शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

👉 Sowing and Reaping (Investment & its Returns) (Part 2)

🔵 Just begin to spend all you have of these two things to receive back 100 times of the same, number ONE. Number TWO, your mind is one such resource provided by BHAGWAN that it must be employed exclusively for the cause of BHAGWAN, in place of employing it in nursing ego, worldliness and other useless issues. Invest all your power of thinking in the field of BHAGWAN just to receive back 100 times of that. Third thing is that you have feelings. Feelings, we have! Yes you too have.
 
🔴 Three bodies are there of you-Corporeal, Subtle and Cause. Here the labour is the part of corporeal body; the mind is situated in subtle body while the feeling or sentiment stands for cause body. The overall theory is that very these three things have been provided to you by BHAGWAN not to be put to any other use than one defined by BHAGWAN only. The Scenario around you goes against you once you go against the above theory. These are the three things provided to us by BHAGWAN.
 
🔵 The labour and body have been given to us by BHAGWAN. The mind too by BHAGWAN, not anyone else and the feelings have also been provided by BHAGWAN. That is why things of BHAGWAN must be invested for the cause of BHAGWAN only. One thing is there which is earned by you either in this birth or in previous birth. Anyway only that is earned by you, not given by BHAGWAN. What is that? That is money. Money is not given to anybody by BHAGWAN.

🔴 It is up to you whether you earn it honestly or dishonestly, whether you earn it through labour or through four twenty. BHAGWAN has nothing to do with it. My GURUDV asked me if the money I had was earned by me. I said, ‘‘how it can be earned by me? How a child of 14 years can earn it? It is given by my father.’’ He directed me to invest all the money in the field of BHAGWAN to receive back 100 times. Well, I noted it in my mind and rest is known to all that for the last 60 years that noting is still with me as it is.
 
🌹 to be continue...
🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 8)

🔴 कितने काम हो गए, तीन— एक और काम कहता हूँ, उसे ध्यान से सुनना। हमने जो लड़ाई छेड़ी है वह दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध छेड़ी है और सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन की छेड़ी है। रामराज्य की स्थापना की छेड़ी है और लंका-दमन की छेड़ी है। यह काम बहुत बड़ा है और इसमें कुछ मुसीबतें भी आएँगी, पर उन मुसीबतों को आप तक नहीं पहुँचने देंगे। उन मुसीबतों को अपने ऊपर लेते रहेंगे। राणा सांगा जो था, उसे जहाँ कहीं भी दीखता कि उसके साथियों पर गाज गिरी, उनके ऊपर की तलवार अपने शरीर पर झेल जाता था। उसने ढेरों आदमी इस तरह बचा दिए थे। जब उसके शरीर पर अस्सी घाव हो गए तब वह बेहोश हो गया और अपना काम बन्द कर दिया।
      
🔵 अस्सी घाव खाने तक तो कोई मुसीबत आपके ऊपर नहीं आवेगी। मुसीबत आएगी तो हमारे ऊपर आएगी। पहले भी आई थी। श्रीकृष्ण भगवान् के पास आई थी। रामचन्द्र जी पर भी मुसीबत आई थी। सीता हरण हो गया था। किसी का क्या हो गया? लेकिन हमारे ऊपर एक और तरह की मुसीबत आएगी, जिसकी जानकारी आपको देना चाहता हूँ। वह मुसीबत इस तरह की है जैसे कि कालनेमि ने पैदा की थी। कालनेमि रावण का कुटुम्बी था। स्कन्द पुराण में कथा आती है कि वह सबकी बुद्धि बिगाड़ देता था। छोटा भाई कुम्भकरण था। उसने योगाभ्यास किया, तप किया।

🔴 वह चाहता था कि ६ महीने जगा करूँ और एक दिन सोया करूँ, लेकिन कालनेमि ने उसकी ऐसी बुद्धि बिगाड़ दी, भ्रष्ट कर दी कि कुम्भकरण यह माँगने लगा कि ६ महीने सोया करूँ और एक दिन जगा करूँ। अगर वह ६ महीने जगा होता तो रावण का ढेर हो गया होता। इसी तरह मारीच ने भी तप किया था। वह स्वर्ग चाहता था, पर कालनेमि ने उसकी ऐसी बुद्धि भ्रष्ट की और कहा कि तू यह मत, माँग कि मैं स्वर्ग जाऊँ, वरन् यह माँग कि सोने का हिरण बन जाऊँ। कारण, चमड़े वाले को तो मारता है एक आदमी, पर सोने वाले को मारेंगे सौ आदमी। बेचारा छिपा-छिपा बैठा रहता था अपने वेष को बनाए एक बार सोने का वेष बनाया, सो सीता जी के कहने पर रामचन्द्र जी ने उसे मार डाला।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आस्तिक बनो (भाग 3)

🔴  एक तीसरी किस्म के नास्तिक और हैं। वे प्रत्यक्ष रूप में ईश्वर के नाम पर रोजी नहीं चलाते बल्कि उलटा उसके नाम पर कुछ खर्च करते हैं। ईश्वर का आडम्बर उनके द्वारा आये दिन रचा जाता रहता है। शरीर पर ईश्वर भक्ति के चिह्न धारण किये रहते हैं, घर में ईश्वर के प्रतीक मौजूद होते हैं, ईश्वर के निमित्त कहे जाने वाले कर्मकाण्डों का आयोजन होता रहता है। ईश्वर भक्त कहलाने वालों का स्वागत सत्कार भेंट पूजा होती रहती है। यह सब इसलिए होता है कि लोग उनके संबंध में अच्छे ख्याल रखें, उनका आदर करें, उन्हें धर्मात्मा समझें, उनके जीवन भर के कुकर्मों की कलई न खोलें और आज भी जो उनके दुष्कर्म चल रहे हैं वे छिपे रहें।

🔵  चौथे प्रकार के नास्तिक ये हैं जो पाप छिपाने या धन कमाने के लिए नहीं किन्तु अपने को पुजवाने के लिए यश और श्रद्धा प्राप्त करने के लिए ईश्वर भक्त बनते हैं, इसके लिए कुछ त्याग और कष्ट भी उठाते हैं, पर भीतर से उन्हें प्रभु की सर्व व्यापकता पर आस्था नहीं होती। कुछ लोग रिश्वत के रूप में ईश्वर भक्ति की साधते हैं अमुक भोग ऐश्वर्य की लालसा उन्हें उसी मार्ग पर ले जाती है जिस प्रकार आज कल घूस-खोर हाकिमों को एक मोटी रकम भुका कर लोग मनमाना काम करवा लेते हैं और थैली खर्च करके थैला भरने में सफल हो जाते हैं। कुछ लोग तथा कथित ऋद्धि-सिद्धियों और न जाने किन-किन अप्रत्यक्ष वैभवों के मनसूबे बाँध कर उसे प्राप्त करने की फिक्र में ईश्वर के दरवाजे खटखटाते रहते हैं।

🔴  इस प्रकार प्रत्यक्षतः ईश्वर भक्त दिखाई देने वालों में भी असंख्यों मनुष्य ऐसे हैं जिनकी भीतरी मनोभूमि परमात्मा से कोसों दूर है। उनका निजी जीवन, घरेलू आचरण, व्यक्तिगत व्यवहार ऐसा नहीं होता जिससे यह प्रतीत होता है कि यह ईश्वर को हाजिर नाजिर समझ कर अपने को बुराइयों से बचाते हैं। ऐसे लोगों को किस प्रकार आस्तिक कहा जाय? जो पापों में जितना ही अधिक लिप्त है। जिसका व्यक्तिगत जीवन जितना ही दूषित है वह उतना ही बड़ा नास्तिक है। लोगों को धोखा देकर अपना स्वार्थ साधना, छल, प्रपंच, माया, दंभ, भय, अत्याचार, कपट और धूर्तता से दूसरों के अधिकारों को अपहरण कर स्वयं सम्पन्न बनना नास्तिकता का स्पष्ट प्रमाण है। जो पाप करने का दुस्साहस करता है वह आस्तिक नहीं हो सकता, भले ही वह आस्तिकता का कितना ही बड़ा प्रदर्शन क्यों न करता हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1945 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1945/December/v1.4

👉 आज का सद्चिंतन 20 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 Oct 2017


👉 मौकों को पहचानने वाले लोग ही ज़िंदगी में आगे बढ़ते हैं

🔵 ईश्वर अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ने तथा अपने आप को साबित करने के लिए हर किसी को हुनर देता है, योग्यता देता है, सभी को बराबर समय, बराबर मौके देता है। लेकिन ये हम पर निर्भर करता है कि हम अपनी योग्यता अपने हुनर का उपयोग किस तरह से करते हैं।  हम अपनी ज़िंदगी में मिले मौकों, अवसरों में छिपी संभावनाओं की पहचान कर पाते हैं या नहीं।

🔴 जो लोग उन मौकों में छिपी संभानाओं को पहचान जाते हैं। वे अपनी सोच और अपनी काबिलियत से दूसरों से हटकर काम करते हैं और ऐसा काम कर जाते हैं जिससे वे अपनी ज़िंदगी में बहुत आगे बढ़ जाते हैं। और वे हर सम्मान और हर बुलंदी को हासिल करते हैं। और जो लोग मिले हुए मौकों को ऐसे ही जाने देते हैं और कुछ नहीं करते हैं वो अपनी ज़िंदगी में भी कुछ नहीं कर पाते हैं और वहीँ के वहीँ रह जाते हैं

🔵 बहुत पुरानी बात है। किसी गाँव में जमींदार रहता था।  उसने अपनी मेहनत और ईमानदारी से अपने कारोबार को काफी बढ़ा लिया और काफी संपत्ति इकठ्ठा की। वह हमेशा जरूरतमंदों और गरीबों की हरसंभव मदद करता था तथा अपने धन को अच्छे कार्यों में लगाता था। जब जमींदार बूढ़ा होने लगा तो उसने अपनी संपत्ति तथा कारोबार को अपने बेटों में बांटने का फैसला किया।  लेकिन उसे डर था कि कहीं उसके बेटे उसकी वर्षों की मेहनत की कमाई को ऐसे ही ना गँवा दें।  उसने फैसला  किया कि तीनों में से जो भी बेटा उसकी संपत्ति तथा कारोबार को आगे बढ़ाने लायक होगा तथा अपनी संपत्ति को अच्छे कार्यों में लगाएगा वो ही उसकी संपत्ति का वारिस होगा।  लेकिन वह अपनी संपत्ति किसे दे ये उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। तो उसने एक फकीर से सलाह ली। फकीर ने उसे एक तरीका बताया।

🔴 जमींदार ने अपने तीनों बेटों से कहा “कि मैं तीर्थ यात्रा पर जा रहा हूँ और उसने तीनों बेटों को कुछ बीज दिए और कहा कि जब तक मैं वापस आऊं इन बीजों को संभाल कर रखना।”  उसके बाद जमींदार तीर्थ यात्रा पर चला गया और काफी समय बाद वापस लौटा।

🔵 वापस आकर जमींदार एक-एक कर तीनों बेटों के पास गया।  पहले बेटे से उसने पूछा  “बेटा!  मैंने तुम्हे जो बीज दिए थे, उनका तुमने क्या किया? ”

🔴 पहले बेटे ने कहा “ पिताजी कौन से बीज?  मुझे तो याद ही नही कि आपने मुझे बीज कब दिए थे?”। जमींदार को थोड़ी निराशा हुई। लेकिन उसने उससे कुछ भी नहीं कहा।

🔵 उसके बाद जमींदार ने अपने दूसरे बेटे के पास जाकर भी यही प्रश्र किया। दूसरे बेटे  ने अपनी तिजोरी की चाबी जमींदार को दे दी और कहा “पिताजी! मैंने आपकी अमानत को तिजोरी में संभाल कर रखा है।”

🔴 जमींदार को फिर निराशा हुई लेकिन उसने उससे भी कुछ नहीं कहा और तीसरे बेटे के पास गया और उससे भी वो ही सवाल किया। तीसरे बेटे ने  कहा “पिताजी!  आप को मेरे साथ कहीं चलना होगा।” दोनों थोड़ी दूर चले तो सामने एक बगीचा था। तीसरे पुत्र ने कहा “पिताजी! ये रहे आपके बीज।” मैंने आपके दिए हुए बीजों से एक सुन्दर बगीचा तैयार कर दिया।

🔵 ये देखकर जमींदार का दिल खुशी से झूम उठा और उसने खुश होकर अपनी सारी संपत्ति अपने तीसरे बेटे के नाम कर दी।

🔴 मित्रों, जमींदार के तीनो बेटों को बराबर बीज मिले, बराबर का मौका मिला तथा अपनी सोच और काबिलियत को दिखाने के लिए समय भी बराबर मिला। लेकिन  तीन में से दो बेटों ने उस मौके को पहचाना नहीं और उसे ऐसे ही गँवा दिया।  जबकि तीसरे बेटे ने अपनी सोच और काबिलियत से उन बीजों से एक सुन्दर बगीचा तैयार कर दिया ।

🔵 मित्रों, जिंदगी के हर एक मोड़ पर हमें मौके मिलते रहते हैं। चाहे सुख हो या दुःख हर एक परिस्थिति हमें ज़िंदगी में एक नयी सम्भावना तलाश करने के लिए कहती है। बस अगर हमने वो सम्भावना तलाश ली या उन मौकों को पहचान लिया तो फिर हमें ज़िंदगी में आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता है। हमें हमारी मंज़िल तक पहुँचने के लिए नए नए रास्ते अपने आप मिलने लगेंगे।

🔴 मित्रों, अपनी ज़िंदगी के हर एक पल पर नज़र रखें और हर परिस्थिति में चाहे सुख हो या दुःख ज़िंदगी के मिले हर एक मौके को पहचानने की कोशिश करें  और उसमें छिपी संभावनाओं को तलाश करने की कोशिश करें। एक दिन आप अपनी ज़िंदगी को बदलने वाले मौके को पहचान जायेंगे और आपको ऐसा आईडिया मिल जायेगा जो आपको सफलता की बुलंदी पर पहुंचा देगा।

👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...