मंगलवार, 26 मई 2026

👉 आनन्द की गंगोत्री अपने ही भीतर (भाग 2)

बचपन में जो खिलौनों से चिपका रहता था अपना भविष्य बनाने में जी तोड़ परिश्रम करता है। उसकी प्रसन्नता इस बात में सन्निहित रहती है कि वैसे अधिक से अधिक योग्यता सम्पादित की जाय। सन्तुष्टि इस आकाँक्षा की पूर्ति से भी नहीं होती। एक की आपूर्ति दूसरे तरह की इच्छा को जन्म देती है। वयस्क होते ही अनुकूल साथी जीवन संगिनी की खोज चलती है। मिलते ही पत्नी के यौवन, रूप और लावण्य पर वह मुग्ध बना आनन्द की अनुभूति करता है। किन्तु यह स्थिति भी अधिक दिनों तक नहीं रहने पाती। शरीराकर्षण कुछ ही दिनों बाद समाप्त हो जाता है। तब तक प्रजनन का दौर चल पड़ता है।

नवागन्तुक शिशु प्रसन्नता का नवीन केन्द्र बिन्दु बनता है। उनकी किलकारियाँ सुनकर वह बड़े से बड़ा दुःख भी भूल जाता है। उसकी एक मुस्कान के लिए अपना सर्वस्व लुटाने के लिए मनुष्य तैयार रहता है। पर धीरे-धीरे वह आकर्षण भी कम होने लगा है जिससे प्रेरित होकर मानव बच्चे के लिए कष्ट उठाने के लिए तत्पर रहता था।
धनोपार्जन, संपदा संग्रह तथा लोकयश पाने की आकाँक्षा पूर्ति में वह अब सुख आनन्द ढूँढ़ने लगता है। तद्नुरूप प्रयासों का ताना बाना बुनता है। वह सब मिलने के बाद भी संतोष नहीं होता। अतृप्त और अशांत मनःस्थिति पुनः नये तरह के खेल खिलौने- मन बहलाने के साधन ढूंढ़ती है। सम्पूर्ण जीवन तो इन बाह्य प्रयासों में खप जाता है। जिसका मनुष्य आनन्द पाने का प्रयत्न करता है उतना ही वह उससे दूर होता चला जाता है।

हर मनुष्य की प्रकृति एक जैसी नहीं होती। परस्पर एक दूसरे की अभिरुचियाँ भी भिन्न होती हैं। एक को एक तरह के काम में आनन्द आता है दूसरे को भिन्न प्रकार के काम में। स्वास्थ्य, धन, ऐश्वर्य, यश, सम्मान योग्यता की प्राप्ति में अधिकाँश व्यक्ति जीवन खपाते और तद्नुरूप सफलता मिलने पर मोद मनाते हैं। पर वह प्रसन्नता भी चिरस्थायी नहीं होती। कुछ ऐसे भी होते हैं जो समाज के ढर्रे से अलग हटकर अपना मार्ग चुनते हैं। वे असामान्य दुस्साहस का परिचय देते तथा ऐसे काम कर गुजरते हैं जिन्हें देखकर दांतों तले उंगली दवानी पड़ती है। जीवन के धनी व्यक्तियों को संकटों से युक्त कार्यों को करने में ही आनन्द आता है। कुछ व्यक्तियों की मनःस्थिति विकृत स्तर की बन जाती है। निकृष्ट कामों में ही उन्हें रस आता है। व्यसनी शराब के प्याले में आनन्द देखता और ढूंढ़ता है- उसी में डूबा रहता और अपना सर्वस्व गँवाता है। कामी कामतृप्ति की क्षणिक रसानुभूति में अपने शरीर को गलाता- मनःशक्ति को क्षीण करता रहता है। क्रूर आततायियों को जघन्य अपराधों को करने में प्रसन्नता होती है। दूसरों को रोते-कलपते, पीड़ा से कराहते-तड़पते देखकर आनन्द आता है। इसकी विकृति उनसे हत्या जैसे पाप कराती है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

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👉 विचार- एक अद्भुत प्रचण्ड शक्ति स्रोत (भाग 3)

किसी तरह की भावनाएँ चिन्तन में- विचार तरंगों में- प्रखरता उत्पन्न करती हैं? एक ही शब्द में यदि इसका उत्तर देना हो तो कहना होगा- आदर्शवादी भावनाएँ। आदर्शवादी भावनाएँ ही मनुष्य को उच्च स्तर का चिन्तन करने के लिए प्रेरित करती हैं। उस स्तर का चिन्तन करने वाले चरित्रवान एवं सेवा भावी लोग अपनी तरंगों के माध्यम से समस्त विश्व को अपनी प्रखर प्रेरणाओं से लाभान्वित करते हैं, भले ही उनका वह अनुदान दूसरों को प्रत्यक्ष न दिखाई पड़ता हो। यही बात दुष्ट दुरात्माओं के सम्बन्ध में भी लागू होती है। वे मन ही मन दुरभि सन्धियों के कुचक्र रचते रहते हैं और इस प्रकार की भयानक विचार तरंगें छोड़ते हैं जिनके कारण अगणित दुर्बल मनोभूमि के लोग उसी प्रकार का चिन्तन आरम्भ कर देते हैं तथा कुमार्गगामिता की ओर बढ़ाने लगते हैं। पतन का एक प्रवाह ही चल पड़ता है।

समान विचार वाले लोगों को अपने स्तर के नये विचार अन्तरिक्ष में व्याप्त ईथर तत्व से मिलते रहते हैं। या कि कहना चाहिए, उन्हें वहाँ से पोषण मिलता रहता है। सजातीय तत्वों के आकर्षण का प्रकृति नियम सर्वविदित है। धातुओं के कण धूलि में बिखरे रहते हैं परन्तु जिधर इन धातुओं की खदानें होती हैं उधर ये कण धीरे-धीरे सहज ही खिसकते तथा खदान में इकट्ठे होते जाते हैं। सभी नदियाँ समुद्र की दिशा में सहज ही बहती हैं। नाले नदियों की तरफ दौड़ते हैं। विचार भी अपने सजातीय विचारों की ओर उसी तेजी से दौड़ते हैं और वहाँ अपना रंग जमाते हैं। चोरी, लबारी, जुआरी, व्यभिचारी अपनी जमात जोड़ लेते हैं तो इसका यही कारण है और सन्त सज्जनों के सत्संग जमे रहते हैं तो इसका कारण भी यही है। अर्थात् जहाँ जिस स्तर के विचार उठ रहे होंगे वहाँ उसी स्तर की अन्य लोगों द्वारा छोड़ी गई विचार तरंगें भी आकर्षित होती हैं और अपना अड्डा जमा लेती हैं।

इस तथ्य को यों भी समझा जा सकता है कि हमारा रेडियो उन्हीं प्रसारणों को पकड़ता है जिन पर उसकी सुई अड़ी होती है। उस समय अन्य रेडियो स्टेशनों से अन्य प्रसारण भी होते रहते हैं, पर हम केवल अपनी रुचि का स्टेशन और प्रोग्राम ही सुनते हैं। अन्य प्रसारण अपनी राह चले जाते हैं, अपने रेडियो यन्त्र से उन्हीं का संपर्क हो पाता है जिन्हें अपना रेडियो पकड़ता है। विचार तरंगों को भी रेडियो तरंगों का सहधर्मी-सहकर्मी माना जा सकता है। वे उठती उमड़ती हैं और सभी को स्पर्श भी करती हैं। सभी पर वे सूक्ष्म प्रवाह भी छोड़ती हैं, पर विशेष प्रवाह अपने सजातियों पर ही डालती हैं। सज्जनों का मस्तिष्कीय चुम्बकत्व प्रायः उन्हीं को आकर्षित करता है, जिनमें सज्जनता के अंकुर पहले से ही मौजूद हों। दुर्जनों के सम्बन्ध में भी यही बात लागू होती है।

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✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

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