मनुष्य के कर्तव्य क्या हैं? इस प्रश्न का उत्तर यह हैं कि जिन कामों, भावों तथा विचारों का प्रभाव दूसरों पर अवांछनीय हो, उनका त्याग और जिनका प्रभाव अनुकूल हो उनका ग्रहण। निषेध की अपेक्षा विधेयक उपाय अधिक समीचीन होते हैं। निषेध की अपेक्षा विधेयक उपाय अधिक समीचीन होते हैं। हम क्या न करें, जिससे किसी पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, इसी चिन्ता करते रहने की अपेक्षा यह अधिक सरल एवं सुखद है कि हम वह करें, जिसका प्रभाव दूसरों पर प्रतिकूल पड़े। यह काम सेवा, सहयोग, सहायता एवं सहानुभूति परक ही हो सकते हैं।
मानव समाज पारस्परिकता के ही आधार पर बना, विकसित हुआ, बढ़ा और उसी के आधार पर ठहरा हुआ है। यदि हम सब एक दूसरे का सहयोग करना छोड़ दें तो जीवन, अन्न तथा वस्त्र जैसी साधारण समस्यायें भी हल न हो सकें जीवन की सारी सुविधा साधनों का निर्माण, जिनका कि हम सब उपभोग करते है, परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से सबके सहयोग से ही होता है। यदि हम एक दूसरे की सेवा करना छोड़ दें अथवा सहायता से विरत हो जायें तो हमारा समाज किसी भी विपत्ति आपत्ति का सामना करने में असमर्थ हो जाये। जो बीमार पड़ जाये वे बीमार ही पड़े रहे, जो आश्रित है वे निराश्रित होकर नष्ट हो जायें। जो धनपति हैं, वे सारा धन अपने पास ही रखें और सारा समाज दो दिन में ही असुविधा से त्रस्त हो उठे।
यदि विचारक अपने विचार, शक्तिवान अपनी शक्ति और शिल्पी अपना शिल्प अपने तक ही सीमित कर ले और दूसरों को उसका लाभ न दे तो शीघ्र ही पूरा समाज जड़वत् होकर एक स्थान पर रुक कर खड़ा हो जाये। तात्पर्य यह कि सारा मानव समाज ही क्यों संसार ही पारस्परिकता, सहायता, सहयोग और आदान प्रदान पर चल रहा है। जो स्वार्थी एवं संकीर्ण व्यक्ति इस पारस्परिकता का महत्व नहीं समझते अथवा इसके प्रतिपादन में प्रमाद करते हैं वे अविकसित एवं अपूर्ण मनुष्य ही हैं।
मनुष्यता की पूर्णता के लिये हमें संग्रह की नहीं त्याग की नीति अपनानी चाहिये। दूसरों से अपना स्वार्थ कैसे सधे यह सोचने के स्थान पर यह सोचना चाहिये कि ऐसा कुछ क्या किया जा सकता है, जिससे दूसरों का कुछ हित हो। जिस दिन हमारी अन्तःचेतना, सेवा, पुण्य, परोपकार, त्याग, उदारता, पारस्परिकता, सहायता, सहयोग, प्रेम, दया करुणा आदि की उदार भावनाओं से ओत प्रोत हो जाये, उस दिन समझना चाहिये कि हम मनुष्यता की पूर्णता की ओर अग्रसर हो आये हैं।
.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969

