बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

👉 मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान (अमृतवाणी भाग 7)

🔴 कामना करने वाले भक्त नहीं हो सकते। भक्त शब्द के साथ में भगवान की इच्छाएँ पूरी करने की बात जुड़ी रहती है। कामनापूर्ति आपकी नहीं भगवान की। भक्त की रक्षा करने का भगवान व्रत लिए हैं—‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’। यह सही है कि भगवान ने योग क्षेम को पूरा करने का व्रत लिया हुआ है, पर हविस पूरी करने का जिम्मा नहीं लिया। आपका योग और क्षेम अर्थात् आपकी शारीरिक आवश्यकताएँ और मानसिक आवश्यकताएँ पूरी करना उनकी जिम्मेदारी है। आपकी बौद्धिक, मानसिक आवश्यकताएँ पूरी करना भगवान् की जिम्मेदारी है, पर आपकी हविस पूरी नहीं हो सकती। हविसों के लिए, तृष्णाओं के लिए भागिए मत।
   
🔵 यह भगवान् की शान में, भक्त की शान में, भजन की शान में गुस्ताखी है, सबकी शान में गुस्ताखी है। भक्त और भगवान का सिलसिला इसी तरह से चलता रहा है और इसी तरीके से चलता रहेगा। भक्त माँगते नहीं दिया करते हैं। भगवान कोई इनसान नहीं हैं, उसे तो हमने बना लिया है। भगवान वास्तव में सिद्धान्तों का समुच्चय है, आदर्शों का नाम है, श्रेष्ठताओं के समुच्चय का नाम है। सिद्धान्तों के प्रति, आदर्शों के प्रति आदमी के जो त्याग और बलिदान हैं, वस्तुतः यही भगवान् की भक्ति है। देवत्व इसी का नाम है।

🔴 प्रामाणिकता आदमी की इतनी बड़ी दौलत है कि जनता का उस पर सहयोग बरसता है, स्नेह बरसता है, समर्थन बरसता है। जहाँ स्नेह, समर्थन और सहयोग बरसता है, वहाँ आदमी के पास चीज की कमी नहीं रह सकती। बुद्ध की प्रामाणिकता के लिए, सद्भावना के लिए, उदारता लोकहित के लिए थी। व्यक्तिगत जीवन में श्रेष्ठता और प्रामाणिकता को लेकर चलने के बाद में वे भक्तों की श्रेणी में सम्मिलित होते चले गये। सारे समाज ने उनको सहयोग दिया, दान दिया और उनकी आज्ञा का पालन किया।

🔵 लाखों लोग उनके कहने पर जेल चले गए, लाखों लोगों ने अपने सीने पर गोलियाँ खाईं। क्या यह हो सकता है? हाँ! शर्त एक ही है कि आप प्रकाश की ओर चलें, छाया आपके पीछे-पीछे चलेगी। आप तो छाया के पीछे-पीछे भागते हैं, छाया ही आप पर हावी हो गई है। छाया का अर्थ है माया। आप प्रकाश की ओर चलिए, भगवान् की ओर चलिए, सिद्धान्तों की ओर चलिए। आदर्श और सिद्धान्त, इन्हीं का नाम हनुमान है, इन्हीं का नाम भगवान है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बुद्धिमत्ता और मूर्खता की कसौटी

🔴 बुद्धिमत्ता की निशानी यह मानी जाती रही है कि उपार्जन बढ़ाया जाय—अपव्यय रोक जाय और संग्रहित बचत के वैभव से अपने वर्चस्व और आनन्द को बढ़ाया जाय। संसार के हर क्षेत्र में इसी कसौटी पर किसी को बुद्धिमान ठहराया जाता है।

🔵 मानव-जीवन की सफलता का लेखा-जोखा लेते हुए भी इसी कसौटी को अपनाया जाना चाहिए। जीवन-व्यवसाय में सद्भावनाओं की—सत्प्रवृत्तियों की पूँजी कितनी मात्रा में संचित की गई? सद्विचारों का, सद्गुणों का, सत्कर्मों का वैभव कितना कमाया गया? इस दृष्टि से अपनी उपलब्धियों को परखा, नापा जाना चाहिए। लगता हो कि व्यक्तित्व को समृद्ध बनाने वाली इन विभूतियों की संपन्नता बढ़ी है तो निश्चय ही बुद्धिमत्ता की एक परीक्षा में अपने को उत्तीर्ण हुआ समझा जाना चाहिए।

🔴 समय, श्रम, धन, वर्चस्व, चिन्तन मानव-जीवन की बहुमूल्य सम्पदाऐं हैं। इन्हें साहस और पुरुषार्थ पूर्वक सत्प्रयोजन में लगाने की तत्परता बुद्धिमत्ता की दूसरी कसौटी है। जिनने इन ईश्वर-प्रदत्त बहुमूल्य अनुदानों को पेट-प्रजनन में-विलास और अहंकार में खर्च कर डाला, समझना चाहिए वे बहुमूल्य रत्नों के बदले काँच-पत्थर खरीदने वाले उपहासास्पद मनःस्थिति के बाल-बुद्धि लोग हैं। वस्तु का सही मूल्यांकन न कर सकने वाले और उपलब्धियों के सदुपयोग में प्रमाद बरतने वाले मूर्ख ही कहे जायेंगे।

🔵 जीवन-क्षेत्र में हमारी सफलता-असफलता का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते समय यह देखना चाहिए कि कहीं दूरदर्शिता के अभाव से हम सौभाग्य को दुर्भाग्य में तो नहीं बदल रहे हैं? जीवन बहुमूल्य सम्पदा है। यह अनुपम और अद्भुत सौभाग्य है। इस सुअवसर का समुचित लाभ उठाने के सम्बन्ध में हम दूरदर्शिता का परिचय दे, इसी में हमारी सच्ची बुद्धिमत्ता मानी जा सकती हैं।

🌹 चिदानंद परिव्राजक
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1974 पृष्ठ 3

👉 मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान (अमृतवाणी भाग 6)

🔴 मित्रो ! भगवान जब प्रसन्न होते हैं तो वह चीज नहीं देते जो आप माँगते हैं। फिर क्या चीज देते हैं? वह चीज देते हैं, जिससे आदमी अपने बलबूते पर खड़ा हो जाता है और चारों ओर से उसको सफलताएँ मिलती हुई चली जाती हैं। सारे के सारे महापुरुषों को आप देखते चले जाइए, कोई भी आदमी दुनिया के पर्दे पर आज तक ऐसा नहीं हुआ है, जिसको दैवी-सहयोग न मिला हो, जिसको जनता का सहयोग न मिला हो, जिसको भगवान् का सहयोग न मिला हो।
   
🔵 ऐसे एक भी आदमी का नाम आप बतलाइए जिसके अन्दर से विशेषताएँ पैदा न हुई हों जिनसे आप दूर रहना चाहते हैं, जिनसे आप बचना चाहते हैं। जिनके प्रति आपका कोई लगाव नहीं है। वे चीजें जिनको हम आदर्शवाद कहते हैं, सिद्धान्तवाद कहते हैं, दुनिया के हिस्से का हर आदमी जिसको श्रेय भी मिला हो, धन भी मिला हो। जहाँ आदमी को श्रेय मिलेगा वहीं उसे वैभव भी मिले बिना रहेगा नहीं। सन्त गरीब नहीं होते। वे उदार होते हैं और जो पाते हैं—खाते नहीं, दूसरों को खिला देते हैं। देवत्व इसी को कहते हैं।

🔴 आदमी के भीतर का माद्दा जब विकसित होता है तो बाहरी दौलत उसके नजदीक बढ़ती चली जाती है। उदाहरण क्या बताऊँ—प्रत्येक सिद्धान्तवादी का यही उदाहरण है। उन्हीं को मैं देवभक्त कहता हूँ। देवोपासक उन्हीं को मैं कहता हूँ। उन्हीं की देवभक्ति को मैं सार्थक मानता हूँ जो अपने आकर्षण में खींच सकने में समर्थ हुए। आपकी भाषा में कहूँ तो देवता जब प्रसन्न होते हैं तो आदमी को देवत्व के गुण देते हैं, देवत्व के कर्म देते हैं, देवत्व का चिन्तन देते हैं और देवत्व का स्वभाव देते हैं। यह मैंने आपकी भाषा में कहा है। हमारी परिभाषा इससे अलग है।

🔵 मैं यह कह सकता हूँ कि आदमी अपने देवत्व के गुणों के आधार पर देवता को मजबूर करता है, देवता पर दबाव डालता है, उसे विवश करता है और यह कहता है कि हमारी सहायता करनी चाहिए और सहायता करनी पड़ेगी। भक्त इतना मजबूत होता है जो भगवान के ऊपर दबाव डालता है और कहता है कि हमारा ड्यू है। आप हमारी सहायता क्यों नहीं करते? वह भगवान से लड़ने को आमादा हो जाता है कि आपको हमारी सहायता करनी चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 11 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Oct 2017

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)

महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृ...