शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८२)

ध्यान की गहराई में छिपा है परम सत्य

योग साधक जैसे-जैसे अन्तर्यात्रा पथ पर आगे बढ़ते हैं, उनकी संवेदनाएँ सूक्ष्म हो जाती है। इस संवेदनात्मक सूक्ष्मता के साथ ही उनमें संवेगात्मक स्थिरता-नीरवता व गहरी शान्ति आती है। और ऐसे में उनके अनुभव भी गहरे, व्यापक व पारदर्शी होते चले जाते हैं। कई बार नए साधक आगे का मार्ग पाने के लिए बेचैन होते हैं। उनमें अध्यात्म की उच्चस्तरीय कक्षा में प्रवेश के लिए त्वरा होती है। यदा-कदा मार्गदर्शक का अभाव उन्हें परेशानी में डालता है। ऐसों के लिए महर्षि पतंजलि के सूत्र एवं परम पूज्य गुरुदेव की अनुभूतियाँ अमृततुल्य औषधि की भाँति है। वह सुझाते हैं, बताते हैं, चेताते हैं कि साधना की अविरामता ही भावी मार्ग की प्राप्ति का कारण है। साधना की अविरामता से उत्तरोत्तर सूक्ष्म होती चेतना स्वतः ही नए मार्ग के द्वार खोलती है। नया पथ प्रशस्त करती है।
    
सच्चाई यह है कि ये अनुभूतियाँ हमारे अन्तःकरण को प्रेरित, प्रकाशित, प्रवर्तित व प्रत्यावर्तित करती हैं। इसमें उच्चस्तरीय आध्यात्मिक चेतना के अवतरण के साथ एक अपूर्व प्रत्यावर्तन घटित होता है। एक गहन रूपान्तरण की प्रक्रिया चलती है। इस प्रक्रिया के साथ ही योग साधक की दिव्य संवेदनाएँ बढ़ती है और उसकी साधना की ज्योति और भी प्रखर होती है।
    
इस अनुभूति कथा के अगले चरण को महर्षि ने अपने अगले सूत्र में प्रकट किया है। यह सूत्र है-
विशोका वा ज्योतिष्मती॥ १/३६॥
शब्दार्थ- वा= इसके सिवा (यदि); विशोका= शोकरहित; ज्योतिष्मती= ज्योतिष्मती प्रवृत्ति (उत्पन्न हो जाय तो वह) भी मन की स्थिति स्थिर करने वाली होती है।
    
अर्थात् अभ्यास के क्रम में उस आन्तरिक प्रकाश का भी ध्यान करो, जो शान्त है और सभी दुःखों से बाहर है।
    
महर्षि अपने इस सूत्र में ध्यान की गहनता की ओर इंगित करते हैं। ध्यान द्वार है—अतीन्द्रिय संवेदना का। जो ध्यान करते हैं, उन्हें काल क्रम में स्वयं ही इस सत्य का अनुभव हो जाता है। यह सच है कि ध्यान में सम्पूर्ण आध्यात्मिक रहस्य समाए हैं। फिर भी इसका अनुभव कम ही लोग कर पाते हैं। और इसका कारण है कि ध्यान के बारे में प्रचलित भ्रान्तियाँ। कतिपय लोग ध्यान को महज एकाग्रता भर समझते हैं। कुछ लोगों के लिए ध्यान केवल मानसिक व्यायाम भर है। ध्यान को एकाग्रता समझने वाले लोग जिस किसी तरह से मानसिक चेतना को एक बिन्दु पर इकट्ठा करने की कोशिश करते हैं हालाँकि उनके इस प्रयास से परामानसिक चेतना के द्वार नहीं खुलते। उन्हें अन्तर्जगत में प्रवेश नहीं मिलता। वे तो बस बाहरी उलझनों में भटकते अथवा मानसिक द्वन्द्वों में अटकते रहते हैं।
    
जबकि ध्यान अन्तर्यात्रा है और यह यात्रा वही साधक कर पाते हैं, जिन्होंने अपनी साधना के पहले चरणों में अपनी मानसिक चेतना को स्थिर, सूक्ष्म व शान्त कर लिया है। अनुभव का सच यही है कि मानसिक चेतना को स्थिरता, सूक्ष्मता व शान्ति ही प्रकारान्तर से परामानसिक चेतना की अनुभूति है। इस अनुभूति में व्यापकता व गुणवत्ता की संवेदना का अतिविस्तार होता है। साथ ही इसे पाने पर अन्तर्चेतना स्वतः ही ऊर्ध्वगमन के लिए प्रेरित होती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १४२
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

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