रविवार, 8 जुलाई 2018

👉 हाथी या भौंरा?

🔶 एक आदमी ने रास्ते में सड़क के किनारे बंधे हाथियों को देखा। हाथियों के पैर में रस्सी बंधी थी। उसे आश्चर्य हुआ कि हाथी जैसा विशाल जानवर केवल एक छोटी सी रस्सी से बंधा था। हाथी इस बंधन को जब चाहे तब तोड़ सकता था, लेकिन वो ऐसा नहीं कर रहा था। उस आदमी ने हाथी के ट्रेनर से पूछा कि कैसे हाथी जैसा विशाल जानवर रस्सी से बंधा शांत खड़ा है और भागने की कोशिश नहीं कर रहा?

🔷 ट्रेनर ने बताया कि इन हाथियों को बचपन से इन रस्सियों से ही बांधा जाता है। उस समय इनके पास इतनी शक्ति नहीं होती कि वे रस्सियों को तोड़ सकें। बार-बार प्रयास करने के बाद इन रस्सियों के न टूटने से इनको यकीन हो जाता है कि ये रस्सियों को नहीं तोड़ सकते और बड़े होने के बाद भी उनका यह यकीन बना रहता है इसलिए वो रस्सी तोडऩे का प्रयास ही नहीं करते।

🔶 दूसरी ओर भंवरा है, जिसके शरीर के भार और उसके पंखों के बीच कोई भी संतुलन नहीं है। साइंस का ऐसा मानना है कि भंवरे उड़ नहीं सकते, लेकिन भंवरे को लगता है कि वो उड़ सकता है, इसलिए वह लगातार कोशिश करता है और बार-बार असफल होने पर भी वह हार नहीं मानता। आखिरकार भंवरा उडऩे में सफल हो ही जाता है। भंवरा मानता है कि वह उड़ सकता है, इसलिए वह उड़ पाता है और हाथी मानता है कि वह रस्सी नहीं तोड़ सकता, इसलिए वह रस्सी को नहीं तोड़ पाता है।

🔷 हमें भी कुछ लोग बताते हैं कि यह मत करो, वो मत करो, तुमसे ये नहीं होगा, वो नहीं होगा। कभी-कभी हम कोशिश भी करते हैं और अगर असफल हो गए तो हमें यकीन हो जाता है कि यह काम नहीं हो पाएगा। फिर यही बातें हमारे थॉट्स, बिहेवियर, एक्शन को कंट्रोल करने लगती हैं। दिक्कत यह है कि हम लगातार प्रयास नहीं करते। यह मान लें कि आपके पास इतनी समझ, इतनी बुद्धि, इतना साहस है कि आप अपने किसी भी वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। बस पहले आप खुद इस बात को मानें।

👉 आज का सद्चिंतन 8 July 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 July 2018


👉 ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं (अन्तिम भाग)

🔶 परिजन हम लोगों का संयुक्त जीवन अखण्ड-दीपक का प्रतीक मानकर उसे आत्म सत्ता की साकार प्रतिमा मानते रहे। वही हम लोगों के लिए मत्स्य बेध जैसा लक्ष्यबेध करने वाले शब्दबेधी बाण की तरह आराध्य बनकर रही है। साथ ही साधना का सम्बल भी। शरीर परिवर्तन की बेला आते ही यों तो हमें साकार से निराकार होना पड़ेगा; पर क्षण भर में उस स्थिति से अपने को उबार लेंगे और दृश्यमान प्रतीक के रूप में उसी अखण्ड दीपक की ज्वलन्त ज्योति में समा जायेंगे, जिसके आधार पर अखण्ड-ज्योति नाम से सम्बोधन अपनाया गया है। शरीरों के निष्प्राण होने के उपरान्त जो चर्म चक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे, वे इसी अखण्ड-ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे। दो शरीर अब तक द्वैत की स्थिति में रहे है। भविष्य में दोनों की सत्ता एक में विलीन हो जायगी और उसे तेल-बाती की पृथक सत्ताओं की एक ही लौ में समावेश होने की तरह अद्वैत रूप में गंगा-यमुना के संगम रूप में देखा जा सकेगा। इसे .... श्रद्धा का एकीकरण भी समझा जा सकेगा।

🔷 अभी हम लोगों के शरीर शान्ति-कुंज में रहते हैं। पीछे भी वे इस परिकर के कण-कण में समाये हुए रहेंगे। इसकी अनुभूति निवासियों और आगन्तुकों को समान रूप से होती रहेगी। पर इसका अर्थ यह न समझा जाय कि यह युग चेतना किसी क्षेत्र विशेष में सीमाबद्ध होकर रह जायगी। जब स्थूल शरीर ने समस्त विश्व की प्रतिमाओं को झकझोरा है और उन्हें प्रसुप्ति से उबार कर कर्म क्षेत्र में कुरुक्षेत्र में ला खड़ा किया है, तो यह हम लोगों की तृप्ति-तुष्टि और शान्ति का केन्द्र क्यों अपनी कक्षा छोड़कर किसी अन्य मार्ग को अपनायेगा। स्थूल शरीर की अपेक्षा सूक्ष्म की शक्ति हजारों-लाखों गुनी अधिक होती है। हम लोग कुछ आगे-पीछे एक ही मोर्चे पर एकत्व अपनाकर कार्यरत बने रहेंगे।

🔶 अपनी अपेक्षा कार्यक्षेत्र को हजारों गुना बढ़ा लेंगे। सफलता भी अत्यन्त उच्चस्तरीय अर्जित करेंगे। हमारी प्रवृत्तियाँ मरेंगी नहीं, वरन् अखण्ड-ज्योति की बढ़-चढ़ कर अभिनव भूमिका सम्पन्न करेगी। इसलिए शरीर परिवर्तन की बात सोचने पर न हमें कुछ खिन्नता होती है और न हम लोगों का वास्तविक स्वरूप समझने वाले अन्य किसी स्वजन, परिजन को होनी चाहिए मिशन तीर की तरह सनसनाता हुआ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेगा। हम लोगों की स्थिति प्रत्यंचा की तरह अभी भी तनी है और भविष्य में भी वैसी ही बनी रहेगी। अखण्ड-ज्योति की ज्योति ज्वाला प्रेरणाप्रद लेखों में अबकी ही तरह भविष्य में भी प्राणवान बनी रहें, इसके लिए अगले बीस वर्षों के लिए अभी से सुनिश्चित संग्रह करके रख दिया गया है। सूत्र संचालकों ने इसमें पूरा सहयोग दिया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 30
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/January/v1.30

👉 दोषों में भी गुण ढूँढ़ निकालिये (भाग 4)

🔶 यदि हम अपने आपसे सच्चे और सज्जन हों तो हमें सदा दूसरों की भलाइयाँ और अच्छाइयाँ दृष्टिगोचर होंगी। जिस प्रकार हम किसी के सुन्दर चेहरे को ही बार-बार देखते हैं उसी से प्रभावित होते हैं और प्रशंसा करते हैं। यद्यपि उसी मनुष्य के शरीर से मलमूत्र के दुर्गन्धपूर्ण कुरूप और कुरुचिपूर्ण स्थान भी हैं पर उनकी ओर न तो ध्यान देते हैं और न चर्चा करते हैं। इसी प्रकार सुरुचिपूर्ण मनो-भावना के व्यक्ति आमतौर से दूसरों के सद्गुणों को ही निरखते-परखते रहते हैं। उसके द्वारा जो अच्छे काम बन पड़े हैं उन्हीं की चर्चा करते हैं। उसके प्रशंसक और मित्र बनकर रहते हैं। आलोचकों और निन्दकों की अपेक्षा आत्मीयता, सद्भाव रखने वाला व्यक्ति किसी की बुराई को अधिक जल्दी और अधिक सरलता पूर्वक दूर कर सकता है।

🔷 कोई व्यक्ति जो अपने को सज्जन और समझदार मानता है उस पर यह जिम्मेदारी अधिक मात्रा में आती है कि वह सामान्य लोगों की अपेक्षा अपने में कुछ असामान्य गुण सिद्ध करे। सामने वाले से मतभेद होने पर उसे बुरा भला कहना निन्दा या अपमान भरे शब्द कहना, लड़-झगड़ पड़ना इतना तो निम्नकोटि के लोग भी करते रहते हैं। कुँजड़े और कंजड़ भी इस नीति से परिचित हैं? यदि इसी नीति को वे लोग भी अपनावें जो अपने को समझदार कहते हैं तो वे उनका यह दवा करना निस्सार है कि हम उस मानसिक स्तर के हैं। कुँजड़े-कंजड़ जैसे फूहड़ शब्द इस्तेमाल करते हैं इसे भले ही उनने न किए हों, शिक्षित होने के कारण वे साहित्यिक शब्दों का प्रयोग कर सकते हैं पर नीति तो वही रही, भावना तो वही रही, क्रिया तो वही रही। वे अपने आपको शिक्षित कुँजड़ा या कंजड़ कह सकते हैं, इतनी ही उनकी विशेषता मानी जा सकती है।

🔶 हर समझदार आदमी पर यह जिम्मेदारी आती है कि वह जिनकी निन्दा करना चाहता है उनकी अपेक्षा अपने आपको अधिक ऊंचा, अधिक सभ्य और अधिक सुसंस्कृत सिद्ध करे। यह भी तभी हो सकता है जब वह अपने में अधिक सहिष्णुता, अधिक प्यार, अधिक आत्मीयता, अधिक सज्जनता, अधिक उदारता और अधिक क्षमाशीलता धारण किये होना प्रमाणित करे। इन्हीं गुणों के आधार उसके बड़प्पन की तौल की जायेगी। यदि कभी भी दो व्यक्तियों में से एक को चुनना पड़े, एक को महत्व देना पड़े तो बाहर के विवेकशील आदमी इसी आधार पर महत्व देंगे कि किसने अधिक उदारता और सज्जनता का परिचय दिया। जिसमें यह अधिकता पाई जायेगी उसी की ओर लोगों की सहज सहानुभूति आकर्षित होगी। पर यदि ऐसा नहीं है तो दोनों एक ही स्तर पर रखे जायेंगे। दोनों की निन्दा की जायेगी और लोग उनके बीच में पड़ने की अपेक्षा उनसे दूर रहना ही पसंद करेंगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1960 पृष्ठ 5
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/December/v1.5

👉 आवेशग्रस्त न रहें, सौम्य जीवन जियें (भाग 2)

🔶 शहरी आबादी की पिच-पिच, गन्दगी, शोर व्यस्तता एवं अभक्ष्य-भक्षण के कारण लोग तनावजन्य रोगों से ग्रसित होते हैं। इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत दृष्टिकोण, स्वभाव एवं जीवन-यापन का क्रम भी इस विपत्ति को बढ़ाने में बड़ा कारण बनता है। क्रोध, आवेश, चिन्ता, भय, ईर्ष्या, निराशा की मनःस्थिति ऐसी उत्तेजना उत्पन्न करती है जिसके कारण तनाव रहने लगे। इस स्थिति में नाड़ी संस्थान और माँस पेशियों के मिलन केन्द्रों पर ‘सोसिटिल कोलेन’ नामक पदार्थ बढ़ने और जमने लगता है।

🔷 कार्बन और कोगल की मात्रा बढ़ने से लचीलापन घटता है और अवयव अकड़ने जकड़ने लगते हैं। यह एक प्रकार की गठिया के चिन्ह हैं जिसके कारण हाथ पैर साथ नहीं देते और कुछ करते-धरते नहीं बन पढ़ता। इन दिनों हर स्तर का व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों से घिरा रहता है जिससे उसका मनःसंस्थान खिन्न उद्विग्न रहने लगे।

🔶 बच्चे अभिभावकों से समुचित स्नेह प्राप्त नहीं कर पाते और असुरक्षा अनुभव करके निराश एवं खीजते रहते हैं। युवा वर्ग के सामने कामाचार की ललक- रोजगार की अनिश्चितता तथा पारिवारिक सामंजस्य की समस्याएँ उद्विग्नता बनाये रहती हैं। यार दोस्तों की धूर्तता से भी वे परेशान रहते हैं। बूढ़ों की शारीरिक अशक्तता, रुग्णता ही नहीं परिजनों द्वारा बरती जाने वाली अवमानना भी कम कष्टदायक नहीं होती। वे कमा तो कुछ सकते नहीं। बेटों के आश्रित रहते हैं। अपनी कमाई पर से भी स्वामित्व खो बैठते हैं।

🔷 मित्रता भी इस स्थिति में किसी को हाथ नहीं लगती। फलतः वे एकाकीपन से ऊबे और भविष्य के सम्बन्ध में निराश रहते हैं। मौत की समीपता अधिकाधिक निकट आती प्रतीत होती है। किसी अविज्ञात के अन्धकार में चले जाने और दृश्यमान संसार सम्बन्ध छूट जाने की कल्पना भी उन्हें कम त्रास नहीं देती। इन परिस्थितियों में यदि तनाव का आक्रमण हर किसी पर छाया दीखता है तो इसमें आश्चर्य भी क्या है?

🔶 संवेगों में स्नेह, क्रोध और भय प्रमुख हैं। इनकी विकृति मोह, आक्रमण एवं हड़कम्प के रूप में देखी जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1984 पृष्ठ 39
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/May/v1.39

👉 कौन थी शबरी

शबरी की कहानी रामायण के अरण्य काण्ड मैं आती है। वह भीलराज की अकेली पुत्री थी। जाति प्रथा के आधार पर वह एक निम्न जाति मैं पैदा हुई थी। वि...