रविवार, 1 अप्रैल 2018

👉 चरवाहे की सम्पत्ति

🔶 ईरानी शाहंशाह अब्बास शिकार के लिए जंगल में भटक रहे थे। वहाँ उनकी भेंट एक चरवाहे बालक से हो गई। नाम था- मुहम्मद अलीवेग। चरवाहा होते हुए भी उसकी हाजिर जबावी तथा व्यक्तित्व से शाह बड़े प्रभावित हुए और लौटते समय उसे भी अपने साथ ले आए।

🔷 मुहम्मद अलीवेग को राज्य का कोषाध्यक्ष बना दिया गया। यद्यपि वह एक निर्धन परिवार का था, इतनी धन-दौलत को देखकर फिर भी उसका मन तनिक भी विचलित न हुआ। वह अपने को कोषालय के समस्त धन का रक्षक मानता था। इतने बड़े पद पर रहते हुए भी उसके जीवन में सादगी थी। शाह अब्बास के बाद उनका अल्प वयस्क पौत्र शाह सफी राज सिंहासन पर आसीन हुआ। किसी ने शाह के कान भर दिए कि मुहम्मद अली राज्य के धन का दुरुपयोग करता है। शाह ने उस प्रकरण को जाँच के लिए अपने पास रखा और एक दिन बिना सूचना के उसकी हवेली का निरीक्षण करने जा पहुँचे।

🔶 शाह ने हवेली के सब कमरों का निरीक्षण किया। थोड़ी-सी वस्तुओं के अतिरिक्त वहाँ कुछ दिखाई ही न दे रहा था। शाह निराश होकर लौटने लगा, तो खोजियों के संकेत पर शाह की दृष्टि एक बंद कमरे की ओर गयी। उसमें तीन मजबूत ताले लटक रहे थे। अब शाह की शंका को कुछ आधार मिला था। उन्होंने पूछा-''इसमें क्या चीज है, जिसके लिए इतने मजबूत ताले लगाये हैं।''

🔷 तुरंत ताले खोल दिए गए। शाह ने कक्ष के मध्य मेज पर एक लाठी, शीशे की सुराही आदि बर्तन तथा पोशाक और दो मोटे कंबल देखे। मुहम्मद ने कहा-'' जब स्वर्गीय शाह मुझे यहाँ लाए थे उस समय मेरे पास यही वस्तुएँ थीं और आज भी मेरे पास अपनी कहने को यही हैं। मैं इससे प्रेरणा ग्रहण करता और उसी स्तर के जीवन का अभ्यास बनाए रखता हूँ।'' युवा बादशाह इस आदर्शनिष्ठा को देखकर नत-मस्तक हो गया।
 
📖 प्रज्ञा पुराण भाग 2 पृष्ठ 16

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2018

👉 आज का सद्चिंतन 2 April 2018


👉 अपना दृष्टिकोण बदलो

🔶 मित्रो ! सत्य! सत्य!! सत्य!!! अहा, कितना सुन्दर शब्द है। उच्चारण करते ही जिव्ह्य को शांति मिलती है, विचार करते ही मस्तिष्क शीतल हो जाता है, हृदयंगम करने से कलेजा ठंडक अनुभव करता है। झूठ के मायावी प्रपंचों में उलझ कर ईश्वर का राजकुमार-मनुष्य मानवता से पतित होकर पशु बन गया है। सत्य की अवहेलना करने का अभिशाप वह भुगत रहा है।
    
🔷 ईश्वर सत्य है, आत्मा सत्य है, प्रभु की त्रिगुणमयी लीला सत्य है, सर्वत्र सत्य ही सत्य व्याप्त हो रहा है। जीवन के कण-कण की एक ही प्यास है-'सत्य'। हमारा जीवन इसलिए है कि अखिल सत्य तत्त्व में विचरण करते हुए अमृत का पान करें। प्रभु ने कृपा करके हमें अपने संसार की सत्यरूपी वाटिका में भ्रमण करके आनंद लाभ करने के लिए भेजा है। परन्तु हाय, हम तो अपने को बिलकुल ही भूले जा रहे हैं। वास्तव में दुनियाँ कुछ नहीं है। अपनी छाया ही संसार के दपर्ण में प्रतिबिंबित हो रही है।

🔶 'सत्य' मनुष्यों को प्रेरणा देता है कि अंतर में दृष्टि डालो, अपना दृष्टिकोण बदलो, अपना और दुनियाँ का स्वरूप समझो, अपने को अच्छा बना डालो, बस सारी दुनियाँ तुम्हारे लिए अच्छी बन जाएगी। तुम सत्यनिष्ठ बनो, दुनियाँ तुम्हारे साथ सत्य का आचरण करेगी। श्रुति कहती 'असतो मा सद्गमय' असत्य की ओर नहीं, सत्य की ओर गमन कीजिए। आपका इसी में कल्याण है।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 NEVER MISUSE WHAT YOU HAVE RECEIVE

🔶 Born, played for couple of days, made castles in the air during adolescence, got married when became adult, worked restlessly to earn to carry on the laden load, solved somehow, to some extent, the endless problems of self-extended family, attacked by feebleness and sickness with passing age, all the property which was added throughout life being seized by worthy progeny, forcing ourselves to pass the remaining life in insult, helplessness and disgraced position and at last being curbed by death while sighing and crying—is this the destiny of a common human being?

🔷 Being far away from the reality of their closest self and remained entangled in illusions, most of the persons find themselves incapable of even self-introspection. Though the load of life is carried away somehow, but what did we ourselves, this enormous world and that Creator (Almighty) get who blessed us with great care and expectations? When conferred this way, only reply which echoes is- the opportunity and privilege we got, it did make some trail like a raising black fume after burning; but it vanished somewhere in this infinite space like a forgotten story!

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्राप्त का दुरूपयोग न होने दें

🔶 जन्मा, कुछ दिन खेला-कूदा, किशोरावस्था आने पर कल्पना की रंगीली उड़ानें भरना, युवा होते-होते विवाह बंधनों में बंधना, जो बोझ लादा उसे वहन करते रहने के लिए दिन-रात कमाने के लिए खटते रहना, बढाए हुए परिवार की बढती समस्याओं को जिस-तिस प्रकार किसी हद तक सुलझाना, ढलती आयु के साथ अशक्तता और रुग्णता का चढ़ दौड़ना, समर्थ संतानों द्वारा समस्त वैभव पर कब्ज़ा जमा लेना, स्वयं को असहाय, अपमानित स्थिति में दिन गुजारने के लिए बाधित होना और रोते-कलपते मौत द्वारा दबोच लिया जाना, क्या यही है आम लोगों की नियति?

🔷 अपने आस-पास की ही वास्तविकता से कोसों दूर, भ्रांतियों में उलझे रहकर, अधिकांश लोगों से तो आत्म-समीक्षा तक नहीं बन पड़ती। जिंदगी का बोझ तो किसी प्रकार वहन कर लिया जाता है, पर उसके साथ अपने को, विशाल विश्व को और भारी अरमानो के साथ हमें निहाल करने वाले स्रष्टा को क्या मिला? इस प्रकार विचार करने पर एक ही उत्तर प्रतिध्वनित होता है, कि जो सुयोग-सौभाग्य उपलब्ध हुआ था, वह जलने-भुनने पर उठने वाले काले धुएँ की तरह कुछ बना तो सही; पर अदृश्य अंतरिक्ष में एक विस्मृत तथ्य बनकर न जाने कहाँ तिरोहित (विलीन) हो गया! 

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Amrit Chintan 2 April

🔶 The Omnipresent God - is a law, a system, which controls the entire creation, Existence of all – animates and in-animates are under that system. Any one who does not follow – gets destroyed. If we can assure our-self to this law and follow we are true devotee to God.

🔷 Love is a great force of attraction which moves a man towards God. Then he will love every creature of the universe. It means now he truly believe presence of invisible God visible in every body. God is always with him. Love is God and God is love, that is all you know and you need to know. This practice of love for all is easiest and blissful worship of God.

🔶 Science of Spirituality is the way to achieve the true wisdom of life. It is that path which leads to make the proper use of this finest gift of the creator. If God’s worship does not take care of his own life – it is a waste of time in – worship.
                                       
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियो! भाइयो!!

🔶 कल आपको उपासना की महत्ता के बारे में बताया जा रहा था। भगवान के नजदीक आप बैठें, उपासना करें, तो देखेंगे कि उनके सारे गुण आप में आते चले जाते हैं। बिजली को छूता है, तो उसके अन्दर करेण्ट आ जाता है। भगवान् को जो छुएगा, भगवान से उसमें करेण्ट आ जाएगा। दो तालाबों को आपस में जोड़ दें, तो नीचे वाले तालाब का लेवल बढ़ता हुआ चला जाता है और दोनों का तल एक हो जाता है। भगवान और भक्त एक हो जाते हैं। सच तो ये है भक्त भगवान से भी बड़े हो जाते हैं; क्योंकि भगवान भक्त का उत्साह बढ़ाना चाहते हैं और दूसरे कामों में उपयोग करना चाहते हैं।

🔷 शबरी के जूठे बेर भगवान ने खाये थे न! गोपियों के यहाँ भगवान छाछ माँगने गए थे न! बलि के दरवाजे पर बावन अंगुल के बन करके भगवान गए थे न! कर्ण के दरवाजे पर सोना माँगने के लिए साधु और भिखारी का रूप बनाकर गए थे न! ये बड़प्पन है, भक्त का बड़प्पन। भृगु ने भगवान के सीने में लात मारी थी, कहाँ कैसे भगवान हैं! जो अपने कर्तव्य का ध्यान नहीं रखते और भगवान ने महर्षि भृगु की लात के निशान को अपनी छाती पर अभी तक सुरक्षित रखा हुआ है। विष्णु की मूर्तियों में महर्षि भृगु की लात का निशान बना रहता है। महर्षि भृगु बड़े थे भगवान से।

🔶 भक्त बड़ा होता है भगवान से; पर सही भक्त होना चाहिए। सही भक्त की कल हम आपको पहचान बता चुके हैं और ये बता चुके हैं कि भक्त को भगवान के अनुशासन पर निर्भर रहना चाहिए; भगवान को अपनी मर्जी पर चलाने की बात नहीं सोचनी चाहिए; अपनी मनोकामना की बाबत ध्यान नहीं रखना चाहिए की हमारी मनोकामना खत्म कर दी गई। भक्त अपनी मनोकामना खत्म कर देते हैं और भगवान की मनोकामना को अपने ऊपर बनाए रहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 77)

👉 गुरु का वाक्य ब्रह्मवाक्य समान

🔶 ‘गुरुगीता’ गुरुगत प्राण शिष्यों के लिए मंत्रमय है। जो शिष्य हैं, वे महामंत्रमयी गुरुगीता का मर्म समझते हैं। उन्हें मालूम है कि मंत्र साधक की मानसिक चेतना की दशा व दिशा को आमूल-चूल बदल देता है। यह बदलाव लोहे को सोने में बदलने जैसा है। ‘मंत्र’ पारस के छूते ही सब कुछ बदल जाता है। लोहे की कलंक-कालिख सोने की स्वर्णिम आभा बिखरने लगती है। साधना व गुरुकृपा से अनजान चित्त के लिए यह पारस कथा अतिशयोक्ति भरा झूठ लग सकती है। पर जिन्हें गुरु की कृपा छाँव मिली है, वे जानते हैं कि गुरुदेव की छुअन में सारे आश्चर्यकारी परिवर्तन समाये हैं। उनकी कृपा से सारे असम्भव सहज सम्भव हो जाते हैं। साधना का सच-गुरुकृपा का प्रभाव तार्किक विश्लेषण व गणित शास्त्र के समीकरण की सभी सीमाओं से पार है।
  
🔷 इसका अतुलनीय प्रभाव हमेशा ही हमें अनुभव करने का नेह निमंत्रण देता है। जिन्हें यह निमंत्रण मिला है, जिन्होंने इसका अनुभव पाया है, उनके हृदय इन क्षणों में भी गद्गद एवं पुलकित हैं। इस पुलकन के कुछ पल इस गुरुभक्ति कथा के  पूर्वोक्त मंत्रों में विवेचित किये गये हैं। इसमें शिव संदेश यही है कि गुरुदेव से अधिक और कुछ नहीं है। भगवान् भोलेनाथ ने यही कहा है-गुरुतत्त्व परम कल्याणकारी है। यह मेरा (शिव का) आदेश है। गुरु ध्यान की सहज परिणति साफ है। उन कृपालु सद्गुरु की कृपा से मैं मुक्त हूँ, ऐसा चिंतन करना चाहिए। ऐसा चिंतन करने वाला सदा ही मुक्त रहता है। कर्मों की शृंखला उसे बाँधने में कभी समर्थ नहीं होती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 119

👉 प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदले

🔶 मित्रों ! अपने को दीन- हीन, दयनीय, दरिद्र, अनगढ़, अभागा, बाधित समझने वालों को वस्तुतः यही अनुभव होता है कि वे दुरूह परिस्थितियों से जकड़े हुए हैं, किन्तु जिनकी मान्यता यह है कि उनमें उठने और महानता की मञ्जिल तक जा पहुँचने की शक्ति है, वे प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदल सकने में भी समर्थ होते हैं। उठने में सहायता करने का श्रेय किसी को भी दिया जा सकता है और गिरने में गिराने का दोषारोपण भी किसी पर भी किया जा सकता है, पर वस्तुस्थिति ऐसी है कि यदि अपने ही व्यक्तित्व और कर्तृत्व को ऊँचा उठाने और गिराने के लिए उत्तरदायी ठहराया जाए, तो यह मान्यता सबसे अधिक सही होगा।

🔷 गई- गुजरी स्थिति पर आँसू बहाए जा सकें, तो अनुचित नहीं, उनकी सहायता करना भी मानवोचित कर्तव्य है, पर यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि जब तक तथाकथित असहाय कहाने वालों का मनोबल न उठाया जाएगा, उनमें पुरुषार्थपूर्वक आगे बढ़ने का संकल्प न उभारा जाएगा,तब तक ऊपर से थोपी गई सहायता कोई चिरस्थाई परिणाम उत्पन्न न कर सकेगी। उत्कण्ठा का चुम्बकत्व अपने आप में इतना शक्तिशाली है कि उसके सहारे निश्चित रूप से प्रगति का पथ- प्रशस्त किया जा सकता है। इस उक्ति को भी ध्यान में रखे ही रहना चाहिए कि ‘‘ईश्वर मात्र उन्ही की सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करते हैं।’’ दीन- दुर्बलों को तो प्रकृति भी अपनी मौत अपने आन मरने के लिए उपेक्षापूर्वक छोड़ती और मुँह मोड़कर अपनी राह चल पड़ती देखी गई है। शास्त्रकारों और आप्तजनों ने इस तथ्य का पग- पग पर प्रतिपादन किया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र- पेज 05

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 33)

युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव ऐसे ही आध्यात्मिक चिकित्सक थे। मानवीय चेतना के सभी दृश्य- अदृश्य आयामों की मर्मज्ञता उन्हें हासिल थी। जब भी कोई...