बुधवार, 3 जून 2026

👉 हम देवत्व की ओर बढ़ें असुरता की ओर नहीं (भाग 4)

मनुष्य के कर्तव्य क्या हैं? इस प्रश्न का उत्तर यह हैं कि जिन कामों, भावों तथा विचारों का प्रभाव दूसरों पर अवांछनीय हो, उनका त्याग और जिनका प्रभाव अनुकूल हो उनका ग्रहण। निषेध की अपेक्षा विधेयक उपाय अधिक समीचीन होते हैं। निषेध की अपेक्षा विधेयक उपाय अधिक समीचीन होते हैं। हम क्या न करें, जिससे किसी पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, इसी चिन्ता करते रहने की अपेक्षा यह अधिक सरल एवं सुखद है कि हम वह करें, जिसका प्रभाव दूसरों पर प्रतिकूल पड़े। यह काम सेवा, सहयोग, सहायता एवं सहानुभूति परक ही हो सकते हैं।

मानव समाज पारस्परिकता के ही आधार पर बना, विकसित हुआ, बढ़ा और उसी के आधार पर ठहरा हुआ है। यदि हम सब एक दूसरे का सहयोग करना छोड़ दें तो जीवन, अन्न तथा वस्त्र जैसी साधारण समस्यायें भी हल न हो सकें जीवन की सारी सुविधा साधनों का निर्माण, जिनका कि हम सब उपभोग करते है, परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से सबके सहयोग से ही होता है। यदि हम एक दूसरे की सेवा करना छोड़ दें अथवा सहायता से विरत हो जायें तो हमारा समाज किसी भी विपत्ति आपत्ति का सामना करने में असमर्थ हो जाये। जो बीमार पड़ जाये वे बीमार ही पड़े रहे, जो आश्रित है वे निराश्रित होकर नष्ट हो जायें। जो धनपति हैं, वे सारा धन अपने पास ही रखें और सारा समाज दो दिन में ही असुविधा से त्रस्त हो उठे।

यदि विचारक अपने विचार, शक्तिवान अपनी शक्ति और शिल्पी अपना शिल्प अपने तक ही सीमित कर ले और दूसरों को उसका लाभ न दे तो शीघ्र ही पूरा समाज जड़वत् होकर एक स्थान पर रुक कर खड़ा हो जाये। तात्पर्य यह कि सारा मानव समाज ही क्यों संसार ही पारस्परिकता, सहायता, सहयोग और आदान प्रदान पर चल रहा है। जो स्वार्थी एवं संकीर्ण व्यक्ति इस पारस्परिकता का महत्व नहीं समझते अथवा इसके प्रतिपादन में प्रमाद करते हैं वे अविकसित एवं अपूर्ण मनुष्य ही हैं।

मनुष्यता की पूर्णता के लिये हमें संग्रह की नहीं त्याग की नीति अपनानी चाहिये। दूसरों से अपना स्वार्थ कैसे सधे यह सोचने के स्थान पर यह सोचना चाहिये कि ऐसा कुछ क्या किया जा सकता है, जिससे दूसरों का कुछ हित हो। जिस दिन हमारी अन्तःचेतना, सेवा, पुण्य, परोपकार, त्याग, उदारता, पारस्परिकता, सहायता, सहयोग, प्रेम, दया करुणा आदि की उदार भावनाओं से ओत प्रोत हो जाये, उस दिन समझना चाहिये कि हम मनुष्यता की पूर्णता की ओर अग्रसर हो आये हैं।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969

‼️ पुरुषार्थी ही पुरस्कारों के अधिकारी ‼️

“लक्ष्मी उद्योगी पुरुष सिंहों को प्राप्त होती है”- वह केवल सूक्ति नहीं, बल्कि एक सिद्धान्त है। ऐसा सिद्धान्त जो युग-युग के अनुभव के बाद स्थिर किया गया है। उन्नति, प्रगति, सफलता और सम्पन्नता का एक मात्र आधार उद्योग अथवा पुरुषार्थ नहीं करेगा, परिश्रम में अपना पसीना नहीं बहाएगा तब तक किसी प्रकार के श्रेय का अधिकारी नहीं बन सका। लक्ष्मी श्रम और उद्योग की ही अनुगामिनी होती है।

कहा जाता है कि लक्ष्मी, श्रेय, सफलता और सम्पन्नता आदि उपलब्धियाँ भगवान् की कृपा से ही मिलती है। ऐसी मान्यता आस्तिकता की द्योतक है, अच्छी है। इस धारणा को बनाकर चलने में कोई हानि नहीं। किन्तु इसका रहस्य समझ लेना भी आवश्यक है।

संसार में चारों ओर जो सुख-सम्पन्नता के साधन और कारण बिखरे पड़े हैं, वह सब एकमात्र उस परमात्मा की ही कृपा है। सुख-दुःख और साधन सुविधा भी उसकी रचना के उसी प्रकार अंग है, जिस प्रकार मनुष्य स्वयं। किसी को मिलने वाली सम्पत्ति उसे तभी ही मिल सकती है, जब उसमें मूल स्वामी की सहमति तथा स्वीकृति सम्मिलित हो इस प्रकार निश्चय ही संसार के सुख-साधन और सम्पत्ति सम्पन्नता परमात्मा की कृपा से ही प्राप्त होती है।

संसार क्या है और हम कैसा जीवन जिये? | Sansaar Kya Hai Aur Hum Kaisa Jeevan Jiyen | 

किन्तु, इस विश्वास के साथ वह न भूल जाना चाहिये कि उसकी कृपा यों ही अनायास मिल जाती है। अथवा वह मनमौजी परमात्मा योंही बैठा-बैठा जिसे चाहता है सम्पन्नता अथवा सफलता वितरित करता रहता है और किसी को असफलता एवं विपन्नता, ऐसा नहीं है। उसके विधान में एक नियम और न्यायशीलता रहती है। वह किसी पर न तो अनायास नर अकारण कृपा करता है। और न कोप। सफलता और सम्पन्नता के लिये उस न्यायपरायणता की कृपा अर्जित करनी पड़ती है। जो व्यक्ति नियमपूर्वक उसकी पूजा नियमपूर्वक उसकी कृपा अर्जित कर लेते हैं, संसार में सब कुछ पा जाते हैं और जो इस विषय में प्रभारी अथवा अन्ध-विश्वासी बने रहते हैं, उन्हें खाली हाथ ही रहना पड़ता है।

सम्पन्नता के सम्बन्ध में परमात्मा की कृपा पाने का केवल एक ही आधार है और वह है पुरुषार्थ अथवा परिश्रम। जो व्यक्ति प्रमाद त्याग कर उद्योग परिश्रम अथवा पुरुषार्थ करते हैं, उन पर परमात्मा कृपा करता ही नहीं उसे करनी पड़ती है। वह अपने इस नियम को इस विषय में भंग करने के लिये सक्षम नहीं है। यह अक्षमता उसकी असमानता नहीं, महिमा है। जो व्यक्ति अपने बनाये नियमों के प्रति जितना भीरु और भावुक रहता है, वह उतना ही दृढ़ और महान माना जाता है। उसी व्यक्ति के बनाये विधान का मान तथा पालन होता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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