शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 1)

Q.1. Why is Gayatri Mantra regarded as Guru Mantra?

Ans. Every body knows that one can learn very well under the direct guidance of a capable teacher. This, however, does not mean that a person devoid of knowledge and character be accepted as Guru. Instead of accepting an illiterate person as teacher and suffer the consequences it is better to regard the scriptures or any rishi  or devatma as one’s Guru and for this purpose even a picture or an idol of the person concerned can be used.

All human beings are born through the same biological process as other animals. Man is, therefore, in no way different from other species of animal kingdom, until he takes the first step towards his spiritual evolution by way of initiation in Sadhana. This ceremony of initiation amongst the Hindus is known as the Upnayan Sanskar.  The newly initiated person is called a Dwij (i.e. born-again) in spiritual parlance.

Each Hindu is traditionally required to undergo Upnayan Sanskar. In course of this ritual, the subject is made to wear a Janeu (sacred thread) across the body on the left shoulder as a constant reminder to follow the disciplines of Gayatri in life, (The Christians wear the crucifix for a similar purpose). During the Upnayan ceremony, the Guru initiates the person concerned exclusively in Gayatri Mantra. This is why it is known as the Guru Mantra.          
Literally too, the word ‘Guru’ in Sanskrit means ‘Heavy’, ‘powerful’ or ‘significant’. Since, this Mantra has been  referred to in the scriptures as the very manifestation of omnipotence and omniscience of God it is justifiably called as Guru Mantra.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 79

👉 दीया

दीया- जड़ और चेतन का मिलन है। दीया की देह मिट्टी की है, परन्तु उसकी ज्योति में चैतन्यता का प्रकाश है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय परिसर में भी एक दीया जलाया गया है। उसकी लौ सतत्-निरन्तर ऊपर उठ रही है। दीया की संरचना और संसाधन तो सांसारिक भूमि का भाग है। परन्तु उसकी लौ अनगिन जनों को प्रेरणा, प्रकाश व ऊर्जा देने के लिए लगातार ऊर्ध्वगामी बनी हुई है।
  
यह लौ विश्वविद्यालय के युवा छात्र-छात्राओं की चेतना की भाँति है। जिन्होंने अपने प्राणों का स्नेह डाल यह दीया जलाया है। डिवाइन इण्डिया यूथ एसोशिएशन- (ष्ठढ्ढङ्घ्न) यही नाम है इस दीया का। इसकी देह मातृभूमि की मिट्टी से बनी है। युवाओं का प्राणबल-मनोबल एवं आत्मबल ही वह तेल है, जिसके बल यह दीया जला है। युवाओं का संकल्प ही इस दीये की बाती है। और इसकी ज्योति, वह तो युवाओं-युवतियों की आत्मचेतना है। जो अपने साहस, पराक्रम, सद्ज्ञान व सद्कर्म की प्रकाश किरणें बिखेर कर देश व विश्व के युवाओं का सत्पथ-सन्मार्ग प्रकाशित कर रही है।
  
संरचना और साधन की दृष्टि से आज यह दीया छोटा लग सकता है; परन्तु इसके अतिरिक्त भी इसमें बहुत कुछ है। और वह है विश्वविद्यालय की युवा चेतना। यह अग्नि शिखा ही इसका प्राण है। इसके निरन्तर ऊपर उठने की उत्सुकता ही इसकी आत्मा है। यह लौ है इसीलिए तो दीया- दीया है, अन्यथा तो सब मिट्टी है। यह लौ पूरी तरह से जल उठेगी तो युवा भारत में क्रान्ति घटित होना सुनिश्चित है। जिनका ध्यान अभी तक इसकी संरचना और साधनों पर है, वे इसके सत्य को न समझ सकेंगे। परन्तु जिन्हें इसकी ज्योति दिखाई दे रही है, वे अवश्य इसके द्वारा होने वाले क्रांतिकारी परिवर्तनों को निहार सकेंगे। क्योंकि ज्योति पर ध्यान जाते ही सब कुछ परिवर्तित हो जाएगा। क्योंकि तब युवाओं के इस संकल्प में युग देवता भगवान् महाकाल के संकल्प के दर्शन अवश्य होंगे।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९०