गुरुवार, 18 जनवरी 2018

👉 अपनापन

🔶 कॉलबेल की आवाज़ सुनकर जैसे ही सुबह सुबह शांतनु ने दरवाजा खोला सामने एक पुराना से ब्रीफकेस लिए गांव के मास्टर जी और उनकी बीमार पत्नी खड़ी थीं। मास्टर जी ने चेहरे के हाव भाव से पता लगा लिया कि उन्हें सामने देख शांतनु को जरा भी खुशी का अहसास न हुआ है। जबरदस्ती चेहरे पर मुस्कुराहट लाने की कोशिश करते हुए बोला "अरे सर आप दोनों बिना कुछ बताए अचानक से चले आये!अंदर आइये।"

🔷 मास्टर साहब ब्रीफकेस उठाये अंदर आते हुए बोले" हाँ बेटा, अचानक से ही आना पड़ा मास्टरनी साहब बीमार हैं पिछले कुछ दिनों से तेज फीवर उतर ही नहीं रहा, काफी कमजोर भी हो गई है। गाँव के डॉक्टर ने AIIMS दिल्ली में अविलंब दिखाने की सलाह दी। अगर तुम आज आफिस से छुट्टी लेकर जरा वहाँ नंबर लगाने में मदद कर सको तो..."

🔶 "नहीं नहीं, छुट्टी तो आफिस से मिलना असंभव सा है "बात काटते हुए शांतनु ने कहा। थोड़ी देर में प्रिया ने भी अनमने ढंग से से दो कप चाय और कुछ बिस्किट उन दोनों बुजुर्गों के सामने टेबल पर रख दिये। सान्या सोकर उठी तो मास्टर जी और उनकी पत्नी को देखकर खूब खुशी से चहकते हुए "दादू दादी"बोलकर उनसे लिपट गयी दरअसल छः महीने पहले जब शांतनु एक सप्ताह के लिए गाँव गया था तो सान्या ज्यादातर मास्टर जी के घर पर ही खेला करती थी। मास्टर जी निःसंतान थे और उनका छोटा सा घर शांतनु के गाँव वाले घर से बिल्कुल सटा था। बूढ़े मास्टर साहब खूब सान्या के साथ खेलते और मास्टरनी साहिबा बूढ़ी होने के बाबजूद दिन भर कुछ न कुछ बनाकर सान्या को खिलातीं रहतीं थीं। बच्चे के साथ वो दोनों भी बच्चे बन गए थे।

🔷 गाँव से दिल्ली वापस लौटते वक्त सान्या खूब रोई उसके अपने दादा दादी तो थे नहीं मास्टर जी और मास्टरनी जी में ही सान्या दादा दादी देखती थी। जाते वक्त शांतनु ने घर का पता देते हुए कहा कि "कभी भी दिल्ली आएं तो हमारे घर जरूर आएं बहुत अच्छा लगेगा।" दोनों बुजुर्गों की आँखों से सान्या को जाते देख आँसू गिर रहे थे और जी भर भर आशीर्वाद दे रहे थे।

🔶 कुल्ला करने जैसे ही मास्टर जी बेसिन के पास आये प्रिया की आवाज़ सुनाई दी "क्या जरूरत थी तुम्हें इनको अपना पता देने की दोपहर को मेरी सहेलियाँ आती हैं उन्हें क्या जबाब दूँगी और सान्या को अंदर ले आओ कहीं बीमार बुढ़िया मास्टरनी की गोद मे बीमार न पड़ जाए"

🔷 शांतनु ने कहा "मुझे क्या पता था कि सच में आ जाएँगे रुको किसी तरह इन्हें यहाँ से टरकाता हूँ"

🔶 दोनों बुजर्ग यात्रा से थके हारे और भूखे आये थे सोचा था बड़े इत्मीनान से शांतनु के घर चलकर सबके साथ आराम से नाश्ता करेंगे। इस कारण उन्होंने कुछ खाया पिया भी न था। आखिर बचपन में कितनी बार शांतनु ने भी तो हमारे घर खाना खाया है। उन्होंने जैसे अधिकार से उसे उसकी पसंद के घी के आलू पराठे खिलाते थे इतना बड़ा आदमी बन जाने के बाद भी शांतनु उन्हें वैसे ही पराठे खिलायेगा।

🔷 " सान्या!!" मम्मी की तेज आवाज सुनकर डरते हुए सान्या अंदर कमरे में चली गयी। थोड़ी देर बाद जैसे ही शांतनु हॉल में उनसे मिलने आया तो देखा चाय बिस्कुट वैसे ही पड़े हैं और वो दोनों जा चुके हैं।

🔶 पहली बार दिल्ली आए दोनों बुजुर्ग किसी तरह टैक्सी से AIIMS पहुँचे और भारी भीड़ के बीच थोड़ा सुस्ताने एक जगह जमीन पर बैठ गए। तभी उनके पास एक काला सा आदमी आया और उनके गाँव का नाम बताते हुए पूछा" आप मास्टर जी और मास्टरनी जी हैं ना। मुझे नहीं पहचाना मैं कल्लू। आपने मुझे पढ़ाया है।"

🔷 मास्टर जी को याद आया "ये बटेसर हरिजन का लड़का कल्लू है बटेसर नाली और मैला साफ करने का काम करता था। कल्लू को हरिजन होने के कारण स्कूल में आने पर गांववालो को ऐतराज था इसलिए मास्टर साहब शाम में एक घंटे कल्लू को चुपचाप उसके घर पढ़ा आया करते थे।"

🔶 " मैं इस अस्पताल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हूँ। साफ सफाई से लेकर पोस्टमार्टम रूम की सारी जिम्मेवारी मेरी है।"

🔷 फिर तुरंत उनका ब्रीफकेस सर पर उठाकर अपने एक रूम वाले छोटे से क्वार्टर में ले गया। रास्ते में अपने साथ काम करने वाले लोगों को खुशी खुशी बता रहा था मेरे रिश्तेदार आये हैं मैं इन्हें घर पहुँचाकर अभी आता हूँ घर पहुँचते ही पत्नी को सारी बात बताई पत्नी ने भी खुशी खुशी तुरंत दोनों के पैर छुए फिर सब मिलकर एक साथ गर्मा गर्म नाश्ता किए। फिर कल्लू की छोटी सी बेटी उन बुजुर्गों के साथ खेलने लगी।

🔶 कल्लू बोला "आपलोग आराम करें आज मैं जो कुछ भी हूँ आपकी बदौलत ही हूँ फिर कल्लू अस्पताल में नंबर लगा आया। "कल्लू की माँ नहीं थी बचपन से ही।

🔷 मास्टरनी साहब का नंबर आते ही कल्लू हाथ जोड़कर डॉक्टर से बोला "जरा अच्छे से इनका इलाज़ करना डॉक्टर साहब ये मेरी बूढ़ी माई है "सुनकर बूढ़ी माँ ने आशीर्वाद की झड़ियां लगाते हुए अपने काँपते हाथ कल्लू के सर पर रख दिए। वो बांझ औरत आज सचमुच माँ बन गयी थी उसे आज बेटा मिल गया था और उस बिन माँ के कल्लू को भी माँ मिल गयी थी....

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 19 Jan 2018


👉 कुसंगत में मत बैठो!

🔶 पानी जैसी जमीन पर बहता है, उसका गुण वैसा ही बदल जाता है। मनुष्य का स्वभाव भी अच्छे बुरे लोगों के अनुसार बदल जाता है। इसलिए चतुर मनुष्य बुरे लोगों का साथ करने से डरते हैं, लेकिन अच्छे व्यक्ति बुरे आदमियों के साथ घुल−मिल जाते हैं और अपने को भी वैसा ही बना लेते हैं। मनुष्य की बुद्धि तो मस्तिष्क में रहती है, परन्तु कीर्ति उस स्थान पर निर्भर रहती है जहाँ वह उठता बैठता है। आदमी का घर चाहे कहीं भी हो, पर असल में उसका निवास स्थान वह है जहाँ वह उठता बैठता है और जिन लोगों की सोहबत पसन्द करता है। आत्मा की पवित्रता मनुष्य के कार्यों पर निर्भर है और उसके कार्य संगति के ऊपर निर्भर है। बुरे लोगों के साथ रहने वाला अच्छे काम करे यह बहुत कठिन है। धर्म से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, लेकिन धर्माचरण करने की बुद्धि सत्संग से ही उत्पन्न होती है। याद रखो कुसंग से बढ़कर कोई हानि नहीं और सत्संगति से बढ़ कर कोई लाभ नहीं।  

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1942 पृष्ठ 1

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/December/v1.1

👉 अपने अन्दर के भगवान् को जगाइये

🔶 संसार के छोटे कहे जाने वाले प्राणी एक निश्चित प्रकृति लेकर जन्मते हैं और प्राय: अंत तक उसी स्थिति में बने रहते हैं। इतना स्वार्थी मनुष्य ही था, जिसे अपने साधनों से तृप्ति नहीं हुई और उसने दूसरों के स्वत्व का अपहरण करना प्रारंभ किया। न्यायाधीश बनकर आया था; पर स्वयं अन्याय करने लगा। ऐसी स्थिति में परमात्मा के अनुदान भला उसका कब तक साथ देते; क्योंकि परमात्मा ने ही आत्मा को आच्छादित कर रखा है। आत्मा मेें जो भी शक्ति और प्रकाश है, वह सब परमात्मा का ही स्वरूप है। परमात्मा आत्मा से विलग कहाँ?
  
🔷 सम्पूर्ण देव शक्तियाँ इसमें समायी हुई हैं। जब अग्रि देव जाग्रत् होते हैं, तो भूख लगती है, वरुण देवता को जल की जरूरत पड़ती है। किसी को निद्रा की, तो किसी को जागृति की। सबकी अपनी दिशा-अपना काम है।
  
🔶 इनमें पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता न होती रहे और उनका नियंत्रण बराबर किया जाता रहे। इस दृष्टि से एक जबरदस्त नियामक सत्ता की आवश्यकता जान पड़ी, तो परमात्मा स्वयं उसमें आत्मा के रूप में समा गया। इस तरह इस अद्ïभुत मनुष्य जीवन का प्रादुर्भाव इस सृष्टि में हुआ। तब से लेकर आज तक मनुष्य निरन्तर एक प्रयोग के रूप में चलता आ रहा है। कभी वह गलती करता है, तो उस अपराध के बदले सजा मिलती है और यदि वह अधिक कर्तव्यशील होता है, तो उसे अधिक बड़े ईनाम और अधिकार दिये जाते हैं। गलती का परिणाम दु:ख और भलाई का परिणाम सुख। सुख और दु:ख का यह अंतद्र्वन्द्व आदिकाल से चलता आ रहा है।
  
🔷 जब मनुष्य के अन्तर का असुर-भाग बलवान हो जाता है, तो दु:खों में बढोत्तरी होती है। वर्तमान समय इस स्थिति की पराकाष्ठा है, यह कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। मनुष्य का यह पतन देखकर विश्वास नहीं होता कि उसके अंदर परमात्मा जैसी महत्त्वपूर्ण शक्ति का विकास हो सकता है। दुर्बल मनुष्य में सर्वशक्तिमान् परमात्मा ओत-प्रोत हो सकता है, इसकी इन दिनों कल्पना भी नहीं की जा सकती।
  
🔶 मनुष्य की इस दयनीय दशा का एक ही कारण है और वह यह है कि उसने अपनी मनोभूमि इतनी गंदी बना ली है, जहां परमात्मा का प्रखर प्रकाश पहँुचना सम्भव नहीं है। यदि सचेत रहकर उसने अपनी भलाई की शक्ति को जीवन्त रखा होता, तो वह जिन साधनों को लेकर इस धरती पर आया था, वे अचूक ब्रह्म अस्त्र है। उनकी शक्ति वज्र से भी प्रबल सिद्ध होती है। सृष्टिï का अन्य कोई भी प्राणी उसका सामना करने में समर्थ नहीं हो सकता। वह युवराज बनकर आया था। विजय, सफलतायें, उत्तम सुख, शक्ति, शौर्य-साहस, निर्भयता उसे उत्तराधिकार में मिले थे। इनसे वह चिरकाल तक सुखी रह सकता था। भ्रम, चिन्ता, शंका, संदेह आदि का कोई स्थान उसके जीवन में नहीं, पर अभागे मनुष्य ने अपनी दुरवस्था अपने आप उत्पन्न की। अंत:करण की-ईश्वरीय सत्ता की उपेक्षा करने के कारण ही उसकी यह दु:खद स्थिति बनी। अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारने का अपराधी मनुष्य स्वयं है, इसका दोष परमात्मा को नहीं।
  
🔷 ईश्वरीय गुणों से पथ-भ्रष्टï मनुष्य की जो दुर्दशा होनी चाहिए थी, वह हुई। दु:ख की खेती उसने स्वयं बोई और उसका फल भी उसे ही चखना पड़ा। परमात्मा हमारे अति समीप रहकर प्रेम का संदेश देता है, पर मनुष्य अपनी वासना से (कुबुद्धि से) उसे कुचल देता है। वह अपनी सादगी, ताजगी और प्राण शक्ति से हमें सदैव अनुप्राणित रखने का प्रयत्न करता है, पर मनुष्य आडम्बर, आलस्य और अकर्मण्यता के द्वारा उस शक्ति को छिन्न-भिन्न कर देता है। कालान्तर में जब आंतरिक प्रकाश की शक्ति क्षीण पड़ जाती है, तो दु:ख और द्वन्द्व के बखेड़े बढ़ जाते हैं। तब मनुष्य को औरों की भलाई करना तो दूर, अपना ही जीवन भार रूप हो जाता है। परमात्मा की अंत:करण से विस्मृति ही कष्टï और क्लेश के बंधन का कारण है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी प्रगति उत्कृष्टता की दिशा में हो (भाग 2)

🔶 निर्माण निर्माण है। वह कैसा भी हो—आखिर वह निर्माण ही है—इस उक्ति को मान्यता नहीं दी जा सकती। यदि निकृष्ट निर्माण को भी मान्यता दी जाने लगेगी, तो संसार में उत्कृष्टता एवं श्रेष्ठता का कोई मूल्य, महत्व ही न रह जायेगा। निर्माण संज्ञा का वास्तविक अधिकारी उत्कृष्ट निर्माण ही हो सकता है, निकृष्ट निर्माण नहीं। अपने को धनवान् अथवा विद्वान् निर्माण करने में जिसने अयोग्य तथा अनुचित उपायों का प्रयोग किया है उसे यदि धनवान और विद्वान् मान लिया जायेगा तो फिर चोर, धूर्त अथवा ठग किसे कहा जाएगा और इस तथाकथित धनवान तथा विद्वान् में क्या अन्तर रह जायेगा। जिसने परिश्रम, पुरुषार्थ, अध्यवसाय एवं तपस्या के आधार पर अपना निर्माण किया है।

🔷 शिव और अशिव के दो विरोधी उपायों से अर्जित उपलब्धियों को समान श्रेय नहीं दिया जा सकता। यदि कोई ऐसा करता अथवा मानता है तो वह या तो अज्ञानी है अथवा अधम प्रकृति का व्यक्ति। उत्कृष्ट निर्माण ही निर्माण है और निकृष्ट निर्माण मिथ्या क्रियाकलाप। अस्तु, उचित यही है कि वह जिस क्षेत्र में अपना निर्माण करे तो उत्कृष्ट रीति से ही करे, नहीं तो कंचन के रूप में पापों की गठरी बांधने से कहीं अच्छा है कि वह निर्धन और गरीब बना रहे।

🔶 उत्कृष्ट निर्माण का आधार धर्म है। धर्म का अर्थ अधिकतर लोग पूजा-पाठ, जप, उपासना, कीर्तन, भक्ति आदि ही मानते हैं। इसीलिये जीवन के अन्य कार्यक्रमों के साथ एक छोटा-सा धार्मिक कार्यक्रम और जोड़कर समझते हैं कि दुनियादारी के साथ-साथ धर्म का भी निर्वाह करते हैं। पूजा-पाठ आदिक कार्यक्रम को धर्म मानने वाले यह नहीं समझ पाते कि संसार का हर काम का एक धर्म होता है। उसके कुछ आदर्श और नियम होते हैं। पूजा-पाठ के कार्यक्रम के साथ जीवन क्रम के हर काम के आदर्श और नियम निर्वाह करने वाले को ही सच्चा धार्मिक कहा जा सकता है।

🔷 केवल मात्र पूजा-पाठ, जप-तप तक ही सीमित रहकर यदि कोई चाहे कि वह अपना उत्कृष्ट निर्माण कर लेगा, तो उसे निराश ही रहना होगा। उत्कृष्ट निर्माण तभी सम्भव होगा जब जीवन की प्रत्येक गतिविधि का धर्म-निर्वाह किया जायेगा। कोई पूजा-पाठ तो करता रहे, साथ ही कार-रोजगार, आचार-व्यवहार में असत्य, मिथ्या और बेईमान बना रहे तो उसका निर्माण निकृष्ट कोटि का ही हो सकेगा। जीवन क्रम में पग-पग पर ईमानदार, सत्यपरायण और आदर्शवान बने रहने पर यदि कोई पूजा-पाठ वाले धर्म के लिये समय नहीं दे पाता तो भी उसका निर्माण उत्कृष्ट ही होगा। उस छोटी-सी कमी के कारण उसकी जीवन तपस्या असफल नहीं हो सकती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अक्टूबर 1970 पृष्ठ 16
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/October/v1.16

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.11

👉 Amrit Chintan 19 Jan

🔷 What is known as illusion a Maya in our scripts of ancient time is nothing but it is human shortsightedness weaknesses and ignorances in life. We put blame to God or luck that everything is God planned no. is not so. Our weaknesses must be overpowered your own self control and hard sincere work. If we will not control our-self we will ruin our life.

🔶 Body and mind are one for the life mind controls body. The whole life of a man is governed by the nature of mind he has. It is all his thinking which is translated in action. This is the reason that any evil in our thinking will also affect body.

🔷 It is Brahmvarchas Sadhana – that is self-restraint and self-discipline, which will to solve our worldly problems and to develop the self, but for that continuous practice and devotion to realize that effect.

🔶 There are some basic concepts to have a cheerful life. They are so simple that you don’t need any training in any institute. You need not to find any Guru in the caves. The difference between the people of good and bad nature can always be seen easily the handsome look of a boy or a beauty of a girl is not by color of skin or so but happiness and good character radiates the beauty.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 2)

🔷 मित्रो! जंगली लोगों के लिए शिक्षा की आवश्यकता थी, त्याग की आवश्यकता थी और न जाने किस-किस चीज की आवश्यकता थीं। बहुत सारी चीजों की आवश्यकता थी। उन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सुयोग्य व्यक्ति वहाँ चले गये। हिन्दुस्तान में उन दिनों शिक्षा की बहुत सुविधाएँ थीं, बहुत श्रम था, बहुत सारे ऋषि थे। गंगा, जमुना में बहुत निर्मल जल था। यहाँ साधनों की कमी नहीं थी। जहाँ साधन हैं, वहीं पर संत को रोककर रखा जाय, यह भी कोई तुक है? जहाँ पर साधन हैं, सुविधा है, वहाँ किनको रहना चाहिए? बीमारों को रहना चाहिए, बुजुर्गों को रहना चाहिए। वहाँ थके हुए लोगों को रहना चाहिए। शान्तिकुंज में हमें उन्हीं लोगों को रखना चाहिए, काली कमली वाले के यहाँ उन्हीं लोगों को रखना चाहिए, जो थक गये हों, जो टूट गये हों, मरे-मराये से हों, जिनके शरीरों में अब दम नहीं रहा और उनके मन में कोई उत्साह नहीं रहा। उत्साह जिनका खत्म हो गया, आँखों का प्रकाश जिनका खत्म हो गया, जीवट जिनका खत्म हो गया। अब हम उनको कहाँ रखें? अब हम उनको काली कमली वाले बाबा की झोपड़ी में रखेंगे। बस वह वहीं बैठा रहा करेगा। टट्टी-पेशाब कर आया करेगा। कुल्ला कर लिया करेगा, मुँह धो लिया करेगा। गंगा जी नहा लिया करेगा और शांतिपूर्वक रहा करेगा।

🔶 मित्रो! हम उनको वहीं रखेंगे, क्योंकि वे और आगे चल नहीं सकते। अब उनकी जिन्दगी खत्म हो गयी। अब उनका जीवन खत्म हो गया। अब उनका जोश खत्म हो गया। अब उनकी भावनायें खत्म हो गयीं। अब जिनकी भावनायें खत्म हो गयी हैं, जो थक गये हैं, जो टूट गये हैं, जो मर गये हैं, उनको अब हम कहाँ से भेज सकते हैं? उनको अब हम श्मशान भूमि की तैयारी के लिए उचित स्थान पर रखेंगे। डेड बॉडी को पोस्टमार्टम करने के बाद बड़े अस्पतालों में, मुर्दाघरों में रख देते हैं, ताकि उनके खानदान वाले आयें और लाश को उठाकर ले जा सकें। फिर उसको मरघट में ले जाकर या उसको कब्रिस्तान में ले जाकर दफन कर दें। ऐसे लोगों को हम कहाँ रखेंगे, जिनका जीवट खत्म हो गया है, जो भुस्स गये हैं। इन्हें तो बस काली कमली वाले बाबाजी के आश्रम में रखेंगे, स्वर्गाश्रम में रखेंगे और उनको हम परमार्थ आश्रम में रखेंगे। क्यों? क्योंकि वे कुछ काम नहीं कर सकते, चल नहीं सकते। उनके भीतर चलने वाली वस्तु नहीं है, माद्दा नहीं है और उनके अंदर क्रियाशीलता जैसी कोई वस्तु नहीं है। और जीवट जैसी वस्तु नहीं हैं। आप ही बताइये? उनको हम कहाँ रख सकते हैं।

🔷 इसलिए मित्रो! उन लोगों के लिए कोई स्थान विशेष में निवास करने के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन जिनके अंदर जीवट है, जिनके अंदर जीवन है, जिनके अंदर प्रकाश है, जिनके अंदर प्रेरणा विद्यमान है, उनको हम कार्यक्षेत्र में भेजेंगे। अब उनको कार्यक्षेत्र में भेजे बिना काम बनेगा नहीं। भगवान बुद्ध ने यही किया था। प्रत्येक जीवन्त व्यक्ति को, जिसके अंदर आध्यात्मिकता का थोड़ा-बहुत प्रकाश मौजूद था, उन्होंने उनको अपने विहारों में रखा ही नहीं। उन्होंने कहा कि हम आपके विहार में रहेंगे और आपका सत्संग करेंगे। भगवान बुद्ध ने कहा कि बहुत लम्बे समय तक सत्संग करना आवश्यक नहीं है। बहुत लम्बे समय तक दवाइयाँ खाना आवश्यक नहीं है। व्यायाम करना आवश्यक है, पर सारे समय रोटी खाना आवश्यक नहीं है। उन्होंने कहा कि गुरुजी! हम तो आपके पास रहा करेंगे और रोटी खाया करेंगे। माता जी आप बनाती जायँ और हम खाते जायँ। बेटे, कितने दिन खायेगा? माता जी आपका चौका सबेरे छः बजे से चलता है, उस वक्त से खाया करूँगा। कब तक खायेगा? तब तक खाऊँगा, जब तक रात के दस बजे तब बंद नहीं हो जाता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 20)

👉 स्वयं से कहो-शिष्योऽहम्
🔷 सद्गुरु के मुख में ब्रह्म का वास होता है। उनकी वाणी ब्रह्म वाणी है। उनके द्वारा बोले गए वचन ब्रह्म वाक्य हैं। महान् दार्शनिक योगी भगवान् शंकराचार्य ने कहा है- मंत्र वही नहीं है, जो वेद और तन्त्र ग्रन्थों में लिखे हैं। मंत्र वे भी हैं, जिन्हें गुरु कहते हैं। सद्गुरु के वचन महामंत्र हैं। इनके अनुसार साधना करने वाला जीवन के परम लक्ष्य को पाए बिना नहीं रहता। पतिव्रता स्त्री की भाँति मन, वाणी और कर्म की सम्पूर्ण निष्ठा को नियोजित करके गुरुदेव भगवान् का ध्यान करना चाहिए। भावना हो या चिन्तन अथवा फिर क्रिया, सभी कुछ सम्मिलित रूप से एक ही दिशा में- सद्गुरु के चरणों की ओर प्रवाहित होना चाहिए।

🔶 ध्यान रहे इस महासाधना में अपना कोई बड़प्पन आड़े न आए। अपना कोई क्षुद्र स्वार्थ इसमें बाधा न  बने। श्री रामकृष्णदेव कभी-कभी हँसते हुए अपने भक्तों से कहते थे- कुछ ऐसे हैं, जिनके मन में तो भगवान् के प्रति और गुरु के प्रति भक्ति है; परन्तु उन्हें लाज लगती है, शरम आती है कि लोग क्या कहेंगे? आश्रम एवं कुल की झूठी मर्यादा, अपनी जाति का अभिमान, यश-प्रतिष्ठा का लोभ उन्हें गुरु की सेवा करने में बाधा बनता है। परमहंस देव जब यह कह रहे थे, तो उनके एक भक्त शिष्य मास्टर महाशय ने पूछा, तो फिर मार्ग क्या है? परमहंस देव ने कहा—इन सबको छोड़ दो, त्यागो इन्हें, तिनके की तरह। सद्गुरु की आज्ञापालन में जो भी बाधाएँ सामने आएँ, उनका सामना करने में कभी कोई संकोच नहीं करना चाहिए।

🔷 स्वामी विवेकानन्द महाराज कहा करते थे- तुम अपने से पूछो- कोऽहम्? मैं कौन हूँ? देखो तुम्हें क्या उत्तर मिलता है। हो सकता है तुम्हें उत्तर मिले मैं पुत्र हूँ, पिता हूँ, पति हूँ अथवा पत्नी हूँ, माँ हूँ, पुत्री हूँ। ऐसे उत्तर मिलने पर और गहराई में उतरो- गुरुचरणों में और ज्यादा नेह बढ़ाओ। फिर तुम्हें एक और सिर्फ एक उत्तर मिलेगा- ‘शिष्योऽहम्’ मैं शिष्य हूँ। सारे रिश्ते-नाते इस एक सम्बन्ध में विलीन हो जाएँगे। ध्यान रहे जो शिष्य है, वही साधक हो सकता है। उसी में जीवन की समस्त सम्भावनाएँ साकार हो सकती हैं और जो सच्चा शिष्य है- उसके सभी कर्त्तव्य अपने गुरु के लिए हैं। ऐसे कर्त्तव्यनिष्ठ शिष्य को सद्गुरु कृपा किस रूप में फलती है, इसका बोध भगवान् भोलेनाथ ने गुरुगीता के अगले मंत्रों में कराया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 36

👉 भाग्य और कर्म

🔶 एक बार देवर्षि नारद जी वैकुंठधाम गए, वहां उन्होंने भगवान विष्णु का नमन किया। नारद जी ने श्रीहरि से कहा,
'प्रभु! पृथ्वी पर अब आपका प्रभाव कम हो रहा है। धर्म पर चलने वालों को कोई अच्छा फल नहीं मिल रहा, जो पाप कर रहे हैं उनका भला हो रहा है।'

🔷 तब श्रीहरि ने कहा, 'ऐसा नहीं है देवर्षि, जो भी हो रहा है सब नियति के जरिए हो रहा है।'

🔶 नारद बोले, मैं तो देखकर आ रहा हूं, पापियों को अच्छा फल मिल रहा है और भला करने वाले, धर्म के रास्ते पर चलने वाले लोगों को बुरा फल मिल रहा है।

🔷 भगवान ने कहा, कोई ऐसी घटना बताओ। नारद ने कहा अभी मैं एक जंगल से आ रहा हूं, वहां एक गाय दलदल में फंसी हुई थी। कोई उसे बचाने वाला नहीं था।
तभी एक चोर उधर से गुजरा, गाय को फंसा हुआ देखकर भी नहीं रुका, वह उस पर पैर रखकर दलदल लांघकर निकल गया। आगे जाकर चोर को सोने की मोहरों से भरी एक थैली मिली।

🔶 थोड़ी देर बाद वहां से एक वृद्ध साधु गुजरा। उसने उस गाय को बचाने की पूरी कोशिश की। पूरे शरीर का जोर लगाकर उस गाय को बचा लिया लेकिन मैंने देखा कि गाय को दलदल से निकालने के बाद वह साधु आगे गया तो एक गड्ढे में गिर गया।

🔷 प्रभु! बताइए यह कौन सा न्याय है?

🔶 नारद जी की बात सुन लेने के बाद प्रभु बोले, 'यह सही ही हुआ। जो चोर गाय पर पैर रखकर भाग गया था, उसकी किस्मत में तो एक खजाना था लेकिन उसके इस पाप के कारण उसे केवल कुछ मोहरें ही मिलीं।'

🔷 वहीं, उस साधु को गड्ढे में इसलिए गिरना पड़ा क्योंकि उसके भाग्य में मृत्यु लिखी थी लेकिन गाय के बचाने के कारण उसके पुण्य बढ़ गए और उसे मृत्यु एक छोटी सी चोट में बदल गई।

🔶 इंसान के कर्म से उसका भाग्य तय होता है।

संक्षेप में
🔷 इस दुनिया में कर्म को मानने वाले लोग कहते हैं भाग्य कुछ नहीं होता।
🔶 और भाग्यवादी लोग कहते हैं किस्मत में जो कुछ लिखा होगा वही होके रहेगा।
🔷 यानी इंसान कर्म और भाग्य इन दो बिंदुओं की धूरी पर घूमता रहता है।
🔶 और एक दिन इस जग को अलविदा कहकर चला जाता है। इंसान को कर्म करते रहना चाहिए, क्योंकि कर्म से भाग्य बदला जा सकता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 18 Jan 2018


👉 प्रगति के पाँच आधार

अरस्तू ने एक शिष्य द्वारा उन्नति का मार्ग पूछे जाने पर उसे पाँच बातें बताई।

🔶 (1) अपना दायरा बढ़ाओ, संकीर्ण स्वार्थ परता से आगे बढ़कर सामाजिक बनो।   

🔷 (2) आज की उपलब्धियों पर संतोष करो और भावी प्रगति की आशा करो।   

🔶 (3) दूसरों के दोष ढूँढ़ने में शक्ति खर्च न करके अपने को ऊँचा उठाने के प्रयास में लगे रहो।
  
🔷 (4) कठिनाई को देख कर न चिन्ता करो न निराश होओ वरन् धैर्य और साहस के साथ उसके निवारण का उपाय करने में जुट जाओ।
  
🔶 (5) हर किसी में अच्छाई खोजो और उससे कुछ सीख कर अपना ज्ञान और अनुभव बढ़ाओ। इन पाँच आधारों पर ही कोई व्यक्ति उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है।

📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1973 पृष्ठ 1


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/April/v1

👉 आपका मूल्य क्या है?

🔶 एक प्रसिद्ध चित्रकार के जीवन की एक घटना हैं। उसके पास एक धनी कलाप्रेमी चित्र खरीदने आया। उसने एक चित्र को देखकर उसका दाम पूछा। चित्रकार ने उसकी कीमत 50 गिन्नी बताई। कला प्रेमी ने छोटे से चित्र की अधिक कीमत पर आश्चर्य जताया। इस पर कलाकार ने कहा- पूरे तीन साल निरंतर परिश्रम करने के बाद मैं इस योग्य बना हूं कि ऐसे चित्र को चार दिनों में बना सकता हूँ। इसके पीछे मेरा वर्षों का अनुभव, साधना और योग्यता छिपी हुई है। कला प्रेमी उत्तर से संतुष्ट हुआ और उसने चित्र खरीद लिया। यदि चित्रकार अपनी कला का मूल्य कम लगाता तो निश्चय ही उसे कम मूल्य मिलता, पर उसके आत्म विश्वास और कला साधना की जीत हुई।
  
🔷 चित्रकार ने अपने को जितना मूल्यवान समझा, संसार ने उतना ही महत्व स्वीकार किया। हमें उतना ही सम्मान, यश, प्रतिष्ठा प्राप्त होती है, जितना हम स्वयं अपने व्यक्तित्व का लगाते हैं। शांत चित्त से कभी-कभी अपने चरित्र की अच्छाइयों, श्रेष्ठताओं और उत्तम गुणों पर विचार करें। आप जितनी देर तक अपनी अच्छाइयों पर मन एकाग्र करेंगे, उतना वे आपके चरित्र में विकसित होंगी। बुराइयों को त्यागने का अमोघ उपाय यह है कि हम एकान्त में अपने चरित्र, स्वभाव और श्रेष्ठ गुणों का चिन्तन करें और इससे दिव्यताओं की अभिवृद्धि करते रहें। मनुष्य के मन में ऐसी अद्ïभूत गुप्त चमत्कारी शक्तियां दबी पड़ी रहती हैं कि वह जिन गुणों का चिन्तन करता है, गुप्त रूप से वे दिव्य गुण उसके चरित्र में बढ़ते-पनपते रहते हैं। आत्म निरीक्षण के माध्यम से आप अपने दैवीय विशिष्ट गुण को बखूबी मालूम कर सकते हैं अथवा किसी योग्य चिकित्सक की सहायता ले सकते हैं। अब्राहम लिंकन की उन्नति का गुर यही था। उसने निरंतर ध्यान और मनोवैज्ञानिक अध्ययन द्वारा अपने छिपे हुए गुणों को खोज निकाला। वह उसी दिशा में निरंतर उन्नति करता गया। एक चिरप्रचलित उक्ति है- ‘मनुष्य अपने मन में स्वयं को जैसा मान बैठा है, वस्तुत: वह वैसा ही है।’

🔶 प्राय: हम देखते हैं कि अनेक अभिभावक दूसरों के बच्चों की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं और अपने बच्चे की बुराई। वे बच्चों को  डांटते-फटकारते हैं। नतीजतन उनके बच्चे बड़े होकर घर से भाग जाते हैं या घर पर नहीं टिकते। अभिभावक अपने बच्चों का कम मूल्य लगाते हैं, फलस्वरूप समाज भी उन्हें घटिया दर्जे का ही मानता है। आप कभी-कभी अपने गुणों, अपनी विलक्षण प्रतिभा, अपनी विशेष ईश्वरीय देन के बारे में खूब सोचिए। त्रुटियों की उपेक्षा कर श्रेष्ठताओं की सूची बनाइए। उन्हीं पर विचार और क्रियाएं एकाग्र कीजिए। यह अपनी श्रेष्ठताएं विकसित करने का मनोवैज्ञानिक मार्ग है। प्रिय पाठक, आपको अपनी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक और अनेक शक्तियों का ज्ञान नहीं है। आप नेत्रों पर पट्टी बांधे अन्धा-धुन्ध आगे मार्ग टटोल रहे हैं। यदि आप अपनी गुप्त शक्तियों के सहारे आगे बढऩे लगें, मन को सृजनात्मक रूप में शिक्षित कर लें तो जीवन फूलों की सेज प्रतीत होगा और अनेक कार्य आप पूर्ण करने लगेंगे।

🔷 आप ताकत की दवाइयां खाते हैं। पौष्टिक अन्न लेते हैं। डंड, मुद्ïगर और तरह-तरह की कसरतें करते हैं। पर सच तो यह है कि शक्ति कहीं बाहर से नहीं आती, वह स्वयं हमारे अन्दर ही मौजूद है। जो हमारे मन की अवस्था के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है। डेढ़ पसली के महात्मा गांधी के शरीर में एक दृढ़ निश्चयी मन की ही ताकत थी। उस मन की शक्ति से ही उन्होंने विदेशी राष्ट्र की जड़ें खोखली कर दी थीं। आप में भी असीम शक्तियाँ भरी पड़ी हैं। उनकी खोज की जाय, तो निश्चय ही आप संसार को चमत्कृत कर सकते हैं। अब आज से आप नए सिरे से अपने व्यक्तित्व का मूल्यांकन कीजिए।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी प्रगति उत्कृष्टता की दिशा में हो (भाग 1)

🔶 मनुष्य अपना शिल्पी आप है। प्रारम्भ में वह एक चेतन-पिण्ड के रूप में ही उत्पन्न होता है। अपने जन्म के साथ न तो वह गुणी होता है, न बुद्धिमान, न विद्वान और न किसी विशेषता का अधिकारी। परमात्मा उसे मानव-मूर्ति के रूप में जन्म देता है और बीज रूप में उपयोगी शक्तियों को उसके साथ कर देता है। इसके बाद का सारा काम स्वयं मनुष्य को करना होता है। अपने इस उत्तरदायित्व के अनुसार वह स्वतन्त्र है कि अपनी रचना योग्यतापूर्वक करे अथवा अयोग्यतापूर्वक। जो अपनी रचना योग्यतापूर्वक करते हैं पुरस्कार रूप में वे परम पद पाकर चिदानन्द के अधिकारी होते हैं और जो अपनी रचना में असफल होते हैं वे जन्म-मरण के चक्र में चौरासी लाख योनियों की यातना सहते हैं।

🔷 मानव-पिण्ड के रूप में आया प्रारम्भिक मनुष्य अपने वंश के अनुसार विकसित होता हुआ अपना निर्माण प्रारम्भ कर देता है। अपनी सूझ-बूझ और निर्णय के अनुसार कोई धनवान बनता है, कोई विद्वान् बनता है, कोई व्यापारी बनता है तो कोई श्रमिक। कोई पापी बनता है तो कोई पुण्यात्मा। मनुष्य अपना निर्माण अनेक प्रकार का कर सकता है। मानव-निर्माण का कोई एक स्वरूप नहीं, असंख्य स्वरूप एवं प्रकार हैं। किन्तु उन सबको बांटकर दो प्रकारों में किया जा सकता है। एक उत्कृष्ट निर्माण दूसरा निकृष्ट निर्माण।

🔶 मनुष्य कुछ भी बने, किसी क्षेत्र अथवा किसी दिशा में बढ़े, विकास करे, यदि उसमें उसने श्रेष्ठता का समावेश किया हुआ है तो उसका निर्माण उत्कृष्ट निर्माण ही कहा जायेगा और यदि वह उसमें अधमता का समावेश करता है तो उसका निर्माण निकृष्ट ही माना जायेगा। उदाहरणार्थ यदि वह धन के क्षेत्र में बढ़कर अपना निर्माण धनाढ्य के रूप में करता है किन्तु इसकी सिद्धि में दुष्ट साधनों तथा उपायों का प्रयोग करता है, तो कहना होगा कि वह अपना निर्माण निकृष्ट कोटि का कर रहा है। यदि वह इसकी सिद्धि में सत्य, शिव और सुन्दर से सुशोभित साधनों तथा उपायों का अवलम्बन करता है तो कहना होगा कि वह अपना निर्माण उत्कृष्ट कोटि का कर रहा है। इस प्रकार मनुष्य का कोई भी आत्म निर्माण या तो उत्कृष्ट कोटि का होता है अथवा निकृष्ट कोटि का।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अक्टूबर 1970 पृष्ठ 16

👉 Meaningful Utilization of Time

🔷 There is not a single moment of life that may be called ordinary. Every moment is extraordinary and unique. It was some moment which gave life to us. It is also some moment which makes us feel good or bad, gives the blessing of success or the bane of failure. Every moment brings with it a unique experience. True wisdom lies in proper utilization of that moment. Time is full of boons. Awakened persons fully live in the present moment and utilize their time wisely. But most of us go through life unconsciously and aimlessly. Thus nothing worthwhile is gained.

🔶 On the other hand, whatever is already available also gets wasted. If one searches the cause of failures, one will easily find it to be the laziness that has unconsciously crept into the psyche. This vice burns time like a firework. Therefore there is need to cultivate the habit of learning new techniques that save time and make the tasks easy. It requires making disorganized lifestyle orderly and moulding the thoughts according to the task at hand. Then only will it be possible to utilize the time in a meaningful way. The present moment is the only moment we have and we must utilize it wisely.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 2)

🔶 मित्रो! भगवान बुद्ध ने यही मुनासिब समझा। उन्होंने यह नहीं किया कि अपने शिष्यों को एक स्थान पर बैठाकर और उनको योगाभ्यास करा करके और संत बना करके और एक आश्रम बना करके, शान्त कुटीर बना करके वहीं उनको निवास करने के लिए कहें। उन्हें ध्यान करने के लिए, जप करने के लिए और पूजा करने के लिए कहें और गंगा स्नान करने के लिए कहें। उन्होंने यह मुनासिब नहीं समझा। उन्होंने कहा कि अब तुम्हारा योगाभ्यास कर्मक्षेत्र में होगा, स्थान विशेष में नहीं होगा। इसलिए चलो, कर्मक्षेत्र में उतरो। प्रत्येक शिष्य से उन्होंने यही कहा कि तुम्हें तीन दिन से अधिक किसी एक स्थान पर नहीं रहना चाहिए। क्यों? क्योंकि स्थान विशेष से मोह हो जाता है और व्यक्ति विशेष से मोह हो जाता है। व्यक्ति विशेष से, जिस आदमी के अंदर लगाव हो गया है, मोह हो गया है, वह आदमी उसका हिमायती, उसका पक्षधर हो जाता है। गलत काम के लिए भी उसका समर्थन करता है। उसी आदमी को शिष्य बनाने के लिए न जाने क्या-से करता चला जाता है।

🔷 पुराने जमाने में लोग तीन-चार दिन के लिए थोड़े-थोड़े समय के लिए घर से निकल जाते थे। क्योंकि हमारा घर में और व्यक्ति विशेष में इतना ज्यादा मोह हो जाता है, इतना ज्यादा पक्षपात हो जाता है कि हम उनकी उचित और अनुचित-दोनों ही तरह की आवश्यकताओं को-माँगों को पूरा करने के लिए अपने आपको खपाते रहते हैं। इसमें हम यह अनुभव करते हैं कि हम जो कर रहे हैं, सही कर रहे हैं। हम जो कर रहे हैं, मुनासिब कर रहे हैं। इसमें गलत और सही का फर्क हमें मालूम नहीं हो पाता। मालूम होने के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि उन स्थानों में, जिनमें हमारा मोह अत्यधिक बढ़ा हुआ है, थोड़े समय के लिए, वहाँ से बाहर निकल जाना चाहिए। प्राचीनकाल में गृहस्थ जीवन के लिए भी यह आवश्यक समझा जाता था। तीर्थयात्राओं के लिए, परिक्रमाओं के लिए समय-समय पर सामान्य गृहस्थ भी बाहर निकल जाते थे और वहाँ चले जाते थे, जहाँ शान्ति की वर्षा होती थी, अमृत की वर्षा होती थी। वहाँ ज्ञान का प्रकाश हमें मिलता था।

🔶 मित्रो! तब उच्च उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए चलते रहना ही मनुष्य की नियति थी। ‘‘चरैवेति-चरैवेति’’—चलते रहो-चलते रहो, यही शिक्षण संतों ने हमेशा अपने परिव्राजकों को दिया है, भावनाशील लोगों को दिया है। शिक्षकों के लिए दिया गया है और योगाभ्यास करने वाले तप करने वाले लोगों को हमेशा यही उपदेश दिया गया हैं। भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों को यही उपदेश दिया और कहा कि जहाँ कहीं भी पीड़ा और पतन दिखाई देता हो, वहाँ सबसे पहले चले जाना। जहाँ कहीं भी पीड़ा और पतन दिखाई पड़ा, बुद्ध के शिष्य वहाँ चले गये, उन-उन स्थानों को चले गये। मध्य एशिया के उन स्थानों में चले गये, जहाँ रेगिस्तानी प्रदेश था। जहाँ खाना भी नसीब नहीं होता था। उन स्थानों पर उन सबको भेज दिया। वहाँ भेज दिया जहाँ जंगल पड़े हुए थे। कौन से वाले क्षेत्र में? जावा से लेकर सुमात्रा तक, इण्डोनेशिया से लेकर मलाया तक, सारे-के देश-जिसमें पूर्वी देश भी सम्मिलित थे। जहाँ जंगली लोग, अशिक्षित लोग रहते थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 19)

👉 स्वयं से कहो-शिष्योऽहम्

🔷 इस कृपा के धारण व ग्रहण की विधि बताते हुए भगवान् सदाशिव माता पार्वती से कहते हैं-

    गुरुमूॄत स्मरेन्नित्यं गुरुनाम सदा जपेत्।
    गुरोराज्ञां प्रकुर्वीत गुरोरन्यन्न भावयेत्॥ १८॥
    गुरुवक्त्रस्थितं ब्रह्म प्राप्यते तत्प्रसादतः।
    गुरोर्ध्यानं सदा कुर्यात् कुलस्त्री स्वपतेर्यथा॥ १९॥
    स्वाश्रमं च स्वजातिं च स्वकीॄत पुष्टिवर्धनम्।
    एतत्सर्वं परित्यज्य गुरोन्यन्न भावयेत्॥ २०॥

🔶 सद्गुरु कृपा से अपने जीवन में भौतिक, आध्यात्मिक, लौकिक-अलौकिक समस्त विभूतियों को पाने की चाहत रखने वाले साधक को सदा ही गुरुदेव की छवि का स्मरण करना चाहिए। उनके नाम का प्रति पल, प्रति क्षण जप करना चाहिए। साथ ही गुरु आज्ञा का जीवन की सभी विपरीतताओं के बावजूद सम्पूर्ण निष्ठा से पालन करना चाहिए। अपने जीवन में कल्याण कामना करने वाले साधक को गुरुदेव के अतिरिक्त अन्य कोई भावना नहीं रखनी चाहिए॥ १८॥ गुरु के मुख में ब्रह्मा का वास है। इस कारण उनके मुख से बोले हुए शब्द ब्रह्म वाक्य ही हैं। गुरु कृपा प्रसाद से ही ब्रह्म की प्राप्ति होती है। परम पतिव्रता स्त्री जिस तरह से सदा ही अपने पति का ध्यान करती है, ठीक उसी तरह अध्यात्म तत्त्व के अभीप्सु साधक को अपने गुरु का ध्यान करना चाहिए॥ १९॥ साधक में इस ध्यान की प्रगाढ़ता कुछ इस कदर होनी चाहिए कि उसे अपना आश्रम, अपनी जाति, अपनी कीर्ति का पोषण, वर्धन, सभी कुछ भूल जाए। गुरु के अलावा अन्य कोई भावना उसे न व्यापे॥२०॥

🔷 इन महामंत्रों का मनन और इनका आचरण साधकों के लिए राजमार्ग है। साधना का यह पथ बड़ा ही सरल, सुगम और निरापद है। श्री रामकृष्ण परमहंस देव के अनेक शिष्य थे। उनमें से कई बहुत पढ़े-लिखे, विद्वान् और तपस्वी थे। स्वामी विवेकानन्द जी महाराज की अलौकिक प्रतिभा से तो समूची दुनिया चमत्कृत रह गयी। इन शिष्यों में एक लाटू महाराज भी थे। निरे अपढ़-गँवार, विद्या-बुद्धि का कोई चमत्कार उनमें नहीं था। बस हृदय में भक्ति थी। न वे शास्त्र चर्चा के गाम्भीर्य में डूब सकते थे और न ही किसी से शास्त्रार्थ कर सकते थे। पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान तो उन्हें छू भी नहीं गया था। अपनी इस स्थिति पर विचार कर उन्होंने परमहंस देव से कहा- ठाकुर! मेरा कैसे होगा? श्री श्री ठाकुर ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा- तेरे लिए मैं हूँ न। बस मेरा नाम स्मरण करने से मेरा ध्यान करने से, सब कुछ हो जाएगा।
  
🔶 तब से लाटू महाराज का नियम बन गया- अपने गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस का नाम स्मरण, उन्हीं का ध्यान और उनकी सेवा। ठाकुर की आज्ञा ही उनके लिए सर्वस्व हो गयी। यह सब करते हुए उनके जीवन में आश्चर्यजनक आध्यात्मिक परिवर्तन हुए। अनेकों दैवी घटनाएँ एवं चमत्कारों ने उनकी साधना को धन्य किया। उनके अद्भुत आध्यात्मिक जीवन और योग शक्तियों के अद्भुत विकास को देखकर स्वामी विवेकानन्द ने उन्हें अद्भुतानन्द नाम दिया। श्री रामकृष्ण संघ में वह इसी नाम से विख्यात हुए। स्वामी विवेकानन्द उनके बारे  में कहा करते थे- लाटू ठाकुर का चमत्कार है। वह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि गुरु स्मरण, गुरुसेवा और गुरु की आज्ञापालन से सब कुछ सम्भव हो सकता है। जो जन्म-जन्मान्तरों के तप से सम्भव नहीं, वह सद्गुरु  कृपा से सहज ही साकार हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 34

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग ५)

कुरीतियों की दृष्टि से यों अपना समाज भी अछूता नहीं हैं, पर अपना देश तो इसके लिए संसार भर में बदनाम है। विवाह योग्य लड़के लड़कियों के उपयुक...