दिन के प्रकाश का विलुप्त होने और रात्रि को अंधकार के आगमन की घड़ी का आ धमकना सामान्यतः घाटे का सौदा प्रतीत होता है, किन्तु इसके साथ ही सूर्य के कान्ति हीन होने, उसके विश्राम करने और पुनः नयी ज्योत्सना साथ उदय होने की आशा भी रहती है। काल निशा में विश्राम करने के लिए जीव पुराने शरीर का परित्याग कर जाता है। यह प्रयाण काल ही मौत के नाम से जाना जाता है। सृष्टि सुव्यवस्था के संचालन की विभिन्न क्रियाओं में जन्म और मृत्यु का यह परिवर्तन चक्र एक सहज स्वाभाविक एवं अनिवार्य प्रक्रिया है। उससे बच सकना किसी भी प्राणी के लिए संभव नहीं।
थकान के बाद हरी नींद आने नींद पूरी होने के बाद जाग पड़ने की तरह मरने और पुनः जन्म लेने की क्या सम्भावना नहीं? कार्योपरान्त थकान मिटाने के लिए विश्राम आवश्यक है। यह न केवल मनुष्य, वरन् समस्त जीवों के लिए अनिवार्य है। प्रकृति चक्र में भी विश्राम की यह प्रक्रिया किसी न किसी रूप में चलती रहती है। दिन भर की थकान के बाद रात्रि को विश्राम किया जाता है। विश्राम की क्रिया शक्तिसंचय की सृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण है। इसी के आधार पर दूसरे दिन नये उल्लास के साथ कार्य किये जाते है।
दिन भर कार्य करने वाले मजदूर रात को विश्राम करते है, पशु-पक्षी भी अपने घोंसले में सोते है। पुराणों की आख्यायिकाओं के अनुसार सूर्य भी रात्रि की गोद में विश्राम करने जाता है। जीव भी अपनी यात्रा पथ में विश्राम करता है। वह मृत्यु शैया में अपने विगत श्रम से मुक्ति पाता है तथा पुनः नये जीवन में प्रवेश करता है। जीव की यात्रा इसी क्रम से अपने कर्मानुसार अनन्त जीवन की ओर चलती रहती है। अतः मृत्यु भी उसके प्रगति-क्रम की एक अनिवार्य सीढ़ी कही जा सकती है। अविनाशी जीवात्मा अपनी यात्रा को मौत रूपी स्टेशनों पर ठहरती हुई पूर्ण करती है, अपने गन्तव्य लक्ष्य तक पहुँचती है। जन्म और मृत्यु का यह गति चक्र न होता तो शायद ही जीवात्मा यात्रा सफल हो पाती।
मोहासिक्त व्यक्ति को ही मृत्यु से डर लगता है। देख भी जाता है कि लोग मौत का नाम सुनते ही काँपने लगते हैं। इसे अशुभ मानते हैं। किसी सगे सम्बन्धी की होने पर रोते चिल्लाते हैं। स्वयं भी मौत के डर से चिन्तित रहते हैं। जबकि मरण की सुनिश्चितता को जानते हुए भी डरना केवल अविवेक ही कहा जा सकता है।
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988
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