सोमवार, 28 दिसंबर 2020

👉 सच्चिदानन्द

भगवान् के यों अगणित नाम हैं उनमें से एक नाम है-सच्चिदानंद। सत् का अर्थ है-टिकाऊ अर्थात् न बदलने वाला-न समाप्त होने वाला। इस कसौटी पर केवल परब्रह्म ही खरा उतरता है। उसका नियम, अनुशासन, विधान एवं प्रयास सुस्थिर है। सृष्टि के मूल में वही है। परिवर्तनों का सूत्र-संचालक भी वही है। इसलिए परब्रह्म को सत् कहा गया है।
    
चित् का अर्थ है-चेतना, विचारणा। जानकारी, मान्यता, भावना आदि इसी के अनेकानेक स्वरूप हैं। मानवी अंतःकरण में उसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के रूप में देखा जाता है। बुद्धिमान् और मूर्ख सभी में अपने विभिन्न स्तरों के अनुरूप वह विद्यमान रहती है।
    
प्राणियों की चेतना बृहत्तर चेतना का एक अंग-अवयव मात्र है। इस ब्रह्माण्ड में अनंत चेतना का भण्डार भरा पड़ा है। उसी के द्वारा पदार्थों को व्यवस्था का एवं प्राणियों को चेतना का अनुदान मिलता है। परम चेतना को ही परब्रह्म कहते हैं। अपनी योजना के अनुरूप वह सभी को दौड़ने एवं सोचने की क्षमता प्रदान करती है। इसलिए उसे ‘चित्’ अर्थात् चेतन कहते हैं।
    
इस संसार का सबसे बड़ा आकर्षण ‘आनंद’ है। आनंद जिसमें जिसे प्रतीत होता है वह उसी ओर दौड़ता है। शरीरगत इन्द्रियाँ अपने-अपने लालच दिखाकर मनुष्य को सोचने और करने की प्रेरणा देती हैं। सुविधा-साधन शरीर को सुख प्रदान करते हैं। मानसिक ललक-लिप्सा, तृष्णा और अहंता की पूर्ति के लिए ललचाती रहती हैं। अंतःकरण की उत्कृष्टता वाला पक्ष आत्मा कहलाता है। उसे स्वर्ग, मुक्ति, ईश्वर प्राप्ति, समाधि जैसे आनंदों की अपेक्षा रहती है।
    
वस्तुतः आनंद प्रकारान्तर से प्रेम का दूसरा नाम है। जिस भी वस्तु, व्यक्ति एवं प्रकृति से प्रेम हो जाता है, वही प्रिय लगने लगती है। प्रेम घटते ही उपेक्षा चल पड़ती है और यदि उसका प्रतिपक्ष-द्वेष उभर पड़े, तो फिर वस्तु या व्यक्ति के रूपवान्, गुणवान् होने पर भी वे बुरे लगने लगते हैं। उनसे दूर हटने या हटा देने की इच्छा होती है।
    
अँधेरे में  जितने स्थान पर टॉर्च की रोशनी पड़ती है, उतना ही प्रकाशवान् होता है। वहाँ का दृश्य परिलक्षित होने लगता है। प्रेम को ऐसा ही टॉर्च-प्रकाश कहना चाहिए, जिसे जहाँ भी फें का जाएगा, वहीं सुंदर, प्रिय एवं सुखद लगने लगेगा। वैसे इस संसार में कोई भी पदार्थ या प्राणी अपने मूल रूप में प्रिय या अप्रिय है नहीं। हमारा दृष्टिकोण, मूल्यांकन एवं रुझान ही आनंददायक अथवा अप्रिय, कुरूप बनाता चलता है और दृष्टिकोण के अनुसार ही अनुभूति होते चली जाती है। 
    
आनंद ईश्वर की विभूति है। प्रेम को परमेश्वर कहा गया है। प्रिय ही सुख है अर्थात् ईश्वर ही आनंद है। उसी के आरोपण से हम सुखानुभूति करते और प्रसन्न होते हैं। 
    
आत्मा परमात्मा का ही एक सूक्ष्म अंश माना गया है। यह आत्मा उसी सच्चिदानंद को निरंतर खोजती रहती है, परन्तु माया के अवरोध के कारण उसको प्राप्त नहीं कर पाती है। जब माया का आवरण हट जाता है, तो सच्चिदानन्द के स्वरूप का बोध हो जाता है और वह उसी में निमग्न हो जाती है। 
    
आत्मा को सच्चिदानन्द स्वरूप को प्राप्त करने की अभिलाषा शाश्वत है। उसे प्रेम या भक्तियोग से ही प्राप्त किया जा सकता है। यह लौकिक प्रेम की श्रेणी का नहीं, अपितु अध्यात्म श्रेणी का है, जिसके द्वारा सच्चिदानन्द की प्राप्ति होती है। यह स्पष्ट जानना चाहिए कि परमात्मा के अनेकानेक नाम है। उनमें से सच्चिदानन्द नाम भी सार्थक है।  

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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