"ऊपर बैठ जाइए साहब! "

अब सबके हाथों मे लस्सी के कुल्लड़ और होठों पर मुस्कुराहट थी
बस एक वो दादी ही थीं जिनकी आंखों मे तृप्ति के आंसूं .. होंठों पर मलाई के कुछ अंश और सैकड़ों दुआएं थीं
ना जाने क्यों जब कभी हमें 10-20-50 रुपए किसी भूखे गरीब को देने या उसपर खर्च करने होते हैं तो वो हमें बहुत ज्यादा लगते हैं लेकिन सोचिए कभी कि क्या वो चंद रुपए किसी के मन को तृप्त करने से अधिक कीमती हैं?

दोस्तों.. जब कभी अवसर मिले अच्छे काम करते रहें भले ही कोई अभी आपका साथ ना दे.. !!

👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 13 April 2020


👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 13 April 2020


👉 In the Shrine of the Heart

Whenever you feel woeful, distressed or helpless in tragic circumstances or adversities around, whenever you feel demoralized by failures, whenever you see despair and darkness all around and are anxious about your future, whenever you are trapped in a dilemma and unable to think discreetly – don’t astray anymore in negativity. Remember, when a fox is surrounded by wild dogs
and sees no rescue, it runs swiftly back in to its den and feels relaxed and safe.

You should also throw away all thoughts and worries of your mind instantly and take shelter in the depths of your heart (the inner core of emotions, the inner self). Take a deep breath and just forget about everything; think as though nothing, not even your existence is there. As you would leave out these things at its doorsteps and enter deeper into the ‘shrine’ or your heart, you would that all the burden, all the worries and sufferings that were troubling you have evaporated. You have become light and floating like a thin piece of cotton. The calmness of your heart will sooth you like a moonlight shadow or a snow chamber to someone dying of heat in the sun of summer.

The purity of inner self is an edifice of peace and spiritual light. It is the source of ultimate realization and is therefore likened with “Brahmloka”. God has graciously endowed us with this paradise to experience divine bliss. But we remain unaware of it and astray externally because of our ignorance.

📖 Akhand Jyoti, March. 1941

👉 परिवर्तन की घड़ियाँ आ रही है

प्रजातन्त्र के नाम पर चलने वाली धाँधली में कटौती होगी। बोट उपयुक्त व्यक्ति ही दे सकेंगे। अफसरों के स्थान पर पंचायतें शासन सम्भालेंगी और जन सहयोग से ऐसे प्रयास चल पड़ेंगे जिनकी कि इन दिनों सरकार पर ही निर्भरता रहती है। नया नेतृत्व उभरेगा। इन दिनों धर्म क्षेत्र के और राजनीति के लोग ही समाज का नेतृत्व करते हैं। अगले दिनों मनीषियों की एक नई बिरादरी का उदय होगा जो देश, जति, वर्ग आदि के नाम पर विभाजित वर्तमान समुदाय को विश्व नागरिक स्तर की मान्यता अपनाने विश्व परिवार बनाकर रहने के लिए सहमत करेंगे। तब विग्रह नहीं, हर किसी पर सृजन और सहकार सवार होगा।

विश्व परिवार की भावना दिन-दिन जोर पकड़ेगी और एक दिन वह समय आवेगा जब विश्व राष्ट्र, आबद्ध विश्व नागरिक बिना आपस में टकराये प्रेम पूर्वक रहेंगे। मिल-जुलकर आगे बढ़ेंगे और वह परिस्थितियाँ उत्पन्न करेंगे जिसे पुरातन सतयुग के समतुल्य कहा जा सके।

इसके लिए नव सृजन का उत्साह उभरेगा। नये लोग नये परिवेश में आगे आयेंगे। ऐसे लोग जिनकी पिछले दिनों कोई चर्चा तक न थी, वे इस तत्परता से बागडोर संभालेंगे मानो वे इसी प्रयोजन के लिए कहीं ऊपर आसमान से उतरे हों या धरती फोड़ कर निकले हों।

यह हमारे स्वप्नों का संसार है। इनके पीछे कल्पनाएँ अटकलें काम नहीं कर रही हैं वरन् अदृश्य जगत में चल रही हलचलों का देखकर इस प्रकार का आभास मिलता है जिसे हम सत्य के अधिकतम निकट देख रहे हैं।

दूसरों को विनाश दीखता है, सो ठीक है, परिस्थितियों का जायजा लेकर निष्कर्ष निकालने वाली बुद्धि को भी झुठलाया नहीं जा सकता। विनाश की भविष्यवाणियों में सत्य भी है और तथ्य भी। पर हम आभास और विश्वास को क्या कहें। जो कहता है कि समय बदलेगा। घटाटोप की तरह घुमड़ने वाले काले मेघ किसी प्रचण्ड तूफान की चपेट से आकर उड़ते हुए कहीं से कहीं चले जायेंगे।

सघन तमिस्रा का अन्त होगा। ऊषाकाल के साथ उभारता हुआ अरुणोदय अपनी प्रखरता का परिचय देगा। जिन्हें तमिस्रा चिरस्थायी लगती हो, वे अपने ढंग से सोचें, पर हमारा दिव्य दर्शन, उज्ज्वल भविष्य की झाँकी करता है। लगता है इस पुण्य प्रयास में सृजन की पक्षधर देवशक्तियाँ प्राण-पण से जुट गयी हैं। इसी सृजन प्रयास के एक अकिंचन घटक के रूप में हमें भी कुछ कारगर अनुदान प्रस्तुत करने का अवसर मिल रहा है। इस सुयोग्य सौभाग्य पर हमें अतीव सन्तोष है और असाधारण आनन्द।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1984 पृष्ठ 18

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 April 2020

■ संसार में बहुत से प्राणी हैं। बड़े विचित्र विचित्र प्राणी हैं, मछलियां, चमगादड़, गिरगिट इत्यादि। इनमें से जो गिरगिट है, परमात्मा ने उसको ऐसी शक्ति और कला दी  है, कि जब उसे कहीं पर अपनी जान का खतरा दिखता है, तो वह अपने आसपास की रंगीली वस्तुओं के समान ही, अपने रंग भी बना लेता है। अर्थात खतरे की स्थिति में वह रंग बदलता है। जो परमात्मा ने उसको एक अच्छी कला दी है। इसका वह अपनी रक्षा के लिए उपयोग करता है।

परंतु एक छली कपटी बेईमान धूर्त मनुष्य तो अपनी रक्षा के लिए रंग नहीं बदलता। वह तो जब भी अवसर लगे, लूट झपट चालाकी धोखाधड़ी बेईमानी ठगी कुछ भी करना हो, दूसरे को कमजोर, मजबूर या अज्ञानी देखकर तुरंत रंग बदलता है। वह अपने स्वार्थ एवं मूर्खता के कारण रंग बदलता है, अपनी रक्षा के लिए नहीं। जब कि ईश्वर ने उसे वेदो में सावधान भी कर रखा है कि तुम लूटपाट चोरी चालाकी ठगी बेईमानी आदि पाप कर्म मत करना, ईमानदारी से जीना।

फिर भी मनुष्य कितना विचित्र प्राणी है कि पशु-पक्षियों, कीड़े मकोड़े आदि प्राणियों से भी गया गुजरा है। वह अपने स्वार्थ और मूर्खता के कारण कदम कदम पर रंग बदलता है। ऐसे मनुष्यों को ही ईश्वर अगले जन्मों में दंड देता है, और शेर भेड़िया मछली साँप बिच्छू गिरगिट चमगादड़ आदि विचित्र योनियों  में जन्म देकर दुख देता है।

ये कीड़े मकोड़े पशु पक्षी तो बेचारे अपने पिछले पापों का दंड भोग ही रहे हैं। बुद्धि कम होने से ये बेचारे समझ नहीं पा रहे, कि हम अपने पिछले पापों का दंड भोग रहे हैं।  परंतु मनुष्य में इतनी तो बुद्धि है कि वह इन प्राणियों को देखकर ही सीख जाए, कि मैं पाप न करूँ, अन्यथा मुझे भी इन कीड़े मकोड़े आदि प्राणियों की तरह से विभिन्न योनियों में दुख भोगने पड़ेंगे। ईश्वर सबको सद्बुध्दि देवे। सब लोग अच्छे काम करें, तथा अपने वर्तमान एवं भविष्य का सुधार करें।

👉 जीवन साधना

जीवन साधना के सत्य व तत्त्व को जान लेना जरूरी है। यह जानना अनिवार्य है कि जीवन साधना का बीज क्या है और फल क्या है? प्रारम्भ व परिणाम की पहचान हो जाना प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक है। कारण व कार्य के अन्तर्सम्बन्ध को बिना जाने जो चलता है, वह भूल करता है। केवल चल पड़ना और चलते चले जाना काफी नहीं है। चलने के साथ दिशा का सम्यक् ज्ञान भी होना चाहिए। इसी तरह जीवन साधना करने के साथ साधना विधि का सम्यक् बोध भी आवश्यक है।

    
जीवन साधना में परिधिगत होने के साथ कुछ केन्द्रीय भी है। प्रयास केन्द्र पर हो तो परिधि स्वयं ही सम्हल जाती है। उसे अलग से सम्हालने की कोई जरूरत नहीं है। केन्द्र ही परिधि में प्रकट होता रहता है। इस सन्दर्भ में केन्द्र क्या है? परिधि क्या है? ये सवाल उठने स्वाभाविक हैं। इन सवालों का सटीक जवाब यह है कि सद्ज्ञान केन्द्र है सदाचार परिधि है। सद्ज्ञान प्रारम्भ है, सदाचरण परिणाम है। सद्ज्ञान बीज है, सदाचार फल है।
    
ध्यान रहे सदाचरण अज्ञान में पैदा नहीं किया जा सकता। पैदा किया हुआ सदाचार सही सदाचार नहीं है। यह तो बस मिथ्या आवरण है। जिसके तले दुराचार दब जाता है। अँधेरे को दबाना, छिपाना नहीं है, उसे मिटाना है। दुराचार पर सदाचार के कागजी फूल नहीं चिपकाने हैं, उसे हटाना है, मिटाना है। सदाचार नहीं सद्ज्ञान लाना है। सद्ज्ञान स्वयं ही सदाचार बनकर समूचे जीवन पर छा जाता है।

सद्ज्ञान की साधना ही यथार्थ जीवन साधना है। सद्ज्ञान सर्व को प्रकाशित करता है। सद्ज्ञान के उदय से स्वयं ही अज्ञान एवं मोह का अँधेरा मिट जाता है। उससे ही राग व द्वेष नष्ट हो जाते हैं। इसी से जीवन में सचादार के फूल खिलते हैं। जिनकी सुगन्धि का विस्तार व्यक्ति एवं व्यक्तित्व दोनों को प्रकाशित करता है। साथ ही जीवन साधना करने वाला साधक शुद्ध, बुद्ध एवं मुक्त हो जाता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१३