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बुधवार, 11 मार्च 2026

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 March 2026

🔴 स्वजनों के प्रति हमारी शुभाकाँक्षा कोई कल्पना, शुभकामना या आशीर्वाद मात्र नहीं है, वरन् यह एक तथ्य है जिसे हर किसी के लिए प्राप्त कर लेना संभव है। हमारा निज का जीवन इस बात का साक्षी है कि अपने आपको बदल लेने पर बाहर के दृश्य भी बदल जाते हैं। यो बाहर के सारे लोग सेवा में उपस्थित रहें और सारी विभूतियाँ चरणों में प्रस्तुत कर दें तो भी वासना और तृष्णा का बीमार माया के सन्निपात ज्वर में ग्रस्त व्यक्ति संतुष्ट नहीं हो सकता, पर जिसने अपनी समस्याओं का सही रूप समझ लिया उसके लिए हँसने, उल्लसित एवं संतुष्ट रहने के अतिरिक्त और कोई हड़बड़ी जैसी बात नहीं है।

🔵 अखण्ड ज्योति के प्रत्येक पाठक को प्रातःकाल का समय ईश्वर चिन्तन के लिए और सायंकाल का समय आत्म-निरीक्षण के लिए नियत करना चाहिए। असुविधा और परिस्थितियों के कारण इसमें कुछ व्यतिरेक होना क्षम्य भी कहा जा सकता है, पर शैय्या पर नींद खुलने से लेकर जमीन पर पैर रखने के बीच का जो थोड़ा सासमय रहता है वह अनिवार्य रूप से हममें से हर एक को ईश्वर चिंतन में लगाना चाहिए।

🔴 लेखों और भाषणों का युग अब बीत गया। गाल बजाकर लम्बी-चौड़ी डींग हाँक कर या बड़े-बड़े कागज काले करके संसार के सुधार की आशा करना व्यर्थ है। इन साधनों से थोड़ी मदद मिल सकती है, पर उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। युग निर्माण जैसे महान् कार्य के लिए तो यह साधन सर्वथा अपर्याप्त और अपूर्ण हैं। इसका प्रधान साधन यही हो सकता है कि हम अपना मानसिक स्तर ऊँचा उठाएँ, चरित्र की दृष्टि से उत्कृष्ट बनें।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

👉 आत्मचिंतन के क्षण 19 Sep 2025

अवगुणों का चिंतन करें, केवल अवगुणों पर ही दृष्टिपात करें तो अपना प्रत्येक प्रियजन भी अनेकों बुराइयों, दोषों में ही ग्रस्त दिखाई देगा। अतः स्नेह, आत्मीयता, सौजन्यता तथा प्रेमपूर्ण व्यवहार में कमी आयेगी, जिससे जीवन के सुखों का अभाव हो जायेगा। अपने बच्चों के छोटे-मोटे दोष भूल जाने की पिता की दृष्टि ही सच्ची होती है। माँ यदि बेटों की गलतियाँ ढूँढा करे तो उसे दण्ड देने से ही फुरसत न मिले। अवगुणों को उपेक्षा की दृष्टि से ही देखना उचित है।

◾  खोयी हुई दौलत फिर कमाई जा सकती है। भूली हुई विद्या फिर याद की जा सकती है। खोया हुआ स्वास्थ्य चिकित्सा द्वारा लौटाया जा सकता है, पर खोया हुआ समय किसी प्रकार लौट नहीं सकता। उसके लिए केवल पश्चाताप ही शेष रह जाता है।

◾  यह कहना उचित नहीं कि इस कलियुग में सज्जन घाटे और दुर्जन लाभ में रहते हैं। सनातन नियमों में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। सत्य और तथ्य देश-काल, पात्र का अंतर किये बिना सदा सुस्थिर और अक्षुण्ण ही रहते हैं। सन्मार्ग पर चलने वाले की सद्गति और कुमार्ग पर चलने वाले की दुर्गति होने की सचाई में कभी भी किसी प्रकार का अंतर नहीं आ सकता। कलियुग-सतयुग की कोई बाधा इस सत्य को झुठला नहीं सकती।

◾  अपनी बातों को ठीक मानने का अर्थ तो यही होता है कि दूसरे सब झूठे हैं- गलत हैं। इस प्रकार का अहंकार अज्ञान का द्योतक है। इस असहिष्णुता से घृणा और विरोध बढ़ता है। सत्य की प्राप्ति नहीं होती। सत्य की प्राप्ति तभी संभव है, जब हम अपनी भूलों, त्रुटियों और कमियों को निष्पक्ष भाव से देखें। हमें अपने विश्वासों का निरीक्षण और परीक्षण भी करना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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गुरुवार, 7 मार्च 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 March 2024

🔸 आज का युग "खूब कमाओ, आवश्यकताएँ बढाओं, मजा उडाओं" की भ्रान्त धारणा में लगा है और सुख कोक दु:खमय स्थानों में ढूँढ़ रहा है। उसकी सम्पत्ति बढी है, अमेरिका जैसे देशों में अनन्त सम्पत्ति भरी पडी है। धन में सुख नहीं है, अतृप्ति है, मृगतृष्णा है। संसार में शक्ति की कमी नहीं, आराम और विलासिता की नाना वस्तुएँ बन चुकी हैं, किन्तु इसमें तनिक भी शान्ति या तृप्ति नहीं।  
 
🔹   जब तब कोई मनुष्य या राष्ट्र ईश्वर में विश्वास नहीं रखता, तब तक उसे कोई स्थायी विचार का आधार नहीं मिलता। अध्यात्म हमें एक दृढ़ आधार प्रदान करता है। अध्यात्मवादी जिस कार्य को हाथ में लेता है वह दैवी शक्ति से स्वयं ही पूर्ण होता है। भौतिकवादी सांसारिक उद्योगों मे कार्य पूर्ण करना चाहता है, लेकिन ये कार्य पूरे होकर भी शान्ति नहीं देते।
 
🔸  दूसरों के अनुशासन की अपेक्षा आत्मानुशासन का विशेष महत्त्व है। हमारी आत्म-ध्वनि हमें सत्य के मार्ग की ओर प्रेरित कर सकती है। सत्य मार्ग से ही पृथ्वी स्थिर है, सत्य से ही रवि तप रहा है और सत्य से ही वायु बह रहा है। सत्य से ही सब स्थिर है। सत्य का ग्रहण और पाप का परित्याग करने को हमें सदैव प्रस्तुत रहना चाहिए।

🔹   आस्तिकता हमें ईश्वर पर श्रद्धा सिखाती है। हमें चाहिए कि ईश्वर को चार हाथ-पाँव वाला प्राणी न समझें। ईश्वर एक तत्त्व है, उसी प्रकार जैसे वायु एक तत्त्व है। वैज्ञानिको ने वायु के अनेक उपभाग किये हैं- आँंक्सीजन, नाइट्रोजन, इत्यादि। इसके हर एक भाग को भी स्थूल रुप से वायु ही कहेंगे। इसी प्रकार एक तत्त्व, जो सर्वत्र ओत-प्रोत है जो सब के भीतर है तथा जिसके भीतर सब कुछ है, वह परमेश्वर है। यह तत्त्व सर्वत्र है, सर्वत्र व्याप्त है । परमेश्वर हमारे ऋषि-मुनियों की सबसे बडी़ खोज है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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बुधवार, 6 मार्च 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 March 2024

🔹 यह सांसारिक जीवन सत्य नहीं है। सत्य तो परमात्मा है, हमारे अन्दर बैठी हुई साक्षात ईश्वर स्वरुप आत्मा है, वास्तविक उन्नति तो आत्मिक उन्नति है। इसी उन्नति की ओर हमारी प्रवृत्ति बढे़, इसी में हमारा सुख-दु:ख हो। यही हमारा लक्ष्य रहा है। अपने हास के इतिहास में भी भारत ने अपनी संस्कृति, अपने धर्म, अपने ऊँचे आदर्शों को प्रथम स्थान दिया है।  
 
🔸  मनुष्य अच्छी तरह जानता है कि असत्य अच्छा नहीं फिर भी वह उसी में आसक्त रहता है। वह अपने दुर्गुणों को नहीं छोड़ सकता। वह अपने दुर्गुणों को नष्ट करने के लिए प्रयत्नशील नहीं होता। इसका कारण क्या है? अविद्या रहस्यमयी है। बुरे संस्कारों के कार्य रहस्यमय है। सत्संग तथा गुरुसेवा के द्वारा इस मोह को नष्ट किया जा सकता है।
 
🔹 सभ्यता का आचरण वह प्रणाली है जिससे मनुष्य अपने कर्तव्य का पालन करता है। कर्तव्यपालन करने का तात्पर्य है नीति का पालन करने का अर्थ है अपने मन और इन्द्रियों को वश में रखना। ऐसा करने से हम अपने आपको पहिचानते हैं। यही सभ्यता है और इससे विरुद्ध आचरण करना असभ्यता है।

🔸  हम भले ही अपने दुष्कर्मों को भूल जायें, पर "कर्म" छोटे से छोटे और बुरे से बुरे किसी भी कार्य को नहीं भूलता और समय पर उसका अवश्य भोगवाता है। इसलिए यदि इस तथ्य को हम समझकर ग्रहण करें तो अनेक बुरे कार्य हम से आप छूट जायेंगे और इस प्रकार जीवन बहुत सुधर जायेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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मंगलवार, 5 मार्च 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 March 2024

🔸  जमनुष्य अपने अभद्र विचारों से सरलता से मुक्त नहीं होता। इसके लिए भी त्याग की आवश्यकता होती है। जो व्यक्ति जितना ही अधिक त्याग करता है वह अपने विचारों का उतना ही अधिक सृजनात्मक बना लेता है। जीवन के सभी संकल्पों और इच्छाओं का त्याग कर देना मनुष्य को देवी शक्ति प्रदान करता है। परोपकार के निमित्त लाये गए विचारों में जो बल होता है वह स्वार्थ युक्त विचारों में नहीं रहता।
 
🔹  साधना उपासना के क्रिया-कृत्य में यही रहस्यमय संकेत सन्निहित है कि हम अपने व्यक्तित्व को किस प्रकार समुन्नत करें और जो प्रसुप्त पडा है उसे जागृत करने के लिए क्या कदम उठायें। सच्चा साधना वही है। जिसमें देवता की मनुहार करने के माध्यम से आत्म-निर्माण की दूरगामी योजना तैयार की जाती और सुव्यवस्था बनाई जाती है।
 
🔸  सच्चे ईश्वरानुभूति वाले पुरुष और अपने स्वार्थ के लिए कार्य करने वाले पुरुषों में मुख्य अन्तर यही है कि ईश्वर पुरुष बिना कुछ कहे दूसरों की सहायता करता रहता है और दिखावटी धर्मात्मा बनने वाले दूसरों के कल्याण और उपकार का ढोंग करते हैं, पर उनका उद्देश्य सदैव अपना ही स्वार्थ-साधन रहता है। इसी कसौटी से इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों की परीक्षा सहज में की जा सकती है।

🔹  संसार में जितने भी चमत्कारी देवता जाने माने गये हैं, उन सबसे बढ़कर आत्म-देव है। उसकी साधना प्रत्यक्ष है। नकद धर्म की तरह उसकी उपासना कभी भी-किसी की भी निष्फल नहीं जाती। यदि उद्देश्य समझते हुए सही दृष्टिकोण अपनाया जा सके तो जीवन साधना को अमृत, पारस कल्पवृक्ष की कामधेनु की सार्थक उपमा दी जा सकती।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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सोमवार, 4 मार्च 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 4 March 2024

🔹 सब कर्मों से निवृत होकर जब निद्रा देवी की गोद में जाने की घडी आये, तब कल्पना करनी चाहिए कि एक सुन्दर नाटक का अब पटाक्षेप हो चला। यह संसार एक नाट्यशाला है। आज का दिन अपने को अभिनय करने के लिए मिला था, सो उसको अच्छी तरह खेलने का ईमानदारी से प्रयत्न किया। जो भूलें रह गई उन्हें याद रखने और अगले दिन उसकी पुनरावृत्ति न होने देने की अधिक सावधानी बरतेंगे।
 
🔸  श्रद्धा वह प्रकाश है जो आत्मा की, सत्य की प्रति के लिए बनाये गए मार्ग को दिखाता रहत है। जब भी मनुष्य एक क्षण के लिए लौकिक चमक-दमक, कामिनी और कंचन के लिए मोहग्रस्त होता है तो माता की ठण्डे जल से मुँह धोकर जगा देने वाली शक्ति यह श्रद्धा ही होती है। सत्य के सद्गुण, ऐश्वर्यस्वरुप एवं ज्ञान की थाह अपनी बुद्धि से नहीं मिलती उसके प्रति सविनय प्रेम भावना विकसित होती है, उसी को श्रद्धा कहते हैं। श्रद्धा सत्य की सीमा तक साधक को साधे रहती है, संभाले रहती है।
 
🔹  जीवन को किसी निर्दिष्ट ढाँचे में ढाल देने वाली, सबसे प्रबल एवं उच्चस्तरीय शक्ति श्रद्धा है। यह अन्त:करण की दिव्यभूमि में उत्पन्न होकर समस्त जीवन को हरियाली से सजा देती है। श्रद्धा का अर्थ है श्रेष्ठता के प्रति अटूट आस्था। वह आस्था जब सिद्धान्त एवं व्यवहार में उतरती है तो उसे निष्ठा कहते हैं। यही जब आत्मा के स्वरुप, जीवन दर्शन एवं ईश्वर भक्ति के क्षेत्र में प्रवेश करती है तो श्रद्धा कहलाती है।

🔸   जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए सबसे प्रथम अनिवार्य रुप से आत्म-निरीक्षण और आत्म सुधार ही करना पड़ता है । भगवान का नाम स्मरण करने, जप-तप, पूजा-पाठ के अनुष्ठान करने का उद्देश्य यही है कि मनुष्य भगवान को सर्वव्यापी एवं न्यायकारी होने की मान्यता को अधिक गहराई तक हृदय में जमा ले ताकि दुष्कर्मों से डरे और सत्कर्मों में रुचि ले।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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रविवार, 3 मार्च 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 3 March 2024

🔸  शिखा रखते समय हर व्यक्ति को इसके मूल प्रयोजन का ध्यान रखना चाहिए। मस्तिष्क में उन्हीं विचारणाओं, मान्यताओं और आकांक्षाओं को स्थान मिले, जो विवेकशीलता, नैतिकता, मानवता, सामाजिकता की कसौटी पर खरे उतरते हों। दुर्बुद्धि, दुर्भावना और दुष्टता की जो दुष्प्रवृत्तियाँ चारों ओर फैली हैं, उनका उन्मूलन करने के  लिए हमें शिखा रूपी धर्मध्वजा फहराते हुए एक ऐसा भावनात्मक महाभारत खड़ा करना चाहिए, जिसमें अनौचित्य की कौरवी सेना को परास्त कर औचित्य- अर्जुन के गले में विजय बैजयन्ती पहनाई जा सके।

🔹  विचारों की शक्ति और उपयोगिता समझ सकने वाले लोग इस विशाल भीड़ से तलाश किए जाएं। जो स्वयं प्रकाश पूर्ण,बौद्घिक प्रखरता के सुनने- समझने के लिए तैयार नहीं, वे भला और किसी को क्या कुछ कह- सुन सकेंगे और क्या अपने जीवन में प्रखरता ला सकेंगे।

🔸   हे भगवान् ! यह शरीर तेरा मन्दिर, है अतः इसे मैं हमेशा पवित्र रखूँगा। आपने मुझे यह हृदय दिया है, मैं इसे प्रेम से भर दूँगा, आपने मुझे यह बुद्धि दी है, मैं इस दीपक को हमेशा निर्मल और तेजस्वी बनाये रखूँगा। 
 
🔹   गुरु- शिष्य संबंध बड़ा कोमल, किन्तु कल्याणकारी होता है। गुरु शिष्य को पुत्रवत् समझकर, उसे टेढे- मेढ़े मार्गों से निकाल ले जाते हैं, जिन्हें शिष्य के लिए समझ पाना कठिन होता है। इसलिए कई बार शिष्य अभिमान में आकर, गुरु की अवज्ञा कर जाता है, इच्छा तथा आदेश की अवहेलना करता है। यद्यपि गुरु उसे कुछ भी न कहें, किन्तु फिर भी वह संभावित लाभ से वंचित रह जाता है। इसके लिए शिष्य में गुरु के प्रति सम्पूर्ण समर्पण की आवश्यकता होती है।

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शनिवार, 2 मार्च 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 March 2024

🔹  गुरु- शिष्य संबंध बड़ा कोमल, किन्तु कल्याणकारी होता है। गुरु शिष्य को पुत्रवत् समझकर, उसे टेढ़े- मेढ़े मागों से निकाल ले जाते हैं, जिन्हें शिष्य के लिए समझ पाना कठिन होता है ।। इसलिए कई बार शिष्य अभिमान में आकर गुरु की अवज्ञा कर जाता है, इच्छा तथा आदेश की अवहेलना करता है। यद्यपि गुरु उसे कुछ भी न कहें, किन्तु फिर भी वह संभावित लाभ से वंचित रह जाता है। इसके लिए शिष्य में गुरु के प्रति सम्पूर्ण समर्पण की आवश्यकता है।

🔸   कुविचारों और दुःस्वभावों से पीछा छुड़ाने का तरीका यह है कि सद्विचारों के सम्पर्क में निरन्तर रहा जाये उनका स्वाध्याय, सत्संग और चिंतन- मनन किया जाये। साथ ही अपने सम्पर्क क्षेत्र में सुधार कार्य जारी रखा जाये। सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन का सेवा कार्य किसी न किसी रूप में कार्यान्वित करते रहा जाये। इतना करने पर ही मन को स्वच्छ, निर्मल व स्वयं को प्रगति के पथ पर अग्रगामी बनाए रखा जा सकता है।

🔹  योग का उद्देश्य ‘‘चित्त वृत्तियों’’ का संशोधन है ।। पशु- प्रवृतियों को देव आस्थाओं में बदल देने वाल मानसिक उपचार का नाम योग है। योगीजन अपने संगृहीत कुसंस्कारों को उच्चस्तरीय आस्थाओं में परिणत करने के लिए भावनात्मक पुरूषार्थ करते रहते हैं और इन्हीं प्रयत्नों में तल्लीन रहते हैं। जिससे वे उतने ही अंशों में आत्मा को परमात्मा से जोड़ लेता है।
 
🔸   वातावरण मानवी चिंतन, विचारणा एवं गतिविधि के समन्वय से उत्पन्न होता है। जैसी भी पीढ़ियां बनानी हो ,जैसा भी समाज का ढ़ाँंचा खड़ा करना हो, उसके अनुरूप ही वातावरण बनाना होगा। जब जब भी महामानवों की पीढ़ियां जन्मी हैं, ऐसे सूक्ष्म घटकों के आधार पर ही विकसित हुई है।माहौल को विनिर्मित करने ,वातावरण को बदलने जिसमें श्रेष्ठ मानवों की ढलाई होती चले। आज उज्ज्वलमान व्यक्तियों की आवश्यकता है।

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शुक्रवार, 1 मार्च 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 1 March 2024

🔸  उत्तम साधक वही है जो दरिद्रता के साथ रहने को कहा जाय तो दरिद्रता के साथ रहे, किसी भी अभाव की वेदना उसे न हो और उसकी दैवी स्थिति के पूर्ण आन्तरिक आनन्द की क्रीड़ा में उससे कुछ भी बाधा न पड़े और वही फिर, वैभव के साथ रहने को कहा जाय तो वैभव के साथ रहे और अपने धन की आसक्ति या वासना में एक क्षण के लिये भी पतित न हो, या उन चीजों से भी आसक्त न हो जिनका वह उपयोग करता है, या उस भोग की दासता में न हो या धन की अधिकारिता द्वारा निर्मित अभ्यासों से दुर्बल की तरह आसक्त न हो।
 
🔹  पवित्र और ईमानदार मनुष्य, अपने आप जिसको न्याय मान लिया, उसके लिये, हमेशा अपने भोग देने को तैयार रहता है। क्या तुम तैयार हो? अपना आराम, अपना आनन्द, अपना व्यापार, अपना जीवन तक, न्याय प्राप्त करने को दे देने के लिये तुम तैयार हो? जो ऐसे हो तो तुम सत्याग्रही हो और तुम जीतोगे ही।
 
🔸  सत्संग मनुष्यों का हो सकता है और पुस्तकों का भी। श्रेष्ठ मनुष्यों के साथ उठना-बैठना, बातचीत करना आदि और उत्तम पुस्तकों का अध्ययन सत्संग कहलाता है। मनुष्यों के सत्संग से भी संभव है। अन्तर इतना है कि संतजनो के सत्संग का प्रभाव सजीवता के कारण शीघ्र पड़ता है।

🔹  इस संसार मे उन्नति करने उत्थान के जितने भी साधन है " सत्संग उन सब में अधिक फलदायक और सुविधाजनक है। सत्संग का जितना गुण-गान किया जाय थोडा है। पारुस लोहे को सोना बना देता है। रामचन्द्र  जी के सत्संग से रीछ वानर भी पवित्र हो गये थे। कृष्ण जी के संग रहने से गाँव के गँवार समझे जाने वाले गोप-गोपियाँ भक्त शिरोमणि बन गये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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गुरुवार, 29 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 29 Feb 2024

🔹  मन और अन्त:करण की एकता में, दोनों के मिलन में ही सुख है। इसी को योगिक शब्दावली में आत्मा और परमात्मा का मिलन कह सकते हैं। इस मिलन का ही दूसरा नाम "योग' है। आत्मा और परमात्मा के मिलन से दोनों के योग से एक ऐसे आनन्द का अविर्भाव होता है, जिसकी तुलना संसार के अन्य किसी भी सुख से नहीं की जा सकती। इसी सुख को परमानन्द, जीवनमुक्ति, ब्रह्म-निर्वाह, आत्मोपलब्धि, प्रभु-दर्शन आदि नामों से पुकारा जाता है।
 
🔸  प्रेम ही सम्पूर्ण सुखों का आधार है। आज प्रत्येक व्यक्ति सुखी जीवन के लिए तरह-तरह के साधन जुटाता है सुख के लिये हरचन्द प्रयत्न भी करता है किन्तु फिर भी अधिकांश लिग दु:खी एवं क्लान्त दिखाई देते हैं। इसका एकमात्र कारण है वे प्रेम को छोड़कर अन्यत्र सुख की खोज करते हैं जो बालू में तेल निकालने जैसा प्रयत्न है। सुख भोगने के लिए प्रेम को जीवन में उतारना होगा । इसी की साधना करनी होगी।
 
🔹   दूसरों की बुराइयाँ ढूंढ़ने में हमारी दृष्टि अलग तरीके से और अपनी बात आने पर और तरीके से काम करती है। यदि यह दोष हटा दिया जाय और दूसरों की भाँति अपनी बुराई भी देखने लग जायें, दूसरों को सुधारने की चिन्ता करने की भाँति यदि अपने को सुधारने की भी चिन्ता करने लगें तो इतना बडा काम हो सकता है जितना सारी दुनियाँ को सुधार लेने पर ही हो सकना संभव है।

🔸  चरित्र ही जीवन की आधार शिला है। मनुष्य संसार में जो कुछ सफलता, सौभाग्य, सुख प्राप्त करता है उसके मूल में उसके चरित्र की उच्चता ही रहती है। निर्बल चरित्र वाले अथवा चरित्रहीन व्यक्ति का जीवन निस्सार और महत्त्वशून्य है। चाहे वह सांसारिक दृष्टि से थोडा या अधिक धन प्राप्त करके आराम का जीवन व्यतीत करता हो पर अन्य लोगों की दृष्टि से वह कभी प्रतिष्ठा या सम्मान का पात्र नहीं हो सकता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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बुधवार, 28 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 28 Feb 2024

🔸परिवार बसा लेना आसान है, लोग आये दिन बसाते ही रहते हैं, उसका पालन भी कोई विशेष कठिन नहीं। सभी उसका पालन करते हैं, किन्तु परिवार को समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए उसका निर्माण करना एक श्रम साध्य कर्त्तव्य है। अधिकतर लोग परिजनों के लिए अधिकाधिक सुख-सुविधाएँ देने, उनके लिए अच्छा भोजन, वस्त्र तथा आराम की चीजें जुटाना ही पारिवारिक जीवन का उद्देश्य मान बैठे हैं। वे यह कभी नहीं सोच पाते कि भोजन, वस्त्र तथा शिक्षा, स्वास्थ्य के साथ परिवार की एक सर्वोपरि आवश्यकता भी है और वह है उसे सद्गुणी बनाना।

🔹  आपके पास एक ऐसी प्रेम की रस्सी होनी चाहिए, आपके पास ऐसी मिठास की रस्सी होनी चाहिए, आपके पास अपने व्यक्तिगत जीवन का उदाहरण पेश करने की ऐसी रस्सी होनी चाहिए, जिससे प्रभावित करके आप आदमी के हाथ जकड़ सकें, पैर जकड़ सकें, काम जकड़ सकें। सारे के सारे को जकड़ करके जिंदगी भर अपने साथ बनाए रख सकें।

🔸 अपने उद्धार के लिए नारी को स्वयं भी जागरूक होना पड़ेगा। अपने आपको आत्मा, वह आत्मा जो पुरुषों में भी है समझना होगा। मातृत्व के महान् पद की प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित रखने के लिए उसे सीता, गौरी, मदालसा, देवी, दुर्गा, काली की सी शक्ति, क्षमता और कर्त्तव्य का उत्तरदायित्व ग्रहरण करना होगा। कामिनी, विलास की सामग्री  न बनकर अपने आपको आदर्श, पूजनीय गुणों का आधार बनाना होगा, तभी वह गिरी हुई अवस्था से उठ सकती है।

🔹   नारी का उत्तरदायित्व बहुत बड़ा है। पुरुष से भी अधिक कह दिया जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। वह गृहिणी है, नियत्री है, अन्नपूर्णा है। नारी में ममतामयी माँ का अस्तित्व निहित है, तो नारी पुरुष की प्रगति, विकास की प्रेरणा स्रोत जाह्नवी है। नारी अनेकों परिवारों का संगम स्थल है। नारी मनुष्य की आदि गुरु है, निर्मात्री है, इसमें कोई संदेह नहीं कि मानव समाज में नारी का बहुत बड़ा स्थान है और नारी की उन्नत अथवा पतित स्थिति पर ही समाज का भी उत्थान-पतन निर्भर करता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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मंगलवार, 27 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 Feb 2024

🔸 साधु-ब्राह्मणों का यह एक परम पवित्र कर्त्तव्य है कि इस समय जिस धर्म के आश्रय में वे अपनी आजीविका चलाते हैं और पूजा-सम्मान प्राप्त करते हैं उस धर्म रक्षा के लिए उन्हें कुछ काम भी करना चाहिए-कष्ट भी उठाना चाहिए। आज जबकि धर्म संकट में है, देश की सुरक्षा एवं प्रगति का प्रश्र है तब तो उन्हें उन आदर्शों को परिपुष्ट करने के लिए अपना समय लगाना ही चाहिए। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी दक्षिणा बटोरने और पैर पुजाने का ही धंधा करते रहे, कर्त्तव्य की तिलांजलि दिये बैठे रहे तो आगामी पीढ़ियँ उन्हें क्षमा न करेंगी।   

🔹 आज दहेज का असुर भाषण-लेखों और प्रस्तावों की मार खाकर भी दहेज का असुर मरता नहीं। रक्तबीज की तरह वह चोट खाकर और भी अधिक विकराल बनता चला जा रहा है। इसका अंत ऐसे होगा कि युग निर्माण योजना के सदस्य बच्चे यह प्रतिज्ञा करेंगे कि वे विचारशील साथी से ही विवह करेंगे। दहेज और विवाहोन्माद में होने वाले भारी अपव्यय को हटाकर बिना खर्च की विधि से विवाह करेंगे। यदि अभिभावक इस निश्चय को मान्यता न देंगे तो वे आजीवन कुमार या कुमारी ही रहकर पवित्र जीवन व्यतीत करेंगे। 

🔸 आज भड़कीला शृंगार फैशन कहा जाता है और उसे कला, सुरुचि एवं सभ्यता का चिह्न कहकर पुकारा जाता है। कहा और माना जो कुछ भी जाय वास्तविकता ज्यों की त्यों रहेगी। हमारे उठती उम्र के बच्चे और बच्ची इस पतन पथ पर कदम न बढ़ाएँ इसका ख्याल रखा जाना चाहिए। उत्तेजक शृंगार की जड़ में वासना का विकार स्पष्ट है इससे देखने वालों के मन में विक्षोभ उत्पन्न होता है। इसलिए हम सफाई से रहें, स्वच्छता पसंद करें, सादगी से रहें और सभ्य वेशभूषा धारण करें। 

🔹 मातृत्व पर-नारीत्व पर सर्वाधिक लानत फेंकने का काम दहेज के राक्षस ने किया है। इसे समझा भी गया तथा उसके निवारण के प्रयास भी बहुत हुए,सामाजिक भर्त्सनाएँ की गई, कानून भी बना। दहेज के प्रतिरोध में सैकड़ों विचारशील व्यक्तियों ने लिखा, भाषण किया, पर पुरानी पीढ़ी अपने स्थान से तिल भर हटने की तैयारी नहीं। दहेज के दानव ने हर किसी का अहित किया है, पर अपनी बाजी से कोई नहीं चूकता। जब कोई साहसपूर्वक प्रतिरोध, संघर्ष एवं आदर्श उपस्थित करने को तैयार होगा, तभी कुछ समस्या हल होगी। यह आशा अब नये रक्त से हीस शेष है। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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सोमवार, 26 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 26 Feb 2024

🔹 चाहे व्यक्तिगत समृद्धि की बात हो, चाहे समूहगत सम्पन्नता का विषय हो, उपाय एक ही है, लोगों का वर्तमान दृष्टिकोण बदला जाय। मन को प्रफु ल्लित करने के लिए इस सृष्टि में इतना विस्तृत आधार मौजूद है कि हर घड़ी हर्षाेल्लास भरी अनुभूति का आस्वादन करते हुए प्रमुदित- पुलकित रहा जा सके। मन को सुविकसित- संस्कारित बनाने के लिए परिवार में अच्छे विचारण न मिलें, तो भूखी आत्मा वाले ऊँची बात सोच न सकते।

🔸 हमारा व्यक्तित्त्व और राष्ट्रीय भविष्य इस बात पर निर्भर है कि भावी पीढ़ियाँ सुसंस्कृत हों। स्कूली शिक्षा से आजीविका उपार्जन करने तथा विविध क्षेत्रों की साधारण जानकारी मिलने की बात पूरी हो सकती है, पर वे सद्गुण जो मानव की प्रधान सम्पत्ति है और जिनके ऊपर व्यक्ति तथा राष्ट्र की श्रेष्ठता निर्भर करती है, स्कूलों में नहीं सीखे जा सकते, उनके शिक्षण का सही स्थान है- घर का वातावरण और उसका निर्माण करती है गृहिणी।

🔹 शिक्षा का उद्देश्य नौकरी करना और पैसा कमाना ही नहीं, सर्वतोन्मुखी प्रगति के लिए बौद्घिक आधार तैयार करना होता है। शिक्षित नारी अपने बच्चों की व्यवस्था, गृह सज्जा तथा पति की सच्ची सहायिका के रूप में कहीं अधिक सुरुचिपूर्ण ढंग से भाग ले सकती है।

🔸 न केवल घर में, अपितु घर के बाहर भी स्त्रियाँ समाज निर्माण में डाँक्टर, नर्स, इंजीनियर, शिक्षिका आदि अनेकों रूपों में सामाजिक प्रगति में सहयोग दे सकती है। महिला डाक्टर अधिक सेवा तथा कर्तव्य की भावना से प्रेरित होकर कार्य करें, तो समाज का अधिक विकास होगा। शिक्षिका के रूप में नारी अपनी सादगी, सज्जनता, सहनशीलता, सत्यनिष्ठा, सद्व्यवहार आदि से छात्रों को उत्कृष्ठता की ओर चरित्र निर्माण की ओर सतत रूप से बढने की प्रेरणा दे सकती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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रविवार, 25 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 Feb 2024

👉अपने माता-पिता गुरुजनों आदि के साथ मीठी भाषा बोलें, सभ्यता पूर्ण व्यवहार करें।

प्रायः लोग अपने आपको बहुत पठित एवं सभ्य व्यक्ति मानते हैं। परंतु जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती जाती है, उनमें सामर्थ्य बुद्धि बल विद्या शक्ति सत्ता अधिकार बढ़ता जाता है, वैसे वैसे यह देखने को मिलता है, कि उनमें इन सब चीजो का अभिमान भी बढ़ता जाता है। और बढ़ते बढ़ते यह अभिमान इतना बढ़ जाता है कि लोग सभ्यता से बोलना ही भूल जाते हैं। वे यह भी भूल जाते हैं कि हमारी इस संपूर्ण उन्नति का मुख्य आधार, हमारे माता पिता और गुरुजन हैं।

यह कोई सभ्यता नहीं है। जिन माता पिता आदि बड़े बुजुर्गों ने इतना तप करके आपको योग्य बनाया, सभी क्षेत्रों में आप की उन्नति करवाई, जिन के आर्थिक सामाजिक मार्गदर्शन विद्या आदि आदि सब प्रकार के सहयोग से आपने इतनी उन्नति की; कम से कम उनका उपकार भूलना नहीं चाहिए। उनके साथ असभ्यता से बात नहीं करनी चाहिए, सम्मान पूर्वक ही बोलना चाहिए।

हो सकता है माता पिता की आयु बड़ी हो जाने पर अर्थात वृद्धावस्था आ जाने पर कभी कभी उनकी कुछ बातें आपको पसंद न भी आएं। तब भी उनके साथ असभ्यता तो नहीं करनी चाहिए। क्योंकि यही घटना कल आपके साथ भी होने वाली है। आपके बच्चे भी आपको रोज देखते हैं, और आपसे ही सीखते हैं। जो व्यवहार आप अपने माता-पिता के साथ आज कर रहे हैं, कुछ समय बाद यही व्यवहार आपके बच्चे आपके साथ करेंगे। यह सोचकर ही अपने माता-पिता के साथ सभ्यतापूर्ण उत्तम व्यवहार करें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( भाग 2)

पुण्य परमार्थ की इस आवश्यकता को प्रायः सज्जन व्यक्ति अनुभव करते हैं। किन्तु उसको कार्यान्वित करने में प्रमाद बरतते हैं। इस प्रमाद का व्यवहार...