गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

👉 आज का सद्चिंतन 7 April 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 April 2017


👉 जाँच रिपोर्ट से चिकित्सक भी चकित

🔴 मुझे सन् १९८४ में शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में विशेष सत्र के आयोजन में भाग लेने का मौका मिला और उसी दौरान शान्तिकुञ्ज परिसर में ही गुरुजी एवं माताजी के दर्शनोपरांत गुरु दीक्षा ग्रहण की। तब से मैं और मेरी धर्मपत्नी गुरु देव के सत्साहित्य का निरंतर अध्ययन करते रहे और उनके बताए मार्ग पर बिल्कुल निश्छल भाव से, श्रद्धापूर्वक यथासंभव चलने का प्रयत्न करते रहे हैं। उस असीम सत्ता से जुड़ने के बाद जीवन में छोटी- बड़ी कई ऐसी घटनाएँ घटीं, जहाँ हम लोगों ने स्पष्टतः गुरुजी- माताजी की कृपा को महसूस किया। हमारी श्रद्धा और भी प्रगाढ़ होती चली गई। चार भाइयों के परिवार से बना हमारा बड़ा परिवार भी इष्ट सत्ता से जुड़ता चला गया। इस बड़े परिवार की ही एक घटना है, जिसे यहाँ उद्घोषित कर रहा हूँ :-

🔵 बात अप्रैल १९८९ की है। मेरे बड़े भाई की एक लड़की विनीता, जो उस समय मात्र ग्यारह वर्ष की थी। उसे घुटने के नीचे असह्य दर्द प्रारंभ हुआ और उस दर्द का आवेग बढ़ता ही चला गया। स्थानीय हड्डी रोग विशेषज्ञ को दिखाया गया, तो उन्होंने अस्थि कैंसर की संभावना बताई। पूरा परिवार यह बात सुनकर त्राहि−त्राहि कर उठा। हम लोग उसे लेकर पटना के प्रसिद्ध हड्डी रोग विशेषज्ञ को यहाँ पहुँचे। उन्होंने ऑपरेशन कर उसकी हड्डी का कुछ हिस्सा दो अलग- अलग जाँच घरों में जाँच के लिए भेज दिया। उन्होंने भी कह दिया कि यह कैंसर ही है; और अगर इसकी जान बचानी है तो टाटा कैंसर इंस्टीट्यूट में ले जाकर इसका पैर कटवा दीजिए।

🔴 उसकी देख- रेख मैं और मेरी पत्नी ही कर रहे थे। हम लोग बिल्कुल निराश हो गए और गुरुजी- माताजी का स्मरण करने लगे। हम दोनों में से एक गायत्री शक्तिपीठ, पटना में गायत्री मंत्र तथा महामृत्युञ्जय मंत्र का जप करता तो दूसरा उसकी देख−रेख करता। यह सिलसिला बारी- बारी से जाँच रिपोर्ट आने तक निरंतर चलता रहा। इस बीच डॉक्टर लगातार कहते रहे कि आप पैसा बर्बाद न करे इसका पैर कटवा दें। क्योंकि इलाज से रोग दूर होने की संभावना कम ही है पर जो समय उसमें लगाना है उससे रोग के फैल जाने का डर है। मैं सोचने लगा कि गुरु जी सर्वज्ञ और अन्तर्यामी हैं, हमारी पुकार जरूर सुनेंगे। मैंने निर्णय कर लिया कि अगर इसके पैर काटने की बारी आएगी तो इसका जीवन बर्बाद करने के बजाय इसे शान्तिकुञ्ज में गुरुजी की शरण में रखकर चले आएँगे। हम लोग काफी शोकग्रस्त और विचलित थे। दिन- रात पूरा परिवार गुरु जी- माताजी पर ध्यान लगाए हुए था।

🔵 इसी दौरान आश्चर्यजनक तरीके से उसका दर्द धीरे- धीरे कम होने लगा और वह काफी राहत महसूस करने लगी। कुछ दिनों के बाद एक जगह से जाँच रिपोर्ट आ गई। यह रिपोर्ट भी आश्चर्यजनक थी। रिपोर्ट में कैंसर का नामोनिशान तक नहीं था। अन्य किसी बीमारी का भी उल्लेख नहीं था। डॉक्टर रिपोर्ट पढ़ते ही पूरे गुस्से में आ गए और रिपोर्ट को जमीन पर फेंक दिया यह बोलते हुए कि ऐसा असंभव है। कहीं न कहीं जाँच में गलती हुई है, दूसरे रिपोर्ट का इंतजार कीजिए। एक दिन बाद दूसरी रिपोर्ट आने पर चिकित्सक उसे काफी उत्सुकता के साथ पढ़ने लगे पर यह क्या! यहाँ भी कैंसर या किसी अन्य बीमारी का भी उल्लेख नहीं किया गया था। डॉक्टर आश्चर्य में पड़ गए। इसके बावजूद उन्होंने कहा कि मेरा अनुभव झूठा हो नहीं सकता, उसे कैंसर ही है। परन्तु मुझे विश्वास हो चला था कि यह हमारे गुरु देव की कृपा है। हमारी प्रार्थना सुन ली गई है। यह सोचते हुए मैं उसे घर ले आया। धीरे- धीरे वह स्वस्थ हो गई और आज वह एक खुशहाल जीवन व्यतीत कर रही है तथा एक सरकारी विद्यालय में शिक्षिका के पद पर कार्यरत है।                   
  
🌹 वीरेन्द्र कुमार सिंह, वैशाली (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/Report

👉 पीड़ितों के अनन्य सेवक माणिक्यलाल वर्मा

🔵 राजस्थान के लब्ध प्रतिष्ठ समाजसेवी श्री माणिक्यलाल वर्मा की जीवन कहानी अनोखी है। बैलगाडी पर अपनी सारी गृहस्थी सहित सपेरे नगर-नगर और ग्राम-ग्राम भटकने वाले गाडिया लुहार उनको खूब जानते थे। रेलवे स्टेशन से सैकडों मील दूर घने जंगलों में पहाडी की टेकरियों पर झोपड़ी बनाकर रहने वाले अधनंगे भील भी उनसे अपरिचित नहीं थे। कंजर और खारी, जिनके माथे पर समाज ने जन्म-जात अपराधी होने का टीका लगा दिया था, उन्हें अपना समझते थे। कालबेलिये जो साँपों को पालते हैं और बनजारे, जो बैलों की पीठ पर अनाज लादकर एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाते हैं, उन्हें अच्छी तरह पहचानते थे। राजस्थान और पाकिस्तान की सीमा पर रेत के टीलों के बीच रहने वाले हरिजनों और गोपालक मुसलमानों से उनकी मित्रता थी।

🔴 जो अभावग्रस्त हैं, भूख और गरीबी के शिकार है दलित और शोषित हैं, पिछडे हुए हैं, अझान और अंधविश्वास के पाश में जकड़े हुए है, ऐसे लाखों स्त्री पुरुषों और बच्चों का माणिक्यलाल जी ने प्यार और आदर पाया था। उनकी मृत्यु पर उन सबने यह महसूस कि उनकी सुध लेने वाला उनका आत्मीय और उनका सहारा उनसे छिन गया।

🔵 माणिक्यलाल वर्मा के निधन पर राजस्थान में सरकारी दफ्तरों पर झंडे झुका दिए गए और उनकी अत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ की गई। राष्ट्रपति ने उन्हें पद्ग भूषण की उपाधि से अलंकृत था। यह राजकीय सम्मान की बात विस्मृत हो जायेगी, किंतु गरीबों के लिए उनके दिल में जो तड़प थी, वह बिजली की तरह कौंधती रहेगी। राजस्थान में बिजोलिया ने हिंदुस्तान में सत्याग्रह का शंख सबसे पहले फूँका था और माणिक्यलाल जी राजस्थान को और देश को इसी बिजोलिया को देन थे।

🔴 उन्होंने सामंती अत्याचारों से मोर्चा लिया और अकथनीय कष्ट झेलै। उनका एक पाँव जेल के भीतर और दूसरा बाहर रहा। स्वराज्य आया, तब भी वे चैन से नहीं बैठे। पिछड़ी जातियों को ऊँचा उठाने के लिये रात-दिन भटकते रहे। गाड़िया लुहारों को वसाने का उन्होंने भगीरथ प्रयत्न किया। गाड़िया लुहार राणा प्रताप के लिए तोप-बंदूक बनाते थे। चित्तौड़ दुर्ग पर जब मुगलों ने अधिकार कर लिया तब वे यह प्रतिज्ञा करके निकल पडे कि जब तक यह दुर्ग पुन: स्वतंत्र न होगा वे कहीं घर बनाकर नहीं रहेंगे। माणिक्य लाल जी ने गाडिया लुहारों के वनवास को समाप्त कराया। वह नेहरू जी को खींचकर चित्तौड दुर्ग पर ले गए और हजारों गाडिया लुहारों की उपस्थिति में दुर्ग पर राष्ट्रीय झंडा फहराकर उन्हें विश्वास दिलाया कि सैकडों वर्षों बाद उनकी प्रतिज्ञा पूरी हुई और वे अब घर बनाकर बस सकते है।

🔵 आज से कोई ३५ वर्ष पहले की बात है। रेलवे स्टेशन से करीब एक सौ मील दूर भूतपूर्व डुंगरपुर रियासत में भीलों की बस्ती के मध्य खड़लाई की पाल में एक पहाड़ी की टेकरी पर माणिक्य लाल जी ने अपना डेरा डाला था। ऊपर खुला आकाश, उसकी तलहटी में एक नाला बहता था। माणिक्य लाल जी में यह चमत्कारी गुण था कि बात ही बात में लोगों के घरों और उनके दिलों में प्रविष्ट हो जाते थे। आते-जाते भीलों ने जल्दी ही जंगल से लकडी़ काटकर उनके लिए झोंपडा खडा़ कर दिया और एकाएक दो-दो मील दूर से भी बालक और बालिकाऐं उनके विद्यालय में पढ़ने आने लगे। अंधेरी रात में शेर पहाड़ी नाले पर पानी पीने के लिए पास से गुजर जाता, परंतु माणिक्य लाल जी निर्भय होकर अपनी झोंपडी में सोते रहते।

🔴 वे अपने पीछे ऐसे समर्पित जीवन की मशाल जला गए, जो चिरकाल तक बराबर रोशनी देती रहेगी, उनका सेवाभावी जीवन तरुणों को अन्याय और अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष के लिये सदैव प्रेरणादायी सिद्ध होगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 123, 124

👉 जप में ध्यान द्वारा प्राणप्रतिष्ठा (भाग 2)

🌹 जप के साथ ध्यान का अनन्य संबंध है। नाम और रूप का जोड़ा है। दोनों को साथ-साथ लेकर ही चलना पड़ता है। अर्थ-चिंतन एक स्वतंत्र साधना है। गायत्री के एक-एक शब्द में सन्निहित अर्थ और भाव पर पाँच-मिनट भी विचार किया जाए तो एक बार पूरा एक गायत्री मंत्र करने में कम-से-कम आधा या एक घंटा लगना चाहिए। अधिक तन्मयता से यह अर्थ-चिंतन किया जाए तो पूरे एक मंत्र की भावनाएँ हृदयंगम करने में कई घंटे लग सकते हैं। मंत्रजप उच्चारण जितनी जल्दी से हो जाता है, उतनी जल्दी उसके शब्दों का अर्थ ध्यान में नहीं लाया जा सकता। इसलिए जप के साथ अर्थ-चिंतन की बात सर्वथा अव्यावहारिक है। अर्थ-चिंतन तो एक स्वतंत्र साधना है जिसे जप के समय नहीं, वरन् कोई अतिरिक्त समय निकालकर करना चाहिए।

🔴 जप योग-साधना का एक अंग है। योग चित्तवृत्तियों के निरोध को कहते हैं। ज पके समय चित्त एक लक्ष्य में लगा रहना चाहिए। यह कार्य ध्यान द्वारा ही संभव है। इसलिए विज्ञ उपासक जप के साथ ध्यान किया करते है। ‘नाम’ के साथ ‘रूप’ की संगति मिलाया करते हैं। यही तरीका सही भी है।

🔵 साधना की आरंभिक कक्षा साकार उपासना से शुरू होती है और धीरे-धीरे विकसित होकर वह निराकार तक जा पहुँचती है। मन किसी रूप पर ही जन्मता है, निराकार का ध्यान पूर्ण परिपक्व में नहीं कर सकता है, आरंभिक अभ्यास के लिए वह सर्वथा कठिन है। इसलिए साधना का आरंभ साकार उपासना से और अंत निराकार उपासना में होता है। साकार और निराकार उपासनाएँ दो कक्षाएँ है। आरंभ में बालक पट्टी पर खड़िया और कलम से लिखना सीखता है, वही विद्यार्थी कालाँतर में कागज, स्याही और फाउण्टेन पेन से लिखने लगता है। दोनों स्थितियों में अंतर तो है, पर इसमें कोई विरोध नहीं है। जो लोग निराकार और साकार का झगड़ा उत्पन्न करते हैं वे ऐसे ही हैं, जैसे पट्टी-खड़िया और कागज-स्याही को एक दूसरे का विरोध बताने वाले।

🔴 जब तक तन स्थिर न हो तब तक साकार उपासना करना उचित है। गायत्री जप के साथ माता का एक सुँदर नारी के रूप में ध्यान करना चाहिए। माता के चित्र गायत्री परिवार द्वारा प्रकाशित हुए हैं, पर यदि उनसे भी सुँदर चित्र किसी चित्रकार की सहायता से बनाए जा सकें तो उत्तम हो। सुँदर-से-सुँदर आकृति की कल्पना करके उसे अपनी सगी माता मानकर जप करते समय अपने ध्यान क्षेत्र में प्रतिष्ठित करना चाहिए।

🌹 -अखण्ड ज्योति – मई 2005 पृष्ठ 20

👉 परिवर्तन जो हो कर रहेगा

🔷 अगले दिनों महान परिवर्तन की प्रक्रिया प्रचण्ड होगी। उसे दैवी निर्धारण, साँस्कृतिक पुनरुत्थान, विचार क्रान्ति आदि भी कहा जा सकता है, पर वह होगी वस्तुतः समाजक्रान्ति ही। समाज, जन समुदाय को एक सूत्र में बाँधे रहने वाली व्यवस्था को कहते हैं। यह व्यवस्था बदलेगी तो प्रचलन और स्वभावों में समान रूप से एक साथ परिवर्तन प्रस्तुत होंगे।

🔶 व्यक्ति सादगी सीखेगा। सरल बनेगा और सन्तोषी रहेगा। श्रमशीलता गौरवास्पद बनेगी। हिल−मिलकर रहने की सहकारिता और मिल बाँटकर खाने की उदारता बदले हुए स्वभाव की विशेषता होगी। महत्त्वाकाँक्षाएँ उद्विग्न न करेंगी। उद्धत प्रदर्शन का अहंकार तब बड़प्पन का नहीं पिछड़ेपन का चिन्ह समझा जायेगा। विलासी और संग्रही भी अपराधियों की पंक्ति में खड़े किये जायेंगे और उन्हें सराहा नहीं दबाया जाएगा।  कुटिलता अपनाने की गुंजाइश जागृत एवं परिवर्तित समाज में रहेगी ही नहीं। छद्म आवरणों को उघाड़ने में ऐसा ही उत्साह उभरेगा जैसा कि इन दिनों विनोद मंचों के निमित्त पाया जाता है।

🔷 इन दिनों अधिक कमाने, अधिक उड़ाने और ठाट-बाट दिखाने की जिस दुष्प्रवृत्ति का बोलबाला है उसे भविष्य में अमान्य ही नहीं, हेय भी ठहरा दिया जायेगा। थोड़े में निर्वाह होने से कम समय में उपार्जन के साधन जुट जायेंगे। बचा हुआ समय तब आलस्य-प्रमाद में नहीं वरन् सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन में लगा करेगा। सार्वजनिक सुव्यवस्था और मानवी गरिमा को बढ़ाने वाले तब ऐसे अनेकानेक कार्य सामने होंगे जिनमें व्यस्त रहते हुए व्यक्ति हर घड़ी प्रसन्नता, प्रगति और सुसम्पन्नता का अनुभव करता रहें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी 1984 पृष्ठ 57

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 April

🔴 इस समय सारे विश्व की व्यवस्था नये सिरे से बनने वाली है। उस समय आप कितने महान् बनेंगे इसका जवाब समय देगा। हनुमान ने कितनी उपासना की थी, नल-नील, जामवन्त, अर्जुन ने कितनी पूजा-तीर्थयात्रा की थी? यह हम कह नहीं सकते; परन्तु उन्होंने भगवान् का काम किया था। भगवान् ने भी उनके कार्यों में कंधा से कंधा मिलाया था। विभीषण, केवट ने भगवान् का काम किया था—ये लोग घाटे में नहीं रहे। भगवान् का काम करने वाले ही भगवान् के वास्तविक भक्त होते हैं।

🔵 इस समय जो भगवान के भक्त हैं, जिन्हें इस संसार के प्रति दर्द है; उनके नाम पर विशेष सन्देश भेजा गया है कि वे अपने व्यक्तिगत लाभ के कार्यों में कटौती करें एवं भगवान् का काम करने के लिए आगे आएं। हमारा भी यही सन्देश है। अगर आप सुन-समझ सकेंगे तो आपके लिए अच्छा होगा। अगर आप इस परिवर्तन की वेला में भी अपना मतलब सिद्ध करते रहे और मालदार बनते रहे तो पीछे आपको पछताना पड़ेगा तथा आप हाथ मलते रह जायेंगे।

🔴 पीला कपड़ा आप उतारना मत। यह हमारी शान है, हमारी इज्जत है। यह हमारी हर तरह की साधु और ब्राह्मण की परम्परा का उस समय की निशानी है, कुल की निशानी है। पीले कपड़े पहनकर जहां भी जायेंगे लोगों को मालूम पड़ेगा कि ये मिशन के आदमी हैं, जो सन्तों की परम्परा को जिन्दा रखने के लिए कमर बांधकर खड़े हो गये। जो ब्राह्मण की परम्परा को जिन्दा रखने के लिए कमर कसकर खड़े हो गये हैं। ऋषियों की निष्ठा को ऊंचा उठाने के लिए आप पीला कपड़ा जरूर पहनना।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (अन्तिम भाग)

🌹 सद्विचारों का निर्माण सत् अध्ययन—सत्संग से

🔴 ज्ञान के अभाव में जनसाधारण भ्रांतिपूर्ण एवं निराधार बातों को उसी प्रकार समझ लेता है जिस प्रकार हिरन मरु-मरीचिका में जल का विश्वास कर लेता है और निरर्थक ही उसके पीछे दौड़-दौड़कर जान तक गंवा देता है। अज्ञान का परिणाम बड़ा ही अनर्थकारी होता है। अज्ञान के कारण ही समाज में अनेकों अन्ध-विश्वास फैल जाते हैं। स्वार्थी लोग किस अन्ध-परम्परा को चलाकर जनता में यह भय उत्पन्न कर देते हैं कि यदि वे उक्त परम्परा अथवा प्रथा को नहीं मानेंगे तो उन्हें पाप लगेगा जिसके फलस्वरूप उन्हें लोक में अनर्थ और परलोक में दुर्गति का भागी बनना पड़ेगा। अज्ञानी लोग ‘भय से प्रीति’ होने के सिद्धान्तानुसार उक्त प्रथा-परम्परा में विश्वास एवं आस्था करने लगते हैं और तब उसकी हानि को देखते हुए भी अज्ञान एवं आशंका के कारण उसे छोड़ने को तैयार नहीं होते। मनुष्य आंखों देखी हानि अथवा संकट से उतना नहीं डरते जितना कि अनागत आशंका से। अज्ञानजन्य भ्रम जंजाल में फंसे मनुष्य दीन-दुःखी रहना स्वाभाविक ही है।

🔵 यही कारण है कि ऋषियों ने ‘‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’’ का सन्देश देते हुए मनुष्यों का अज्ञान की यातना से निकलने के लिए ज्ञान-प्राप्ति का पुरुषार्थ करने के लिए कहा है। भारत का आध्यात्म-दर्शन ज्ञान-प्राप्ति के उपायों का प्रतिपादक है। अज्ञानी व्यक्ति को शास्त्रकारों ने अंधे की उपमा दी है। जिस प्रकार बाह्य-नेत्रों के नष्ट हो जाने से मनुष्य  भौतिक जगत का स्वरूप जानने में असमर्थ रहता है उसी प्रकार ज्ञान के अभाव में बौद्धिक अथवा विचार-जगत की निर्भ्रान्त जानकारी नहीं हो पाती। बाह्य जगत के समान मनुष्य का एक आत्मिक जगत भी है, जो कि ज्ञान के अभाव में वैसे ही तमसाच्छन्न रहता है जैसे आंखों के अभाव में यह संसार।

🔴 सद्ज्ञान में ही वह सृजनात्मक शक्ति सन्निहित है, जो मनुष्य को प्रगति-पथ पर चढ़ने की प्रेरणा देती एवं सहायता करती है। इसलिए उन्नति के आकांक्षी व्यक्ति को सत्साहित्य के माध्यम एवं सत्संग के द्वारा सदा स्वयं को सद्विचारों से समृद्ध करते रहना चाहिए, ताकि वह उसकी सृजनात्मक शक्ति के सहारे उत्कर्ष की ऊंची मंजिलें पार करता चला जाए।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 29)

🌹 युग परिवर्तन प्रतिभा ही करेगी

🔵 प्रयोजन बड़ा होते हुए भी उसका समाधान सरल है। यदि प्रतिभाओं के परिष्कार का क्रम चल पड़े, उनके आविर्भाव का उपचार बन पड़े तो समझना चाहिये कि इन अनुदानों के सहारे विश्वव्यापी कार्य सध जाता है-सामाजिक और क्षेत्रीय समस्याओं को संभालते रहना और भी अधिक सरल पड़ता जाएगा।                  

🔴 हर महत्त्वपूर्ण कार्य में तद्नुरूप ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। उसके बिना तो छोटे-छोटे कार्य भी पूरे नहीं होते। हर महत्त्वपूर्ण कार्य के लिये ऊर्जा चाहिये; फिर युगनिर्माण जैसा विश्वव्यापी और अत्यधिक भारी-भरकम काम तो वरिष्ठ प्रतिभासम्पन्नों के कंधा लगाये बिना पूरा हो सकने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।

🔵 नवनिर्माण की विश्वव्यापी संरचना जिसने सोची और खड़ी की है, उसने इस पुण्यप्रयोजन की पूर्ति के लिये प्राणवान् जीवट के धनी व्यक्तित्वों की अच्छी-खासी सेना खड़ी करने की आवश्यकता अनुभव की है और उसे समय रहते जुटा लेने की तैयारी की है। यह उल्लेख-उद्बोधन उन्हीं के लिये है। प्रतिभा-परिष्कार का सुयोग उपयुक्त मात्रा में बन पड़ा तो फिर अपनी दुनिया का स्वरूप और परिवेश बदल डालने में नियंता के सामने और कोई बड़ी कठिनाई शेष न रहेगी।

🔴 भूतकाल में भी मनस्वी लोगों ने एक-से-एक आश्चर्यजनक कार्य किये हैं। इनमें अगस्त्य का समुद्र सोखना, हनुमान का पर्वत उठाना एवं विश्वामित्र के तत्त्वावधान में रामराज्य की स्थापना होना जैसी घटनाएँ ऐसी हैं, जो बताती है कि करने-मरने पर उतारू व्यक्ति के लिये क्या कुछ ऐसा है, जिसे संभव करके नहीं दिखाया जा सकता। स्वर्ग से धरती पर गंगा उतारने वाले भगीरथ अपने कार्य में सफल हुए थे तो फिर कोई कारण नहीं कि नवनिर्माण में जुटे भगीरथों की अपनी मण्डली भ्रम-जंजाल से निकलकर सीधे और सरल काम कर सकने के लिये समर्थ नहीं बन सकती।      
  
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 6 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 April 2017


👉 प्रसाद में छिपा था पोलियो का इलाज

🔵  मैं निजी कार्य से हजारीबाग गया था। रात्रि विश्राम के लिए किसी जगह की तलाश कर रहा था। इसी बीच एक भाई ने कहा कि यहाँ से थोड़ी ही दूर अन्नदा विद्यालय में गायत्री यज्ञ चल रहा है, वहीं पर आप चले जाइए। वहाँ पर आपके रहने, खाने- पीने की व्यवस्था भी हो जाएगी। मेरे पास और कोई चारा भी नहीं था। यह बात मुझे जँच गई। सोचा धार्मिक कार्यक्रम है, रहने खाने के साथ सत्संग का भी लाभ अनायास मिल जाएगा।

🔴  यही सोच कर मैं यज्ञ स्थल पर गया। मुझे वहाँ की व्यवस्था देखकर बड़ी हैरत हुई। मैं, सामान्य क्रम में जो आज तक होता रहा है, उसी हिसाब से सोच रहा था। किन्तु वहाँ का अनुशासित कार्यक्रम देखकर काफी प्रभावित हुआ। धर्म की गूढ़ बातें बड़े ही सहज ढंग से हमारे हृदय में उतरती चली गईं। सत्संग से लगा मेरी वर्षों की प्यास बुझ गई। गुरु का जीवन में क्या स्थान है, मुझे इसका ज्ञान नहीं था। इस सत्संग में मैंने गुरु के महत्त्व को जाना।

🔵  इसका प्रभाव यह हुआ कि दूसरे दिन ही दिनांक ११ मई १९८७ को मैंने दीक्षा ले ली। इस प्रकार धीरे- धीरे गायत्री मिशन से जुड़ता चला गया। मेरी श्रद्धा दिनोंदिन मिशन एवं गुरु जी के प्रति बढ़ती रही। मेरा छोटा पुत्र नरेश का ढाई वर्ष की उम्र से ही बायाँ पैर पोलियो ग्रस्त हो गया था। अपनी स्थिति के अनुरूप मैंने उसका बहुत इलाज कराया, किन्तु कोई लाभ नहीं मिला। मैंने राँची के डॉक्टर श्री टी० बी० प्रसाद को दिखाया तो उन्होंने मुझे समझाया कि मैं इसकी नस काट कर जोड़ सकता हूँ, परन्तु ठीक होगा कि नहीं यह गारण्टी नहीं है। आप आर्थिक दृष्टि से बहुत कमजोर दिखते हैं इसलिए इसे ईश्वर पर ही छोड़ दीजिए।

🔴  इस तरह धीरे- धीरे उसकी उम्र १३- १४ वर्ष की हो गई और उसका पैर बेकार होता चला गया। अब तो उसे बिना सहारा के चलना भी दूभर होने लगा। उसे मुझे खुद साइकिल से विद्यालय पहुँचाना तथा ले आना पड़ता था, जो बहुत मुश्किल काम था। इसी बीच करीब १९९० में गायत्री परिवार के एक परिजन मुझे मिले। उन्होंने मुझे सलाह दी कि चूँकि आप वंदनीया माताजी से दीक्षित हैं इसलिए अपने बच्चे को उन्हीं के पास ले जाएँ। उनके आशीर्वाद से सब कुछ ठीक हो जाएगा। उनकी यह बात मुझे बहुत अच्छी लगी।

🔵  इसके बाद मैंने शान्तिकुञ्ज पत्र लिखकर स्वीकृति मँगाकर जून १९९१ में एक माह का सत्र करने अपने परिवार तथा कुछ अन्य लोगों के साथ शान्तिकुञ्ज पहुँच गया। माताजी से मिलने के क्रम में मैं, परिवार के लोग तथा अन्य लोग भी थे। माताजी को इस बच्चे को दिखाया तथा प्रार्थना की कि माता जी इस बच्चे का जीवन कैसे बीतेगा? माताजी ने बच्चे को बड़ी गौर से देखा तथा प्रसाद के रूप में हलवा दिया और आश्वासन दिया कि जा तेरा बेटा ठीक हो जाएगा। इसके पश्चात् सत्र समाप्त हो गया। सभी लोग अपने- अपने घर चले गए। वापस आने के बाद एक दिन उमेश ने नरेश से कहा चलो नरेश तुम्हें साइकिल सिखाएँगे। दोनों भाई साइकिल सीखने गए। कुछ देर बाद हम सबने देखा कि नरेश खुद चलाकर आ रहा है। अचानक देखने पर विश्वास नहीं हुआ कि यह वही बच्चा है जो अभी कुछ दिन पहले तक बैठने को तरसता था, जो बड़ी मुश्किल से साइकिल पर बैठकर स्कूल जाता था आज स्वयं साइकिल चलाकर आ रहा है। हम लोग खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। सभी की आँखें खुशी से गीली हो गई थीं। यह घटना क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई।

🔴  माँ के इस दैवीय अनुदान को पाकर हम सपरिवार मिशन से पूर्ण रूप से जुड़ गए। इस तरह से हमने उमेश को सदा के लिए शांतिकुंज को समर्पित कर दिया। मैं गुरु देव को भगवान शिव एवं माताजी को आद्यशक्ति पार्वती मानता हूँ। घर में सिर्फ पूज्य गुरुदेव, माताजी एवं गायत्री की ही पूजा होती है।                   
  
🌹 हरि यादव, गिरीडीह (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/prasad

👉 सच्चे जीवन की झलक

🔵 श्रीमती लस्सीचेस इंगलैंड की निवासी थीं। उनके पति भारतीय सेना में मेजर के पद पर थे। भौतिकवाद की समर्थक ब्रिटिश सभ्यता में पली नारी और फिर एक फौजी मेजर की पत्नी-लस्सीचेस, बडे़ ठाठ-बाट से रहतीं और सैर-सपाटा करती। जिंदगी उनके लिए एक उत्सव के समान थी और उसे उसी प्रकार जी भी रही थीं।

🔴 श्रीमती लस्सीचेस को दो खास शौक थे। एक फिल्म देखना और दूसरा मित्रों को दावत देना। उनके घर आए दिन मित्रों की दावत होती रहती थी और हर नयी फिल्म को वे देखे बिना नहीं रहती थी। पैसे के संबंध मे लस्सीचेस पति पर ही निर्भर न रहती थी। उन्हें अपने पिता से वसीयत में एक लबी रकम मिली हुई थी। पैसे की उन्हें जरा भी कमी नहीं थी।

🔵 एक लंबे अरसे तक यह जीवन चलता रहा, फिर सहसा बदल गया। यह परिवर्तन उनमें तब हुआ, जब वे कुछ दिन भारत मे पति के साथ रहकर लंदन वापिस आ गई। भारत प्रवास के बाद उन्होंने शराब पीना छोड दिया। रंगीन कीमती और तड़क भड़क वाले कपडों से उन्हें अरुचि हो गई। रहन-सहन और आचार, विचार में शालीनता आ गई। उनका प्रतिमास खर्च हजारों से घटकर सैकडों मे आ गया। भारत से आने के बाद श्रीमती लस्सीचेस में एक अप्रत्याशित संतत्व आ गया।

🔴 परिचितों, मित्रों और सखी-सहेलियों को श्रीमती चेस के इस आमूल एवं आकस्मिक परिवर्तन पर बडा आश्चर्य हुआ, वे अपने लिए इस आश्चर्य से व्यग्र होकर पूछ ही बैठे- ''श्रीमती चैस! आप जब से भारत प्रवास से वापस आई है, तब से आपका जीवन ही बदल गया है। आखिर ऐसा कौन-सा शोक आपके हृदय मे घुस बैठा है, जिससे आप जिंदगी से उदासीन हो गई हैं ?"

🔵 श्रीमती लस्सीचेस ने मित्रों को धैर्यपूर्वक सुना और उत्तर दिया- ''भारत-प्रवास के समय मैं उसके प्राचीन साहित्य को पढ़ चुकी हूँ और उसकी प्रेरणा से मुझे यह प्रकाश मिला है, जो शांति सादगी में है, उसका रंचमात्र प्रदर्शन में नहीं है। फिर भी अभी मेरा जीवन अपूर्ण है। कुछ ही समय में मैं उसकी पूर्ति करने का कार्यक्रम चलाने वाली हूँ।'

🔴 और वास्तव में कुछ ही समय बाद लोगों ने देखा कि श्रीमती लस्सीचेस ने समाज-सेवा का कार्यक्रम शुरू कर दिया। उन्होने लंदन की मजदूर तथा गरीब बस्तियों में जाना और स्वच्छता तथा शिक्षा का प्रचार करना प्रारंभ कर दिया। वे गरीब तथा महिला-मजदूरों और उनके बच्चों को स्वयं पढातीं और शराब य सिगरेट पीने से विरत करती। अपने जीवन का उदाहरण देकर उन्हें जीवन का सच्चा मार्ग बतलाती और अनुभव कराती कि गरीबी में भी सुंदरतापूर्वक रहा जा सकता है, यदि उसे दुर्व्यसनों से दूषित न किया जाए।

🔵 श्रीमती लस्सीचेस अपने शौक आदि पर जो रुपया खर्च करती थीं, वह अब अपने पर खर्च न करके समाज-सेवा व गरीबों की सेवा में खर्च करने लगीं जिससे उन्हें न केवल आत्म-शांति ही मिलती बल्कि वे अपने सेवा-क्षेत्र में देवी के रूप मे पूजी जाने लगीं।

🔴 कुछ समय बाद उनके पति का देहांत हो गया। उनके मित्रों तथा संबंधियो ने बहुत कुछ समझाया कि वे फिर विवाह कर लें और अपनी संपत्ति का जी भरकर उपभोग करें। श्रीमती चेस इसके लिए किसी प्रकार भी तैयार न हुई। उन्होंने बार-बार यही उत्तर दिया कि मै समाज की हूँ मेरी संपत्ति समाज की है, उसे फूँकने और बहाने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। अब इसका व्यक्तिगत जीवन में उपभोग करने का प्रश्न ही नही उठता। हाँ इसका सामाजिक हित में सदुपयोग अवश्य करूगी। श्रीमती चेस की इस दृढ़ता एवं उच्चता से प्रप्रगिवत होकर उनके संपर्क में अन्ने वाली कितनी ही महिलाओं का जीवन बदला तथा सुधर गया।

🔵 कुछ समय बाद जब उनकी मृत्यु हुई तो उनकी वसीयत के अनुसार उनकी लाखों की संपत्ति इंग्लैंड के गिरजाघरों को बाँट दी गई जिन्हें उस देश में सच्चे धर्म, गरीबों की सहायता तथा उन विधवाओं की मदद में खर्च करने के लिए निर्देश दिया गया था, जो पुन: विवाह न कर शेष जीवन उन्हीं की तरह समाज की सेवा में लगाने की इच्छूक हों।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 121, 122

👉 संपदा को रोकें नहीं

🔵 परमात्मा के अनंत वैभव से विश्व में कभी किसी बात की नहीं। भगवान आपके हैं और उसके राजकुमार के नाते सृष्टि की हर वस्तु पर आपका समग्र अधिकार है। उसमें से जब जिस चीज की जितनी आवश्यकता हो उतनी लें और आवश्यकता निबटते ही अगली बात सोचें। संसार में सुखी और संपन्न रहने का यही तरीका है।

🔴 बादल अपने, नदी अपनी, पहाड़ अपने, वन उद्यान अपने। इनमें से जब जिसके साथ रहना हो, रहें। जिसका जितना उपयोग करना हो, करें। कोई रोक-टोक नहीं है। दुःखदायी तो संग्रह है। नदी को रोककर यदि अपनी बनाना चाहेंगे और किसी दूसरे को पास न आने देंगे, उपयोग न करने देंगे तो समस्या उत्पन्न होगी। एक जगह जमा किया हुआ पानी अमर्यादित होकर बाढ़ के रूप में उफनने लगेगा और आपके निजी खेत खलिहानों को ही डुबो देगा।

🔵 बहती हुई हवा कितनी सुरभित है पर उसे आप अपने ही पेट में भरना चाहेंगे तो पेट फूलेगा, फटेगा। औचित्य इसी में है कि जितनी जगह फेफड़े में है, उतनी ही सांस लें और बाकी हवा दूसरों के लिए छोड़ दें। मिल-बांटकर खाने की यह नीति ही सुखकर है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 -अखण्ड ज्योति – जनवरी 1985 पृष्ठ 1

👉 जप में ध्यान द्वारा प्राणप्रतिष्ठा (भाग 1)

🌹 आमतौर से उपासना करने वालों को यह शिकायत रहती है कि भजन करते समय उनका मन स्थिर नहीं रहता, अनेक जगह भागता रहता है। साधना में मन न लगे, चित्त कहीं का मारा कहीं भागा फिरे तो उसमें वह आनंद नहीं आता, जो आना चाहिए।

🔴 इस कठिनाई का उपाय सोचने से पूर्व यह विचार करना होगा कि मन क्यों भागता है? और भागकर कहाँ जाता है? हमें जानना चाहिए कि मन प्रेम का गुलाम है। जहाँ भी जिस वस्तु में भी प्रेम मिलेगा, वहीं मन उसी प्रकार दौड़ जाएगा, जैसे फूल पर भौंरा जा पहुँचता है। साधारणतया लोगों का प्रेम अपनी स्त्री-पुत्र, मित्र-धन-व्यवसाय, यश-मनोरंजन आदि में होता है। इन्हीं प्रिय वस्तुओं में मन दौड़-दौड़कर जाता है।

🔵 भजन को हम एक चिन्हपूजा की तरह पूरा तो करते हैं, पर उसमें सच्चा प्रेम नहीं होता। इष्टदेव को भी हम कोई बहुत दूर का अपने से सर्वथा भिन्न तत्व मानते हैं, उससे कुछ चाहते तो हैं, पर अपने तथा उसके बीच में कोई प्रेम और आत्मीयता का संबंध-सूत्र नहीं देखते। राजा और भिखारी के बीच जो अंतर होता है, वही हमें अपने और इष्टदेव के भीतर लगता है। ऐसी दशा में मन यदि भजन में न लगे और अपने प्रिय विषयों में भागे तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। यह स्वाभाविक ही है।

🔴 भजन में मन लगे इसके लिए बलपूर्वक मन को रोकने का प्रयत्न निष्फल ही रहता है। यह एक तथ्य है कि मन प्रेम का गुलाम है। वह वहीं टिकेगा, जहाँ प्रेम होगा। यदि भजन के साथ प्रेमभावना का समावेश कर लिया जाए तो निश्चित रूप से मन उसमें उसी प्रकार लगा रहेगा जैसा संसारी मनुष्यों का अपने स्त्री-पुत्र धन आदि में लगा रहता है।

🌹 -अखण्ड ज्योति – मई 2005 पृष्ठ 19

👉 उपासना के तत्व दर्शन को भली भान्ति हृदयंगम किया जाय (भाग 4)

🔵 शरीर को नित्य स्नान कराया जाता है, वस्त्र हम नित्य धोते हैं, कमरा नित्य बुहारी लगा कर साफ करते हैं। कारण यह कि एक बार की सफाई रोज काम नहीं दे सकती। मन को एक बार चिंतन−मनन− स्वाध्याय द्वारा साफ कर लिया तो सदा वह वैसा ही बना रहेगा, ऐसी आशा निरर्थक है। अभी आकाश साफ है। उस पर कब आँधी, कुहासा धूलि−बादल छा जायेंगे प्रकृति कब कुपिता हो जाएगी कहा नहीं जा सकता। अन्तरात्मा पर निरन्तर छाते रहने वाले इन मलिन आवरणों की सफाई के लिये उपासना की नित्य निरन्तर आवश्यकता पड़ती है ईश्वरीय गुणों का समावेश अपने चिन्तन व्यवहार में इससे कम में हो ही नहीं सकता। आग के समीप बैठे बिना गर्मी आये कैसे?

🔴 अपने आपे को साधने, अनगढ़ से सुगढ़ बनाने हेतु सुसंस्कारिता की साधना की जाती है। यह तो पूर्वार्ध हुआ। इसका उत्तरार्ध है उपासना जिसमें ईश्वरीय गुणों से स्वयं को अनुप्राणित किया जाता है। यह आत्मिक पुरुषार्थ हर साधक के लिये अनिवार्य है।

🌹 -समाप्त
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 -अखण्ड ज्योति – मार्च 1982 पृष्ठ 4

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 April

🔴 जीवनोद्देश्य की प्राप्ति के लिये भजन ही नहीं व्यक्तित्व की उत्कृष्टता का अभिवर्धन भी आवश्यक है। ओछे और कमीने व्यक्तित्व दिन रात भजन करने पर भी रतीभर आत्मिक प्राप्ति नहीं कर सकते। इसके विपरीत जिनने अपना अन्तःकरण पवित्र और व्यक्तित्व समुन्नत बनाया है उनका दस-बीस मिनट भजन भी ईश्वर की उपलब्धि और आत्म-साक्षात्कार का लाभ दे सकता है। इस तथ्य को ‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों को हृदयंगम कराते हुये उन्हें आत्म-निरीक्षण, आत्म-शोधन और आत्म-निर्माण की दिशा में अग्रसर होने के लिए प्रोत्साहित, प्रेरित किया जा रहा है।

🔵 उपासना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। इसके अनेक विधान हैं। इन सब विधानों में हमें गायत्री महामंत्र का जप और ध्यान सर्वोत्तम प्रतीत हुआ है। शास्त्र, पूर्वजों के निर्देश और हमारे व्यक्तिगत अनुभव तीनों का सम्मिलित निष्कर्ष गायत्री उपासना के पक्ष में ही जाता है। जो अन्य उपासना करते हैं वह भले ही उसे भी करते रहें पर हमारा अनुरोध है कि उसके साथ गायत्री उपासना अवश्य जोड़ दें। उचित तो यही है कि नियत समय पर, नियत विधि-विधान के साथ उपासना की जाय।

🔴 दवा थोड़ी होती है जरा-सी देर में खा ली जाती है पर उसका परहेज उपचार सारे दिन निबाहना पड़ता है। भजन थोड़ा रहे तो हर्ज नहीं पर उसके साथ जुड़े हुए आत्म-शोधन और परमार्थ प्रयोजन के दो महत्वपूर्ण आधार निश्चित रूप से जुड़े रहने चाहिये। इस प्रकार की साधना में असफलता की कोई सम्भावना नहीं वह लक्ष्य तक पहुँचा देने में निश्चित रूप से समर्थ होगी।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नवरात्रि साधना का तत्वदर्शन (अन्तिम भाग)



🔴 इस बीच हमने आप से नित्य अग्निहोत्र करने को कहा जप का एक अंश अग्निहोत्र कीजिए। आप अग्निहोत्र को एक कर्मकाण्ड माने बैठे हैं। अग्निहोत्र यज्ञ विज्ञान का नाम है। यह एक परम्परा ही नहीं, इसका साइंटिफिक बेस भी है। यज्ञ कहते हैं कुर्बानी को, सेवा को। भूदानयज्ञ, नेत्रदानयज्ञ, सफाईयज्ञ, ज्ञानयज्ञ हजारों तरह के यज्ञ हैं । इन सबका एक ही अर्थ होता है लोक हितार्थाय आहुति देना। यज्ञ कीजिए पूर्णाहुति दीजिए, पर जनकल्याण का ध्यान रखिए। संस्कृति की रक्षा के लिए, देश व मानवी आदर्शों को जीवन्त रखने के लिए अपने पसीने की आहुति दीजिए, उस चीज की भी आहुति दीजिए जिसे आपने दबाकर रखा है अपने बेटे के लिए।

🔵 मित्रों अगर आप अय्याशी-फिजूलखर्ची विलासिता की कुर्बानी देने की हिम्मत दिखा सके तो यज्ञ सफल है। तब आप असली अध्यात्मवादी होंगे। जिस दिन आप ऐसे बन जाएँगे तब आप देखेंगे असली चमत्कार । उस दिन आप देखेंगे असली भगवान। तब आपको सुदामा के तरीके से आप के चरणों को धोता हुआ, शबरी के तरीके से आपके दरवाजे पर झूठे बेर खाता हुआ और राजा बलि के तरीके से आपके दरवाजे पर साढ़े तीन गज जमीन माँगता हुआ, गोपियों के दरवाजे पर छाछ माँगता हुआ आपको भगवान दिखाई पड़ेगा। 

🔴 आइए! भगवान ने आपको बुलाया है। जेब खाली कीजिए। बीज के तरीके से गलिए और दरख्त की तरह फलिए मैंने यही जीवनभर सीखा व आपको भी सिखाना चाहता हूँ आपको यदि यह समझ में आस गया तो मैं पूरे मन से आशीर्वाद देता हूँ कि जो भी नवरात्रि अनुष्ठान के, गायत्री साधना के चमत्कार आपने सुने हैं वह आपके जीवन में फलित हो जायँ। आप जिस मकसद से आए थे वह पूरा हो व आप जब भी अनुष्ठान करें समूचा लाभ उठा सकें इसलिए आपको यह समझ में आए व आप लाभान्वित हों।

हमारी बात समाप्त। ॐ शाँतिः शाँतिः शाँतिः।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1992/April/v1.58

👉 ऊंचा क़द

चार महीने बीत चुके थे, बल्कि 10 दिन ऊपर हो गए थे, किंतु बड़े भइया की ओर से अभी तक कोई ख़बर नहीं आई थी कि वह पापा को लेने कब आएंगे. यह कोई ...