गुरुवार, 18 जून 2026

👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( भाग 2)

हार्वर्ड मेडिकल कालेज के प्रोफेसर डॉक्टर वाल्टर केनिन लिखते हैं कि “मनुष्य के दोनों गुर्दों के ऊपर चने के आकार की दो छोटी -छोटी ग्रन्थियाँ होती हैं, जिनमें ‘एडरेनलिन’ तत्व भरा होता है। यह खून के साथ मिलकर जब जिगर में पहुँचता है तो वहाँ जमे हुये ग्लाइकोजन को शक्कर में बदल देता है।” यह शक्कर शरीर के तमाम अंगों में पहुँच कर रगों और पुट्टों को फाड़ देता है। क्रोधी मनुष्य को कोई रोग न होते हुए भी इसी हानिकार स्थिति में होकर गुजरना पड़ता हैं।

क्रोध करने के कारणों पर यदि विचार करे तो वे बिलकुल छोटे दिखाई देते हैं। कई बार तो वे बिलकुल निराधार दिखाई पड़ते हैं। संयत मनःस्थिति के अभाव में प्रायः लोग एकाएक उत्तेजित होकर अनर्थ कर डालते हैं। कई बार यह कारण इतने छोटे होते है कि उनके कारण किये गये अपराध पर विश्वास तक नहीं होता। कानपुर का एक समाचार है कि रेलवे स्टेशन पर ननकू नामक व्यक्ति फल बेचा करता था। किसी व्यक्ति ने उससे उधार लीची माँगी पर ननकू ने इनकार कर दिया। इस पर क्षुब्ध होकर उक्त व्यक्ति ने ननकू की चाकू से हत्या कर दी। ये कारण इतने छोटे हैं कि मनुष्य थोड़ा भी अगर ध्यान दे ले, तो इन भयंकर परिणामों से बचा जा सकता है। घरों में थाली फेंकने, कपड़े फाड़ने, बच्चों को पीटने, स्त्रियों को मारने, धमकाने के हेय दृश्य जो उपस्थित हुआ करते हैं, उनमें मानव स्वभाव की छोटी छोटी गलतियाँ और भूलों के सिवाय और कुछ नहीं होता।

घरेलू और सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि क्रोध के विनाशक परिणामों पर ध्यान दें और उनके उन्मूलन का सम्पूर्ण शक्ति से प्रयत्न करें। इससे सदैव हानि ही होती है। प्रायः देखा गया है कि क्रोध का कारण जल्दबाजी है। किसी वस्तु को प्राप्त करने या इच्छापूर्ति में कुछ विलम्ब लगता है तो लोगों को क्रोध आ जाता है। इसलिये अपने स्वभाव में धैर्य और संतोष का विकास करना चाहिये।

जब कोई कार्य गलत हो जाय या कोई हानि हो जाय तो उसे समझने में जल्दबाजी न करें। गम्भीरतापूर्वक सोचें कि यह सब किस कारण से हुआ। आप निर्णय करते समय बुद्धि में पर्याप्त उदारता बनाये रखिये, इससे आपको बड़ी शाँति मिलेगी। यदि कोई दूसरा व्यक्ति आपको अपशब्द या कड़ुवे वचन कहता है, तो आप यह समझ कर कि यह व्यक्ति मूर्ख है, कुछ न बोलिये, मौन व्रत कर लीजिये। इससे आप अकारण उत्तेजित भी नहीं होंगे और कोई अयाचित घटना भी नहीं घटेगी। मन-ही मन सामने वाले की बेवकूफी पर मुस्कराते रहिये, देखिये आपके जी में जरा भी दुःख नहीं आयेगा।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 इच्छाएँ और उनका सदुपयोग (अंतिम भाग)

अच्छी या बुरी, जैसी भी इच्छा लेकर हम जीवन क्षेत्र में उतरते हैं, वैसी ही परिस्थितियाँ, सहयोग भी जुटते चले जाते हैं। हमारी इच्छा होती है एम॰ ए॰ पास करें तो स्कूल की शरण लेनी पड़ती है, अध्यापकों का सहचर्य प्राप्त करते हैं, पुस्तकें जुटाते हैं। तात्पर्य यह है कि इच्छाओं के अनुरूप ही साधन जुटाने की आदत मानवीय है। पर यदि यही इच्छायें अहितकर हों तो दुराचारिणी परिस्थितियाँ और बुरे लोगों का संग भी स्वाभाविक ही समझिये। ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपनी कामना भले ही पूर्ण कर ले, पर पीछे उसे निन्दा, परिताप एवं बुरे परिणाम ही भोगने पड़ेंगे। व्यभिचारी व्यक्ति अपयश और स्वास्थ्य की खराबी से बचा रहे, यह असम्भव है। चोर को अपने कुकृत्य का दण्ड न भोगना पड़े, यह हो नहीं सकता। तब आवश्यकता इस बात की होती है कि हम अच्छी कामनायें ही करें।

विशुद्ध आत्मा से की गई सदिच्छायें बड़ी बलवती होती हैं। ऐसा व्यक्ति स्वयं तो स्वर्गीय सुख अहर्निश आस्वादन करता ही है, साथ ही अनेकों औरों को भी सन्मार्ग की प्रेरणा देकर उन्हें भी सदाचार में प्रवृत्त कर देता है। दूसरों की भलाई करने वालों को सदैव, सर्वत्र सम्मान सुख मिलेगा ही। औरों के दुःख में हाथ बटाने वाले ही सच्चे मित्र प्राप्त करते हैं। परमार्थ की जिनकी वृत्ति होती है, उन्हें औरों की आत्मीयता से वंचित रहते कभी किसी ने न देखा होगा।

दक्षिण के महान् सन्त तिरुवल्लुवर ने लिखा है- “योगी वही है जो साँसारिक इच्छाओं को वशवर्ती करे, औरों की हित-कामना में रत हो।” यह सच ही है कि मनुष्य इस धरती पर एक महान् उद्देश्य लेकर अवतरित हुआ है। यह सुयोग उसे बार-बार नहीं मिलता। आज जो शारीरिक, मानसिक और भावनाओं की क्षमता हमें मिली है, कौन जाने अगले जन्मों में भी मिलेगी अथवा नहीं। फिर हमें सच्चे हृदय से आत्म-कल्याण की ही कामना करनी चाहिये। अपना जीवन लक्ष्य भी पूरा हो सकेगा तथा औरों के प्रति कर्तव्य पालन भी हो सकेगा।

हम स्वास्थ्य, सद्गृहस्थ, धन और यश की कामना करें, पर परमार्थ को भी भुलायें नहीं। आत्म-तुष्टि का जहाँ ध्यान रहे, वहाँ यह भी न भूलें कि इस संसार में हजारों लाखों ऐसे भी हैं, जो हमारी परिस्थितियों से कोसो पीछे पड़े अभाग्य का रोना रो रहे हैं। इनके भी हित एवं कल्याण की इच्छा करना हमारा परम धर्म है। इसके अभाव में तो वह परिस्थितियाँ भी देर तक न टिक सकेंगी, जो आज हमें मिली है। कोई धनी व्यक्ति यदि सारा धन समेट कर बैठ जाय, आस-पास के लोग भूखे मरते रहें, तो वह व्यक्ति सुरक्षा स्थिर रखे रहेगा ऐसी आशा बहुत कम करनी चाहिये।

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। अपने परिवार, पड़ोस, गाँव राष्ट्र की अनेक जिम्मेदारियाँ उस पर होती हैं। हम अपनी सुख सुविधाओं की बात सोचें, पर औरों के प्रति सच्चे हृदय से कर्तव्य पालन करने की इच्छा करे तभी हमारा भला होगा। जीवन लक्ष्य की प्राप्ति भी तभी सम्भव है, जब हम में सदिच्छायें जागृत हों, औरों के प्रति शुभ कामनाओं का विकास हो।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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