रविवार, 26 नवंबर 2017

👉 सब अपने की समान

🔷 एक दिन गुरु द्रोणाचार्य जी युधिष्ठिर से कहा कि एक दुर्जन खोजकर लाओ। वे दूर दूर तक घूमने गये पर उन्हें कोई दुर्जन न मिला। हर किसी में सज्जनता और ईश्वर की झाँकी उन्हें दिखाई देती रही। लौटकर आये तो उन्होंने असफलता स्वीकार करते हुए कहा- ‘मुझे कोई दुर्जन दिखाई नहीं पड़ता।

🔶 तब गुरुजी ने दुर्योधन को कहा कि- एक सज्जन खोजकर लाओ। वे भी दूर दूर तक गये पर हर किसी में उन्हें दुर्जनता और दुष्टता ही दिखाई दी। एक भी आदमी संसार में उन्हें भला न दीखा। वे भी लौटकर आये और गुरु के सामने सज्जन न ढूँढ़ सकने की अपनी असफलता स्वीकार कर ली।

🔷 इस संसार में दुर्जनों और सज्जनों की कमी नहीं। सभी तरह के मनुष्य मौजूद है पर जो व्यक्ति जैसा होता है उसे अपने समान ही सब दीखते है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 गुरुतत्त्व की गरिमा और महिमा (भाग 2)

🔶 दूसरे नम्बर की दौलत है हमारी ज्ञान की, विचार करने की शक्ति। हमें जो प्रसन्नता मिलती है इसी ज्ञान की शक्ति से मिलती है। खुशी दिमागी बैलेंस से प्राप्त होती है। यह बाहर से नहीं आती, भीतर से प्राप्त होती है। जब हमारा मस्तिष्क सन्तुलित होता है तो हर परिस्थिति में हमें चारों ओर प्रसन्नता ही प्रसन्नता दिखाई देती है। घने बादल दिखाई देते हैं तो एक सोच सकता है कि कैसे काले मेघ आ रहे हैं। अब बरसेंगे। दूसरा सोचने वाला कह सकता है कि कितनी सुन्दर मेघमालाएँ चली आ रही हैं। यह है प्रकृति का सौन्दर्य।
               
🔷 हम गंगोत्री जा रहे थे। चारों ओर सुनसान, डरावना जंगल था। जरा-सी पत्तों की सरसराहट हो तो लगे कि साँप है। हवा चले, वृक्षों के बीच सीटी-सी बजे तो लगे कि भूत है। अच्छे-खासे मजबूत आदमी के नीरव-एकाकी वियावान में होश उड़ जाएँ, पर हमने उस नुकसान में भी प्रसन्नता का स्त्रोत ढूँढ़ लिया। ‘सुनसान के सहचर’ हमारी लिखी किताब आपने पढ़ी हो तो आपको पता लगेगा कि हर लम्हे को जिया जा सकता है, प्रकृति के साथ एकात्मता रखी जा सकती है। अब हम बार-बार याद करते हैं उस स्थान की जहाँ हमारे गुरु ने हमें पहले बुलाया था। अब तो हम कहीं जा भी नहीं पाते, पर प्रकृति के सान्निध्य में अवश्य रहते हैं। हमारे कमरे में आप चले जाइए। आपको सारी नेचर की, प्रकृति के भिन्न-भिन्न रूपों की तस्वीरें वहाँ मिलेंगी, बादलों में, झील में, वृक्षों के झुरमुटों में, झरनों में से खुशी छलकती दिखाई देती है। वहाँ कोई देवी-देवता नहीं है, मात्र प्रकृति के भिन्न-भिन्न रूपों की तस्वीरें हैं। हमें उन्हीं को देखकर अन्दर से बेइन्तिहा खुशी मिलती है।
  
🔶 जीवन का आनन्द सदैव भीतर से आता है। यदि हमारे सोचने का तरीका सही हो तो बाहर जो भी क्रिया-कलाप चल रहे हों, उन सभी में हमको खुशी ही खुशी बिखरी दिखाई पड़ेगी। बच्चे को देखकर, धर्मपत्नी को देखकर अन्दर से आनन्द आता है। सड़क पर चल रहे क्रिया-कलापों को देखकर आप आनन्द लेना सीख लें। यदि आपको सही विचारणा की शक्ति मिल जाए तो जो स्वर्ग आप चाहते हैं उस स्वर्ग के लिए मरने की जरूरत नहीं है, मैं आपको दिला सकता हूँ। स्वर्ग दृष्टिकोण में निहित है। इन आँखों से देखा जाता है। देखने को ‘दर्शन’ कहते हैं। दर्शन अर्थात् दृष्टि। दर्शन अर्थात् फिलॉसफी। जब हम किसी बात की गहराई में प्रवेश करते हैं, बारीकी मालूम करने का प्रयास करते हैं, तब इसे दृष्टि कहते हैं। यही दर्शन है। किसी बात को गहराई से समझने का माद्दा आ गया अर्थात् दर्शन वाली दृष्टि विकसित हो गई। आपने किताब देखी, पढ़ी पर उसमें क्या देखा? उसका दर्शन आपकी समझ में आया या नहीं। सही अर्थों में तभी आपने दृष्टि डाली, यह माना जाएगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

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