बुधवार, 13 मई 2026

👉 अशुभ चिंतन छोड़िये-भय मुक्त होइये ( भाग 1)

अपने कार्यकारी जीवन में लोग कई तरह की अशुभ आशंकाओं से आतंकित रहते हैं। रोजगार ठीक से चलेगा या नहीं, कहीं व्यापार में हानि तो नहीं हो जाएगी, नौकरी से हटा तो नहीं दिया जायेगा, अधिकारी नाराज तो नहीं हो जायेंगे जैसी चिन्ताएँ लोगों के मन मस्तिष्क पर हावी होने लगती हैं तो वह जो काम हाथ में होता है, उसे भी सहज ढंग से नहीं कर पाता। इन अशुभ आशंकाओं के करते रहने से मन में जो स्थाई गाँठ पड़ जाती है उसकी का नाम भय है।

भय का एक सामान्य रूप यह भी होता है कि अन्धेरे में जाते ही डर लगता है, अकेले यात्रा करने में किसी अनिष्ट की सम्भावना दिखाई देती है, रोगी होने बीमार पड़ने पर रोग के ठीक न होने तथा उसी के कारण मृत्युद्वार तह पहुँच जाने का डर रहता है। यह भी भविष्य के प्रति अशुभ आशंकाओं का ही छोटा रूप है। अँधेरे में जाते समय जी क्यों काँपने लगाता है? इसलिए कि आशंका होती है कहीं कोई कीड़ा-काँटा न बैठा हो या कोई भूत-प्रेत ही न पकड़ ले। अकेले यात्रा करने में भी चोर डाकुओं द्वारा सताये जाने, लूट लेने की आशंका ही डराती है। इस तरह के डर भी एक तरह से भविष्य के प्रति अशुभ आशंकाओं के परिणाम ही हैं।

इस तरह की आशंकाएँ स्वभाव बन कर भय के रूप में परिणत हो जाती हैं और इन आशंकाओं या भयों का एक ही कारण है- मन की दुर्बलता। भय और कुछ नहीं मन की दुर्बलता से उत्पन्न हुआ भूत ही है। इस सम्बन्ध में एक जापानी लोक कथा प्रचलित है। किसी व्यक्ति को एक डरावना जिन्न सताया करता था। वह जागता था तो जिन्न सामने खड़ा रहता था और उसे तरह-तरह से सताया करता था, सोता था तो सपने में डरावनी हरकतों से उसे परेशान करता था। एक दिन उसने हिम्मत कर जिन्न से पूछ ही लिया, ‘तुम कहाँ से आ गए हो? क्यों मुझे इतना सताते रहते हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?

इसके उत्तर में जिन्न ने कहा कि “तुम्हीं ने मुझे बुलाया है और तुम्हीं ने मुझे डराने के लिए जिम्मेदार किया है। इसके लिए तुम्हीं जिम्मेदार हो, क्योंकि तुम्हीं ने मुझे उत्पन्न किया है।” जापान के बड़े बुजुर्ग अपने बच्चों को यह कहानी सुनाते हुए बताते हैं कि यह जिन्न लोगों के बुलाने पर अब भी आता है तथा उन्हें तरह-तरह से परेशान करता है। इस जिन्न का नाम भय है। कुल मिलाकर यह कि भय अपने ही मन की उपज है। कौन यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि व्यापार में घाटा हो सकता है, परीक्षा में फेल हुआ जा सकता है, नौकरी में अधिकारी नाराज हो सकते हैं, काम धन्धा चौपट हो सकता है। बिना किसी के कहने पर व्यक्ति स्वयं ही तो इस तरह की बातें सोचता है। अन्यथा क्या यह नहीं सोचा जा सकता कि व्यापार में पहले की अपेक्षा अधिक लाभ होगा, नौकरी में तरक्की हो सकती है, परीक्षा में पहले की अपेक्षा अच्छे नम्बरों से पास हुआ जा सकता है। व्यक्ति इस तरह का शुभ और आशाप्रद चिन्तन क्यों नहीं करता, क्यों वह अशुभ ही अशुभ सोचता है?

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1981 जनवरी

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👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( भाग 3)

समयाभाव का बहाना भी इसी तरह का थोथा बहाना मात्र है और कुछ नहीं। एक दिन के चौबीस घंटों और गुजर गये जीवन की लम्बी अवधि में ऐसी कौन सी व्यस्तता रही हो सकती है जिसके कारण थोड़ा सा पुण्य परमार्थ, कोई छोटा सा सत्कर्म करने का भी समय न मिल सका। खाने, पीने, सोने, जागने, मनोरंजन करने और व्यापार व्यवसाय के बीच से क्या थोड़ा सा भी समय नहीं निकाला जा सकता जो कि किसी सत्कर्म में लगाया जा सके।

माना, व्यापार व्यवसाय के व्यस्त समय में कटौती नहीं कि जा सकती। ऐसा करने से सम्भव है कि किसी हानि का सामना करना पड़ जाये। तथापि विश्राम एवं मनोरंजन के समय में से तो कुछ समय ऐसा निकाला जा सकता है तो पुण्य परमार्थ के कर्म में लगाया जा सके! गद्दी पर बैठे बैठे दान किया जा सकता है। रास्ता चलते-चलते किसी की सहायता की जा सकती है। किसी समय थोड़ा सा समय देकर कुछ ऐसे विद्यार्थियों की परीक्षा ली जा सकती है जो सहायता के पात्र हों और उसी समय से उनको छात्रवृत्ति देकर एक साल तक परोपकार के उस कार्य को चलाया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त मनोरंजन के उपायों में परमार्थ परक गतिविधियाँ और कार्यक्रम शामिल किए जा सकते हैं। बहुत बार जहाँ सैर सपाटे के लिए यात्राओं पर जाया जा सकता है, वन-विहार और जल विहार के लिये प्रस्थान किया जा सकता है तो एक बार किसी दीन-हीन और पिछड़ी बस्ती की और भी जाया जा सकता है। उनकी आवश्यकताएँ और दुःख दर्द का पता लगाया और सहायता की जा सकती है। जहाँ सौ बार संगीत सुना जा सकता है वहाँ एक बार दुखियों की पुकार भी सुनी जा सकती है। जिस प्रकार उस पर खर्च किया जा सकता है, उसी प्रकार उन गरीबों पर भी किया जा सकता है, कहने का तात्पर्य यह है कि यदि परोपकार की भावना सच्ची हो और कुछ करने का उत्साह हो तो समय का प्रभाव आड़े नहीं आ सकता! हजारों ऐसे परोपकार के कार्य हो सकते हैं जो घूमते-चलते और बैठते-उठते किए जा सकते हैं।

अवसर न मिलने की बात भी व्यर्थ है। इसमें भी कोई तथ्य नहीं है। कोई आवश्यक नहीं कि परोपकार के लिए कोई बड़ी योजना बनाई जाये और खास तौर से उसका प्रबंध किया जाये। परमार्थ कोई बड़ा यत्न करने अथवा विश्वविद्यालय खड़ा करने में ही नहीं है और न गरीबों की बस्ती का पुनः-निर्माण करने मात्र में ही है। कहीं भी चल रहे इन आयोजनों में योगदान करने से भी परमार्थ का प्रयोजन पूरा हो जाता है। किसी के आयोजित यज्ञ में कुछ दे देने और किसी संस्था के निर्माण में सहयोग करने में भी उतना ही बड़ा पुण्य है जितना कि स्वयं उसका आयोजन करना! जिस प्रकार खड़े-खड़े व्यावसायिक सौदे कर लिए जाते हैं बैठे-बैठे, बड़े-बड़े कारोबार चला लिए जाते हैं, वैसे ही चलते-चलते किसी जन-निर्माण में चुपके से अपना अंश-दान भी लिखाया जा सकता है। बिना कहे साधन सामग्री भी भेजी जा सकती है। ऐसे कार्यों के लिए किसी अवसर की तलाश करना, किसी तीर्थ यात्रा की प्रतीक्षा करते रहना एक बहाने के सिवाय और कुछ नहीं है। श्रद्धापूर्वक अच्छे और निष्काम मन से किया हुआ एक छोटा सहयोग भी परमार्थ के बड़े आयोजन की तरह ही पुण्य प्रतापी होता है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1970 दिसम्बर

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 13 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 May 2026


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👉 अशुभ चिंतन छोड़िये-भय मुक्त होइये ( भाग 1)

अपने कार्यकारी जीवन में लोग कई तरह की अशुभ आशंकाओं से आतंकित रहते हैं। रोजगार ठीक से चलेगा या नहीं, कहीं व्यापार में हानि तो नहीं हो जाएगी, ...