मंगलवार, 24 जनवरी 2017

👉 सोशल मीडिया पर उल्लू बनने से ऐसे बचें (अंतिम भाग)

🔴 अफवाह फैलाने पर कानूनी सजा

झूठी अफवाह फैलाने पर आईपीसी 153 और 505 के तहत कानूनन सजा हो सकती है। हाल में स्व. जयललिता के अस्पताल में भर्ती होने के बाद वट्सऐप पर अफवाह फैलाने के लिए तमिलनाडु पुलिस ने 8 लोगों को सेक्शन 505 के तहत गिरफ्तार किया था। इसलिए कभी भी राजनीतिक/धार्मिक आदि मेसेज जब तक कन्फर्म ने कर लें, आगे न भेजें।

🔴 ब्रैंड राइवलरी का गेम

कॉर्पोरेट वर्ल्ड में लोग अपने ब्रैंड को बेहतर साबित करने या दूसरे को खराब जताने के लिए सोशल मीडिया का खूब इस्तेमाल करते हैं। जैसे कि मोबाइल फटने की अफवाह। एक ही फोन, अलग-अलग वक्त पर, अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग लोगों के जख्मों के साथ दिखता है। आप ही बताइए कि 3-4 लोगों के पास बिल्कुल एक ही तरह से टूटा हुआ फोन कैसे हो सकता है? यहां तक कि जख्मी भी लोग मोबाइल फटने से नहीं हुए होते हैं। वे फोटो किसी दंगे की होती हैं या फिर किसी और वजह से जले इंसानों की होती हैं।

🔴 कैसे बचें

- ऐसी फोटो को तवज्जो न दें। जहां तक फटने की बात है तो कोई भी फोन फट सकता है तो क्या मोबाइल इस्तेमाल करना बंद कर देंगे?

🔴 खबरों का खेल समझें
अक्सर लोग चैनलों और अखबारों के नाम पर झूठी खबरें खूब फैलाते रहते हैं। लोग टीवी पर चलती हुई न्यूज का मोबाइल से फोटो लेकर उस पर फोटोशॉप में जाकर कुछ भी लिख देते हैं। फिर वट्सऐप पर लोगों को भेजने लगते हैं या फिर फेसबुक पर पोस्ट कर देते हैं। इस तरह लाखों लोगों तक यह झूठ पहुंच जाता है।

🔴 कैसे बचें

गौर से देखेंगे तो इस तरह की फोटो में जो न्यूज़ दिख रही है, उसकी सफेदी, लोगो, नीचे छोटी ब्रेकिंग न्यूज़ वाली पट्टी और बैकग्राउंड के लाल रंग में भी हल्का-सा फर्क होता है। फॉन्ट भी अलग होता है। और सबसे बड़ी बात, अगर यह न्यूज़ इतनी बड़ी है तो किसी और मीडिया या गूगल पर क्यों नहीं?

🔴 डेटिंग ट्रैप

जैसा कि आपको पहले बताया, लोग फेसबुक आदि से लड़कियों की फोटो चुराकर डेटिंग प्रोफाइल बनाते हैं और फिर किसी लड़के के प्रोफाइल पर कुछ दिन नजर रखते हैं। फिर किसी लड़की का फोटो, कोई काल्पनिक नाम इस्तेमाल कर दोस्ती करते हैं। अंत में कोई सर्विस/वेबसाइट आदि जॉइन करने को कहते हैं या फिर किसी की मदद के नाम पर पैसा ठग लेते हैं।

🔴 कैसे बचें

डेटिंग साइट्स से दूर रहें या जब तक सामने वाले से असल में मिल न लें, दूर रहें।

🔴 लाइक्स का गेम

'लाइक' का मतलब है कि किसी फेसबुक पेज के 'लाइक' पर क्लिक करना। इससे उस पेज पर कुछ भी आएगा वह आपको दिखेगा। अब फिर यहां आपकी भावनाओं का फायदा उठाया जाता है। ऐसे पेज कुछ ऐसा नाम रखते हैं जो आपको पसंद हो जैसे 'मैं भारतीय सेना को सपोर्ट करता हूं'। अब जहां सेना का नाम आ जाता है, लोगों की सोचने की शक्ति कम पड़ जाती है और देशभक्ति की भावना बढ़ जाती है। ऐसे पेज 4-5 सैनिकों की फोटो पोस्ट करते हैं जिनमें ज्यादातर झूठे होते हैं। ये किसी फिल्म से या किसी दूसरे देश की सेना से लिए जाते हैं। फिर भगवान की फोटो आपकी दिलचस्पी बनाए रखने डाल दिए जाते हैं। इन सबके बीच में या तो कोई वेबसाइट का लिंक (जो नाम से न्यूज वाली लगती है) या किसी राजनैतिक नेता की तारीफ वाली पोस्ट होती हैं। ऐसी न्यूज जैसी वेबसाइट भी होती है, जिनके पेज पर चारों ओर विज्ञापन भरे मिलते हैं। ध्यान रखें कि भावनाओं में बहकर किसी भी अनजान फोटो या पेज को लाइक न करें।

🔴 सचाई कैसे देखें

- आपको अगर किसी मेसेज की सचाई जांचनी है, तो उसमें से चुनिंदा शब्द या फिर पूरा वाक्य गूगल में टाइप करें। न्यूज सही होती है तो अक्सर वहां मिल ही जाती है।
- फोटो में कुछ लिखा हो तो वही शब्द या जिस जगह/चीज के बारे में हो उसका नाम गूगल पर इमेजेज सेक्शन में जाकर ढूंढें।
- जरूरी नहीं कि न्यूज या इमेज गूगल के पहले पेज पर ही मिले। कभी-कभी थोड़ा आगे जाना पड़ता है।
- ज्यादातर सर्च में गूगल पर न्यूज/इमेज के सामने तारीख भी लिखी आती है, जिससे पता चलता है कि यह बिलकुल नई बात है या बरसों पुरानी।
- यहां खास बात यह है कि यह तारीख नहीं बदली जा सकती।

🔴 हर लिंक पर न करें क्लिक

कई लिंक आपको ऐसी वेबसाइट पर ले जाते हैं, जहां कोई स्क्रिप्ट आपके ब्राउज़र पर खतरे का मेसेज दिखाएगी। मोबाइल वाइब्रेट होने लगेगा और अगर आप डर कर दिए हुए बटन को दबाएंगे तो कोई ऐप डाउनलोड हो जाएगा जो सिर्फ विज्ञापन ही दिखाएगा। ब्राउज़र फोन को धीमा भी कर देगा इसीलिए किसी अनजान लिंक पर न क्लिक करें।

🔴 कहां कर सकते हैं शिकायत

अगर किसी ने आपकी फोटो का गलत इस्तेमाल किया है या आपके नाम से कोई गलत मेसेज लोगों को भेजा है तो आप सीबीआई की साइबर सेल में शिकायत कर सकते हैं।

Add: सीबीआई साइबर क्राइम सेल, सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस, साइबर क्राइम इन्वेस्टिगेशन सेल, सीबीआई, 5th फ्लोर, ब्लॉक 3, सीजीओ कॉम्प्लेक्स, लोधी रोड-3, लोधी रोड

फोन: 011- 436-2203, 439-2424

वेबसाइट: cbi.nic.in, ईमेल cbiccic@bol.net.in

इसके अलावा इकनॉमिक ऑफेंसेस विंग (EOW) के अंदर साइबर सेल में भी शिकायत कर सकते हैं।
अड्रेस: असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस, साइबर क्राइम, पुलिस ट्रेनिंग स्कूल कॉम्प्लेक्स, मालवीय नगर
फोन: 011-26515229
ईमेल: acp-cybercell-dl@nic.in

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Jan 2017


👉 आज का सद्चिंतन 25 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 18) 25 Jan

🌹 सार्थक, सुलभ एव समग्र साधना  

🔴 पदार्थ से शरीर और आत्मा का महत्त्व अधिक है। इसी प्रकार समृद्धि-सम्पन्नता का, प्रगति और योग्यता का, आत्मिक प्रखरता, प्रतिभा का स्तर भी क्रम से, एक से एक सीढ़ी ऊँचाई का समझा जा सकता है। आन्तरिक आस्थाएँ ही वे विभूतियाँ हैं, जो व्यक्ति के चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को परिष्कृत करती हैं। व्यक्तित्त्व को प्रखर, प्रामाणिक एवं प्रतिभावान् बनाती हैं। इसी आधार पर वे क्षमताएँ उभरती हैं, जो अनेकानेक सफलताओं की उद्गम स्रोत हैं।              

🔵 आत्मबल के आधार पर अन्य सभी बल हस्तगत किये जा सकते हैं। इसी के आधार पर उपलब्धियों का सदुपयोग बन पड़ता है। परिस्थितियों की प्रतिकूलता रहने पर भी उन्हें व्यक्तित्त्व की उत्कृष्टता के आधार पर अनुकूल बनाया जा सकता है। संसार के इतिहास में ऐसे अगणित व्यक्ति हुए हैं, जिनकी प्रारम्भिक परिस्थितियाँ गई-गुजरी थीं। निर्वाह के साधनों तक की कमी पड़ती थी, फिर प्रगति के सरंजाम जुट सकना और भी कठिन, लगभग असम्भव दीख पड़ता था। इतने पर भी वे व्यक्तित्त्व की प्रामाणिकता के आधार पर सभी के लिये विश्वस्त एवं आकर्षक बन गये। उनका चुम्बकत्व व्यक्तियों, साधनों और परिस्थितियों को अनुकूल बनाता चला गया और वे अपने पुरुषार्थ के साथ उस सद्भाव का तालमेल बिठाते हुए दिन-दिन ऊँचे उठते चले गये और अन्तत: सफलता के सर्वोच्च शिखर तक जा पहुँचने में समर्थ हुए। ऐसे अवसरों पर व्यक्तित्त्व की उत्कृष्टता को ही श्रेय दिया जाता है। इस उपलब्धि को ही आत्मबल का चमत्कार कहते हैं।  

🔴 इसके विपरीत ऐसे भी अनेकानेक प्रसंग सामने आते रहते हैं, जिसमें सभी अनुकूलताएँ रहने पर भी लोग अपनी दुर्बुद्धि के कारण दिन-दिन घटते और गिरते चले गये। पूर्वजों के कमाये धन को दुर्व्यसनों में उड़ा दिया। आलस्य और प्रमाद में ग्रसित रहकर अपनी क्षमताओं और सम्पदाओं को गलाते चले गये। कई अनाचार के मार्ग पर चल पड़े और दुर्गति भुगतने के लिये मजबूर हुए। इसमें उनके मानस की गुण, कर्म, स्वभाव की निकृष्टता ने अनेक सुविधाएँ रहते हुए भी उन्हें असुविधा भरी परिस्थितियों तक पहुँचा दिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 शांति की तलाश

🔴 एक बार भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ कही जा रहे थे। उनके प्रिय शिष्य आनंद ने मार्ग में उनसे एक प्रश्न पूछा -‘भगवान! जीवन में पूर्ण रूप से कभी शांति नहीं मिलती, कोई ऐसा मार्ग बताइए कि जीवन में सदा शांति का अहसास हो।

🔵 बुद्ध आनंद का प्रश्न सुनकर मुस्कुराते हुए बोले, तुम्हे इसका जबाब अवश्य देगे किन्तु अभी हमे प्यास लगी है, पहले थोडा जल पी ले। क्या हमारे लिए थोडा जल लेकर आओगे?

🔴 बुद्ध का आदेश पाकर आनंद जल की खोज में निकला तो थोड़ी ही दूरी पर एक झरना नजर आया। वह जैसे ही करीब पंहुचा तब तक कुछ बैलगाड़िया वहां आ पहुची और झरने को पार करने लगी। उनके गुजरने के बाद आनंद ने पाया कि झील का पानी बहुत ही गन्दा हो गया था इसलिए उसने कही और से जल लेने का निश्चय किया। बहुत देर तक जब अन्य स्थानों पर जल तलाशने पर जल नहीं मिला तो निराश होकर उसने लौटने का निश्चय किया।

🔵 उसके खाली हाथ लौटने पर जब बुद्ध ने पूछा तो उसने सारी बाते बताई और यह भी बोला कि एक बार फिर से मैं किसी दूसरी झील की तलाश करता हूँ जिसका पानी साफ़ हो। यह कहकर आनंद जाने लगा तभी भगवान बुद्ध की आवाज सुनकर वह रुक गया। बुद्ध बोले-‘दूसरी झील तलाश करने की जरुरत नहीं, उसी झील पर जाओ।

🔴 आनन्द दोबारा उस झील पर गया किन्तु अभी भी झील का पानी साफ़ नहीं हुआ था । कुछ पत्ते आदि उस पर तैर रहे थे। आनंद दोबारा वापिस आकर बोला इस झील का पानी अभी भी गन्दा है। बुद्ध ने कुछ देर बाद उसे वहाँ जाने को कहा। थोड़ी देर ठहर कर आनंद जब झील पर पहुंचा तो अब झील का पानी बिलकुल पहले जैसा ही साफ़ हो चुका था । काई सिमटकर दूर जा चुकी थी, सड़े- गले पदार्थ नीचे बैठ गए थे और पानी आईने की तरह चमक रहा था।

🔵 इस बार आनंद प्रसन्न होकर जल ले आया जिसे बुद्ध पीकर बोले कि आनंद जो क्रियाकलाप अभी तुमने किया, तुम्हारा जबाब इसी में छुपा हुआ है। बुद्ध बोले -हमारे जीवन के जल को भी विचारों की बैलगाड़ियां रोज गन्दा करती रहती है और हमारी शांति को भंग करती हैं। कई बार तो हम इनसे डर कर जीवन से ही भाग खड़े होते है, किन्तु हम भागे नहीं और मन की झील के शांत होने कि थोड़ी प्रतीक्षा कर लें तो सब कुछ स्वच्छ और शांत हो जाता है। ठीक उसी झरने की तरह जहाँ से तुम ये जल लाये हो। यदि हम ऐसा करने में सफल हो गए तो जीवन में सदा शान्ति के अहसास को पा लेगे।

👉 आत्म निर्माण की ओर (भाग 1)

🔵 छोटी छोटी साधारण बातें बड़ी महत्त्वपूर्ण होती हैं- उनमें तत्त्वज्ञान और बड़े बड़े सत्य सिद्धान्त मिलते हैं। तुममें जितना ज्ञान है उसका उपयोग करते रहो जिससे वह नित्य नवीन बना चमकता रहेगा। केवल पुस्तकें पढ़ कर संसार की व्यावहारिक प्रथाओं में डूब जाने से ज्ञान होने से क्या लाभ जबकि अज्ञानियों के समान ही आचरण किया जाय। ज्ञानियों ने प्रथाओं की व्यवस्था मूर्खों के निर्देश के लिए ही हैं, ज्ञानी तो स्वतंत्र है और ज्ञान द्वारा विवेकबुद्धि से आचरण करने में समर्थ है यद्यपि मूर्ख लोग प्रथाबद्ध होकर ज्ञानी को धिक्कारते हैं कि उल्टा आचरण करते हो? ज्ञानी जानता है कि तत्व सत्य क्या है अतः वह मुक्त है। अज्ञानी अभाव के कारण प्रथाओं और परम्परा को ही सत्य मान उसमें लिप्त बद्ध है। उसमें बुद्धि नहीं कि स्वतंत्र रूप से प्रथा और परम्परा से बाहर निकल कर कुछ सोच सके और कर सके। यदि तुम ज्ञानी होकर भी मूर्खों के बीच तथा और परम्परा के अनुसार आचरण करो तो तुममें और मूर्खों में क्या अन्तर रहा?

🔴 अपने ज्ञान को स्वाध्याय और छोटे छोटे व्यवहार द्वारा नित्य परिमार्जित करते रहो। यदि कहीं ज्ञान चर्चा होती हो और उसके कुछ शब्द सुनकर तुम्हें मालूम पड़े तो यह कहकर वहाँ से मत खिसक जाओ कि यह सब तो मैंने पढ़ लिया है मैं जानता हूँ। संभव है उसके अन्दर कोई नवीन बात निकल आवे जो तुम्हारे लिए उपयोगी हो, तुम्हारे जीवन में महान् परिवर्तन उपस्थित कर दे।

🔵 अपनी बातचीत में सदैव सतर्क रहो। किसी के विषय में आलोचना या निन्दा मत करो और अपने विषय में किसी प्रकार की हीनता मत प्रकट करो। संसार में सभी प्राणी- परमात्मा की कला द्वारा रचित उसकी प्रतिमूर्ति हैं दिव्य हैं, तुम भी उसकी प्रतिमूर्ति और दिव्य हो। आवश्यकता है केवल आत्म विकास की, जिससे तुम दूसरों का और अपना सत्य स्वरूप समझ सको।

🔴 रात को सोते समय अन्वेषण करो कि दिन भर की बातचीत में तुमने किसी से कैसी कैसी बातें की। निश्चय करो कि अगले दिन बातचीत में कोई असत्य, हीन बात न निकले। तुम्हारे शब्द ठोस, रचनात्मक, दिव्य, प्रसन्न और चेतन हों जिससे दूसरों पर ऐसा प्रभाव पड़े जैसे एक चुम्बक दूसरे लोहे को खींचता है, और बिजली द्वारा मुर्दा ‘बैटरी चार्ज’ हो जाती है। ऐसा ही तुम्हारे शब्दों का प्रभाव हो कि सुनने वाला निराश निरुत्साही व्यक्ति चेतन हो जाय और असत्य भाषी का दिल हिल जाय और दुबारा असत्य बोलने का साहस न रह जाय।

🌹 अखण्ड ज्योति -अगस्त 1948 पृष्ठ 23

http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1948/August.23

👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 Jan 2017

🔴 परमार्थ के लिए स्वार्थ को छोड़ना आवश्यक है। आत्म-कल्याण के लिए भौतिक  श्री-समृद्धि की कामनाओं से मुँह मोड़ना पड़ता है। दोनों हाथ लड्डू मिलने वाली उक्ति उस क्षेत्र में चरितार्थ नहीं हो सकती। उन बाल बुद्धि लोगों से हमें कुछ नहीं कहना जो थोड़ा सा पूजा-पाठ करके विपुल सुख-साधन और स्वर्ग-मुक्ति दोनों ही पाने की कल्पनाएँ करते रहते हैं।

🔵 साधु-ब्राह्मणों का यह एक परम पवित्र कर्त्तव्य है कि इस समय जिस धर्म के आश्रय में वे अपनी आजीविका चलाते हैं और पूजा-सम्मान प्राप्त करते हैं उस धर्म रक्षा के लिए उन्हें कुछ काम भी करना चाहिए-कष्ट भी उठाना चाहिए। आज जबकि धर्म संकट में है, देश की सुरक्षा एवं प्रगति का प्रश्न है तब तो उन्हें उन आदर्शों को परिपुष्ट करने के लिए अपना समय लगाना ही चाहिए। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी दक्षिणा बटोरने और पैर पुजाने का ही धंधा करते रहे, कर्त्तव्य की तिलांजलि दिये बैठे रहे तो आगामी पीढ़ियँ उन्हें क्षमा न करेंगी।

🔴 ईश्वर और धर्म की मान्यताएँ केवल इसीलिए है कि इन आस्थाओं को हृदयंगम करने वाला व्यक्ति निजी जीवन में सदाचारी और सामाजिक जीवन में परमार्थी बने। यदि यह दोनों प्रयोजन सिद्ध न होते हों-इन दोनों कसौटियों पर वास्तविकता सिद्ध न होती हो तो यही कहना पड़ेगा कि यह तथाकथित ईश्वर भक्ति और धर्मात्मापन दम्भ मात्र था।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 34) 25 Jan

🌹 नित्य उपासना से अधिक लाभ

🔴 प्रति दिन प्रातः सायं नियमित रूप से गायत्री उपासना का विधान है। उस नियमितता में कोई व्यतिरेक नहीं आने देना चाहिए। तन्मयता और एकाग्रता तो उपासना को सर्वांगपूर्ण बनाने के लिए अनिवार्य है ही। पर इतने मात्र से ही आत्मकल्याण की आवश्यकता पूरी नहीं हो जाती है। स्वास्थ्य संरक्षण के लिए दिन में दो या तीन बार भोजन करते हैं। शरीर के पोषण और स्वास्थ्य संरक्षण के लिए यह आवश्यक है, पर इतने मात्र से यह उद्देश्य पूर्ण नहीं हो जाता। इसके साथ ही श्रमशील जीवन जीने, दिनचर्या में और भी कई नियमों का समावेश करना आवश्यक हो जाता है। यदि इन आवश्यक बातों का ध्यान न रखा गया तो कितना ही पोष्टिक भोजन किया जाय, उससे पोषण और स्वास्थ्य संरक्षण की आवश्यकता पूरी नहीं होती। गायत्री उपासना थोड़े समय तक की जाती है लेकिन उसका पूरा लाभ तभी मिलता है जब जीवन-पथ में उपासना के साथ-साथ साधना का भी समावेश किया जाय।

🔵 पहलवान लोग शारीरिक शक्ति का संवर्धन करने के लिए पौष्टिक भोजन तो करते ही हैं लेकिन उसका अधिकाधिक लाभ उठाने के लिए अधिकाधिक श्रम, व्यायाम, दण्ड, बैठक आदि भी करते हैं, तभी उसका समुचित लाभ मिलता है। जिन्हें गायत्री उपासना से अधिकाधिक लाभ उठाना है, उन्हें चाहिए कि वे उपासना के साथ साधनात्मक व्यायाम भी करें। यदि उपासना का स्तर अधिक ऊंचा कर दिया जाय, उसे साधना स्तर की बना दिया जाय तो उसका लाभ और भी अधिक मिलता है। साधना से आशय उपासना में निष्ठा का अधिकाधिक समावेश करना है। निष्ठा का समावेश संकल्प, दृढ़ता, अनुशासन और नियमितता के रूप में चरितार्थ होता है।

🔴 निष्ठा के समावेश से संकल्प बढ़ता है, संकल्प से मनोबल, आत्मिक बल ऊंचा उठता है। यह मनोबल, संकल्प, दृढ़ता, समन्वित-निष्ठा साधक को कठोर अनुशासन में रहने के लिए प्रेरित और बाध्य करती है। यह अनुशासन, नियमानुवर्ती ही तपश्चर्या कहलाती है। अनुष्ठान साधनाओं में इन्हीं बातों की विशेष रूप से आवश्यकता पड़ती है। और यदि नियमित साधना में भी इन विशेषताओं का समावेश कर लिया जाय तो वह सामान्य उपासना क्रम भी अनुष्ठान स्तर का बन जाता है। अस्तु गायत्री उपासना का अधिकाधिक लाभ उठाने के लिए उसमें नियम पालन, अनुशासन, निष्ठा, दृढ़ता और नियमितता का कड़ाई के साथ पालन करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 28) 25 Jan

🌹 साहस का शिक्षण—संकटों की पाठशाला में

🔵 शरीर और मन की अनुकूलताएं रुचिकर लगती हैं। उन्हें जुटाने के लिए मनुष्य का समूचा पुरुषार्थ लगा रहता है। जीवन यापन के लिए आवश्यक सुविधायें जुटाई जायं, यह उचित है पर यह नहीं भूलना चाहिये कि चाहते हुए भी वह जरूरी नहीं कि सदा अभीष्ट प्रकार की परिस्थितियां बनी रहेंगी। कठिनाइयां प्रतिकूलताएं भी जीवन पथ पर प्रस्तुत होती हैं तथा मनुष्य के धैर्य एवं जीवट की परीक्षा लेती हैं। अनभ्यस्त शरीर और मन को ऐसे अवसरों पर अधिक परेशानी होती है। उपस्थित कठिनाइयों संकटों को वे व्यक्ति अभिशाप मानते हैं। जिन्होंने सतत अनुकूलताओं में ही रहना सीखा है।

🔴 प्रायः देखा यह जाता है संकटों के अवसर पर अनभ्यस्त अपना मन ही अधिक समस्या खड़ा करता है। आरम्भ से ही उसे हर तरह की परिस्थितियों में रहने के लिए प्रशिक्षित और अभ्यस्त किया गया होता तो उपस्थित होने वाली कठिनाइयां भी खेल-खिलवाड़ जैसी महसूस होतीं। पुरुषार्थ एवं जीवट को निखारने का उन्हें भी माध्यम माना जाता है तथा उतना ही उपयोगी उन्हें भी समझा जाता है जितना कि अनुकूल परिस्थितियों को।

🔵 पर बिरले होते हैं जो अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों में एक जैसे निस्पृह बने रहते हैं और अपने मन को दोनों ही में सन्तुलित बनाये रखते हैं। अन्यथा अधिकांश की प्रसन्नता अप्रसन्नता परिस्थितियों पर अवलम्बित होती है। वे अभीष्ट तरह की सुख सुविधाएं उपलब्ध रहने पर मोद मनाते तथा उनके तिरोहित होते ही शोकातुर हो उठते हैं। थोड़े से व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो कठिनाइयों तथा संघर्षों को स्वयं आमन्त्रित करते हैं। सुविधाओं तथा ढर्रे का जीवन उन्हें नहीं रुचता। कठिनाइयों संकटों से जूझे बिना उन्हें चैन नहीं पड़ता। वे जानते हैं कि उनका सामना किये बिना आन्तरिक जीवट को उभरने और सुदृढ़ बनने का अवसर नहीं मिल सकता। ऐसे व्यक्ति शूरवीर साहसी मनस्वी बनते हैं। स्वयं धन्य होते और दूसरों का प्रेरणा प्रकाश देते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 6)

 👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
🔴 और बड़े महत्त्वपूर्ण आदमी है और ऐसे महत्त्वपूर्ण और कीमती आदमी हैं कि आप अपने महत्त्व का और आप अपने कीमत का ठीक इस्तेमाल करने में समर्थ हो सकें तो आपके लिये भी मजा जाये और हमारे लिये भी मजा आ जाये। दोनों के दोनों ही धन्य हो जायें और दोनों के दोनों ही आज का हमारा यह प्रवचन है इसको सुनकर यह कहे कि इस आदमी ने बहुत ही नेक सलाह दी थी। और अगर हमने इस सलाह को न माना होता तो हम बहुत घाटे में रहे होते। आप हमारा कहना मानिए और हमारी सलाह पर चलिये। हम भी किसी की सलाह पर चले हैं घाटा हमने भी उठाया है। जोखिम हमने भी उठाया है। जोखिम उठाना कोई बहुत बुरी बात नहीं है।

🔵 हनुमान् जी ने भी जोखिम उठाया था कुन्ती ने भी जोखिम उठाया था। कुन्ती ने कहाँ से ढूँढ़े थे पाँच बच्चे सामान्य नहीं थे उनके पति के नहीं थे पाण्डु के नहीं थे। वह किसके थे एक सूर्य का बेटा था, एक इन्द्र का बेटा था, एक वरुण का बेटा था, एक वायु का बेटा था और छः देवताओं के ही सब बेटे थे। और उन्होंने सबको भगवान् के सुपुर्द कर दिया। ले जाओ अरे बड़ी पागल थी कुन्ती अपने घर रखती अपने बच्चों की कमाई खाती और अपने घर में मकान बनाती अपनी दुकान चलाती और अपनी खेती करती और सब बच्चों को नौकरी से लगा देती तो सब लड़के बहुत सारा कमाते और मजा आता जेवर पहनते लेकिन कुन्ती कुन्ती ने मुनासिब सलाह दी कि गैरमुनासिब सलाह दी बड़ी मुनासिब सलाह दी और मुनासिब सलाह का परिणाम यह हुआ कि अर्जुन धन्य हो गया युधिष्ठिर धर्मराज हो गया। और अगर श्रीकृष्ण जी के फेर में न आये होते महाभारत में न गये होते तो न वो युधिष्ठिर रहे होते और न धर्मराज रहे होते न पार्थ हुये होते और न वह भीम हुये होते साधारण से व्यक्ति रह जाते और सामान्य स्थिति में उनको जीवन यापन करना पड़ता। लेकिन उन्होंने उनका कहना मान लिया तो बहुत ही अच्छा हुआ। क्या कह रहे हम यो कह रहे कि इस समय आपकी बहुत आवश्यकता है।

🔴 आप अपने आपको पहचान लीजिये कि सामान्य आदमी नहीं है और असामान्य हैं और आप सामान्य काम के लिये पैदा नहीं हुये हैं असामान्य काम के लिये पैदा हुये हैं। आप नौकरी करने के लिए पैदा नहीं हुये है, आप पढ़ने के लिये पैदा नहीं हुये हैं हमने भी पढ़ा नहीं है हम स्कूल नहीं गये हैं। स्कूल के अलावा हम पढ़े हैं। और नौकरी की है नौकरी भी नहीं की है लेकिन हम नफे में रहे हैं नौकरी करते तो क्या मिल जाता और हम पड़कर के बी.ए हो जाते तो क्या मिल जाता। लेकिन हमने जो किया है जो हमको मिला है वह बहुत फायदे का मिला है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/31.2

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 82)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 13. पवित्र धर्मानुष्ठान का यज्ञीय वातावरण रहे:- मांस, मदिरा, रण्डी भाड़ नचकैये, अश्लील गीत, गन्दे मजाक, आदि के हेय असुर कृत्यों से इस धर्म संस्कार की पवित्रता नष्ट न होने दी जाय।

🔵 विवाह एक श्रेष्ठ यज्ञ है। उसमें देवताओं का आह्वान वेद पाठ एवं दो आत्माओं को जोड़ने वाला महान धर्मानुष्ठान सम्पन्न होता है। ऐसे शुभ समय में उपरोक्त बुराइयों के समावेश का कोई तुक नहीं। जहां इन बातों का रिवाज चल पड़ा है, वहां उसे बन्द किया जाय। गन्दे रिकार्ड भी लाउडस्पीकर में विवाह में न बजें।

🔴 14. विवाह संस्कार प्रभावशाली ढंग से हों:- विवाह मण्डप की बढ़िया सजावट, हवन की सुव्यवस्था दोनों पक्ष के नर-नारियों के बैठने योग्य समुचित स्थान, कोलाहल, धुंआ आदि से बचाव, विद्वान पण्डित जो विवाह विधान को व्याख्यापूर्वक समझा सके—इन सब बातों का प्रबन्ध विशेष ध्यान देकर किया जाय।

🔵 विवाह संस्कार जैसी दो आत्माओं के आत्म समर्पण की धर्म प्रक्रिया का अत्यन्त महत्व है। उसी के उपलक्ष्य में ही इतना सारा आडम्बर रचा जाता है। खेद है कि संस्कार कराने वाले पण्डितों के अनाड़ीपन तथा घर वालों की उपेक्षा के कारण संस्कार की विधि व्यवस्था भार रूप चिह्न पूजा मात्र रह जाती है जिससे हर कोई जल्दी से जल्दी पिंड छुड़ाना चाहता है। आदर्श विवाहों में यह रूप बदला जाना चाहिये, और सुयोग्य पण्डितों के द्वारा शास्त्रोक्त विधि विधान के साथ ऐसे सुन्दर ढंग से विवाह कराने का प्रबन्ध किया जाय जिसे देखने में सबका मन लगे। मन्त्र की व्याख्या भी ऐसे प्रभावशाली ढंग से हो कि वर-वधू ही नहीं उपस्थित समस्त नर-नारी भी अपने विवाहित जीवन का उद्देश्य और कर्तव्य समझ सकें। इसके लिए आवश्यक प्रबन्ध पहले से ही कर रक्खा जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 33)

🌞 दिए गए कार्यक्रमों का प्राण-पण से निर्वाह

🔴 देश के लिए हमने क्या किया कितने कष्ट सहे, सौंपे गए कार्यों को कितनी खूबी से निभाया इसकी चर्चा यहाँ करना सर्वथा अप्रासंगिक होगा। उसे जानने की आवश्यकता प्रतीत होती हो तो परिजन-पाठक उत्तरप्रदेश सरकार के सूचना विभाग द्वारा प्रकाशित ‘‘आगरा सम्भाग के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी’’ पुस्तक पढ़ें। उसमें अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यों के साथ हमारा उल्लेख हुआ है। ‘‘श्रीराम मत्त हमारा उन दिनों का प्रचलित नाम है। यहाँ तो केवल यह ध्यान में रखना है कि हमारे हित में मार्ग दर्शक ने किस हित का ख्याल मन में रखकर यह आदेश दिया।’’

🔵 इन दस वर्षों में जेलों में तथा जेल से बाहर अनेक प्रकृति के लोगों से मिलना हुआ। स्वतंत्रता संग्राम के समय में जन-जागृति चरम सीमा पर थी। शूरवीर, साहस के धनी, संकल्प बल वाले अनेकों ऐसे व्यक्ति सम्पर्क में आए, जिनसे हमने कुछ सीखा। जनसमुदाय को लाभान्वित करने और नैतिक क्रांति जैसे बड़े कार्य के लिए अपना प्रशंसक, समर्थक सहयोगी बनाने हेतु किन रीति-नीतियों को अपनाना चाहिए, यह मात्र दो वर्षों में ही सीखने को मिल गया। इसके लिए वैसी पूरी जिंदगी गुजार देने पर यह सुयोग उपलब्ध नहीं होता।

🔴 विचित्र प्रकार की विचित्र प्रकृतियों का अध्ययन करने का इतना अवसर मिला, जितना देश के अधिकाँश भाग का परिभ्रमण करने पर मिल पाता। हमारे मन में घर-गृहस्थी अपने-पराए का मोह छूट गया और उन विपन्न परिस्थितियों में भी इतनी प्रसन्नतापूर्वक जीवन जिया कि अपने आपे की मजबूती पर विश्वास होता चला गया। सबसे बड़ी बात यह कि हमारा स्वभाव स्वयं सेवक की तरह ढलता चला गया, जो अभी भी हमें इस चरमावस्था में पहुँचने पर भी विनम्र बनाए हुए है। हमारे असमंजस का समाधान उन दिनों गुजरे स्वतंत्रता संग्राम के प्रसंगों से हो गया कि क्यों हमसे अनुष्ठान दो भागों में कराया गया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/diye.3

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 33)

🌞  हिमालय में प्रवेश

पत्तीदार साग
🔴 साग भाजी का इधर शौक ही नहीं है। आलू छोड़कर और कोई सब्जी यहां नहीं मिलती। नीचे के दूर प्रदेशों से आने के और परिवहन के साधन न होने से आलू भी महंगा पड़ता है। चट्टी के दुकानदार एक रुपया सेर देते हैं। यों इधर छोटे-छोटे झरने हैं उनसे जहां-तहां थोड़ी-थोड़ी सिंचाई भी होती है किन्तु वहां भी शाक-भाजी होने का रिवाज नहीं है। रोज आलू खाते-खाते ऊब गया। सब्जी के बारे में वहां निवासियों तथा दुकानदारों से चर्चा की तो उन्होंने बताया कि जंगल में खड़ी हुई तरह-तरह की वनस्पतियों में से तीन पौधे ऐसे होते हैं जिनके पत्तों का साग बनाया जाता है (1) मारचा (2) लिंगड़ा (3) कोला।

🔵 एक पहाड़ी को पारिश्रमिक के पैसे दिये और इनमें से कोई एक प्रकार की पत्तियां लाने को भेजा। पौधे चट्टी के पीछे ही खड़े थे वह बात की बात में मारचा की पत्तियां दो-चार सेर तोड़ लाया। बनाने की तरकीब भी उसी से पूछी और उसी प्रकार उसे तैयार किया। बहुत स्वादिष्ट लगा। दूसरे दिन लिंगड़ा की और तीसरे दिन कोला की पत्तियां इसी प्रकार वहां के निवासियों से मंगवाई और बनाई खाईं। तीनों प्रकार की पत्तियां एक दूसरे से अधिक स्वादिष्ट लगीं। चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। एक महीने हरी सब्जी नहीं मिली थी, इसे खाकर तृप्ति अनुभव की।

🔴 उधर के पहाड़ी निवासी रास्ते में तथा चट्टियों पर मिलते ही थे। उनसे जगह-जगह मैंने चर्चा की कि इतने स्वादिष्ट पत्तीदार साग जब आपके यहां पैदा होते हैं उन्हें काम में नहीं लेते? पत्तीदार साग तो स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बहुत लाभ दायक होते हैं। उनमें से किसी ने न तो मेरी सलाह को स्वीकार किया और न उन सागों को स्वादिष्ट तथा लाभप्रद ही माना। उपेक्षा दिखाकर बात समाप्त करदी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 33) 24 Jan

🌹 जप-यज्ञ के समय के वस्त्र
🔴 ऐसे कपड़े जो शरीर पर चिपके रहते हैं—नित्य नहीं धुलते, उनको धार्मिक क्रिया-कृत्यों में धारण न किया जाय तो ही अच्छा है। मोजे हर हालत में उतार देने चाहिए, उनकी गन्दगी लगभग जूते के ही समतुल्य होती है।

🔵 जिन प्रदेशों में धोती कुर्ते का रिवाज नहीं है, बनाना भी कठिन है, वहां पाजामा के उपयोग की भी छूट मिल सकती है। पर वह भी धुला हुआ तो हो, यह ध्यान रखा जाय। जहां आसानी से धोती-कुर्ते का प्रबन्ध हो सकता है, वहां तो उसके लिए जोर दिया ही जाय। इस सन्दर्भ में आलस्य या उपेक्षा न बरतें। कंधे पर पीला दुपट्टा धर्मानुष्ठानों के लिए शास्त्रोक्त परिधान है। जहां तक सम्भव हो जप, साधना यज्ञ-प्रक्रिया आदि के अवसर पर कंधे पर पीला दुपट्टा रखा जाय। इसमें सांस्कृतिक एकता एवं भावनात्मक समस्वरता का समावेश है।

🔴 इसलिए यथासम्भव सभी धर्मकृत्यों में धोती, कुर्ता, पीला दुपट्टा धारण करने पर जोर दिया जाय। पर इसे इतना कड़ा प्रतिबन्ध माना जाय कि किसी श्रद्धालु को मात्र इसी कारण सम्मिलित होने से रोका जाय। अच्छा यह है कि सामूहिक आयोजनों में कुछ सैट इस प्रकार के रखे जायें जिन्हें वे लोग प्रयोग कर सकें जो इस प्रकार के वस्त्र घर से लेकर नहीं आये हैं। महिलाएं प्रायः साड़ियां ही पहनती हैं। वे धर्मकृत्यों में पीली रंगी रहें। शरीर पर धारण करने के वस्त्र चिपके रहने वाले नहीं ढीले होने चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 27) 24 Jan

🌹 उत्साह एवं सक्रियता चिरयौवन के मूल आधार

🔵 जॉर्ज बर्नार्ड शॉ 93 वर्ष की आयु तक इतना अधिक लिखते थे कि वे स्वयं 40 वर्ष की आयु में भी इतना नहीं लिख पाते थे। दार्शनिक वैनदित्तो क्रोचे 80 वर्ष की अवस्था में भी नियमित रूप से दस घण्टे काम करते थे। 85 वर्ष की आयु में उन्होंने दो महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं जिनकी चर्चा विश्व साहित्य में होती है। बट्रेण्ड रसेल को 78 वर्ष की आयु में उस कृति पर पुरस्कार मिला जो उन्होंने 77 वर्ष की अवस्था में पूरी की थी। माटिस मैटर लिंक का देहान्त 88 वर्ष की आयु में हुआ। जिन दिनों वे मरे, उसके कुछ दिन पूर्व ही उन्होंने अपनी अन्तिम पुस्तक पूरी की थी। इस पुस्तक का नाम था ‘द एवार्ट ऑफ से टू ऑल’ यह पुस्तक उनकी सर्वोत्कृष्ट रचना समझी जाती है।

🔴 ब्रिटेन के सुप्रसिद्ध अखबार ‘डेली एक्सप्रेस’ के संचालक लॉर्ड वीवनवर्क 80 वर्ष की अवस्था में भी दफ्तर में जमकर बैठते और काम करते थे। दार्शनिक काण्ट को 74 वर्ष की अवस्था में उनकी एक रचना के आधार पर दर्शन क्षेत्र में प्रतिष्ठा मिली। 60 वर्ष की आयु के बाद चार वर्षों में उन्होंने ‘एन्थ्रोपोलॉजी’, ‘मेटा फिजिक्स ऑफ ईथिक्स’ और ‘स्ट्राइफ ऑफ फैकल्टीज’ ये तीन पुस्तकें लिखी थीं, जिनने उन्हें दार्शनिक जगत में प्रतिष्ठित किया। टैनीसन ने अपना प्रख्यात ग्रन्थ ‘क्रासिंग द बार’ 83 वर्ष की आयु में पूरा किया। होब्स ने 88 वर्ष की आयु में ‘इलियड’ अनुवाद प्रकाशित कराया था। चित्रकार टीटान ने विश्व प्रसिद्ध कलाकृति ‘वैटल ऑफ लिमाटो’ 98 वर्ष की आयु में पूरी की।

🔵 इंग्लैण्ड का इतिहास जिनने पढ़ा है, वे ग्लैडस्टन के नाम से अवश्य ही परिचित होंगे। ग्लैडस्टन ने 40 वर्ष की आयु में ब्रिटेन की राजनीति में प्रवेश किया और 70 वर्ष की आयु में राज्य का उत्तरदायित्व सम्हाला। ऑक्सफोर्ड यूनवर्सिटी में ‘होमर’ पर उनने जो भाषण दिया वह अत्यन्त शोध पूर्ण माना जाता है। पर जब प्रधानमन्त्री बने तब उनकी आयु 79 वर्ष थी। 85 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘ओडेमी ऑफ हाटस्’ नामक ग्रन्थ की रचना की। वृद्धावस्था में भी वे चैन से नहीं बैठे रहे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 5)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
🔴 आज हम आपको इसी तरह की बात बताने को हैं जो आपको शायद यह मालूम पड़ेगी कि हमको नुकसान की बात बताई जा रही है। लेकिन आप यकीन रखिये कि हम नुकसान की बात नहीं बताई जा रही है। आपको नफे की बात बता रहे हैं आपको नफा ही नफा है नुकसान हो जाये तो हमारी जिम्मेदारी है आप हमारे ऊपर यकीन करते हों तो कर लीजिये कि हमारे फायदे के लिए कहा जा रहा है नुकसान के लिए नहीं कहा जा रहा है। क्या कह रहे हैं हम यूँ कह रहे है कि आपकी लम्बी वाली जिंदगी है ४० की होगी, ५० की होगी १०० की होगी जो भी हो यदि उसमें यदि एक साल आप हमारे लिये निकाल दें तो इसमें नुकसान हुआ न हाँ साहब नुकसान हुआ यदि हम १०० रुपया महीना कमाते तो १२०० रुपये का हमारा नुकसान हो गया।

🔵 और समय चला गया हमारी खेती में नुकसान हो गया हमारी दुकान में नुकसान हो गया हमारा फलाना नुकसान हो गया और आप सलाह लीजिये किसी से अपनी माँ से पूछिए, धर्मपत्नी से पूछिए, भाई से पूछिए, भतीजे से पूछिए, साले से पूछिए, बहनोई से पूछिए सब यह कहेंगे कि यह बेअकली का बात है और बेवकूफी की बात है। इसमें सिवाय नुकसान के क्या फायदा है तुम्हारा। तुम पागल हो गये हो क्या। ऐसे तो सैकड़ों बाबाजी फिरते हैं, सैकड़ों पंडित फिरते हैं। किसी ने लिख दिया, छाप दिया और उन्होंने कहा तुम चल दिये। नुकसान तुम्हारी समझ में नहीं आता। नुकसान की बात है कि फायदे की बताइये मैं आपको फायदे की बता रहा हूँ। क्या फायदे की बात बता रहे हैं। हम यह फायदे की बात बता रहे हैं कि आप सो रहे हैं और आपको नींद आ गई है आप खुमारी में है। यदि आप अपनी सही स्थिति को जान लें तो आपको बड़ा मजा आ जायेगा। आप कौन है जानते हैं। हमारा नाम राम गोपाल है, मोहन लाल है गुलाब चंद है, नहीं आप न राम गोपाल हैं न गुलाब चंद हैं।

🔴  आप वो है कि हमने बड़ी मेहनत से और बड़ी मसक्कत से आपको ढूँढ़कर इकट्ठा किया है जिन लोगों के पास पूर्व जन्मों के संस्कार जमा थे और जो इस योग्य थे उनको हमने बड़ी मुश्किल से ढूँढ़ा और बड़ी मुश्किल से जमा किया है। सारी जिंदगी में हमारी एक ही सफलता है कि हमने संस्कारवान व्यक्तियों को इकट्ठा कर लिया है दूसरे लोग संस्कार वान व्यक्ति इकट्ठे नहीं कर पाये। बहुत सी कमेटियाँ हैं, संस्थायें हैं, अमुक हैं, तमुक हैं व्यक्ति तो किसी और के पास भी होंगे ये तो मैं नहीं कहता कि औरों के पास कोई व्यक्ति नहीं हैं हमारे पास हैं और हमारे पास बहुत सही आदमी हैं और हमने ढूँढ़कर निकाले हैं। मेहनत की है पानी में डुबकी लगाई है और डुबकी लगाकर के मोतियों के तरीके से आपको हमने ढूँढ़कर निकाला है और आप समझते ही नहीं। आप तो अपने को किसान समझते हैं, दुकानदार समझते हैं शिक्षक समझते हैं, विद्यार्थी समझते हैं। नौकर समझते हैं न जाने क्या समझते हैं। हम आपको समझते हैं कि आप बड़े कीमती आदमी हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/31.2

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 81)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 11. विवाह के लिए नियत पर्व:-- सालग सोधने के झंझट में यदि उपयुक्त समय पर विवाह न बनता हो तो शुभ देव-पर्वों पर उन्हें निस्संकोच कर लिया जाये।

🔵 कई बार अभिभावकों की सुविधा के विपरीत पण्डित लोग विवाह न बनने का अड़ंगा लगाकर एक बड़ी कठिनाई उत्पन्न कर देते हैं। यों मासिक होने पर ज्योतिष-शास्त्र के अनुसार सूर्य, गुरु, चन्द्र आदि के देखने की बिलकुल भी जरूरत नहीं है और उसका विवाह किसी भी शुभ दिन किया जा सकता है। फिर भी अनाड़ी पण्डित कुछ न कुछ अड़ंगे खड़े करते रहते हैं। ऐसी उलझनों से बचने के लिए देव पर्वों पर पहले भी बिना पण्डित से पूछे विवाह होते थे। (1) कार्तिक में देवोत्थान, (2) माघ में बसन्त-पंचमी, (3) बैसाख में अक्षय तृतीया, (4) आषाढ़ में शुक्ल-पक्ष की नवमी इन चार अवसरों पर अभी भी विवाह किए जाते हैं। अब इनके अतिरिक्त छह नए और बढ़ा दिए जांय (1) कार्तिकी (कार्तिक सुदी 15) (2) गीता जयन्ती (मार्गशीर्ष सुदी 11) (3) शिवरात्रि (फाल्गुन वदी 13) (4) राम नवमी (चैत्र सुदी 9) (5) हनुमान जयन्ती (चैत्र सुदी 15) (6) गायत्री जयन्ती गंगा दशहरा (ज्येष्ठ सुदी 10)।

🔴 12. विवाह का शुभ समय गोधूलि बेला:-- सायंकाल सूर्य अस्त होते समय विवाह संस्कार के लिए सर्वोत्तम समय माना जाय।

🔵 बहुत रात गए विवाह संस्कार होने में, (1) बारात रात में चढ़ती है और रोशनी सजावट का बेकार खर्च बढ़ता है, (2) भोजन कराने में अनावश्यक विलम्ब होता है, (3) सारी रात बेकार जगते जाती है। (4) संस्कार के धर्मानुष्ठान देखने एवं शिक्षाओं को सुनने कम लोग वहां बैठते हैं अधिकांश तो थके मांदे सो ही जाते हैं। (5) अधिक रात विवाह का यज्ञ करने से उसमें कीड़े-मकोड़े गिरने का डर रहता है। (6) वर कन्या अलसाये व उनींदे रहते हैं। इन सब अड़चनों को हटाने के लिए गोधूलि हर विवाह के लिए उपयुक्त मानी जाय। सूर्य अस्त होने से एक घण्टे पूर्व कार्य आरम्भ करके एक दो घण्टे रात गये तक सब कार्य समाप्त हो सकता है। और उस समय सब लोग उस आनन्द समारोह में उत्साहपूर्वक भाग लेने का लाभ उठा सकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 32)

🌞 दिए गए कार्यक्रमों का प्राण-पण से निर्वाह

🔴 गुरुदेव का आदेश पालन करने के लिए हमने काँग्रेस के सत्याग्रह आंदोलन में भाग तो लिया, पर प्रारंभ में असमंजस ही बना रहा कि जब चौबीस वर्ष का एक संकल्प दिया गया था, तो ५ और १९ वर्ष के दो टुकड़ों में क्यों विभाजित किया। फिर आंदोलन में तो हजारों स्वयं सेवक संलग्न थे, तो एक की कमी बेशी से उसमें क्या बनता-बिगड़ता था?

🔵 हमारे असमंजस को साक्षात्कार के समय ही गुरुदेव ने ताड़ लिया था। जब बारी आई तो उनकी परावाणी से मार्गदर्शन मिला कि ‘‘युग धर्म की अपनी महत्ता है। उसे समय की पुकार समझ कर अन्य आवश्यक कार्यों को भी छोड़कर उसी प्रकार दौड़ पड़ना चाहिए जैसे अग्निकांड होने पर पानी लेकर दौड़ना पड़ता है और अन्य सभी आवश्यक काम छोड़ने पड़ते हैं।’’ आगे संदेश मिला कि ‘‘अगले दिनों तुम्हें जन सम्पर्क के अनेक काम करने हैं, उनके लिए विविध प्रकार के व्यक्तियों से सम्पर्क साधने और निपटने का दूसरा कोई अवसर नहीं आने वाला है। यह उस उद्देश्य की पूर्ति का एक चरण है, जिसमें भविष्य में बहुत सा श्रम व समय लगाना है। आरम्भिक दिनों में, जो पाठ पढ़े थे, पूर्वजन्मों में जिनका अभ्यास किया था, उनके रिहर्सल का अवसर भी मिल जाएगा। यह सभी कार्य निजी लाभ की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण नहीं है। समय की माँग तो इसी से पूरी होती है।’’

🔴 व्यवहारिक जीवन में तुम्हें चार पाठ पढ़ाए जाने हैं। १-समझदारी, २-ईमानदारी, ३-जिम्मेदारी, ४-बहादुरी। इनके सहारे ही व्यक्तित्व में खरापन आता है और प्रतिभा-पराक्रम विकसित होता है। हथियार भोथरे तो नहीं पड़ गए, कहीं पुराने पाठ विस्मृत तो नहीं हो गए, इसकी जाँच पड़ताल नए सिरे से हो जाएगी। इस दृष्टि से एवं भावी क्रिया पद्धति के सूत्रों को समझने के लिए तुम्हारा स्वतंत्रता संग्राम अनुष्ठान भी जरूरी है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/diye.3

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 32)

🌞  हिमालय में प्रवेश

सीधे और टेड़े पेड़

🔵  दिन बीत गये। बेचारी जड़ें सब शाखाओं को खूब विकसित होने के लायक रस कहां से जुटा पातीं। प्रगति रुक गई, टहनियां छोटी और दुबली रह गईं। पेड़ का तना भी कमजोर रहा और ऊंचाई भी न बढ़ सकीं। अनेक भागों में विभक्त होने पर मजबूती तो रहती ही कहां से? बेचारे यह दादरा और पिनखू के पेड़ अपनी डालियां छितराये तो रहे लेकिन समझदार व्यक्तियों में उनका मूल्य कुछ जंचा नहीं। उन्हें कमजोर और बेकार माना गया अनेक दिशाओं में फैल कर जल्दी से किसी न किसी दिशा में सफलता प्राप्त करने की उतावली में अन्ततः कुछ बुद्धिमत्ता साबित न हुई।

🔵  देवदारु का एक निष्ठ पेड़ मन-ही-मन इन टेढ़े तिरछे पेड़ों की चाल चपलता पर मुस्कराता हो तो आश्चर्य ही क्या है? हमारी वह चंचलता जिसके कारण एक लक्ष पर चीड़ की तरह सीधा बढ़ सकना सम्भव न हो सका यदि विज्ञ व्यक्तियों की दृष्टि में हमारे ओछे रह जाने के कारण जंचती हो तो इसमें अनुचित ही क्या है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य