शुक्रवार, 8 मई 2026

👉 आत्मनिरीक्षण का स्वभाव बनाइए (भाग 2)

आत्म निरीक्षण के पथ पर चलते हुए मनुष्य को अपने जीवन एवं तत्सम्बन्धित विषयों को सूक्ष्म दृष्टि से देखते रहना चाहिए और उनका सुधार करना चाहिए। जिस प्रकार मुनीम अपनी रोकड़ को बड़े ध्यान से मिलाता है और एक पैसे की भूल हो जाने पर उसको निकाल कर ही पीछा छोड़ता है, उसी प्रकार हमें भी अपने दोषों का पूरा-पूरा निरीक्षण करके उन्हें दुरुस्त करना चाहिए। यही आत्म निरीक्षण रूपी छननी है जिसमें चरित्र व्यवहार, स्वभाव आदि की सारी अशुद्धियाँ बुराइयां दूर हों जाती हैं।

इसके लिए मनुष्य को दोषज्ञ बनना चाहिए। इसका तात्पर्य यह नहीं पर दोष दर्शन की वृत्ति अपनाई जाय वरन् स्व छिद्रान्वेषण की आदत डाली जाय। दोषज्ञ का अर्थ है अपने दोषों का जानकार होना। लेकिन स्वदोष दर्शन और उन्हें दूर करने के पथ पर बहुत ही कम व्यक्ति बढ़ पाते हैं। कई तो अपने आप के स्तर एवं दोषों को जानते भी नहीं।

स्वदोष दर्शन परक बुद्धि आत्म निरीक्षण की क्षमता प्राप्त करने में सर्वप्रथम अपने दोषों को लोक शास्त्र के आधार पर देखना चाहिए अधिकतर लोग मनुष्य के सम्मुख, उसकी बुराइयों तथा दोषों का बखान नहीं करते इसलिए लोक व्यापी आधार पर उन्हें पहचानना चाहिए जब लोक में किसी भी बात पर दोष मिलता हो, अपनी असफलता, हानि के कारण दूसरे लोग जान पड़े, दुख कठिनाई अपने पर विधाता को दोष दिया जाए, ऐसे समय अपने अंतर को ढूँढ़ना चाहिए। 

अपनी आन्तरिक स्थिति को टटोल कर देखने पर पता चलता है कि इन सबका कारण हमारे स्वयं के अन्तर में ही मौजूद है। ऐसी परिस्थितियों में सूक्ष्म अन्तः निरीक्षण करने पर पता चलता है कि मनुष्य की मानसिक कमजोरी के कारण ही वह अपनी हानि दोष का कारण दूसरों को बताता है। अपनी परिश्रम हीनता एवं आलस्यवश ही असफलतायें मिलती हैं। लोक व्यवहार की कुशलता मिलनसारी के अभाव में ही सामाजिक अवहेलना, तिरस्कार सहना पड़ता है। सहनशीलता के अभाव में संसार कठोर जान पड़ता है। इस प्रकार बहुत कुछ बाहर दीखने वाली बुराइयां कमजोरियाँ अपने अन्तर में ही छिपी रहती हैं। ढूंढ़ने पर उन्हें पहचाना जा सकता है। अपने अन्तर को टटोलते हुए ठीक ही कहा है-
बुरा जो ढूँढन मैं चला मुझसा बुरा न कोय-
इस प्रकार अपने अंतर को खोजने पर अपनी कमजोरियाँ स्पष्ट दिखाई देंगी।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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👉 अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित कीजिए। (अंतिम भाग)

इस संसार का निमार्ण सत और तम शुद्ध और अशुद्ध, भले और बुरे तत्वों से मिल कर हुआ है। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं जो पूर्णतः बुरा या पूर्णतः भला हो। समय-समय पर यह भली-बुरी परिस्थितियाँ दबती और उभरती रहती हैं। धूप-छाँव की तरह प्रिय और अप्रिय अवसर आते जाते रहते हैं। इनमें से किसे स्मरण रखा जाय और किसे भुलाया जाय यही विचार करना बुद्धिमत्ता का चिन्ह है। यदि हम दुखों को, अभावों को, असफलताओं को, दूसरों के अपकारों को ही स्मरण किया करें तो यह जीवन नरकमय दुखों से भर जायगा। हर घड़ी खिन्नता, निराशा और असंतुष्टि चित्त में छाई रहेगी। पर यदि दृष्टिकोण बदल लिया जाय और प्रिय प्रसंगों, सफलताओं, प्राप्त साधन सम्पदा के लोगों और दूसरों के किये हुए उपकारों को स्मरण किया जाय तो प्रतीत होगा कि भले ही थोड़े अभाव आज हों पर उनकी तुलना में सुख दायक वातावरण ही अधिक है, दुर्भाग्य की अपेक्षा सौभाग्य की ही स्थिति अपने को अधिक उपलब्ध है।

जीवन को सुख शान्तिमय बनाने के लिए सुविधा सामग्रियों की आवश्यकता अनुभव की जाती है, सो ठीक है। इसके लिए भी प्रयत्न करना चाहिए। पर यह भी न भूल जाना चाहिए कि जो प्राप्त है उसका सदुपयोग किया जाय। उपलब्ध साधनों का सदुपयोग यदि हम सीख जायं, हर वस्तु का मितव्ययितापूर्वक उपयोग करें, उसका पूरा-पूरा लाभ लें तो जो कुछ प्राप्त है वही हमारे आनन्द को अनेकों गुना बढ़ा सकता है। अपनी धर्मपत्नी जैसी भी कुछ वह है यदि उसे अधिक शिक्षित, अधिक सुयोग्य बनाया जाय और उसके स्वभाव तथा गुणों का अपने कार्यक्रमों में ठीक प्रकार उपयोग किया जाय तो यही पत्नी जो आज व्यर्थ का बोझ जैसी मालूम पड़ती है- अत्यंत उपयोगी एवं लाभदायक प्रतीत होने लगेगी। जितनी आजीविका आज अपने को प्राप्त है यदि उसके खर्च को ही विवेक और मितव्ययितापूर्वक ऐसी योजना बनाई जाय कि प्रत्येक पैसे से अधिकाधिक लाभ उठाया जा सके तो यह आज की थोड़ी आजीविका भी आनंद और सुविधाओं में अनेक गुनी वृद्धि कर सकती है। इसके विपरीत यदि अपना दृष्टिकोण अस्त व्यस्त है तो बड़ी मात्रा में सुख−साधन उपलब्ध होते हुए भी वे कुछ लाभ न पहुँचा सकेंगे वरन् ‘जी के जंजाल’ बनकर परेशानियाँ और उलझनें ही उत्पन्न करेंगे।

सुखी जीवन की आकाँक्षा सभी को होती है। वह उचित और स्वाभाविक भी है पर उसकी उपलब्धि तभी संभव है जब हम अपने दृष्टिकोण की त्रुटियों को समझें और उन्हें सुधारने का प्रयत्न करें। सुधरा हुआ दृष्टिकोण की त्रुटियों को समझें और उन्हें सुधारने का प्रयत्न करें सुधरा हुआ दृष्टिकोण स्वल्प साधनों और कठिन परिस्थितियों में भी शान्ति और सन्तोष को कायम रख सकता है। गरीबी में भी लोग स्वर्ग का आनन्द उपलब्ध करते देखे जाते हैं। पर यदि दृष्टिकोण अनुपयुक्त है, तो संसार के समस्त सुख साधन उपलब्ध होते हुए भी हमें सुखी न बना सकेंगे। अतएव सुखी जीवन की आकाँक्षा करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उचित है कि अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करता रहे।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 08 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 08 May 2026


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‼️ यह सौभाग्य हर विवेकवान को मिल सकता है (भाग 1) ‼️

अखण्ड-ज्योति परिजनों ने लम्बे समय से जो पढ़ा और समझा है अब उसे मस्तिष्क की उथली परतों तक सीमित न रहने देकर अन्तराल की गहराई में उतरना चाहिए और भुलकर आगत के सम्बन्ध में नई नीति निर्धारण कर सकने योग्य विवेक एवं साहस जुटाना चाहिए।

समस्याएं जानी पहचानी हैं। समाधान भी प्रायः सभी विचारवानों को विदित हैं। फिर से उस सर्न्दभ में अधिक ध्यान देने के लिए इसलिए कहा जाता है कि तथ्यों पर जिस हलके ढंग से विचार किया जाता रहा है वह अपर्याप्त है। ढर्रे आवरण उठाकर हमें वास्तविक को देखना चाहिए। इसी को तत्वदर्शन या ईश्वर दर्शन कहतें हैं। इसी का नाम आत्म साक्षात्कार अथवा ब्रह्म निर्वाण है। ढर्रे का अभ्यास ही भव बन्धन है। माया अर्थात् आवास्तविकता की खुमारी। इसे हटाया और तथ्य को अपनाया जा सके तो समझना चाहिए कि जीवन मुक्ति के मार्ग का अवरोध मिट गया।

मनुष्य जीवन ईश्वर का बहुमूल्य अनुदान है। इसे इनाम नहीं अमानत माना जाय। भव-बन्धनों के कुचक्र से निवृति, पर्णता की प्राप्ति-र्स्वग और मुक्ति की उपलब्धि-सिद्धियों की विभूति आत्मा और परमात्मा की एकता है कि यर्थर्थता को हृदयंगम करना सम्भव हो सका या नहीं ?

पूज्य गुरुदेव के "दस सूत्रीय कार्यक्रम" क्या है ? अमृत सन्देश, https://youtu.be/osWWkn6frZ0?si=yGzD1yJe13boxQpo

कहने सुनने को तो आदर्शवादी बकवास आये दिन चलती रहती है, पर वस्तुतः उसमें कुछ सार नहीं। अध्यात्म का लाभ एवं चमत्कार मात्र उन्हीं को मिलता है जो उसे कल्पना लोक की उड़ान न मानकर जीवन-दर्शन के रुप में मान्यता देते और नदनुरुप दिशा धारा का निर्धारण करते हैं।

युग-सन्धि की ब्रह्म वेला में जागृत आत्माओं का आत्म-चिन्तन, जीवन-दर्शन की यथार्थत के साथ जुड़ सके तो काम चले। सोचा जाय कि अन्य प्राणीयों की तुलना में मनुष्य को जो ‘विशेष’ मिला है वह शौक-मौज भर के लिए है ? विचारा जाय कि चौरासी चक्र से छूटने के-पूर्णता तक पहुँचने के ईश्वर के साथ अनन्य होने के इस र्स्वण सुयोग को आगे भी इसी तरह नष्ट करते रहना उचित है जैसा कि अब तक किया जाता रहा ? लोग कहते और क्या करते हैं इसे देखने, सुनने और उन्हीं का अनुकरण करने से तो एक के पीछे एक एक करके गर्त में गिरने वानी भेड़ों की तरह अपनी भी दुर्गति ही होनी है। क्या इस दुर्भाग्य से बचा नहीं जा सकता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1980 अप्रैल

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👉 आत्मनिरीक्षण का स्वभाव बनाइए (भाग 2)

आत्म निरीक्षण के पथ पर चलते हुए मनुष्य को अपने जीवन एवं तत्सम्बन्धित विषयों को सूक्ष्म दृष्टि से देखते रहना चाहिए और उनका सुधार करना चाहिए। ...