बुधवार, 30 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ९३)

स्फटिक मणि सा बनाइये मन
    
जिसे महर्षि कहते हैं शुद्ध स्फटिक की भाँति। परम पूज्य गुरुदेव कहते थे, मन-मन में भेद है। मन कोयला भी है और हीरा भी। विचारों के शोरगुल, विचारों के धूल भरे तूफान में इसका शुद्ध स्वरूप प्रकट नहीं होता है। ध्यान की गहनता इसे सम्भव बनाती है। जो ध्यान करते हैं, इसे अनुभव करते हैं। यह अनुभूति उन्हें शान्ति भी देती है और ऊर्जा भी। इसी से ज्ञान की नवीन किरणें भी फूटती और फैलती हैं। यह अवस्था कुछ ऐसी है जैसे कि गंगाजल को जब घर एक बाल्टी में लाते हैं, तो उसमें काफी कुछ कीचड़-गन्दगी होती है, परन्तु उसमें फिटकिरी का ढेला दो-चार बार घुमादें, तो बाद में सारी गन्दगी शान्त और गंगाजल होता है-एकदम निर्मल-स्वच्छ। बस कुछ ऐसे ही मन में ध्यान की फिटकिरी घुमाने की बात है। फिर यह होता है-शुद्ध स्फटिक की भाँति।

यह मन की विशेष अवस्था है, जिसका अहसास केवल उन्हीं को हो सकता है, जिन्होंने इसे जिया हो-अनुभव किया हो। क्योंकि यह मन की वर्तमान अवस्था एवं व्यवस्थता से एकदम उलट है। जहाँ वर्तमान में अज्ञान, अशान्ति एवं असक्ति छायी रहती है, वही इसमें ज्ञान, शान्ति एवं ऊर्जा के नये-नये रूप भासते हैं। जीवन का हरपल-हरक्षण ज्ञानदायी, शान्तिदायी एवं ऊर्जादायी होता है। और यह सब होता है-बिना किसी बाहरी साधन-सुविधाओं की बैशाखी का सहारा लिये। अभी तो स्थिति है कि ज्ञान चाहिए तो पढ़ो, सीखो; शान्ति चाहिए तो शान्त वातावरण तलाशो और शक्ति चाहिए तो शरीर व मन को स्वस्थ रखने की कवायद करो। पर इस अद्भुत अवस्था वाला मन तो जब, जहाँ, जिस वस्तु, विषय अथवा विचार पर एकाग्र होता है, वही वह उससे तदाकार हो जाता है। और फिर विषय, वस्तु या विचार में निहित ज्ञान, शान्ति एवं ऊर्जा स्वयमेव उसके अपने हो जाते हैं।
    
इसमें प्रतिबिम्बित होता है—बोधकर्त्ता, बोध एवं बोध विषय। यानि कि क्षीणवृत्ति वाले मन का साधक जब, जहाँ, जैसे चाहे किसी भी आधार को लेकर समाधिस्थ हो सकता है। इस क्रम में सबसे पहला आधार तो वह स्वयं ही है। वह यदि स्वयं को ही ध्यान का विषय बना ले, तो स्वयं की सभी सूक्ष्मताओं एवं बारीकियों को भली प्रकार अनुभव कर सकता है। वर्तमान आगत एवं विगत सभी उसे स्वयं में भासते हैं। वह अनुभव कर सकता है, वर्तमान के कारणों को और इसके परिणामों को। विचार हों या संस्कार, अपना जन्म-जन्मान्तर का अतीत हो या फिर सुदूर ठिठका हुआ भविष्य सभी उसे स्पष्ट नजर आते हैं।
    
यही नहीं वह जिसे भी अपने ध्यान का विषय बना ले, उसी के सभी रहस्यों को अनुभव कर सकता है। तदाकार होने की यह अवस्था सम्प्रज्ञात समाधि है। इसके अवलम्बन से किसी भी वस्तु, व्यक्ति, विषय, विचार के यथार्थ को जाना जा सकता है। ऐसे व्यक्ति के ध्यान की एकाग्रता में सब कुछ बड़े स्पष्ट रीति से साफ-साफ प्रतिबिम्बित होता है। ऐसा सम्प्रज्ञात समाधि पाने वाला योगी जब जो चाहे देख-जान सकता है। कहते हैं कि ज्योतिष के मर्मज्ञ अतीत को पहचान लेते हैं और भविष्य की आहट को सुन लेते हैं। परन्तु इसके लिए उन्हें अपने  अद्वितीय अनुमानों का सहारा लेना पड़ता है। इस सम्बन्ध में उनकी दृष्टि व अनुभव बहुत ही सीमाओं में बँधे होते हैं।
    
परन्तु वह योग साधक जिसका चित्त स्फटिक की भाँति स्वच्छ है, उसके संकल्प मात्र से, तनिक सा एकाग्र होने पर से उसे सब कुछ अनुभव होने लगता है। परन्तु इसमें अभी तर्क की सीमाएँ बनी रहती हैं। विकल्प की अवस्था बनी रहती है। वह इस अवस्था को पाने के बाद भी भेदों के पार नहीं जा पाता। सीमाबद्ध होता है, उसका ज्ञान। सीमाओं से मुक्त होने के लिए तो समाधि की निर्वितर्क अवस्था चाहिए।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १६३
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 शान्तिकुंज - कायाकल्प के लिए बनी एक अकादमी

मित्रो! सरकारी स्कूलों-कॉलेजों में आपने देखा होगा कि वहाँ  बोर्डिंग फीस अलग देनी पड़ती है। पढ़ाई की फीस अलग देनी पड़ती है, लाइब्रेरी फीस अलग व ट्यूशन फीस अलग। लेकिन हमने यह हिम्मत की है कि कानी कौड़ी की भी फीस किसी के ऊपर लागू नहीं की जाएगी। यही विशेषता नालन्दा-तक्षशिला विश्वविद्यालय में भी थी। वही हमने भी की है, लेकिन बुलाया केवल उन्हीं को है, जो समर्थ हों, शरीर या मन से बूढ़े न हो गए हों, जिनमें क्षमता हो, जो पढ़े-लिखे हों। इस तरह के लोग आयेंगे तो ठीक है, नहीं तो अपनी नानी को, दादी को, मौसी को, पड़ोसन को लेकर के यहाँ कबाड़खाना इकट्ठा कर देंगे तो यह विश्वविद्यालय नहीं रहेगा? फिर तो यह धर्मशाला हो जाएगी साक्षात् नरक हो जाएगा। इसे नरक मत बनाइए आप। जो लायक हों वे यहाँ की ट्रेनिंग प्राप्त करने आएँ और हमारे प्राण, हमारे जीवट से लाभ उठाना चाहें, चाहे हम रहें या न रहें, वे लोग आएँ। 

प्रतिभावानों के लिए निमन्त्रण है, बुड्ढों, अशिक्षितों, उजड्डों के लिए निमन्त्रण नहीं है। आप कबाड़खाने को लेकर आएँगे तो हम आपको दूसरे तरीके से रखेंगे, दूसरे दिन विदा कर देंगे। आप हमारी व्यवस्था बिगाड़ेंगे? हमने न जाने क्या-क्या विचार किया है और आप अपनी सुविधा के लिए धर्मशाला का लाभ उठाना चाहते हैं? नहीं, यह धर्मशाला नहीं है। यह कॉलेज है, विश्वविद्यालय है। कायाकल्प के लिए बनी एक अकादमी है। हमारे सतयुगी सपनों का महल है। आपमें से जिन्हें आदमी बनना हो, इस विद्यालय की संजीवनी विद्या सीखने के लिए आमन्त्रण है। कैसे जीवन को ऊँचा उठाया जाता है, समाज की समस्याओं का कैसे हल किया जाता है? यह आप लोगों को सिखाया जाएगा। दावत है आप सबको। आप सबमें जो विचारशील हों, भावनाशील हों, हमारे इस कार्यक्रम का लाभ उठाएँ। अपने को धन्य बनाएँ और हमको भी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय-नं-६८-पेज-१.४१

सोमवार, 28 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ९२)

स्फटिक मणि सा बनाइये मन

यह तथ्य भली भाँति हृदयंगम कर लेना चाहिये कि असंभव को संभव बनाने वाला अन्तर्यात्रा का विज्ञान उनके लिए ही है, जो अंतर्चेतना के वैज्ञानिक होने के लिए तत्पर हैं। वैज्ञानिक अपनी अनूठी दृष्टि, प्रक्रियाओं एवं प्रयोगों की वजह से विशेष होता है। जिन बातों को, जिन तथ्यों को सामान्य जन यूँ ही कहकर टाल देते हैं, वह अपनी विशेष दृष्टि से उनमें कुछ विशेष की खोज करता है। अपने अनुसंधान के अध्यवसाय से वह इनमें से ऐसे रहस्यों को उजागर करता है, जिनके बारे में कभी जाना, समझा एवं कहा-सोचा नहीं गया था। इन अर्थों में वह साधक होता है, सामान्य और औसत मनुष्यों से अलग। दूसरे अर्थों में योग साधक भी रहस्यवेत्ता वैज्ञानिक होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि सामान्य पदार्थ वैज्ञानिक बाह्य प्रकृति एवं पदार्थों को लेकर अनुसंधान करते हैं, जबकि योग साधक आंतरिक प्रकृति एवं चेतना को लेकर अनुसंधान करते हैं। जिस जीवन को साधारण लोग दुःखों का पिटारा या फिर सुख-भोग का साधन समझते हैं, उसमें से वह अलौकिक आध्यात्मिक विभूतियों के मणि-मुक्तकों का अनुसंधान कर लेता है। 
     
ध्यान की परम प्रगाढ़ता संस्कारों की काई-कीचड़ को धो डालती है। हालाँकि यह सब होता मुश्किल है, क्योंकि एक-एक संस्कार को मिटने-हरने में भारी श्रम, समय एवं साधना की जरूरत पड़ती है। इन तक पहुँचने से पहले मन की उर्मियों को शान्त करना पड़ता है। मन की लहरें जब थमती हैं, मन की शक्तियाँ जब क्षीण होती हैं, तभी साधना गहरी व गहन होती है। इसी सत्य को महर्षि ने अपने इस सत्य में स्पष्ट किया है-
    
क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिः॥ १/४१॥
    
शब्दार्थ-क्षीणवृत्तेः = जिसकी समस्त बाह्य वृत्तियाँ क्षीण हो चुकी हैं, ऐसे; मणेः इव अभिजातस्य = स्फटिक मणि की भाँति निर्मल चित्त का; ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु = ग्रहीता (पुरुष), ग्रहण (अंतःकरण और इन्द्रियाँ) तथा ग्राह्य (पञ्चभूत एवं विषयों) में; तत्स्थतदञ्जनता = स्थित हो जाना और तदाकार हो जाना ही; समापत्तिः = सम्प्रज्ञात समाधि है।

अर्थात् जब मन की वृत्तियाँ क्षीण होती हैं, तब मन हो जाता है शुद्ध स्फटिक की भाँति। फिर वह समान रूप से प्रतिबिम्बित करता है—बोधकर्त्ता को, बोध को और बोध के विषय को।
    
महर्षि पतंजलि का यह सूत्र अपने में अनेकों रहस्य समेटे है। इसका प्रत्येक चरण मूल्यवान् है, इसे सही रीति से समझने के लिए जरूरी है इसके प्रत्येक चरण में अपना ध्यान केन्द्रित करना। इस क्रम में सबसे पहली बात है, मन की वृत्तियों का क्षीण होना। सच तो यह है कि मन का अपना कोई विशेष अस्तित्व नहीं। यह तो बस विचारों-भावों की लहरों का प्रवाह है। इन लहरों की गति एवं तीव्रता कुछ ऐसी है कि मन का अस्तित्व भासता है। सारी उम्र ये लहरें न तो थमती है और न मिटती है। यदि कोई तरीका ऐसा हो कि ये लहरें शान्त हो जाएँ? आम जन के लिए तो ऐसा कठिन है। पर ध्यान इन कठिन को सम्भव बनाता है। ध्यान ज्यों-ज्यों गहरा होता है, मन की लहरें शान्त पड़ती जाती हैं और इस शान्ति के साथ प्रकट होती है-एक अद्भुत स्वच्छता।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १६२
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 सच्चिदानन्द

भगवान् के यों अगणित नाम हैं उनमें से एक नाम है-सच्चिदानंद। सत् का अर्थ है-टिकाऊ अर्थात् न बदलने वाला-न समाप्त होने वाला। इस कसौटी पर केवल परब्रह्म ही खरा उतरता है। उसका नियम, अनुशासन, विधान एवं प्रयास सुस्थिर है। सृष्टि के मूल में वही है। परिवर्तनों का सूत्र-संचालक भी वही है। इसलिए परब्रह्म को सत् कहा गया है।
    
चित् का अर्थ है-चेतना, विचारणा। जानकारी, मान्यता, भावना आदि इसी के अनेकानेक स्वरूप हैं। मानवी अंतःकरण में उसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के रूप में देखा जाता है। बुद्धिमान् और मूर्ख सभी में अपने विभिन्न स्तरों के अनुरूप वह विद्यमान रहती है।
    
प्राणियों की चेतना बृहत्तर चेतना का एक अंग-अवयव मात्र है। इस ब्रह्माण्ड में अनंत चेतना का भण्डार भरा पड़ा है। उसी के द्वारा पदार्थों को व्यवस्था का एवं प्राणियों को चेतना का अनुदान मिलता है। परम चेतना को ही परब्रह्म कहते हैं। अपनी योजना के अनुरूप वह सभी को दौड़ने एवं सोचने की क्षमता प्रदान करती है। इसलिए उसे ‘चित्’ अर्थात् चेतन कहते हैं।
    
इस संसार का सबसे बड़ा आकर्षण ‘आनंद’ है। आनंद जिसमें जिसे प्रतीत होता है वह उसी ओर दौड़ता है। शरीरगत इन्द्रियाँ अपने-अपने लालच दिखाकर मनुष्य को सोचने और करने की प्रेरणा देती हैं। सुविधा-साधन शरीर को सुख प्रदान करते हैं। मानसिक ललक-लिप्सा, तृष्णा और अहंता की पूर्ति के लिए ललचाती रहती हैं। अंतःकरण की उत्कृष्टता वाला पक्ष आत्मा कहलाता है। उसे स्वर्ग, मुक्ति, ईश्वर प्राप्ति, समाधि जैसे आनंदों की अपेक्षा रहती है।
    
वस्तुतः आनंद प्रकारान्तर से प्रेम का दूसरा नाम है। जिस भी वस्तु, व्यक्ति एवं प्रकृति से प्रेम हो जाता है, वही प्रिय लगने लगती है। प्रेम घटते ही उपेक्षा चल पड़ती है और यदि उसका प्रतिपक्ष-द्वेष उभर पड़े, तो फिर वस्तु या व्यक्ति के रूपवान्, गुणवान् होने पर भी वे बुरे लगने लगते हैं। उनसे दूर हटने या हटा देने की इच्छा होती है।
    
अँधेरे में  जितने स्थान पर टॉर्च की रोशनी पड़ती है, उतना ही प्रकाशवान् होता है। वहाँ का दृश्य परिलक्षित होने लगता है। प्रेम को ऐसा ही टॉर्च-प्रकाश कहना चाहिए, जिसे जहाँ भी फें का जाएगा, वहीं सुंदर, प्रिय एवं सुखद लगने लगेगा। वैसे इस संसार में कोई भी पदार्थ या प्राणी अपने मूल रूप में प्रिय या अप्रिय है नहीं। हमारा दृष्टिकोण, मूल्यांकन एवं रुझान ही आनंददायक अथवा अप्रिय, कुरूप बनाता चलता है और दृष्टिकोण के अनुसार ही अनुभूति होते चली जाती है। 
    
आनंद ईश्वर की विभूति है। प्रेम को परमेश्वर कहा गया है। प्रिय ही सुख है अर्थात् ईश्वर ही आनंद है। उसी के आरोपण से हम सुखानुभूति करते और प्रसन्न होते हैं। 
    
आत्मा परमात्मा का ही एक सूक्ष्म अंश माना गया है। यह आत्मा उसी सच्चिदानंद को निरंतर खोजती रहती है, परन्तु माया के अवरोध के कारण उसको प्राप्त नहीं कर पाती है। जब माया का आवरण हट जाता है, तो सच्चिदानन्द के स्वरूप का बोध हो जाता है और वह उसी में निमग्न हो जाती है। 
    
आत्मा को सच्चिदानन्द स्वरूप को प्राप्त करने की अभिलाषा शाश्वत है। उसे प्रेम या भक्तियोग से ही प्राप्त किया जा सकता है। यह लौकिक प्रेम की श्रेणी का नहीं, अपितु अध्यात्म श्रेणी का है, जिसके द्वारा सच्चिदानन्द की प्राप्ति होती है। यह स्पष्ट जानना चाहिए कि परमात्मा के अनेकानेक नाम है। उनमें से सच्चिदानन्द नाम भी सार्थक है।  

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 उपासना और साधना का समन्वय

साधना का दूसरा-पक्ष उत्तरार्ध, उपासना है। विविधविध शारीरिक और मानसिक क्रियाकृत्य इसी प्रयोजन के लिए पूरे किए जाते हैं। शरीर से व्रत, मौन, अस्वाद, ब्रह्मचर्य, तीर्थयात्रा, परिक्रमा, आसन, प्राणायाम, जप, कीर्तन, पाठ, बन्ध, मुद्राएं, नेति, धौति, बस्ति, नौलि, बज्रोली, कपालभाति जैसे क्रियाकृत्य किए जाते हैं। मानसिक साधनाओं में प्राय: सभी चिन्तन परक होती हैं और उनमें कितने ही स्तर के ध्यान करने पड़ते हैं। नादयोग, बिंदुयोग, लययोग, ऋजुयोग, प्राणयोग, हंसयोग, षटचक्र वेधन, कुंडलिनी जागरण जैसे बिना किसी श्रम या उपकरण के किए जाने वाले, मात्र मनोयोग के सहारे संपन्न किए जाने वाले सभी कृत्य ध्यान योग की श्रेणी में गिने जाते हैं। स्थूल शरीर से श्रमपरक, सूक्ष्म शरीर से चिन्तनपरक उपासनाएं की जाती हैं। कारणशरीर तक केवल भावना की पहुँच है। निष्ठा, आस्था, श्रद्धा का भाव भरा समन्वय 'भक्ति' कहलाता है। प्रेम-संवेदना इसी को कहते हैं। यह स्थिति तर्क से ऊपर है। मन और बुद्धि का इसमें अधिक उपयोग नहीं हो सकता है। भावनाओं की उमंग भरी लहरें ही अन्त:करण के मर्मस्थल का स्पर्श कर पाती हैं।

मनुष्य के अस्तित्व को तीन हिस्सों में बाँटा गया है – सूक्ष्म, स्थूल और कारण। यह तीन शरीर माने गए हैं। दृश्य सत्ता के रूप में हाड़-मांस का बना सबको दिखाई पड़ने वाला चलता-फिरता, खात-सोता, स्थूल शरीर है। क्रिया शीलता इसका प्रधान गुण है। इसके नीचे वह सत्ता है, जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं। इसका कार्य समझ और केन्द्र मस्तिष्क है। शरीर विज्ञान में अनाटांमी, फ़िज़ियालोजी दो विभाजन हैं। मन:शास्त्र को साइकोलाजी और पैरा-साइकोलाजी इन दो भागों में बाँटा गया है। मन के भी दो भाग हैं – एक सचेतन, जो सोचने विचारने के काम आता है और दूसरा अचेतन, जो स्वभाव एवं आदतों का केन्द्र है। रक्त संचार, स्वांस-प्रस्वांस, आकुंचन-प्रकुंचन, निमेष-उन्मेष जैसी स्वसंचालित रहने वाली क्रियाएं इस अचेतन मन की प्रेरणा से ही संभव होती हैं। तीसरा कारण शरीर- भावनाओं का,  मान्यताओं एवं आकांक्षाओं का केन्द्र है, इसे अन्त:करण कहते हैं। इन्हीं में 'स्व' बनता है। 

जीवात्मा की मूल सत्ता का सीधा सम्बंध इसी  'स्व' से है। यह  'स्व'  जिस स्तर का होता है, उसी के अनुसार विचारतंत्र और क्रियातंत्र काम करने लगते हैं। जीवन की सूत्र संचालक सत्ता यही है। कारण शरीर का स्थान हृदय माना गया है। रक्त फेंकने वाली और धड़कते रहने वाली थैली से यह केन्द्र भिन्न है। इसका स्थान दोनों ओर की पसलियों के मिलने वाले आमाशय के ऊपर वाले स्थान को माना गया है। साधना विज्ञान में हृदय गुफा में अंगुष्ठ प्रमाण प्रकाश ज्योति का ध्यान करने का विधान है। यहाँ जीवात्मा की ज्योति और उसका निवास 'अहम्'  मान्यता के भाव केन्द्र में माना गया है। शरीर में  इसका केन्द्र जिस  हृदय में है,  उसे अन्त:करण नाम दिया गया है। 'कारणशरीर' के रूप में इसी की व्यवस्था की जाती है। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ९१)

अतिचेतन तक को वश में कर लेता है ध्यान

इसके बाद अगली स्थिति मन की है। मन की गंगा में विचार व भावनाओं का जल बहता है। इसे प्रदूषण मुक्त करना एवं इस प्रवाह को नियंत्रित करना, इसे ऊर्जा केन्द्र के रूप में परिवर्तित करना ध्यानयोग के साधक की अगली चुनौती है। जिस तरह से नदी के जल पर बाँध बनाकर उस जल के वेग को शक्ति में परिवर्तित किया जाता है। कुछ इसी तरह की चुनौती ध्यान के साधक की भी होती है। यदि जलधारा के वेग को नियंत्रित न किया जा सका, तो इससे टरबाइन चलाना सम्भव नहीं होगा और फिर विद्युत् उत्पादन न हो सकेगा। ध्यान के साधक को भी अपने विचार व भाव प्रवाह को ध्येय की लय में बाँधना पड़ता है।
    
निरन्तर प्रयास से ऐसा हो पाता है। पवित्र ध्येय के साथ जब मन लय पूर्ण होता है, तो न केवल विचार एवं भावनाएँ शुद्ध होती हैं, बल्कि उनमें ऊर्जस्विता आती है और ये सचमुच ही लेजर किरणों के पुञ्ज में बदल जाती है। अभी की स्थिति में तो हमारी ऊर्जा टिमटिमाहट की भाँति है, इससे कोई विशेष कार्य नहीं सध सकता। ध्यान की प्रक्रिया में आध्यात्मिक शल्य चिकित्सा के लिए मन की तरंगों का लेजर किरणों के पुञ्ज में परिवर्तित होना अनिवार्य है। यही वह उपकरण है, जिसके प्रकाश में अचेतन की गहराइयों में उतरना सम्भव हो जाता है। इसी के द्वारा अचेतन के संस्कारों की शल्य क्रिया बन पड़ती है। यह प्रक्रिया जटिल है, कठिन है, दुरूह है, दुष्कर है। यह श्रम साध्य भी है और समय साध्य भी।
    
चेतन मन की तरंगों से जो लेजर किरणों का पुञ्ज तैयार होता है, उसी से अचेतन के संस्कारों को देखना एवं इन्हें हटाना बन पड़ता है। ये संस्कार परत दर परत होते हैं। इनकी परतों में भारी विविधताएँ होती हैं, जो कालक्रम से प्रकट होती हैं। यह विविधता परस्पर विरोधाभासी भी हो सकती है। उदाहरण के लिए एक परत में साधना के संस्कार हो सकते हैं, तो दूसरी में  वासना के। एक परत में साधुता के संस्कार हो सकते हैं, तो दूसरी में शैतानियत के। इस सत्य को ठीक तरह से जानने के लिए ध्यान के गहरे अनुभव से गुजरना निहायत जरूरी है।
    
सामान्य जीवन के उदाहरण से समझना हो, तो यही कहेंगे कि जिस तरह बीज में वृक्ष का समूचा अस्तित्व छिपा होता है, उसी तरह से अचेतन की परतों में मनुष्य का सम्पूर्ण व्यक्तित्व समाया होता है। बीज से पहले कोपलें एवं जड़ें निकलती हैं, उसकी कोमलता को देख औसत व्यक्ति यह नहीं सोच सकता कि इस वट बीज में कितना वृहत् आकार छुपा है, परन्तु कालक्रम में धीरे-धीरे सब प्रकट होता है। जेनेटिक्स को जानने वाला कुशल वैज्ञानिक अपने कतिपय प्रक्रियाओं से उसमें कुछ परिवर्तन भी कर सकता है। ठीक यही बात ध्यान के बारे में है-इस प्रयोग में ध्यान विज्ञानी अचेतन के संस्कारों का आवश्यक परिष्कार, परिमार्जन यहाँ तक कि रूपान्तरण  तक करने में समर्थ होते हैं।
    
इतना ही अचेतन के अँधेरों से निकल अतिचेतन के प्रकाशमय लोक में प्रवेश करते हैं। और तब आती है वह स्थिति, जिसके लिए महर्षि पतंजलि कहते हैं कि योगी हो जाता है मालिक, अतिसूक्ष्म परमाणु से लेकर अपरिसोम तक का। क्योंकि अतिचेतन के पास सारी शक्ति होती है। वह होता है सर्वशक्तिमान, वह होता है सर्वत्र, वह होता है सर्वव्यापी। अतिचेतन के पास वह हर एक शक्ति होती है, जो सम्भव होती है। यह वह स्तर है, जहाँ सारे असम्भव सम्भव बनते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १५९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 23 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ९०)

अतिचेतन तक को वश में कर लेता है ध्यान

अंतर्यात्रा के पथ पर श्रद्घा एवं सम्पूर्ण सामर्थ्य से चल रहे साधक के व्यक्तित्व से कभी ज्ञान के आश्चर्य पल्लवित होते हैं, तो कभी उसमें अचरज में डालनी शक्ति सामर्थ्य नजर आती है। जिसे कभी सुना नहीं गया, जिसके बारे में कभी सोचा नहीं गया, ऐसे कितने ही अचरज साधक के सामने आ खड़े होते हैं। इसी के साथ आती है-अलौकिक शक्तियाँ, जिनमें अपार, अद्भुत एवं आश्चर्यपूर्ण सामर्थ्य होती है। अंतर्यात्रा के इस दौर में जो कुछ भी घटित होता है, उसे अनुभव तो किया जा सकता है, पर बताया नहीं जा सकता। यदि उसे बताया भी जाय, तो सुनने वालों को यह सब नानी की कहानी की भाँति लगेगा। तार्किक लोग इसे अविश्वसनीय कहेंगे। और बुद्धिमान लोगों के लिए यह गल्प कथा होगा।
    
पर महर्षि पतंजलि कहते हैं कि यह उनके लिए सत्य है, जो ध्यान करते हैं, जिनके पास ध्यान की पारसमणि है, उनसे स्वर्ण राशि दूर नहीं, क्योंकि इस लोहे से जीवन की कुरूपता ही सुवर्ण में बदल जाने वाली है। 
    
महर्षि अपने अगले सूत्र में ध्यान के प्रभाव को बताते हुए कहते हैं-
परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः॥ १/४०॥
    
शब्दार्थ-(उस समय) अस्य=इसका (योग साधक का); परमाणुपरममहत्त्वान्तः = परमाणु से लेकर परम महत्त्व तक; वशीकारः = वशीकार (हो जाता है)।
    
अर्थात्  इस प्रकार योगी अति सूक्ष्म परमाणु से लेकर अपरिसोम तक सभी का वशीकार कर लेता है अर्थात वश में कर लेता है।
    
इस सूत्र में आश्चर्य तो है, पर ऐसा जो अनिवार्यतः घटित होता है-योग साधक की ध्यान-साधना में। इस सूत्र में निहित भाव इतना ही है कि ध्यान द्वार है अपरिसोम का, अतिचेतन का। जो इस द्वार को खोलना जानता है, उसके जीवन में सभी असम्भव सम्भव होते हैं। लेकिन यह सब होता तभी है, जबकि साधक को ध्यान की तकनीक में विशेषज्ञता हासिल हो। सामान्यतया देखा यही जाता है कि ध्यान के गहरे विज्ञान से लोगों का परिचय नहीं है। साधारण जनों की बात तो जाने दें, अपने को ध्यानयोगी महात्मा बताने वाले भी ध्यान की यथार्थता व सार्थकता से अपरिचित नजर आते हैं। ध्यान के नाम पर जो होता या किया जाता है, वह प्रायः नींद लाने वाली गोली से अधिक कुछ नहीं होता। ये पंक्तियाँ किसी को बुरी जरूर लग सकती है, पर सत्य को तो सुना व स्वीकारा जाना ही चाहिए।

जिन्हें ध्यान की गहरी अनुभूति है, वे इस सत्य से अवश्य सहमत होंगे कि ध्यान एक गहन आध्यात्मिक शल्य क्रिया है। इसे बड़ी बारीकी एवं समझदारी से करना पड़ता है। यह समूची प्रक्रिया तीन चरणों में सम्पन्न होती है। युग ऋषि परम पूज्य गुरुदेव के अनुसार ध्यान करने से पहले व्यक्ति को ध्यान के लायक होना पड़ता है। ध्यान की यह सुपात्रता ही ध्यान की प्रक्रिया का पहला चरण है- जिसमें शरीर व मन को ध्यान के अनुरूप बनाना पड़ता है। शरीर स्वस्थ, हल्का-फुल्का व निरोग रहे, इसके लिए आवश्यक है-खान-पान का संयम। ध्यानयोगी का भोजन औषधि की भाँति होना चाहिए। जो शरीर को स्वस्थ रखने में तो सहायक हो, परन्तु शरीर को ऐसा न बनाये, जिससे मानसिक चेतना देह पर ही टिकी रहे। शरीर की स्थिति ऐसी हो, जो मन को ऊर्ध्वगामी बनाने में सहायक हो।
    
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १५८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

👉 आप समर्पित हो जाइए

मित्रो ! मनुष्य की सामान्य शक्ति सीमित है। प्रत्येक प्राणी को भगवान ने उतना ही सामान दिया है कि वह अपने जीवन का गुजारा कर ले। कीड़े-मकोड़ों को, पशुओं को, पक्षियों को इतना ही ज्ञान, साधन, शक्ति और इन्द्रियाँ मिली हैं, ताकि वह अपना पेट भर ले और वंशवृद्धि की इच्छा पूरी करने के लिए औलाद पैदा करता रहे। लेकिन अगर आपको कुछ इससे ज्यादा जानना हो या प्राप्त करना हो, तब आपको वहाँ जाना पड़ेगा, जहाँ शक्तियों के भण्डार भरे पड़े हैं। एक जगह ऐसी है, जहाँ बहुत शक्तियाँ भरी पड़ी हैं। जहाँ सम्पत्ति का कोई ठिकाना नहीं। जहाँ समृद्धि भरी पड़ी है। सारे विश्व का मालिक भगवान है, यह सब उसी का तो सामान है। 

एक सर्वशक्तिमान सत्ता है भगवान। उसके साथ अगर आप नाता जोड़ लें, तो आपकी मालदारी का कोई ठिकाना नहीं रहेगा। आप इतने सम्पन्न हो जाएँगे कि मैं कह नहीं सकता आपसे। आप बापा जलाराम के तरीके से सम्पन्न भी हो सकते हैं, आप सुदामा के तरीके से मालदार भी हो सकते हैं, विभीषण के तरीके से धनवान भी हो सकते हैं, सुग्रीव के तरीके से मुसीबतों से बचकर खोया हुआ राजपाट पा सकते हैं, आपके यहाँ नरसी मेहता के तरीके से हुण्डी भी बरस सकती है। उसके यहाँ कोई कमी नहीं है। यहाँ जो आपको बुलाया गया है, उसका एक कारण यह भी है कि आपसे कहा जाए कि आप भगवान के साथ में अपना रिश्ता जोड़ लीजिए। आप पूजा करते हैं, उपासना करते हैं, भजन करते हैं। उसका मतलब यह है कि आप इन उपायों के द्वारा अपना रिश्ता भगवान के साथ में जोड़ लें और भगवान के साथ रिश्ता जुड़ गया, तो मजा आ जाएगा। ...

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 21 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८९)

अभिरुचि के ही अनुरूप हो ध्यान 
    
महर्षि पतंजलि का यह सूत्र पहले के सभी सूत्रों से कहीं अधिक गहन एवं व्यापक है। साथ ही इस सूत्र में उनकी वैज्ञानिकता के गहरे रहस्य भी निहित हैं। ध्यान के प्रयोग के लिए विषय वस्तु के चुनाव में अभिमत का, आकर्षण का, गहन रुचि का भारी महत्त्व है। किसी के व्यक्तित्व पर ध्येय को आरोपित नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा हुआ अथवा किया गया, तो ध्यान बोझ बन जाएगा। ध्यान के क्षण विश्रान्ति न बनकर व्यायाम बन जाएँगे। दुर्भाग्यवश होता ऐसा ही है। अपनी मान्यताओं, आग्रहों, प्रतीकों को सभी के ध्यान का विषय बनाने के लिए भारी प्रयत्न किए जाते हैं। यही वजह है कि ध्यान के ज्यादातर प्रयोग अपने सार्थक परिणाम नहीं प्रस्तुत कर पाते।
    
ध्यान अपने यथार्थ में सम्प्रदाय, मजहब, देश, काल की सीमाओं में बँधा हुआ नहीं है। इसकी असीमता व्यापक है, इसके उद्देश्य उच्चतम है। यह तो व्यक्तित्व को रूपान्तरित करने वाली औषधि है। इस अर्थ में ध्यान की प्रक्रिया एवं विषय वस्तु का चुनाव प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसी तरह से किया जाना चाहिए, जिस तरह से कोई चिकित्सक अपने मरीज के लिए औषधि चुनता है। समाधान के पहले निदान की प्रक्रिया अनिवार्य है। और निदान तभी सम्भव है, जब व्यक्तित्व की सभी विशेषताओं एवं उसके गुण-दोषों की सम्यक् जानकारी ली गयी हो।
    
ध्यान की प्रक्रिया का सच यह है कि ध्यान की विषय वस्तु के प्रति साधक के मन में गहरी आस्था हो। उसके भाव एवं विचार सहज ही उस ओर बहने लगे। ध्यान की विषय वस्तु के चिन्तन एवं स्फुरण मात्र से उसके अन्तस् में उल्लास एवं श्रद्धा तरंगित हो। अपने आप ही उसका विचार प्रवाह ध्यान की विषय वस्तु में विलीन होने के लिए आतुर हो उठे। और ऐसा तभी हो सकता है, जब ध्यान की विषय वस्तु व्यक्ति के अन्तस् की विशेषताओं के अनुरूप हो। उदारण के लिए एक प्रकृति प्रेमी व्यक्ति के लिए प्राकृतिक सौन्दर्य ध्यान की विषय वस्तु बन सकता है। जबकि एक विचारवान् व्यक्ति  किसी दार्शनिक विचार पर ध्यान करना अधिक पसन्द करेगा।
    
नीलगगन में आते हुए सूरज का ध्यान किसी एक के लिए सहज है। जबकि दूसरे की श्रद्धा गोपाल कृष्ण में टिकती है। किसी को भगवान् बुद्ध की ध्यानस्थ मूर्ति संवेदित करती है, तो कोई महापराक्रमी हनुमान् को अपने ध्यान का केन्द्र बनाना चाहता है। इन सबसे अलग किसी की आस्था साकार सीमाओं से अलग व्यापक विराट् निराकार में टिकती है। असीमता का भाव उसमें संवेदनों की सृष्टि करता है। किसी का मन उपनिषदों के  तत्त्वमसि आदि महावाक्यों के चिन्तन में रमता है। यदि प्रश्न यह उठे कि इसमें से श्रेष्ठ क्या है? तो उत्तर यह होगा कि व्यक्तित्व की विशेषताओं के अनुरूप वह सभी ध्यान श्रेष्ठ है।
    
इस सम्बन्ध में एक सत्य और है कि ध्यान की विषय वस्तु का चयन उचित है या नहीं? इसका मापन इस बात से भी होता है कि ध्यान करने वाले की चेतना निरन्तर परिमार्जित, पवित्र एवं रूपान्तरित हो रही  है या नहीं। पवित्रता एवं रूपान्तरण को ध्यान के प्रभाव की अनिवार्य शर्त एवं परिणति के रूप में परखा जाना चाहिए। ऐसा होने पर ही साधक की ध्यान साधना की सफलता खरी साबित होती है। फिर स्वाभाविक ही उसके जीवन में योग विभूतियाँ अंकुरित-पल्लवित होने लगती हैं। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १५५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शनिवार, 19 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८८)

अभिरुचि के ही अनुरूप हो ध्यान 

समाधि की मंजिल तक पहुँचाने वाले अन्तर्यात्रा के इस मार्ग में  योग साधक में अनेकों भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन होते हैं। भौतिक एवं रसायन की यह शब्दावली भले ही किसी को अचरज में डाल दे, फिर भी सच को तो कहा ही जाना चाहिए। जो अन्तर्यात्रा में गतिशील हैं, इसके वैज्ञानिक प्रयोगों में स्वयं को खपा रहे हैं, वे इस यथार्थ से सहमत होंगे। हाँ,  जिनके लिए ये प्रायोगिक सत्य केवल तर्क का विषय हैं, उन्हें अवश्य हमें अपने सन्दर्भ से अलग मानना पड़ेगा। अन्तर्यात्रा में योग साधक की गति ज्यों-ज्यों तीव्र होती है, त्यों-त्यों उसकी भावनाओं एवं विचारों में गहरे परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों का स्वरूप कुछ इस तरह से बनता, बदलता है कि उसे रूपान्तरण की संज्ञा दी जा सकती है। इन परिवर्तनों के कारण जीवन की रासायनिक क्रिया भी परिवर्तित होती है। और परिवर्तित होता है—व्यक्ति का भौतिक शरीर एवं उसका व्यवहार। जिसे देखा और अनुभव किया जा सकता है।

इस समूचे परिवर्तन की प्रक्रिया का यदि आधार ढूँढें, तो वह एक ही है, पवित्रता के साथ जुड़ी सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया। व्यवहार हो या विचार अथवा फिर अन्तस् की भावनाएँ। योग साधना के साथ ही इनमें पवित्रता की प्रक्रिया घटित होने लगती है। इनसे कषाय-कल्मष एवं कुसंस्कारों का बोझ घटने लगता है। साथ ही बढ़ने एवं विकसित होने लगते हैं- इनके सूक्ष्म प्रभाव। जिसकी आभा अनेकों को अपने घेरे में लेती है। जिसके स्पर्श मात्र से औरों में रूपान्तरण के रासायनिक प्रयोग होने लगते हैं। और अन्ततोगत्वा इसकी परिणति जीवन के भौतिक व्यवहारों तक आए बिना नहीं रहती।

अन्तर्यात्रा विज्ञान के ये सारे प्रयोग एवं उसकी सूक्ष्मताएँ ध्यान की प्रयोगशाला में घटित होती है। इसी वजह से महर्षि पतंजलि ने ध्यान को सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माना है। उन्होंने अपनी कई सूत्रों में इस तकनीक की बारीकियों को उजागर किया है।  महर्षि पतंजलि- मानव चेतना के महान् वैज्ञानिक हैं। इसी तरह से परम पूज्य गुरुदेव भी अध्यात्म विज्ञान के महान् प्रयोगकर्त्ता रहे हैं। इस सत्य के अनुरूप ही महर्षि ने अपने अगले सूत्र में ध्यान की विषय वस्तु के दायरे को और अधिक व्यापक किया है। उनका कहना है कि ध्यान की विषय वस्तु को सीमित नहीं किया, इसको काल, स्थान, परिवेश एवं अभिरुचि के अनुसार परिवर्तित भी किया जा सकता है। और इसी परिवर्तन से ध्यान की समूची प्रक्रिया के प्रभावों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

महर्षि का अगला सूत्र इसी सत्य को उजागर करता है। उनका यह सूत्र है- यथाभिमतध्यानाद्वा॥ १/३९॥
शब्दार्थ-यथाभिमतध्यानात् = जिसको जो अभिमत हो, उसके ध्यान से, वा = भी (मन स्थिर हो जाता है)।
अर्थात् ध्यान करो किसी उस चीज पर भी, जिसमें तुम्हारी गहरी रुचि हो।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १५४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 आप समर्पित हो जाइए

मित्रो! एक बार लैला ने मजनूँ की परीक्षा लेनी चाही और जानना चाहा कि मजनूँ कैसा है? पहले तो उसने ऐसा इंतजाम कर दिया कि उसको कुछ पैसे मिल जाया करें, दुकानदारों से खाने को मिल जाया करे। फिर उसने सोचा, ऐसा तो नहीं कि वह हरामखोर हो और फोकट का खा रहा हो। उसने अपनी बाँदी से यह कहला भेजा कि लैला बहुत बीमार है। सुनकर मजनूँ बड़ा दुःखी हुआ। बाँदी ने कहा-दुःखी होने से क्या फायदा? आप कुछ मदद कीजिए न उनकी। उसने कहा-लैला को हम बहुत प्यार करते हैं। प्यार करते हो तो कुछ दीजिए न। मजनूँ ने कहा-मैं क्या दूँ? बाँदी ने कहा-डॉक्टरों ने यह कहा है कि लैला की नसों में खून का एक प्याला चढ़ाया जाएगा, आप अपना खून देंगे क्या, जिससे कि लैला की जिन्दगी बचायी जा सके। मजनूँ फौरन तैयार हो गया। उसने जो कटोरा बाँदी लेकर आयी थी, खून से लबालब भर दिया। बाँदी जब खून लेकर चली, तब उसने बाँदी से एक और बात कही-बाँदी जल्दी आना, अभी कई कटोरे खून मेरे शरीर में है। वह मैं उसके सुपुर्द करूँगा, क्योंकि उससे मैं मुहब्बत करता हूँ और मुहब्बत का मतलब होता है-देना। बाँदी जब एक कटोरा खून लेकर के गयी, तो नकली मजनूँ जो थे, सब भगा दिए गये। लैला ने अपने बाप से कह दिया-जो मुझसे इतनी मुहब्बत करता है और जो मुहब्बत की कीमत को समझता है, उसके ही साथ मैं रहूँगी। लैला और मजनूँ की शादी हो गई। 

आपकी भी शादी भगवान के साथ में हो सकती है, लेकिन करना क्या चाहिए? सिर्फ एक बात करनी चाहिए कि भगवान की मर्जी पर चलने के लिए आप आमादा हो जाइए। भगवान जो आपसे चाहते हैं, उसको कीजिए। आपका चाहना भी ठीक है, लेकिन आप जो चाहते हैं, उससे पहले बहुत कुछ दे दिया है भगवान ने। आपको इनसान की जिन्दगी दी है और ऐसी जिन्दगी दी है कि आप अपनी मनमर्जी पूरी कर सकते हैं। मनमर्जी के लिए कोई कमी नहीं है। आपके हाथ कितने बड़े हैं, आपकी जुबान और आँखें कितनी शानदार हैं, इसमें आप संतोष कर सकते हैं। अपनी दैनिक जरूरतों की भगवान से अपेक्षा मत कीजिए। आप अपनी हविश, अपनी तमन्नाओं, इच्छाओं, महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए भगवान को मजबूर करेंगे कि कर्तव्य की बात को छोड़कर वह पक्षपात करने लगे और कर्मफल की महत्ता का परित्याग कर दे? आप ऐसा मत कीजिए, उनको न्यायाधीश रहने दीजिए। 

आप अपने घिनौने चिन्तन को बदल दीजिए, अपने छोटे दृष्टिकोण को परिवर्तित कर दीजिए, लोभ और लालच से बाज आइए और भगवान की सुन्दर दुनिया को ऊँचा बनाने के लिए, शानदार बनाने के लिए राजकुमार के तरीके से कमर बाँधकर खड़े हो जाइए। आप समर्पित हो जाइए, शरणागति में आइए, विराजिए, विसर्जन कीजिए, फिर देखिए आप क्या पाते हैं? आज मुझे यही निवेदन करना था आप लोगों से। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय-नं-६८-पेज-१.१४

👉 चिंतन के क्षण Chintan Ke Kshan

🔸 आज की सुविधा, संपन्नता की प्राचीनकाल से तुलना की जाए और मनुष्य के सुख-संतोष को भी दृष्टिगत रखा जाए तो पिछले जमाने की असुविधा भरी परिस्थितियों में रहने वाले व्यक्ति अधिक सुखी और संतुष्ट जान पड़ॆंगे। इन पंक्तियों में भौतिक प्रगति तथा साधन-सुविधाओं की अभिवृद्धि को व्यर्थ नहीं बताया जा रहा है, न उनकी निन्दा की जा रही है। कहने का आशय इतना भर है कि परिस्थितियाँ कितनी भी अच्छी और अनुकूल क्यों न हों, यदि मनुष्य के आन्तरिक स्तर में कोई भी सुधार नहीं हुआ है तो सुख-शांति किसी भी उपाय से प्राप्त नहीं की जा सकती है।     

🔹 सर्वतोमुखी पतन और पराभव के इस संकट का निराकरण करने के लिए एक ही उपाय कारगर हो सकता है। वह है – व्यक्ति और समाज का भावनात्मक परिष्कार। भावना स्तर में अवांछनीयताओं के घुस पड़ने से ही तमाम समस्याएं उत्पन्न हुई हैं, इन समस्याओं का यदि समाधान करना है तो सुधार की प्रक्रिया भी वहीं से प्रारम्भ करनी पड़ेगी, जहाँ से ये विभीषिकाएं उत्पन्न हुई हैं। अमुक-अमुक समाधान-सामयिक उपचार तो हो सकता है, पर चिरस्थाई समाधान के लिए आधार को ही ठीक करना पड़ता है।     

🔸 अधर्म का आचरण करने वाले असंयमी, पापी, स्वार्थी, कपटी, धूर्त और दुराचारी लोग शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य एवं धन-संपत्ति, यश-वैभव आदि सब कुछ खो बैठते हैं। उन्हें बाह्य जगत में घृणा और तिरस्कार तथा अंतरात्मा में धिक्कार ही उपलब्ध होते हैं। ऐसे लोग भले ही उपभोग के कुछ साधन इकट्ठे कर लें, पर अनीति का मार्ग अपनाने के कारण उनका रोम-रोम अशांत तथा आत्म-प्रताड़ना की आग में झुलसता रहता है। चारों ओर घृणा, तिरस्कार एवं असहयोग ही मिलता है। आतंक के बल पर यदि वे कुछ पा भी लेते हैं तो उपभोग के पश्चात् उनके लिए विषतुल्य-दुखदायक ही सिद्ध होता है। आत्मशान्ति पाने, सुसंयमित जीवन व्यतीत करने वाले मनुष्य को धर्ममय जीवनक्रम अपनाने के लिए तत्पर होना पड़ता है। नैतिकता, मानवता एवं कर्तव्यपरायणता को ही अपने जीवन में समाविष्ट करना होता है। इस प्रवृत्ति का व्यापक प्रसार करने के लिए किए गए प्रयत्नों को नैतिक क्रान्ति की संज्ञा दी जाती है। बुद्ध धर्म के प्रथम मंत्र 'धम्मं शरणं गच्छामि' में इसी नैतिक क्रान्ति की चिनगारी निहित है, इस मंत्र को लोकव्यापी बनाने के लिए जो प्रयत्न बौद्ध धर्मावलम्बियों ने किया था, उसे विशुद्ध नैतिक क्रान्ति ही कहा जएगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

👉 हमारे अंग बन जाओ

मित्रो ! हमारी एक ही महत्त्वाकांक्षा है कि हम सहस्रभुजा वाले सहस्रशीर्षा पुरुष बनना चाहते हैं। तुम सब हमारी भुजा बन जाओ, हमारे अंग बन जाओ, यह हमारी मन की बात है। गुरु-शिष्य एक-दूसरे से अपने मन की बात कहकर हल्के हो जाते हैं। हमने अपने मन की बात तुमसे कह दी। अब तुम पर निर्भर है कि तुम कितना हमारे बनते हो? पति-पत्नी की तरह, गुरु व शिष्य की आत्मा में भी परस्पर ब्याह होता है, दोनों एक-दूसरे से घुल-मिलकर एक हो जाते हैं। समर्पण का अर्थ है-दो का अस्तित्व मिटाकर एक हो जाना। तुम भी अपना अस्तित्व मिटाकर हमारे साथ मिला दो व अपनी क्षुद्र महात्त्वाकांक्षाओं को हमारी अनन्त आध्यात्मिक महात्त्वाकांक्षाओं में विलीन कर दो। जिसका अहं जिन्दा है, वह वेश्या है। जिसका अहं मिट गया, वह पवित्रता है। देखना है कि हमारी भुजा, आँख, मस्तिष्क बनने के लिए तुम कितना अपने अहं को गला पाते हो? इसके लिए निरहंकारी बनो। स्वाभिमानी तो होना चाहिए, पर निरहंकारी बनकर। निरहंकारी का प्रथम चिह्न है वाणी की मिठास। 

वाणी व्यक्तित्व का हथियार है। सामने वाले पर वार करना हो तो तलवार नहीं, कलाई नहीं, हिम्मत की पूछ होती है। हिम्मत न हो तो हाथ में तलवार भी हो, तो बेकार है। यदि वाणी सही है तो तुम्हारा व्यक्तित्व जीवन्त हो जाएगा, बोलने लगेगा व सामने वाले को अपना बना लेगा। अपनी विनम्रता, दूसरों का सम्मान व बोलने में मिठास, यही व्यक्तित्व के प्रमुख हथियार हैं। इनका सही उपयोग करोगे तो व्यक्तित्व वजनदार बनेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय-नं-६८-पेज-१.१४

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८७)

अन्तर्चक्षु खोल—देगा निद्रा का मर्म
    
सामान्य जनों के लिए सपने एक कौतूहल की भाँति होते हैं। परम्परावादी मनोवैज्ञानिक इनमें इच्छाओं के दमन को ढूँढते हैं। जबकि योग विज्ञानी इन्हें अन्तर्चेतना के नवीन आयामों के प्रवेश द्वार के रूप में देखते हैं। सच यही है कि सपना एक जबरदस्त क्रिया है- यह अधिक शक्तिशाली है और सामान्य क्रम में सोचने की तुलना में अधिक अर्थपूर्ण भी। क्योंकि सपनों का सम्बन्ध सामान्य ढंग से सोचने-विचारने वाले मन की तुलना में अधिक गहरे अंश से सम्बन्धित है। जब कोई नींद में जाता है, तब मन का वह हिस्सा जो दिन भर काम कर रहा था, थका होता है, निढाल होता है। यह मन का बहुत छोटा हिस्सा होता है, अचेतन की तुलना में प्रायः दशांश। अचेतन नौ गुना ज्यादा बड़ा और ज्यादा शक्तिशाली  है। हाँ, इसकी शक्तिमत्ता अतिचेतन की तुलना में जरूर कम है। परन्तु सामान्य चेतन मन की तुलना में इसकी शक्ति बहुत ज्यादा है।
    
यही वजह है कि जो समस्याएँ चेतन मन द्वारा हल नहीं होती, वे अचेतन द्वारा हल कर ली जाती हैं। जो समाधान जाग्रत् अवस्था में नहीं मिलते, वे प्रायः स्वप्न में मिल जाते हैं। बेन्जीन के अन्वेषक विज्ञानी काकुले की खोज कथा को सभी जानते हैं। वे बेन्जीन की रायायनिक संरचना को लेकर जिन दिनों काम कर रहे थे, उन दिनों उन्हें अनेकों प्रयासों के बाद भी कामयाबी नहीं मिली। अन्ततः एक दिन उन्हें स्वप्न में बेन्जीन की संरचना का रहस्य मिला। कारण इतना भर है कि अचेतन की गहरी परतों में समाधान के गहरे सूत्र छिपे हैं। पर ये मिलते उन्हीं को हैं, जो अपनी समस्या को, प्रश्न को इन परतों तक पहुँचा सकें।
    
इसी तरह से निद्रा भी बहुत ज्ञान दे सकती है। क्योंकि वहाँ अनंत सम्पत्ति का भण्डार है। बहुत से जन्मों का भण्डार। क्योंकि बहुत सी चीजों को हमने वहाँ संचित किया है। योग साधक के जीवन में इसका महत्त्व बढ़ जाता है। क्योंकि साधना की गहनता में चेतना की गहरी परतें आन्दोलित-आलोड़ित होती है। जप एवं ध्यान के सूक्ष्म स्पन्दन इन्हें लगातार स्पन्दित करते हैं। इन स्पन्दनों से जहाँ जन्म-जन्मान्तर के संचित संस्कार उद्घाटित होते हैं, वहीं विराट् चेतना की झलकें भी झलकती हैं। कभी-कभी तो विशिष्ट जनों से, सिद्ध योगियों से सान्निध्य भी बनता है।
    
साधकों के संसार में यह बड़ा सुपरिचित रहस्य है कि सूक्ष्म जगत् में विचरण करने वाले सिद्ध योगी साधकों तक अपने सन्देश, अपनी सहायताएँ पहुँचाने के लिए स्वप्न एवं निद्रा का ही सहारा लेते हैं। ऐसा करने के लिए वे साधक के मन को अपनी संकल्प ऊर्जा से निस्पन्द एवं एकाग्र कर देते हैं। और फिर संवाद की सहज स्थिति बन जाती है। इस स्थिति में वे साधक के लिए उपयुक्त मार्गदर्शन और आने वाली परेशानियों के प्रति जागरूकता, अपेक्षित सावधानियाँ सभी कुछ बता देते हैं। यह कहना, सुनना इतना स्पष्ट होता है, जैसे कि सब कुछ जगते में ही कहा-सुना जाता है। यहाँ तक कि जगने पर भी इसकी स्मृति धुँधली एवं धूमिल नहीं पड़ती।
    
प्रगाढ़ निद्रा की साधना में भारी उपयोगिता है। इस अवस्था में योग साधक का ज्योति शरीर चेतना के विभिन्न आयामों की यात्रा कर लेता है। सद्गुरु के सान्निध्य में उसके सामने बोध के नवीन आयाम खुलते हैं। जब कभी साधक के जीवन में इस तरह की सूक्ष्म यात्राएँ होती हैं, तो इनके अनुभव बड़े अलौकिक होते हैं। उदाहरण के लिए हिमालय के दिव्य प्रदेशों में गमन, देवलोकों में गमन जैसी अनुभूतियाँ साधकों को अपनी निद्रा में सहज मिलती है। सच तो यह है कि उनके लिए निद्रा जागरण की तुलना में ज्यादा उपयोगी होती है। युगऋषि गुरुदेव कहते थे कि इन अनुभवों को अपने ध्यान का माध्यम बनाकर समाधि को सिद्ध किया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १५१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 18 Dec 2020

🔸 आकर्षक लगने वाली सभी वस्तुएं उपयोगी नहीं होतीं। सर्प, बिच्छू, काँतर, कनखजूरे जैसे प्राणी देखने में सुन्दर लगते हैं पर उनके गुणों को देखने पर पता चलता है  कि वे समीप आने वाले को कितना त्रास देते हैं ? प्रथम पहचान में ही न किसी का मित्र बनना चाहिए और न किसी को बनाना चाहिए। चरित्र के बारे में बारीकी से देखना, समझना और परखना चाहिए। मात्र शालीनता के प्रति आशा रखने वाले और आदर्शों का दृढ़तापूर्वक अवलम्बन करने वाले ही इस योग्य होते हैं कि उनसे घनिष्टता का सम्बन्ध स्थापित किया जाए।        

🔹 बड़ी बात दुर्जनों को समझाकर सज्जनता के मार्ग पर लाना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि उनके गिरोह को छिन्न-भ्न्न करने से लेकर घात लगाने की चलती प्रक्रिया में कारगर अवरोध खड़े कर देना। इसके लिए जनसाधारण को साहस जगाने वाला प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, प्रतिरोध कर सकने वाली साहसिक मंडलियों का गठन किया जाना चाहिए और सरकरी तंत्र तक यह आवाज पहुँचाई जानी चाहिए कि उसके भागीदार अधिकारी कर्मचारी उस कर्तव्य का ईमानदारी से पालन करें जिसके लिए उन्होंने जिम्मेदारी कंधे पर उठाई है। इस कार्य में उन्हें जहाँ भी कठिनाई अनुभव हो रही हो, उसे दूर करने के लिए जागरूक नागरिकों को समुचित प्रयत्न करना चाहिए। जनता का साहस, सुरक्षा बलों का पराक्रम और सरकारी तंत्र का समुचित योगदान यदि मिलने लगे तो गुंडा गर्दी का उन्मूलन उतना कठिन न रहेगा जितना अब है।      

🔸 हर व्यक्ति अपने को ऐसा चुस्त-दुरुस्त रखे जिससे प्रतीत हो कि वह किसी भी आक्रमण का सामना करने के लिए तैयार है। यह कार्य प्राय: एकाकी होने पर नहीं बन पड़ता, समूह में अपनी शक्ति होती है। मिल-जुलकर रहने और एक-दूसरे की क्षमता बनाए रहने पर आधी मुसीबत टल जाती है। आक्रमण अपना हाथ रोक लेते हैं और बढ़ते कदमों को पीछे हटा लेने पर विवश होते हैं। निजी हौसला बुलन्द रखने के अतिरिक्त अपने जैसे ही साहसी लोगों का संगठन बना लेना चाहिए और उनके साथ-साथ रहने,  साथ-साथ उठने-बैठने के अवसर बनाते रहने चाहिए। बर्रों के छत्ते में हाथ डालने में डर लगता है, पर यदि वह अकेली पास आ डटे तो उसका कचूमर निकालने के लिए कोई भी तैयार हो जाता है। मधुमक्खियों के छ्त्ते से आमतौर से लोग बचकर ही निकलते हैं। बन्दर समूह में रहते हैं और एक को छेड़ने पर दूसरे भी उनकी सहायता के लिए इकट्ठे हो जाते हैं – इस कारण लोग बन्दरों के झुंड को छेड़ते नहीं वरन् उससे बचकर ही निकलने में अपनी भलाई देखते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८६)

अन्तर्चक्षु खोल—देगा निद्रा का मर्म

अन्तर्यात्रा का विज्ञान उन समर्पित पथिकों के लिए है, जिन्हें सदा इस बात का बोध रहता है कि उनकी यह अनूठी यात्रा नींद के समय भी चलती रहती है। बल्कि कई बार तो नींद में इस यात्रा की तीव्रता और भी बढ़ जाती है। हालाँकि साधारण तौर पर लोग निद्रा के महत्त्व से अपरिचित ही रहते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि इन्सान अपनी जिन्दगी का तकरीबन एक तिहाई भाग नींद में ही बिताता है। फिर भी आमतौर पर कोई इसके बारे में न तो सोचता है और न ही ध्यान देता है। ऐसा इसलिए हुआ है, क्योंकि मनुष्य ने चेतन मन की ओर, जाग्रत् दशा की ओर ज्यादा ध्यान लगाया है। जबकि भौतिक पदार्थ की भाँति मन भी त्रिआयामी है। इसका एक आयाम चेतन है, दूसरा अचेतन है और तीसरा अतिचेतन है।
    
महर्षि पतंजलि कहते हैं कि व्यक्तित्व की पहेली को सुलझाने के लिए, जीवन के महाप्रश्न को हल करने के लिए व्यक्ति को अपनी सम्पूर्णता में प्रतिबद्ध होना होगा। ध्यान सधे, समाधि सिद्ध हो इसके लिए व्यक्ति की समग्र ऊर्जा आवश्यक है। व्यक्ति जब अपने जीवन के सभी आयामों में सम्पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध होगा, केवल तभी अतिचेतन की बादल सदृश घटना में ऊर्ध्वगामी गति सम्भव है। चेतन मन तो सहज क्रियाशील है। इस क्रियाशीलता का अनुभव सभी को सदा किसी न किसी रूप में होता रहता है। अचेतन की अनुभूति गहन भावदशाओं में ही हो पाती है। गहन भावनाओं में जब चेतन नीरव निस्पन्द होता है, तब जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सीधे व्यक्तित्व की जड़ों में पहुँचता है। एक तीसरी सम्भावना अतिचेतन की है, जिसके द्वार शून्यता में खुलते हैं। और इसकी अनुभूति बड़ी विरल दशाओं में विरलों को होती है।

महर्षि अगला सूत्र कहते हैं, अबकी बार की यह राह विचित्र है और अद्भुत भी। परन्तु इस पर चलना नामुमकिन नहीं है।
इस राह के रहस्य को खोलने वाला महर्षि का सूत्र है-
स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा॥ १/३८॥
शब्दार्थ-स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनम्= स्वप्न और निद्रा के ज्ञान का अवलम्बन करने वाला (चित्त); वा= भी (स्थिर हो सकता है)।
अर्थात् उस बोध पर भी ध्यान करो, जो स्वप्न और निद्रा के समय उतर आता है।
    
महर्षि पतंजलि का यह सूत्र उनकी योगजन्य रहस्यमयता का बड़ा सुस्पष्ट प्रमाण है। इसमें स्वप्न और निद्रा की भारी आध्यात्मिक उपयोगिता के संकेत हैं। इन संकेतों को जिसने समझ लिया, वह अपने व्यक्तित्व की बिखरी कड़ियों को एक सूत्र में पिरो सकता है। उन्हें सूत्रबद्ध, संगठित एवं सशक्त बना सकता है। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि साधक की निद्रा सामान्य जनों की नींद से अलग होती है। उसके स्वप्न भी साधारण लोगों से अलग होते हैं। इन पर ध्यान दिया जाय, तो बोध की अनूठी सम्पदा हासिल की जा सकती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १५०
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 17 Dec 2020

🔸कीचड़ में कमल उगना एक सुयोग है। आमतौर से उसमें गंदे कीड़े ही कुलबुलाते रहते हैं। जिन्होंने लोकप्रवाह में बहने के लिए आत्म समर्पण कर दिया, समझना चाहिए उनके लिए नर-पशु स्तर का जीवनयापन ही भाग्य विधान जैसा बन गया। वे खाते, सोते, पाप बटोरते और रोते-कलपते मौत के मुँह में चले जाते हैं। स्रष्टा ने मनुष्य जीवन का बहुमूल्य जीवन धरोहर के रूप में दिया था, होना यह चाहिए था कि इस सुयोग का लाभ उठाकर अपनी अपूर्णता पूर्णता में बदली गयी होती और विश्वमानव की सेवा-साधना में संलग्न रहकर देवमानव की भूमिका में प्रवेश करके धन्य बना जाता, असंख्यों को सन्मार्ग में चलाकर सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन का अजस्र पुण्य कमाया गया होता। यह तो बन नहीं पड़ता, उल्टे पाप का पिटारा सिर पर लादकर लंबे भविष्य को अन्धकारमय बनाया जाता है।    

🔹 सत्य परायणों और न्यायनिष्ठों को समय-समय पर दूसरों की सहायता भी मिलती रही है, इतिहास इसका साक्षी है। यदि ऐसा न हुआ होता तो बहुसंख्यक कुकर्मियों ने इस संसार की समूची शालीनता का भक्षण कर लिया होता। सत्यनिष्ठ एकाकी होने के कारण सर्वत्र पराजित-पराभूत हो गए होते किन्तु ऐसा हुआ नहीं। प्रहलाद पथ के अनुयायी कष्ट सहकर भी अपनी विजय ध्वजा फहराते हैं। ईसा मरकर भी मरे नहीं, सुकरात की काया नष्ट होने पर भी उसका यश, वर्चस्व और दर्शन अपेक्षाकृत और भी प्रखर हुआ, व्यापक बना। गोवर्धन पर्वत उठाए जाने का संकल्प आरम्भ में असंभव लगता रहा होगा, पर समय ने सदुद्देश्य का साथ दिया और सत्संकल्प ने विजय दुंदुभी बजाई।       

🔸 अपराधी प्रवृत्ति एक प्रकार की छूत वाली बीमारी है जो पहले परिवार के नवोदित सदस्यों पर आक्रमण करती है। कुकर्मी लोगों की संतानें भी अनैतिक कार्यों में ही रुचि लेती हैं और उन्हीं की अभ्यस्त बनती हैं। इसके अतिरिक्त ऐसा भी होता है कि जिनके साथ उनकी घनिष्टता है, उन्हें भी उसी पतन के गर्त में गिरने का कुयोग बने। ऐसे लोग प्रयत्नपूर्वक अपना संपर्क क्षेत्र बढ़ाते हैं और उद्धत आचरणों के फलस्वरूप तत्काल बड़े लाभ मिलने के सब्जबाग दिखाते हैं। आरम्भ में हिचकने वालों की हिम्मत बढ़ाने के लिए कितने ही इस आधार पर बड़े-बड़े लाभ प्राप्त कर लेने के मन गढ़न्त वृतान्त सुनाते हैं। जिन्हें सच मानने और उस प्रकार का आचरण करने में अपनी भी उपयोगिता देखकर सहज ही तैयार हो जाते हैं। गिरोह बनता है और साथियों की सहायता से अपराधी लोगों का समुदाय बनता है। संगठित प्रयत्नों की सफलता सर्व विदित है। अनाचार पर उतारू लोग भी आक्रामक नीति अपनाकर आरम्भिक सफलता तो प्राप्त कर ही लेते हैं, पीछे भले ही उनके भयानक दुष्प्रिणाम भुगतने पड़ें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 16 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८५)

राग शमन करता है—वीतराग का ध्यान
    
वे जगद्गुरु हैं और सद्गुरु भी। उन्होंने आज के मानव जीवन को युग बोध दिया है। योग साधकों के अन्तर्चेतना को नयी ऊर्जा, नयी चेतनता दी है। उनका ध्यान योग पथ के पथिक को सभी द्वन्द्वों से परे ले जाता है। इन पंक्तियों को पढ़कर कोई जिज्ञासु पूछ सकता है, यह भला किस तरह? तो सच यह है कि जब हम ध्यान करते हैं उसका, जो आकांक्षाओं के पार जा चुका है, तो वह हमारे भीतर एक चुम्बकीय शक्ति बन जाता है। हम उसे अपने भीतर प्रवेश करने देते हैं। वह हमें हमारी वर्तमान अवस्था से बाहर खींचता है। यही बात हमें उसकी विराट् चेतना के प्रति खोलती है।
    
यदि हम लगातार उसका ध्यान करते रहें, उसकी वीतरागता में खोये रहें, तो देर-सबेर हम उसी की भाँति हो जायेंगे, क्योंकि ध्यान की प्रक्रिया ध्यान करने वाले को ध्यान की विषयवस्तु की भाँति बना देती है। यदि कोई ध्यान करता है धन पर, तो वह स्वयं धन हो जाता है। एक कंजूस आदमी स्वयं ही बैंक बैलेंस बनकर रह जाता है। उसके भीतर नोटों के सरकने और सिक्कों के खनकने की सिवा और कुछ नहीं बचता। यह बड़ी सावधानी की बात है कि हमें उसी के बारे में सोचना चाहिए, चिंतन करना चाहिए और उस पर ध्यान करना चाहिए, जैसे कि हम स्वयं होना चाहते हैं।
    
हम अपने जीवन में स्वयं ही नरक के बीज बोते हैं और जब वे वृक्ष बन जाते हैं, तब हम अचरज से पूछते हैं कि भला मैं इतना दुःखी क्यों हूँ? कारण केवल इतना ही है कि हम सदा गलत चीजों पर ध्यान लगाते हैं। हमेशा उसकी ओर देखते हैं, जो नकारात्मक है। हमेशा हम ध्यान लगाते हैं दोषों पर और स्वयं ही दोषों से भरते चले जाते हैं। यहाँ तक कि दोषों की सघन मूर्ति बन जाते हैं।
    
इसीलिए पतंजलि कहते हैं कि वीतराग का ध्यान करो। ध्यान करो अपने सद्गुरु का। अपने अन्तःकरण में अपने सद्गुरु के मूर्ति की स्थापना करो। देखते-देखते सारा का सारा दृश्य बदल जायेगा। जिसे हम ध्यान का विषय बनाते हैं, वही प्रकारान्तर से हमारे जीवन का लक्ष्य बन जाता है। द्रष्टा स्वयं दृश्य बन जाता है। यह बात परम वन्दनीया माताजी के जीवन के पृष्ठों को पढ़कर जानी जा सकती है। वे शिव की पार्वती की भाँति स्वयं शिव हो गयी थीं। गुरुदेव में उनके चित्त की सतत विलीनता ने उन्हें स्वयं गुरुदेव बना दिया था। मार्ग अभी भी है, प्रक्रिया यथावत् है। बस, केवल सघन श्रद्धा, सहजप्रेम एवं सम्पूर्ण समर्पण की दरकार है। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १४८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 सभ्यताओं का समन्वय

सभ्यता और संस्कृति इस युग के दो बहु-प्रचलित विषय हैं। आस्थाओं और मान्यताओं को संस्कृति और तदनुरूप व्यवहार, आचरण को सभ्यता की संज्ञा दी जाती है। मानवीय सभ्यता या संस्कृति कहें या चाहे जो भी नाम दें, मानवीय दर्शन सर्वत्र एक ही हो सकता है, मानवीय संस्कृति केवल एक हो सकती है दो नहीं, क्योंकि विज्ञान कुछ भी हो, मानवीय प्रादुर्भाव का केन्द्र बिन्दु और आधार एक ही हो सकता है। इनका निर्धारण जीवन के बाह्य स्वरूप भर से नहीं किया जा सकता। संस्कृति को यथार्थ स्वरूप प्रदान करने के लिए अंततः धर्म और दर्शन की ही शरण में जाना पड़ेगा। 

संस्कृति का अर्थ है- मनुष्य का भीतरी विकास। उसका परिचय व्यक्ति के निजी चरित्र और दूसरों के साथ किये जाने वाले सद्व्यवहार से मिलता है। दूसरों को ठीक तरह समझ सकने और अपनी स्थिति तथा समझ धैर्यपूर्वक दूसरों को समझा सकने की स्थिति भी उस योग्यता में सम्मिलित कर सकते हैं, जो संस्कृति की देन है।

आदान-प्रदान एक तथ्य है, जिसके सहारे मानवीय प्रगति के चरण आगे बढ़ते-बढ़ते वर्तमान स्थिति तक पहुँचे हैं। कृषि, पशुपालन, शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प-उद्योग, विज्ञान, दर्शन जैसे जीवन की मौलिक आवश्यकताओं के संबंधित प्रसंग किसी क्षेत्र या वर्ष की वपौती नहीं है। एक वर्ग की उपलब्धियों से दूसरे क्षेत्र के लोग परिचित हुए हैं। परस्पर आदान-प्रदान चले हैं और भौतिक क्षेत्र में सुविधा संवर्धन का पथ-प्रशस्त हुआ है। ठीक यही बात धर्म और संस्कृति के संबंध में भी है। एक ने अपने सम्पर्क क्षेत्र को प्रभावित किया है। एक लहर ने दूसरी को आगे धकेला है। लेन-देन का सिलसिला सर्वत्र चलता रहा है। मिल-जुलकर ही मनुष्य हर क्षेत्र में आगे बढ़ा है। इस समन्वय से धर्म और संस्कृति भी अछूते नहीं रहे हैं। उन्होंने एक-दूसरे को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से प्रभावित किया है। 

यह सभ्यताओं का समन्वय एवं आदान-प्रदान उचित भी है और आवश्यक भी। कट्टरता के इस कटघरे में मानवीय विवेक को कैद रखे रहना असंभव है। विवेक दृष्टि जाग्रत् होते ही इन कटघरों की दीवारें टूटती हैं और जो रुचिकर या उपयोगी लगता है, उसका बिना किसी प्रयास या दबाव के आदान-प्रदान चल पड़ता है। इसकी रोकथाम के लिए कट्टरपंथी प्रयास सदा से हाथ-पैर पीटते रहे हैं, पर कठिन ही रहा है। हवा उन्मुक्त आकाश में बहती है। सर्दी गर्मी का विस्तार व्यापक क्षेत्र में होता है। इन्हें बंधनों में बाँधकर कैदियों की तरह अपने ही घर में रुके रहने के लिए बाधित नहीं किया जा सकता। सम्प्रदायों और सभ्यताओं में भी यह आदान-प्रदान अपने ढंग से चुपके-चुपके चलता रहा है। भविष्य में इसकी गति और भी तीव्र होगी। 

धर्म और संस्कृति दोनों ही सार्वभौम हैं, उन्हें सर्वजनीन कहा जा सकता है। मनुष्यता के टुकड़े नहीं हो सकते। सज्जनता की परिभाषा में बहुत मतभेद नहीं है। शारीरिक संरचना की तरह मानवीय अंतःकरण की मूल सत्ता भी एक ही प्रकार की है। भौतिक प्रवृत्तियाँ लगभग एक सी हैं। एकता व्यापक है और शाश्वत। पृथकता सामयिक है और क्षणिक। हम सब एक ही पिता के पुत्र हैं। एक ही धरती पर पैदा हुए हैं। एक ही आकाश के नीचे रहते हैं। एक ही सूर्य से गर्मी पाते हैं और बादलों के अनुदान से एक ही तरह अपना गुजारा करते हैं फिर कृत्रिम विभेद से बहुत दिनों तक बहुत दूरी तक किस प्रकार बँधे रह सकते हैं? औचित्य को आधार मानकर परस्पर आदान-प्रदान का द्वार जितना खोलकर रखा जाय, उतना ही स्वच्छ हवा और रोशनी का लाभ मिलेगा। खिड़कियाँ बंद रखकर हम अपनी विशेषताओं को न तो सुरक्षित रख सकते हैं और न स्वच्छ हवा और खुली धूप से मिलने वाले लाभों से लाभान्वित हो सकते हैं। संकीर्णता अपनाकर पाया कम और खोया अधिक जाता है। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८४)

राग शमन करता है—वीतराग का ध्यान

अन्तर्यात्रा का विज्ञान योग पथ को प्रकाशित करता है। इसके प्रकाश में योग पथ की सूक्ष्मताएँ, गुह्यताएँ गहरे रहस्य उजागर होते हैं। योग पथ के पथिक इस प्रकाश का सहारा पाकर इधर-उधर अटकने-भटकने से बचते हैं। अन्तर्यात्रा विज्ञान का प्रकाश उन्हें न केवल उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ देता है, बल्कि उनके अन्तस् को पवित्र बनाता है। वे जीवन की अनगिनत भ्रान्तियों से मुक्त होकर समग्र रूपान्तरण की ओर अग्रसर होते हैं। यह एक ऐसा अनुभव है, जिसे अनेकों ने पाया है और वे इसमें जी रहे हैं। जिन्होंने भी अपनी अन्तर्यात्रा के लिए इस योग कथा का अवलम्बन लिया है, वे इसके पुण्य प्रकाश से सदा लाभान्वित हुए हैं। उनकी साधना में आने वाले अँधेरे, इसके प्रभाव से उजाले में बदले हैं। उनकी अटकनों को नये द्वारों की आहट मिली है और उनकी भटकनों ने नई राहें पायी हैं।

कठिनाई बस है कि जिनकी चित्तवृत्तियाँ बर्हिमुखी है, वे अपने आंतरिक प्रकाश को न तो खोज पाते हैं और न पहचान पाते हैं। ऐसों के लिए महर्षि एक नया सूत्र देते हैं।
इस योग कथा का यह अगला सूत्र बहुत ही सुस्पष्ट है। साथ ही सामान्य साधकों के लिए साधना के ढंग से अतिसहज भी। महर्षि का यह सूत्र है-
वीतरागविषयं वा चित्तम्॥ १/३७॥
शब्दार्थ-वीतरागविषयम् = वीतराग को विषय करने वाला; चित्तम् = चित्त; वा = भी (स्थिर हो जाता है)।
    
अर्थात्  वीतरागता को जो उपलब्ध हो चुका है, उसका ध्यान करो।
महर्षि पतंजलि का यह सूत्र उनकी परम करुणा का सुस्पष्ट प्रमाण है। वे मानव चेतना के परम वैज्ञानिक होने के साथ परम करुणावान् भी हैं। एक ओर वे जहाँ अस्तित्व की सूक्ष्मताओं, गुह्यताओं एवं गहरे रहस्यों व भेदों को उजागर करते हैं, तो दूसरी ओर वे यह भी ध्यान रखते हैं कि योग की निर्मल सरिता सभी के लिए बहे। सब इससे लाभान्वित हों, सभी इससे सुख पायें। वे भी  जिनकी प्रज्ञा बहुत समर्थ नहीं है, जिनमें योग की जटिल प्रक्रियाओं को करने-समझने की योग्यता नहीं है। ऐसे साधकों के लिए महर्षि पतंजलि माँ की भाँति हैं। वे उनकी अंगुली पकड़ कर चलाने के लिए, अन्तर्यात्रा पर चलने के लिए एक सूत्र देते हैं। एक नयी प्रक्रिया, एक नयी विधि खोजते हैं।
    
यह विधि है-वीतराग पुरुष का ध्यान। वीतराग वह है, जिसके सभी राग, आसक्तियाँ, आकांक्षाएँ शान्त हो चुके हें। जो इन सभी के पार व परे जा चुका है, ऐसे व्यक्ति का ध्यान। ऐसों में एक तो स्वयं महर्षि पतंजलि हैं, साथ ही उनकी परम्परा में और भी अनेक हैं। बुद्ध पुरुषों की बड़ी समर्थ परम्परा ने इस धरा को धन्य किया है। समय-समय पर अनेक वीतराग विभूतियों ने यहाँ योग की चरम सिद्धि पायी है। इनमें वसिष्ठ, विश्वामित्र, नारद आदि प्राचीन ऋषिगण हैं। भगवान् श्रीकृष्ण, प्रभु श्रीराम, बुद्ध, महावीर, ईसा आदि अवतारी सत्ताएँ हैं। महर्षि अरविन्द, श्रीरामकृष्ण परमहंस, भक्तिमती मीरा आदि संत हैं और इस युग को अपनी तप साधना से प्रेरित-प्रकाशित-प्रभावित करने वाले युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव हैं। ये सभी वीतराग हैं। ये सभी आसक्तियों, आकांक्षाओं से पार हैं।
    
इनके प्रति गहरा लगाव, सहज प्रेम, इनका भावपूर्ण चिंतन साधक की चेतना के तंतुओं को इनकी विराट्ता, पवित्रता से जोड़ता है। ये सभी एकरस हैं, शिवमय हैं, परन्तु जिसका मन जिसमें रमे। गोस्वामी तुलसी बाबा की भाषा में-‘जेहि कर मन रम जाहि सब, सो तेही सतकाम।’ यानि कि जिसका मन जिसमें रमे, उसे तो बस उससे ही काम है। अब योग साधक को अपने अन्तःकरण की छान-बीनकर यह परखना है कि उसका मन कहाँ रमता है। उसे किस वीतराग से राग है। यदि इस सवाल में ज्यादा झंझट लगती हो, तो बड़ी आसान सी राह है-युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव। वे द्वार हैं-परम चेतना का। वे मार्ग हैं-परम धाम का, परम ज्ञान का, निर्विकल्प समाधि का। यह सच उनका ध्यान करके परखा जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १४६
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शनिवार, 12 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८३)

ध्यान की गहराई में छिपा है परम सत्य

परम पूज्य गुरुदेव अपनी चर्चाओं व संगोष्ठियों में प्रायः एक बात कहा करते थे कि आध्यात्मिक जीवन की पहली किरण जिसने देख ली, वह स्वतः ही संसार की सभी बुराइयों से दूर हो जाता है। उसका मन अपने आप ही सांसारिक रसों से दूर हो जाता है।  गुरुदेव के अनुसार ज्यों-ज्यों हम स्थूल भोगों को भोगते हैं, हमारी चेतना भी उतनी ही स्थूल एवं संवेदनहीन हो जाती है। इतना ही नहीं, हम इतने ज्यादा बर्हिमुखी हो जाते हैं कि हमारी समूची आन्तरिक योग्यताएँ ही समाप्त हो जाती हैं।
     
इसके विपरीत जब हम सूक्ष्म तत्त्वों के प्रति प्रकाग्र होते हैं तो संवेदना व चेतना भी सूक्ष्म हो जाती है। और साथ ही हमारे सामने सूक्ष्म जगत् की झाँकी झलकने लगती है। जिसने ऐसा किया है, वह आँख बंद करते ही हृदयाकाश में उदित होते हुए सूर्य की झाँकी पा लेता है। यही नहीं हृदय के पास ज्योतित अग्निशिखा भी हमें दिखाई देती है। यद्यपि वह सब समय वहीं पर है, लेकिन हम उसे यूँ ही अभी देख नहीं सकते। दूसरे भी नहीं देख सकते। इसका कारण केवल इतना भर है कि अभी हमारे पास उपयुक्त सूक्ष्म-चेतना का अभाव है। जप की तल्लीनता हो या ध्यान की गहनता इसकी यथार्थ उपलब्धि हमारे अन्तस् की सूक्ष्मता है।
    
गुरुदेव इस क्रम में एक गायत्री साधक की घटना सुनाते हैं। इन साधक का नाम वीरमणि था। वीरमणि पढ़े तो ज्यादा नहीं थे। पर उनकी अनुभूतियों का संसार अनोखा था। उन्होंने ग्यारह साल की उम्र से गायत्री का जप शुरू किया था। प्रातः सायं गायत्री जप यही उनका नियम था। यूँ उनका पेशा तो खेती करना था। खेती के सभी कामों को वह मनोयोगपूर्वक करते थे। इसी के साथ उनका मानसिक जप भी चलता रहता था। बुवाई, निराई, गुड़ाई, सिंचाई आदि कार्यों के साथ उन्होंने गायत्री जप का अच्छा क्रम बिठा लिया था। जप के प्रभाव से उनकी भावचेतना उत्तरोत्तर सूक्ष्म होती गयी। जप की गहराई ने कब ध्यान का रूप ले लिया, यह पता ही न चला। बस गायत्री उनके लिए अजपा हो गयी। और ध्यान की प्रगाढ़ता भाव समाधि में बदल गयी।
    
इस प्रगाढ़ ध्यान में वह आन्तरिक प्रकाश में घण्टों डूबे रहते थे। यहाँ तक कि उनका निद्राकाल भी साधना में परिवर्तित हो गया था। जितनी उनकी साधना प्रगाढ़ होती गयी, उतनी ही शान्ति भी गहन होती गयी। इस साधना क्रम में उनकी रुचियाँ, प्रवृत्तियाँ, सभी उत्तरोत्तर सूक्ष्म एवं प्रकाशित हो गयी। कभी पूछने पर वह कहते कि मुझे तो बस इतना ही मालूम है कि आँख बन्द करते ही मैं प्रकाश के महासागर में तैरने लगता हूँ। इस प्रकाश से मेरी समूची दुनिया ही बदल गयी है। पहले मैं प्रयास से साधना करता था, अब तो अपने आप ही साधना होती है। सचमुच ही यह बिना किए होती है। मन अपने आप ही स्थिर, एकाग्र व शान्त रहता है। सब कुछ बदल गया है। बस यही अनुभव होता है कि गायत्री ही प्रकाश है और वह प्रकाश स्वयं मैं हूँ।
    
पतंजलि कहते हैं कि इस प्रकाश के भाव चेतना में उदय होते ही सारे शोक विलीन हो जाते हैं। जो इसे अनुभव करता है, वह जानता है कि इससे अधिक आनन्दमय और कुछ भी नहीं। और कुछ भी हृदय के भीतर अनुभव होने वाले इस प्रकाश से ज्यादा संगीतपूर्ण एवं सुसंगत नहीं होता है। इसकी अनुभूति जितनी प्रगाढ़ होती है, हम उतने ही ज्यादा शान्तिपूर्ण, मौन व एकजुट हो जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १४३
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८२)

ध्यान की गहराई में छिपा है परम सत्य

योग साधक जैसे-जैसे अन्तर्यात्रा पथ पर आगे बढ़ते हैं, उनकी संवेदनाएँ सूक्ष्म हो जाती है। इस संवेदनात्मक सूक्ष्मता के साथ ही उनमें संवेगात्मक स्थिरता-नीरवता व गहरी शान्ति आती है। और ऐसे में उनके अनुभव भी गहरे, व्यापक व पारदर्शी होते चले जाते हैं। कई बार नए साधक आगे का मार्ग पाने के लिए बेचैन होते हैं। उनमें अध्यात्म की उच्चस्तरीय कक्षा में प्रवेश के लिए त्वरा होती है। यदा-कदा मार्गदर्शक का अभाव उन्हें परेशानी में डालता है। ऐसों के लिए महर्षि पतंजलि के सूत्र एवं परम पूज्य गुरुदेव की अनुभूतियाँ अमृततुल्य औषधि की भाँति है। वह सुझाते हैं, बताते हैं, चेताते हैं कि साधना की अविरामता ही भावी मार्ग की प्राप्ति का कारण है। साधना की अविरामता से उत्तरोत्तर सूक्ष्म होती चेतना स्वतः ही नए मार्ग के द्वार खोलती है। नया पथ प्रशस्त करती है।
    
सच्चाई यह है कि ये अनुभूतियाँ हमारे अन्तःकरण को प्रेरित, प्रकाशित, प्रवर्तित व प्रत्यावर्तित करती हैं। इसमें उच्चस्तरीय आध्यात्मिक चेतना के अवतरण के साथ एक अपूर्व प्रत्यावर्तन घटित होता है। एक गहन रूपान्तरण की प्रक्रिया चलती है। इस प्रक्रिया के साथ ही योग साधक की दिव्य संवेदनाएँ बढ़ती है और उसकी साधना की ज्योति और भी प्रखर होती है।
    
इस अनुभूति कथा के अगले चरण को महर्षि ने अपने अगले सूत्र में प्रकट किया है। यह सूत्र है-
विशोका वा ज्योतिष्मती॥ १/३६॥
शब्दार्थ- वा= इसके सिवा (यदि); विशोका= शोकरहित; ज्योतिष्मती= ज्योतिष्मती प्रवृत्ति (उत्पन्न हो जाय तो वह) भी मन की स्थिति स्थिर करने वाली होती है।
    
अर्थात् अभ्यास के क्रम में उस आन्तरिक प्रकाश का भी ध्यान करो, जो शान्त है और सभी दुःखों से बाहर है।
    
महर्षि अपने इस सूत्र में ध्यान की गहनता की ओर इंगित करते हैं। ध्यान द्वार है—अतीन्द्रिय संवेदना का। जो ध्यान करते हैं, उन्हें काल क्रम में स्वयं ही इस सत्य का अनुभव हो जाता है। यह सच है कि ध्यान में सम्पूर्ण आध्यात्मिक रहस्य समाए हैं। फिर भी इसका अनुभव कम ही लोग कर पाते हैं। और इसका कारण है कि ध्यान के बारे में प्रचलित भ्रान्तियाँ। कतिपय लोग ध्यान को महज एकाग्रता भर समझते हैं। कुछ लोगों के लिए ध्यान केवल मानसिक व्यायाम भर है। ध्यान को एकाग्रता समझने वाले लोग जिस किसी तरह से मानसिक चेतना को एक बिन्दु पर इकट्ठा करने की कोशिश करते हैं हालाँकि उनके इस प्रयास से परामानसिक चेतना के द्वार नहीं खुलते। उन्हें अन्तर्जगत में प्रवेश नहीं मिलता। वे तो बस बाहरी उलझनों में भटकते अथवा मानसिक द्वन्द्वों में अटकते रहते हैं।
    
जबकि ध्यान अन्तर्यात्रा है और यह यात्रा वही साधक कर पाते हैं, जिन्होंने अपनी साधना के पहले चरणों में अपनी मानसिक चेतना को स्थिर, सूक्ष्म व शान्त कर लिया है। अनुभव का सच यही है कि मानसिक चेतना को स्थिरता, सूक्ष्मता व शान्ति ही प्रकारान्तर से परामानसिक चेतना की अनुभूति है। इस अनुभूति में व्यापकता व गुणवत्ता की संवेदना का अतिविस्तार होता है। साथ ही इसे पाने पर अन्तर्चेतना स्वतः ही ऊर्ध्वगमन के लिए प्रेरित होती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १४२
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 9 दिसंबर 2020

👉 नालायक

"बेटा , हमारा एक्सीडेंट हो गया है। मुझे ज्यादा चोट नहीं आई पर तेरी माँ की हालत गंभीर है। कछ पैसों की जरुरत है और तेरी माँ को खुन भी देना है। "बासठ साल के माधव जी ने अपने बडे बेटे से फोन पर कहा।

"पापा, मैं बहुत व्यस्त हूँ आजकल। मेरा आना नही हो सकेगा। मुझे विदेश मे नौकरी का पैकेज मिला है तो उसी की तैयारी कर रहा हूँ। आपका भी तो यही सपना था ना? इसलिये हाथ भी तंग चल रहा है। पैसे की व्यवस्था कर लीजिए मैं बाद मे दे दुँगा। "उनके बडे इंजिनियर बेटे ने जबाब दिया।

उन्होनें अपने दुसरे डाॅक्टर बेटे को फोन किया तो उसने भी आने से मना कर दिया। उसे अपनी ससुराल मे शादी मे जाना था। हाँ इतना जरुर कहा कि पैसों की चिंता मत कीजिए मै भिजवा दूँगा।

यह अलग बात है कि उसने कभी पैसे नहीं भिजवाए। उन्होंने बहुत मायुसी से फोन रख दिया। अब उस नालालक को फोन करके क्या फायदा। जब ये दो लायक बेटे कुछ नही कर रहे तो वो नालायक क्या कर लेगा?

उन्होंने सोचा और बोझिल कदमों से अस्पताल मे पत्नी के पास पहूँचे और कुरसी पर ढेर हो गये। पुरानी बातें याद आने लगी।

माधव राय जी स्कुल मे शिक्षक थे। उनके तीन बेटे और एक बेटी थी।बडा इंजिनियर और मझला डाक्टर था। दोनौ की शादी बडे घराने मे हुई थी। दोनो अपनी पत्नियों के साथ अलग अलग शहरों मे रहते थे। बेटी की शादी भी उन्होंने खुब धुमधाम से की थी।

सबसे छोटा बेटा पढाई मे ध्यान नही लगा पाया था। ग्यारहवीं के बाद उसने पढाई छोड दी और घर मे ही रहने लगा। कहता था मुझे नौकरी नही करनी अपने माता पिता की सेवा करनी है पर मास्टर साहब उससे बहुत नाराज रहते थे।

उन्होंने उसका नाम नालायक रख दिया था। दोनों बडे भाई पिता के आज्ञाकारी थे पर वह गलत बात पर उनसे भी बहस कर बैठता था। इसलिये माधव जी उसे पसंद नही करते थे।

जब माधव जी रिटायर हुए तो जमा पुँजी कुछ भी नही थी। सारी बचत दोनों बच्चों की उच्च शिक्षा और बेटी की शादी मे खर्च हो गई थी। शहर मे एक घर्, थोडी जमीन और गाँव मे थोडी सी जमीन थी। घर का खर्च उनके पेंशन से चल रहा था।

माधव जी को जब लगा कि छोटा सुधरने वाला नही तो उन्होंने बँटवारा कर दिया और उसके हिस्से की जमीन उसे देकर उसे गाँव मे ही रहने भेज दिया। हालाँकि वह जाना नही चाहता था पर पिता की जिद के आगे झुक गया और गाँव मे ही झोपडी बनाकर रहने लगा।

माधव जी सबसे अपने दोनो होनहार और लायक बेटों की बडाई किया करते। उनका सीना गर्व से चौडा हो जाता था। पर उस नालायक का नाम भी नही लेते थे।

दो दिन पहले दोनो पति पत्नी का एक्सीडेन्ट हो गया था। वह अपनी पत्नी के साथ सरकारी अस्पताल मे भर्ती थे। डाॅक्टर ने उनकी पत्नी को आपरेशन करने को कहा था।

"पापा, पापा!" सुन कर तंद्रा टुटी तो देखा सामने वही नालायक खड़ा था। उन्होंने गुस्से से मुँह फेर लिया। पर उसने पापा के पैर छुए और रोते हुए बोला "पापा आपने इस नालायक को क्यो नही बताया? पर मैने भी आपलोगों पर जासुस छोड रखे हैं।खबर मिलते ही भागा आया हूँ।"

पापा के विरोध के वावजुद उसने उनको एक बडे अस्पताल मे भरती कराया। माँ का आपरेशन कराया। अपना खुन दिया। दिन रात उनकी सेवा मे लगा रहता कि एक दिन वह गायब हो गया।

वह उसके बारे मे फिर बुरा सोचने लगे थे कि तीसरे दिन वह वापस आ गया। महीने भर मे ही माँ एकदम भली चंगी हो गई। वह अस्पताल से छुट्टी लेकर उन लोगों को घर ले आया। माधव जी के पुछने पर बता दिया कि खैराती अस्पताल था पैसे नही लगे हैं।

घर मे नौकरानी थी ही। वह उन लोगों को छोड कर वापस गाँव चला गया।

धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो गया। एक दिन यूँ ही उनके मन मे आया कि उस नालायक की खबर ली जाए। दोनों जब गाँव के खेत पर पहुँचे तो झोपडी मे ताला देख कर चौंके। उनके खेत मे काम कर रहे आदमी से पुछा तो उसने कहा "यह खेत अब मेरे हैं।"

"क्या? पर यह खेत तो...." उन्हे बहुत आश्चर्य हुआ। "हाँ। उसकी माँ की तबीयत बहुत खराब थी। उसके पास पैसे नही थे तो उसने अपने सारे खेत बेच दिये। वह रोजी रोटी की तलाश मे दुसरे शहर चला गया है। बस यह झोपडी उसके पास रह गई है। यह रही उसकी चाबी। "उस आदमी ने कहा।

वह झोपडी मे दाखिल हुये तो बरबस उस नालायक की याद आ गई। टेबुल पर पडा लिफाफा खोल कर देखा तो उसमे रखा अस्पताल का नौ लाख का बिल उनको मुँह चिढाने लगा।

उन्होंने अपनी पत्नी से कहा - "जानकी तुम्हारा बेटा नालायक तो था ही झुठा भी है।"
अचानक उनकी आँखों से आँसू गिरने लगे और वह जोर से चिल्लाये -"तु कहाँ चला गया नालायक, अपने पापा को छोड कर। एक बार वापस आ जा फिर मैं तुझे कहीं नही जाने दुँगा।" उनकी पत्नी के आँसू भी वहे जा रहे थे।

और माधव जी को इंतजार था अपने नालायक बेटे को अपने गले से लगाने का।
सचमुच बहुत नालायक था वो।।

👉 विचारों से कार्य प्रेरणा

कार्यों का मूल, विचार है। मस्तिष्क में जिस प्रकार के विचार घूमते हैं उसी प्रकार के कार्य होने लगते हैं। जिस वर्ग के लोग स्वार्थपरता, तृष्णा, वासना और अहंता के विचारों में डूबे रहते हैं वहाँ नाना प्रकार के क्लेश, कलह, दुष्कर्म एवं अपराध निरन्तर बढ़ते रहते हैं। पर जहाँ परमार्थ, संयम, संतोष और नम्रता आदर्शवाद को प्रधानता दी जाती है वहाँ सर्वत्र सत्कर्म होते दिखाई पड़ते हैं और उसके फलस्वरूप, सतयुगी सुख शान्ति का वातावरण बन जाता है। जिस प्रकार स्वस्थ शरीर से स्वच्छ मन का संबंध है उसी प्रकार स्वच्छ मन के ऊपर सभ्य समाज की सम्भावना निर्भर है। 

यदि शरीर बीमार पड़ा रहेगा तो मन में निम्न श्रेणी के विचार ही आवेंगे। अस्वस्थ व्यक्ति देर तक उच्च भावनाऐं अपने मन में धारण किये नहीं रह सकता। उसी प्रकार अस्वच्छ मन वाले व्यक्तियों से भरा समाज कभी सभ्य कहलाने का अधिकारी नहीं बन सकता। मानव जाति एकता, प्रेम, प्रगति, शान्ति एवं समृद्धि की ओर अग्रसर हो, इसका एकमात्र उपाय यही है कि लोगों के मन आदर्शवाद, धर्म, कर्तव्यपरायणता, परोपकार एवं आस्तिकता की भावनाओं से ओत-प्रोत रहें। इस दिशा में यदि हमारे कदम उठते रहेंगे तो उन्नति के लिए जिन योग्यताओं एवं क्षमता की आवश्यकता है वे सब कुछ ही समय में अनायास प्राप्त हो जायेंगी। पर यदि दुर्गुणी लोग बहुत चतुर और साधन सम्पन्न बनें तो भी उस चतुरता और क्षमता के दुरुपयोग होने पर विपत्ति ही बढ़ेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८१)

ध्यान से उपजती है—अतीन्द्रिय संवेदना
    
ऐसे परम पवित्र महान् आचार्य इस श्रीरंगम के पीठ में आसीन थे। श्रीरंगम में मेले की भारी भीड़ थी। दर्शनार्थियों का ताँता लगा था। इन दर्शनार्थियों की भीड़ में एक विचित्र व्यक्ति भी था। लोग उसे भय, घृणा और आतंक मिश्रित नजरों से देख रहे थे। इन देखने वालों के मन में बहुत कुछ उमड़-घुमड़ रहा था; पर किसी में साहस ही नहीं था कि कोई उससे कुछ कहे। यह दृश्य ही कुछ ऐसा था। यह विचित्र व्यक्ति उस इलाके का खूंखार दस्यु दुर्दम था। और वह एक महिला के साथ उस पर छतरी लगाए जा रहा था। उसकी नजरों में उस महिला के लिए भारी वासनात्मक आसक्ति थी। प्रभु मन्दिर में भी इस वासना भरे कुत्सित दृश्य को लोग हज़म नहीं कर पा रहे थे। पर कोई कहता भी क्या?
    
आचार्य रामानुज ने भी यह विचित्र दृश्य देखा। उन्हें भी कुछ अटपटा लगा। असमंजस भरे स्वर में उन्होंने अपने एक शिष्य से पूछा भगवान् श्रीरंगम के पवित्र स्थान में यह कौन है? शिष्य ने डाकू दुर्दम की कथा, उसके अत्याचारों के वीभत्स विवरणों के साथ सुना डाली। आचार्य शिष्य की सारी बातें सुनते रहे। इन बातों में उस महिला का जिक्र भी कई बार आया, जिसके पीछे यह डाकू छतरी लगाए जा रहा था। सारी कथा सुनने के बाद आचार्य ने अपने इस शिष्य से कहा- तुम जाकर उसे बुला लाओ। पर क्यों भगवन्! शिष्य ने लगभग सहमते हुए कहा। प्रश्न न करो वत्स! बस तुम उसे बुला दो। भगवान् उस पर कृपा करना चाहते हैं।
    
आचार्य की रहस्य वाणी शिष्य की समझ में न आयी। फिर भी उसने आदेश का पालन किया। डाकू दुर्दम भी इस अप्रत्याशित बुलावे के लिए तैयार न था। वह भी आचार्य की आध्यात्मिक विभूतियों की कथाएँ सुन चुका था। सो इस बुलावे पर उसे भी थोड़ा डर लगा। क्योंकि अपने मन के किसी कोने में उसे अपने पापों का बोध था। इसलिए अनजाने भय के पाश में बँधकर आचार्य के समीप जा पहुँचा। आचार्य ने उसे देखा। उनकी इस दृष्टि में उसके लिए करुणापूरित वात्सल्य था। बड़े प्यार से उन्होंने उससे पूछा- तुम्हारे साथ में जो देवी हैं, वे कौन हैं वत्स? इस सवाल के उत्तर में दुर्दम ने लज्जा से अपना सिर झुका लिया। वैसे भी आचार्य की अतीन्द्रिय संवेदनाओं से भला क्या छुपता?
    
आचार्य ने फिर से टटोलने वाली नजरों से उसे देखते हुए दुर्दम से पुनः सवाल किया- वत्स, इस स्त्री में तुम्हें क्या अच्छा लगता है? डाकू दुर्दम ने अबकी बार थोड़ा झिझकते हुए उत्तर दिया- भगवन् मैं इसके रूप और सौन्दर्य से मोहित हूँ। और यदि इससे भी श्रेष्ठ सौन्दर्य की झलक तुम्हें मिल जाय तो? तब तो मैं इसे छोड़ दूँगा, दुर्दम ने उत्तर दिया। आचार्य उसके इस उत्तर पर मुस्कराए और बोले- नहीं तुम इसे छोड़ना मत। इससे विवाह करना और एक सद्गृहस्थ की भाँति रहना। ऐसा कहते हुए आचार्य ने उसके सिर पर धीरे-धीरे हाथ फेरा। लगभग तीन पल वे ऐसा ही करते रहे। बाद में उन्होंने उसे तीन थपकियाँ दीं। इतना करते ही दुर्दम जैसे चेतना शून्य हो गया। बस वह निस्पन्द बैठा रहा। उसकी आँखों से आँसू झरते रहे। काफी देर बाद उसकी चेतनता बाह्य जगत् में लौटी। अब तो बस उसकी एक ही रट थी, मुझे वही दृश्य, वही अनुभूति बार-बार चाहिए। मुझे प्रभु का वही सौन्दर्य सतत निहारना है।
    
शान्त स्वर में आचार्य ने कहा- इसके लिए तुम ध्यान करो वत्स! तुमने जो अनुभव किया- वह सब ध्यान का अनुभव था। हाँ बस बात इतनी है कि यह ध्यान तुम्हें मेरे प्रयास से लगा। आगे तुम्हें स्वयं प्रयास करने होंगे। ध्यान करते-करते अतीन्द्रिय संवेदना के जागरण से ये अनुभव तुम्हें नित्य होंगे। आचार्य के वचन दुर्दम के लिए प्रेरणा बन गए और उनकी कृपा से हुए आध्यात्मिक अनुभव उसके लिए ऊर्जा का स्रोत। अतीन्द्रिय संवेदनों से हुई अनुभूति ने डाकू दुर्दम को महान् सन्त में बदल दिया।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १३९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

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भव्य भवन थोड़े से या झोंपड़े बहुत से, इन दोनों में से एक का चयन जन कल्याण की दृष्टि से करना है, तो बहुलता वाली बात को प्रधानता देनी पड़ेगी। राम...