सोमवार, 19 नवंबर 2018

👉 मृदुता :-

🔷 स्वभाव की मृदुलता ग्रहण करें। मृदुल स्वभाव उस व्यक्ति का है जिसे देख कर स्वतः मन में उसके प्रति आकर्षण का भाव उत्पन्न होता है। उसके मुख, स्वभाव तथा चरित्र से मानसिक आकर्षण, प्रेम, तथा आनन्द प्रस्फुटित होता है। मृदुलता के अंतर्गत वे सभी विधियाँ आती हैं जिनके द्वारा मनुष्य दूसरों को प्रसन्न रखता तथा हृदय में अपने प्रति प्रेम उत्पन्न करता है। उसका सबके प्रति प्रेममय, मित्रतापूर्ण व्यवहार होता है। उसका व्यवहार मित्रों और हितैषियों को उसकी ओर आकर्षित करता है। उसमें चिड़चिड़ापन, उत्तेजना, क्रोध, कटुता, कुढ़न इत्यादि नहीं होती।

🔶 मृदु व्यक्ति बड़ा मीठा हंसमुख स्वभाव रखता है सभ्यतापूर्ण ढंग से व्यवहार करता है और प्रेम सहानुभूति से स्निग्ध रहता है। जो व्यक्ति उसके संपर्क में आता है, उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।

🔷 मृदु व्यक्ति सदा दूसरों को प्रसन्न रखने और प्रेम करने की बात सोचता रहता है उसके मित्रों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है। वह उदार, दयावान, और प्रेममय रहता है। इन सद्गुणों के कारण मृदुल व्यक्ति सब स्थितियों और सब प्रकार के व्यक्तियों से बड़ा अच्छा निर्भाव कर लेता है।

🔶 यथा शक्ति दूसरों से प्रेम कीजिए। सहानुभूतिपूर्ण ढंग से अप्रिय कामों को कीजिए। जिससे भी मिलें आपके वाक्य, शब्द और अक्षर प्रेम से सरस स्निग्ध रहें। जगत् के विदग्ध हृदयों को आपके शब्दों से ऐसा मरहम प्राप्त हो कि *वे अपने संताप भूल सकें और दो घड़ी अपने महत्त्व का अनुभव कर सकें।

👉 अन्तःलोक का आलोक

🔷 हवा के एक झोंके ने मिट्टी का दीया बुझा दिया। मिट्टी के दीयों का भरोसा भी क्या? कब टूटे और बिखरकर मिट्टी में मिल गए। उन ज्योतियों का साथ भी कितना, जिन्हें हवाएँ जब-तब बुझा सकती है। ज्योति के बिना जीवन अँधेरों में डूब जाता है। ये अँधेरे सदा ही भयावह होते हैं। जिन्हें अनुभव है, वे जानते हैं कि अँधेरे में प्राण कँप जाते हैं और साँसें लेना भी कठिन हो जाता है।

🔶 जीवन ही नहीं जगत् भी अँधेरे से घिरा है। ऐसी कोई भी ज्योति इस जगत् में नहीं है, जो अँधेरे को पूरी तरह मिटा दे। जो भी ज्योतियाँ हैं, उन्हें देर-सबेर हवाओं के झोंके अँधेरों में डुबा देते हैं। ये जलती हैं और बुझ जाती हैं, पर अँधेरे की सघनता जस की तस बनी रहती है। जगत् में फैला हुआ अँधेरा शाश्वत है। जो इस जगत् की ज्योतियों पर भरोसा करते हैं, वे नासमझ हैं, क्योंकि ये ज्योतियाँ सब की सब आखिरकार अँधेरे से हार जाती हैं।

🔷 अंधकार से भरे इस जगत् से परे एक और लोक भी है। जहाँ प्रकाश ही प्रकाश है। इस बाहरी जगत् में प्रकाश क्षणिक और सामयिक है एवं अँधेरा शाश्वत है तो इस आन्तरिक जगत् में अंधकार क्षणिक व सामयिक है और प्रकाश शाश्वत है। अचरज की बात यह है कि यह प्रकाश लोक हमारे बहुत निकट है, क्योंकि अंधकार बाहर है और प्रकाश भीतर।

🔶 याद रहे, जब तक अन्तःलोक के आलोक में जागरण नहीं होता, तब तक कोई भी ज्योति अभय नहीं दे पाती। जरूरत इस बात की है कि मिट्टी के मृण्मय दीपों पर भरोसा छोड़ा जाय और चिन्मय ज्योति को खोजा जाय। क्योंकि यही अभय, आनन्द और आलोक का स्रोत है। अँधेरे से घबराहट और आलोक की चाहत यह जताती है कि हमारी वास्तविकता प्रकाश ही है। क्योंकि आलोक ही आलोक के लिए प्यासा हो सकता है। जहाँ से प्रकाश की चाहत पनप ही है, वहीं खोजो, अन्तःलोक का आलोक-चिन्मय ज्योति का स्रोत वहीं छिपा है।

श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 November 2018




👉 आज का सद्चिंतन 19 Nov 2018


👉 Refinement of aspirations

🔷 A lack of harmony between inner life (aspirations, thinking, character, etc.) and outer life (actions, interactions, conduct, etc.) of an individual may give rise to muddled and mismatched aspirations as well as the feelings of inner dissatisfaction. Many individuals happen be deeply idealistic, however, sometimes they might commit something undesirable out of their instincts or inner traits which would then make them regret and feel discontent for having failed to practice the ideals they staunchly believed in.

🔶 This could also happen when an individual may desire to be idealistic but cannot refine or make his aspirations compatible with his aforesaid desire. For example, an individual may wish to be honest in his life and to serve the masses, however, he also has some parallel aspirations which compels him to live a lavish and luxurious life. This might make it difficult for him to prove his integrity and commitment and to have any desirable impact of his service to humanity leading to inner dissatisfaction.Anyone who desires to serve the humanity need to adopt a simplicity in their life if they wish to have any impact on masses. For that reason, it is necessary for them to shape their aspirations in such a way that they harmonize well with their ideals.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Jivan Devtā kī sādhanā-ārādhanā Vangmay 2 Page 2.16

👉 आकांक्षाओं का परिष्कार

🔷 आंतरिक और बाह्य जीवन में एक रसता - क्षमता न होने के कारण भी ऊल-जलूल आकांक्षाएँ तथा असंतोष की भावनाएँ उठा करती हैं। कई व्यक्ति आंतरिक दृष्टि से बड़े आदर्शवादी होते हैं, किन्तु संस्कारों से प्रेरित होकर कई ऐसे कार्य भी कर बैठते हैं जिससे कि आदर्शों को अपने जीवन में न उतार पाने का असंतोष और जीव विक्षोभ होता है।

🔶 इस तरह की भूलें तब भी होती है जबकि आदर्शवादी बनने की लालसा रखते हुए भी अपनी आकाक्षाओं को परिष्कृत या संतुलित नहीं रखा जाता। उदाहरण के लिए ईमानदार और लोकसेवी बनने की लगन है , किन्तु आकांक्षा इस तरह की है की खूब शान -शौकत और ठाठ -बाट से रहना जरूरी लगे। वैसी स्थिती में अपनी ईमानदारी व निष्ठा को प्रामाणिक सिद्ध करने और सेवा कार्यों का अपेक्षित प्रभाव ने होने पर विक्षोभ तो उत्पन्न होगा ही क्योंकि लोकसेवी के व्यक्तित्व में सादगी हो तो ही लोगों पर उसका प्रभाव पड़ता है। अतः अपनी आकांक्षाओं को अपने आदर्शों के अनुरूप ही ढालना चाहिए।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 जीवन देवता की साधना - आराधना वांग्मय 2 पृष्ठ - 2.16