गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए। (भाग 1)

मन का भाव दब कर मन की एक ग्रन्थि बन जाता है। जो व्यक्ति अनेक मानसिक व्याधियों से ग्रस्त हैं उसका कारण यह दबे हुए नाना प्रकार के कुँठित भाव ही हैं। बचपन की किस कटु अनुभूति के कारण ये दलित भाव दुःख और व्याधि के कारण बनते हैं और मनुष्य को परेशान किए रहते हैं।

क्रोधी, चिड़चिड़ी, बात बात में झगड़ने वाली कर्कशा नारी के बिगड़े हुए स्वभाव का कारण बचपन में उस पर नाना प्रकार के दमन हैं। कठोर व्यवहार भी विकसित होकर गुप्त भावना ग्रन्थि का रूप धारण कर लेता है। जो नारी या पुरुष बच्चों को घृणा करता है, उसका कारण यह है कि उसमें मातृत्व या पितृत्व के सहज स्वाभाविक भाव पनपने नहीं पाये हैं। अनेक पाश्चात्य अविवाहित नारियाँ पालतू कुत्तों तथा बिल्लियों को अपने पास रखती हैं, उनका प्रेम से चुम्बन करती हैं और अपने मातृत्व के सहज वात्सल्य का माधुर्य लूटती हैं। जो कोमल स्नेह नारी की प्राकृतिक सम्पदा है जिससे मानव शिशु पलता - पनपता है, वह कुत्ते बिल्लियों पर न्यौछावर कर के तृप्त किया जाता है। वात्सल्य और प्रेम की इन भावनाओं को निकालने से पाश्चात्य नारियाँ कृत्रिम मातृत्व के सुख का अनुभव करती हैं तथा मन में आह्लादित रहती हैं।

जिन पुरुषों तथा नारियों में इस प्रकार की अन्य अनेक इच्छाएँ कुँठित पड़ी हैं, वे समाज के भय से दलित होकर मन में कुण्ठा उत्पन्न कर सकती हैं। महत्वाकाँक्षा, प्रसिद्धि, महत्ता आदि न मिलने से मनुष्य चोर, डाकू या शैतान बन सकता है। नारियों की सेक्स भावना अतृप्त रहने से उनमें हिस्टीरिया, प्रमाद, चिड़चिड़ापन उत्पन्न हो सकते हैं। अतः मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रत्येक स्वस्थ स्त्री पुरुष का अवरुद्ध भावनाओं को निकालने के मार्ग ढूँढ़िये। ऐसी नारियाँ समाज सेवा में तन मन लगा कर अपने हृदय का भार हलका कर सकती हैं अथवा यतीम खाने के अनाथ बच्चों की देख रेख, प्यार, सेवा, पालन, पोषण, सेवा, सुश्रूषा कर मातृत्व की सहज वृत्ति की तृप्ति कर सकती हैं। उन्हें चाहिए कि वे गरीबों की बस्तियों की ओर निकल जाया करें। वहाँ के अर्द्धनग्न और भूखे बच्चों की देख रेख किया करें। उन्हें स्नान करायें और स्वच्छ वस्त्र धारण करायें, उनके साथ खेलें, गायें, बातचीत करें। इस प्रेम से गुप्त भावनाओं को निकालने का स्वस्थ मार्ग मिलता है जो मानसिक स्वास्थ्य और सुख के लिए अमृत तुल्य है। आपके मन की कोई भी भावना, यदि अतृप्त है तो मानसिक संस्थान में भावना ग्रन्थि (काम्लेक्त) उत्पन्न करेंगी और नाना मनोविकारों में प्रस्फुटित होंगी। वह हमारे गुप्त प्रदेश में बाहर निकलने और तृप्ति प्राप्त करने के अवसर देखा करती हैं। जो उसे निर्दयता से कुचल डालते हैं, वे मानसिक रोगों के शिकार बनते हैं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मार्च

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👉 निराशा से बचने का उपाय-कम कामनाएं (भाग 2)

साहस रहित मनुष्य का वैराग्य, असफलता जन्य विरक्ति और निराशा से उपजी हुई आत्म-ग्लानि बड़ी भयंकर होती है। इससे मनुष्य की अन्तरात्मा कुचल जाती है।

ऐसे असात्विक वैराग्य का मुख्य करण मनुष्य की मनोवाँछाओं की असफलता ही है जिसके कारण अपने से तथा संसार से घृणा हो जाती है। प्रतिक्रिया स्वरूप संसार भी उससे नफरत करने लगता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य की मनोदशा उस भयानक बिन्दु के पास तक पहुँच जाती है जहाँ पर वह त्रास से त्राण पाने के लिए आत्म-हत्या जैसे जघन्य पाप की ओर तक प्रवृत्त होने लगता है।

जो भी अधिक इच्छाएं रखेगा बहुत प्रकार की कामनाएँ करेगा उसका ऐसी स्थिति में पहुँच जाना स्वाभाविक ही है। किसी मनुष्य की सभी मनोकामनाएं सदा पूरी नहीं होती। वह हो भी नहीं सकतीं। मनुष्य की वांछाएं इतनी अधिक होती हैं कि यदि संसार के समस्त साधन लगा दिये जायें, तब भी वे पूरी न होंगी।

ऐसा नहीं है कि मनुष्यों की इच्छायें पूर्ण नहीं होती हों, किन्तु इच्छायें उसी मनुष्य की पूर्ण होती हैं जो उनको सीमित एवं नियंत्रित रखता है। जिसकी आकाँक्षायें अनियंत्रित हैं जिनका कोई ओर-छोर ही नहीं है उसकी कोई भी महत्वाकाँक्षा पूर्ण होने में सन्देह रहता है। बहुधा अनन्त आकाँक्षाओं वाले व्यक्ति को घोरतम निराशा का ही सामना करना पड़ता है।

इच्छाओं के ऐसे दुष्परिणाम देखकर ही भारतीय मनीषियों ने इच्छाओं को त्याज्य बतलाया है। उन्होंने अच्छी प्रकार इस सत्य को अनुभव कर लिया था कि जो इच्छाओं के प्रति त्याग भावना नहीं रखता उसकी इच्छायें धीरे-धीरे एक से दो और दो से चार होती हुई शीघ्र ही बढ़ती चली जाती हैं और फिर वे न तो नियंत्रण में आ पाती हैं न पूरी हो पाती हैं। फलस्वरूप मनुष्य को घोर निराशा की स्थिति में पहुँचा देती हैं। अतएव ऋषि मुनियों ने हृदय को पूर्ण रूप से निष्काम रखने का ही आदेश दिया है।

इस इच्छा त्याग का गलत अर्थ लगाकर लोग यह कह उठते हैं कि जिसमें कोई इच्छा नहीं होगी, वह कोई काम ही न करेगा और यदि एक दिन संसार का हर मनुष्य इच्छा रहित निष्काम हो जाये तो सृष्टि की सारी गति-विधि ही नष्ट हो जाये और यह चौपट हो जाये।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1966 मार्च

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👉 उत्तम जीवन व्यवहार ही हमारा धर्म है। (भाग 1)

वर्तमान समय में अपने को धार्मिक कहने वाले व्यक्ति प्रायः यह मत प्रकट किया करते हैं कि संसार में धर्म ही सर्वोपरि है, इसलिये जीवन से सम्बन्ध रखने वाले आर्थिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक आदि विषयों को गौण समझना चाहिये, और उनका निर्णय धर्म को प्रमुख स्थान देकर ही करना चाहिये। यह बात सुनने में तो बहुत अच्छी लगती है, पर कार्य रूप में इसका पालन संभव नहीं होता। क्योंकि धर्म राजनीति, विज्ञान आदि सभी मानव-प्रकृति के अंग हैं और उनका आधार “सत्य” पर है। जिस चीज का आधार सत्य के बजाय असत्य पर होगा, वह न तो कल्याणकारी हो सकती है और न स्थायी। इसलिये जो लोग अर्थ और राजनीति, विज्ञान आदि की उपेक्षा करके धर्म को ही प्रधानता देते हैं, वे प्रायः पाखंडी और ढोंगी हो जाते हैं, उनके कहने और करने में ऐक्य का भाव नहीं पाया जाता। वे मुँह से धर्म के लिये गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने पर भी जहाँ अपना स्वार्थ होता है वहाँ सर्वथा विपरीत मार्ग से चलते हैं और इस प्रकार संसार के अन्य लोगों को भी धर्म-विमुख करने में सहायक बनते हैं।

प्राचीनकाल में मनुष्य जीवन में इतना अधिक विरोध-भाव नहीं पाया जाता था। इसका खास कारण यह था कि उस समय विज्ञान की इतनी प्रगति नहीं हुई थी, और जो कुछ हुई थी वह साधारण जनता में वर्तमान समय की भाँति प्रचारित नहीं की गई थी। इसलिये धर्म और दर्शन के सिद्धान्तों के अनुसार ही राज्य और समाज के नियम भी निश्चित किये गये थे। इससे लोगों के व्यवहार और सिद्धान्तों में इतना परस्पर विरोधी-भाव उत्पन्न नहीं होता था। अब विज्ञान का विकास बहुत अधिक हो गया है और उसे सर्वसाधारण की शिक्षा का एक प्रमुख अंग बना दिया गया है, इससे परस्पर विरोधिता का भाव अकल्पित रूप से बढ़ गया है।

इससे भी अधिक विचारणीय दशा धर्म और राजनीति के सम्बन्ध में दिखलाई पड़ती है। इसका बहुत स्पष्ट उदाहरण देखना हो तो वर्तमान ईसाई राष्ट्रों पर निगाह डालना चाहिये। कहाँ तो ईसा का पूर्ण क्षमा-भाव रखने का उपदेश, और कहाँ आज कल के ईसाई कहलाने वाले शासकों की कूट नीति, हथियारों की प्रतिद्वंदिता और करोड़ों व्यक्तियों का संहार करने वाले महासमरों का आयोजन। ये ईसाई जिस प्रकार अपने व्यापारिक लाभ को अधिकाधिक बढ़ाने के लिये युद्ध-कला की दृष्टि से निर्बल राष्ट्रों का शोषण करते हैं और बराबरी वाले राष्ट्रों को युद्ध की भीषणता द्वारा नष्ट करने के उपाय करते हैं- ये दोनों बातें ईसा के उपदेशों के सर्वथा विपरीत हैं। पर ईसा के इन्हीं उपदेशों को बाईबल में प्रतिदिन पढ़ते और स्कूलों में सर्वत्र उनकी शिक्षा देते हुये ये लोग किस हृदय से लाखों करोड़ों लोगों के संहार की योजना बनाते रहते हैं, यह समझ में नहीं आता। एक ओर तो ये लोग गिरिजाघरों के लिये करोड़ों रुपए खर्च करते रहते हैं और बाईबल का संसार के कोने-काने में प्रचार करने का प्रयत्न कर रहे हैं, और दूसरी ओर वे ही लोग घातक से घातक अस्त्र तैयार करके अन्य देशों के बड़े-बड़े नगरों को दो चार मिनट के भीतर ही मटियामेट कर डालते हैं। इस प्रकार का कार्य एक बड़ा मिथ्याचार है और उसके फल से ईसाई सभ्यता का भवन ढहे बिना नहीं रह सकता।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 फरवरी

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 30 April 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 April 2026


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‼️ आत्मबोध चिन्तन—तत्वबोध मनन ‼️

“हर दिन नया जन्म, हर रात नयी मौत” की मान्यता लेकर जीवनक्रम बनाकर चला जाए तो वर्तमान स्तर से क्रमशः ऊँचे उठते चलना सरल पड़ेगा। मस्तिष्क और शरीर की हलचलें अन्तःकरण में जड़ जमाकर बैठने वाली आस्थाओं की प्रेरणा पर अवलंबित रहती हैं। आध्यात्मिक साधनाओं का उद्देश्य इस संस्थान को प्रभावित एवं परिष्कृत करना ही होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति में वह साधना बहुत ही उपयोगी सिद्ध होती है, जिसमें उठते ही नये जन्म की और सोते ही नई मृत्यु की मान्यता को जीवन्त बनाया जाता है।

प्रातः बिस्तर पर जब आँख खुलती है तो कुछ समय आलस को दूर करके शैया से नीचे उतरने में लग जाता है। प्रस्तुत उपासना के लिए यही सर्वोत्तम समय है। मुख से कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं पर यह मान्यता−चित्र मस्तिष्क में अधिकाधिक स्पष्टता के साथ जमाना चाहिए कि “आज का एक दिन एक पूरे जीवन की तरह है; इसका श्रेष्ठतम, सदुपयोग किया जाना चाहिए। समय का एक भी क्षण न तो व्यर्थ गँवाया जाना चाहिए और न अनर्थ कार्यों में लगाना चाहिए।” सोचा जाना चाहिए कि “ईश्वर ने अन्य किसी जीवधारी को वे सुविधाएँ नहीं दीं जो मनुष्य को प्राप्त हैं। यह पक्षपात या उपहार नहीं; वरन् विशुद्ध अमानत है। जिसे उत्कृष्ट आदर्शवादी रीति−नीति अपनाकर पूर्णता प्राप्त करने—स्वर्ग और मुक्ति का आनन्द इसी जन्म में लेने के लिए दिया गया है। यह प्रयोजन तभी पूरा होता है जब ईश्वर की इस सृष्टि को अधिक सुन्दर, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए उपलब्ध जीवन सम्पदा का उपयोग किया जाय। उपयोग के लिए यह सुर−दुर्लभ अवसर मिला है। यह योजनाबद्ध सदुपयोग करने में ईश्वर की प्रसन्नता और जीवन की सार्थकता है।”

मंत्र जाप की तरह इन शब्दों को दुहराने की जरूरत नहीं है वरन् अत्यंत गम्भीरतापूर्वक इस तथ्य को हृदयंगम किया जाना चाहिए। कल्पना चित्र सिनेमा फिल्म की तरह स्पष्ट उभरने चाहिएँ और उनके साथ इतनी गहरी आस्था का पुट देना चाहिए कि यह चिन्तन, वस्तु स्थिति बनकर मस्तिष्क को पूरी तरह आच्छादित कर ले।

अमृत सन्देश:- हर सुबह नया जन्म हर रात नई मौत : संध्या वंदन, https://youtu.be/sdkyVwe0pnk?si=GN0GZYPcYQlkHxv1

*शौच जाने की आवश्यकता अनुभव हो तो विलम्ब नहीं करना चाहिए और शय्या त्याग कर नित्य कर्म में लग जाना चाहिए। थोड़ी गुंजाइश हो तो उठने से लेकर सोने के समय तक की दिन−चर्या इसी समय बना लेनी चाहिए। यों नित्य कर्म करते हुए भी दिन भर का समय विभाजन कर लेना कुछ कठिन नहीं है। फुर्ती और चुस्ती से काम निपटाये जायं तो कम समय में अधिक काम हो सकता है। सुस्ती और उदासी में ही समय का तो भारी अपव्यय होता है, योजनाबद्ध दिन−चर्या बनाई जाय और उसका मुस्तैदी से पालन किया जाय तो ढेरों समय बच सकता है। एक काम के साथ दो काम हो सकते हैं। जैसे आजीविका उपार्जन के बीच खाली समय में स्वाध्याय तथा मित्रों में परामर्श हो सकता है। 
परिवार, व्यवस्था में मनोरंजन का पुट रह सकता है। निद्रा, नित्य कर्म, आजीविका उपार्जन, स्वाध्याय, उपासना, परिवार व्यवस्था, लोक−मंगल आदि कार्यों में, कौन, कब, किस प्रकार कितना समय देगा यह हर व्यक्ति की अपनी परिस्थिति पर निर्भर है, पर समन्वय इन सब बातों का रहना चाहिए। दृष्टिकोण यह रहना चाहिए कि आलस्य प्रमाद में एक क्षण भी नष्ट न हो और सारी गतिविधियाँ इस प्रकार चलती रहें जिनमें आत्मकल्याण परिवार निर्माण एवं लोक−मंगल के तीनों तथ्यों का समुचित समावेश बना रहे। इन सारे क्रिया−कलापों में आदर्शवादी दृष्टिकोण अपनाया जाय। दुष्प्रवृत्तियों को दुर्भावनाओं को स्थान न मिलने दिया जाय। जहाँ भी जब भी गड़बड़ दिखाई पड़े तब वहीं उसकी रोकथाम की जाय और गिरते कदमों को संभाल लिया जाय। समय, श्रम, चिन्तन एवं धन का तनिक−सा अंश भी अवाँछनीय प्रयोजन में नष्ट न होने दिया जाये इन चारों ही सम्पदाओं का एक−एक कण सदुपयोग में लगता रहे, इस तथ्य पर तीखी दृष्टि रखी जाय, भूलों को तत्काल सुधारते रहा जाय तो उस दिन के —उस जीवन को संतोषजनक रीति से जिया जा सकता है।*

जल्दी सोने और जल्दी उठने का नियम जीवन साधना में रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को बनाना ही चाहिए। ब्रह्ममुहूर्त का समय अमृतोपम है, उस समय किया गया हर कार्य बहुत ही सफलतापूर्वक संपन्न होता है। अस्तु जो भी अधिक महत्वपूर्ण कार्य प्रतीत होता हो उसे उसी समय में करना चाहिए। सवेरे जल्दी उठना उन्हीं के लिए सम्भव है जो रात्रि को जल्दी सोते हैं। इस मार्ग में जो अड़चने हों उन्हें बुद्धिमतापूर्वक हल करना चाहिए; किन्तु जल्दी सोने और जल्दी उठने की परम्परा तो अपने लिए ही नहीं पूरे परिवार के लिए बना ही लेनी चाहिए।

रात्रि को सोते समय वैराग्य एवं संन्यास जैसी स्थिति बनानी चाहिए। बिस्तर पर जाते ही यह सोचना चाहिए कि निद्रा काल एक प्रकार की मृत्यु विश्राम है। आज का नाटक समाप्त कल दूसरा खेल खेलना है। परिवार ईश्वर का उद्यान है उसमें अपने को कर्तव्य−निष्ठ माली की भूमिका निभानी थी। शरीर, मन, ईश्वरीय प्रयोजनों को पूरा करने के लिए मिले जीवन रथ के दो पहिये हैं, इन्हें सही राह पर चलाना था। धन, प्रभाव, पद यह विशुद्ध धरोहर है उन्हें सत्प्रयोजनों में ही लगाना था। देखना चाहिए कि वैसा ही हुआ या नहीं? जहाँ गड़बड़ी हुई दिखाई दे वहाँ पश्चाताप करना चाहिए और अगले दिन वैसी भूल न होने देने में कड़ी सतर्कता बरतने की अपने आपको चेतावनी देनी चाहिए।

संन्यासी अपना सब कुछ ईश्वर अर्पण करके परमार्थ प्रयोजन में लगता है। सोते समय साधक की वैसी ही मनःस्थिति होनी चाहिए। मिली हुई अमानतें और सौंपी हुई जिम्मेदारियाँ आज ईमानदारी के साथ संभाली गईं। यदि कल वे फिर मिलीं तो फिर उन्हें ईश्वरीय आदेश मान कर संभाला जायगा। अपना स्वामित्व किसी भी व्यक्ति या पदार्थ पर नहीं। यहाँ जो कुछ है सो सब ईश्वर का है। अपना तो केवल कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व भर है। उसे पूरी ईमानदारी और पूरी तत्परता से निवाहते भर रहना अपने लिये पर्याप्त है। परिणाम क्या होते हैं, क्या नहीं—यह परिस्थितियों पर निर्भर है अस्तु सफलता असफलता की चिन्ता न करते हुए हमें आदर्शवादी कर्तव्य परायणता अपनाये रहने मात्र में पूरा−पूरा संतोष अनुभव करना चाहिए।

सोते समय ईश्वर की अमानतें ईश्वर को सौंपने और स्वयं खाली हाथ प्रसन्न चित्त विदा होने की—निद्रा देवी की गोद में जाने की बात सोचनी चाहिए। हलके मन से शाँति पूर्वक गहरी नींद में सो जाना चाहिए। चिन्ता, आशंका, खीज, क्रोध जैसी किसी भी उद्विग्नता को मन पर लाद कर नहीं सोना चाहिए। यह प्रयास शाँत निद्रा लाने की दृष्टि से भी उपयोगी है। साथ ही आत्म-परिष्कार की दृष्टि से भी अति−महत्वपूर्ण है।

मृत्यु को भूलने से ही जीवन संपदा को निरर्थक कामों में गँवाते रहने की चूक होती है, दुष्कर्म बन पड़ते हैं और वासना तृष्णा अहंता की क्षुद्रताओं में समय गुजरता है। यदि यह ध्यान बना रहेगा कि मृत्यु का निमंत्रण कभी भी सामने आ सकता है तो यह ध्यान बना रहेगा कि इस महान अवसर का सही उपयोग किया जाय और पूरा लाभ उठाया जाय। निद्रा की तुलना मृत्यु से करते रहने पर मौत का भय मन से निकल जाता है और अलभ्य अवसर के सदुपयोग की बात चित्त पर छाई रहती है।

प्रातः उठते समय नये दिन की मान्यता—जीवनोद्देश्य की स्पष्टता तथा सुव्यवस्थित दिनचर्या बनाने का कार्य संपन्न करना चाहिए। रात्रि को सोते समय मृत्यु का चिन्तन, आत्म, निरीक्षण, पश्चाताप और कल के लिए सतर्कता—वैरागी एवं संन्यासी जैसी मालिकी त्यागने की हलकी फुलकी मनः स्थिति लेकर शयन किया जाय। दिन भर हर घड़ी चुस्ती फुर्ती मुस्तैदी और दिलचस्पी के साथ प्रस्तुत कार्यों को निपटाया जाय। भीतर दुर्भावनाओं और बाहरी दुष्प्रवृत्तियों के उभरने का अवसर आते ही उनसे जूझ पड़ा जाय और निरस्त करके ही दम लिया जाय। यह है वह जीवन साधना जिसमें चौबीसों घन्टे निमग्न रह कर और इसी जीवन में स्वर्ग जैसे उल्लास आनन्द और मुक्ति जैसे आनन्द का हर घड़ी अनुभव करते रहा जा सकता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1976 जनवरी

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👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए। (भाग 1)

मन का भाव दब कर मन की एक ग्रन्थि बन जाता है। जो व्यक्ति अनेक मानसिक व्याधियों से ग्रस्त हैं उसका कारण यह दबे हुए नाना प्रकार के कुँठित भाव ह...