शनिवार, 11 जुलाई 2026

👉 हमारी आध्यात्मिक जिज्ञासा और आकांक्षा (भाग १)

आत्म स्वरूप का ज्ञान, जिज्ञासा द्वारा ही संभव है। हम वस्तुतः है क्या-यह बोध तभी हो सकता है, जब हम उसको जानने के लिए उत्सुक और उत्कंठित हो जिस विषय में कोई रुचि, कोई उत्कंठा नहीं होती उसको कदापि नहीं जाना जा सकता।

ज्ञान का जन्म जिज्ञासा द्वारा ही होता है। पूर्वकालीन ऋषियों को जिज्ञासा हुई कि वे यह जाने कि इस अपार और रहस्यमय सृष्टि का आदि उद्गम क्या है? उनकी इस जिज्ञासा ने उन्हें प्रेरित किया और वे साधना मार्ग से शोध में प्रवृत्त हुए, जिसके परिणामस्वरूप उस ईश्वर को खोज ही लाये, जो इस निखिल ब्रह्माण्ड का रचयिता, पालन कर्ता और लय कर्ता है। उनकी जिज्ञासा ने ही उन्हें यह श्रेय प्रदान किया कि वे सृष्टि के रहस्यों, उसके आदि स्त्रोत ईश्वर का पता ही नहीं लगा सके, बल्कि उससे सीधा सम्पर्क भी स्थापित कर सकें।
वैज्ञानिकों को प्रकृति के रहस्यों और उसके उत्पादनों की प्रक्रिया जानने की जिज्ञासा हुई और वे इस खोज में निरत हो गये। उन्होंने पृथ्वी, पवन, जल और अग्नि के भौतिक रहस्य को जाना और उसका उपयोग किया। उन्होंने वनस्पतियों, औषधियों और प्राणियों के आधिभौतिक स्वरूप की जिज्ञासा की, विज्ञाता ने उन्हें शोभा कार्यों में संलग्न किया। जिसके फलस्वरूप आज के विशाल भौतिक विज्ञान, औषधि विज्ञान, वनस्पति विज्ञान और जीव विज्ञान आदि शास्त्रों की रचना हुई।

मानस शास्त्रियों को जिज्ञासा हुई कि यह जान कि मनुष्य के अन्दर चलने वाले द्वन्द्वों का क्या आधार है। जिज्ञासा ने सक्रियता प्रदान की और उन्होंने स्थूल शरीर से भिन्न एक ऐसे निराकार मानसिक संसार का पता लगा डाला, जो बाह्य जीवन का मुख्य आधार है और आज का मानस ज्ञान एक व्यवस्थित शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठित है।

अध्यात्म, भौतिक और मानस शास्त्रियों यदि जिज्ञासा न हुई होती तो क्या यह सम्भव था कि यह वैचित्र्यपूर्ण बृहत् ज्ञान मनुष्य जाति के पास होता। जिज्ञासा ही किसी ज्ञान की आधार शिला है, उसकी जननी है। आत्म ज्ञान भी आत्म जिज्ञासा के बिना नहीं हो सकता। यदि अपना, सच्चा और वास्तविक रूप जानना है तो उसे जानने की प्रबल जिज्ञासा करनी होगी, इससे रहित अन्य कोई उपाय नहीं, जिससे मनुष्य आत्मस्वरूप का ज्ञान पा सके। अस्तु, आत्म ज्ञान के लिये जिज्ञासा करिये और उसकी अनुकूल सक्रियता के लिये विचार, भाव और दृष्टिकोण का निर्माण कीजिये आत्मनिरीक्षण करते हुए अनुभवों की लड़ी बनाते चलिये, एक दिन आपकी आत्म ज्ञान हो जायेगा।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969


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👉 सुख-दुःख मानसिक स्थिति पर अवलम्बित हैं (अंतिम भाग)

बहुत से लोग कपटपूर्ण स्थिति वाले भी होते है। वे ऊपर से तो बड़े सज्जन और अनुरूप दिखलाई देने का प्रयत्न करते रहते है। उसी के अनुरूप बोलते और उसी के अनुरूप आचरण भी प्रदर्शित करते है। पर यह सब उनका होता दिखावा ही। उनका इस प्रकार का बाह्य अन्तर के छल पर एक आवरण होता है। अवसर पाते ही ऐसे कपटी व्यक्ति दूसरों की हानि करते देर नहीं करते। वास्तविकता तो यह होती है कि बाहर का आदर्श उनका एक जाल के समान होता है, एक छल और छलावा होता है। अवसर पाकर दूसरों को छल लेने का, धोखा देने का एक उपाय मात्र होता है। ऐसे छली और कपटी लोग स्वप्न में भी कभी सुख शाँति नहीं पा सकते। वे ऊपर से कितनी ही शाँति-सन्तोष और स्थिरता का अभिनय करने में क्यों न सफल हो जायें पर अन्दर ही अन्दर अशाँत, भीत व्यग्र बने रहते है। उनकी अन्तरात्मा उनकी कुरूपता पर उन्हें धिक्कारती रहती है। उन्हें स्पष्ट अनुभव होता है कि वे जो कुछ दिखला और कर रहे है, वह सब मिथ्या है। एक दिन इसका परिणाम उन्हें भोगना ही होगा। उनकी अन्तरात्मा उन्हें क्षमा नहीं करेगी और तब समय आयेगा तो यही आत्मा जो मनुष्य का मित्र कही गई है, शत्रु बनकर उनके सामने खड़ी हो जायेगी। 

तन, मन और बुद्धि की सारी शक्तियाँ कुण्ठित कर देगी और उनको परिणाम भोगने के लिए निर्बल से निर्बल करके डाल देगी। उभय रूपी व्यक्ति इस सारे सत्य को भली प्रकार जानते है और भविष्य के भय से हर समय जलते गलते रहते है।

इसी अन्तर बाहर को अनुरूपता के कारण, विरोधी चिन्तन के फलस्वरूप इतना मानसिक ताप हो जाता है कि बहुत बार मानसिक और शारीरिक बीमारियाँ तक पैदा हो जाती है। इसी विरोधाभास के कारण हृदय कमजोर होकर बैठ जाते है और कभी कभी लोग इस आपत्ति से पागल तक हो जाते है। अन्दर बाहर का यह विरोधाभास भयंकर यातना भरी स्थिति है। इसमें कैसे अबुद्धिमान लोग एक क्षण को भी शाँति के लिए तरसते रहते है। इस द्विविधि जीवन से उसी तरह बचते रहना चाहिये, जिस प्रकार सावधान लोग दुमुँही साँप से बचते है।

इन दोनों उपायों के साथ सुख-शाँति की सुरक्षा करने के लिये, एक छोटी-सी आवश्यकता और है। वह है ‘सामंजस्य’। बिना सामंजस्य बुद्धि के भी काम नहीं चल सकता। यदि कोई व्यक्ति अन्तर से आदर्शवादी है और उसका बाह्य व्यवहार भी उसी के अनुरूप है, तथापि सामंजस्य गुण का अभाव है, तब भी वह दूसरों के गलत काम देख सुनकर अथवा अनुभव करके अशाँत होता रहेगा। असामंजस्य बुद्धि वाले व्यक्तियों का यह एक मिराज हो जाता है कि जैसा मैं आदर्शवादी हूँ, वैसा ही हर आदमी बने और जब वे इसके विरुद्ध देखते है तो अशाँत और व्यग्र होते है। इस अच्छाई बुराई से भरे संसार में सबका एक सा होना सम्भव नहीं। जो जैसा है उसे उसके भाग्य और अन्त पर छोड़कर अपनी सुख-शाँति की रक्षा करना ही चाहिये। आवश्यकता भर ड़ड़ड़ड़ को समझा, सही रास्ते पर लाने का प्रयत्न तो करना चाहिये किन्तु इस विषय में इस सीमा तक भावुक न हो जाये कि उसके दुर्भाग्य में अपना भाग बना ले। मानवीय सद्भावना रखते हुए उसे उसके कर्मों पर छोड़िये, न उस पर क्रोध करिये और न क्षोभ। यदि उसकी बुराई के छींटे अपने आप पर भी कभी आ जाते है तो उन्हें सहन करिये, साधारण सामंजस्य बनाए रहिये और इस प्रकार अपनी सुख शाँति को प्रभावित मन होने दीजिये, यही बुद्धिमानी है और यही उचित है।

इस प्रकार जीवन में यदि स्थायी सुख शाँति की आकांक्षा है तो संतुलन, समरूपता और सामंजस्य का अभ्यास करिये। इनका अवलम्बन लिए बिना अभिमत फल की आशा नहीं की जा सकती।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 11 July 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 July 2026


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