गुरुवार, 2 जुलाई 2026

👉 मृत्यु से डर कैसा? (अन्तिम भाग)

मनुष्य जीवन के साथ जुड़े हुए कर्तव्य एवं उत्तरदायित्वों को जीवन काल में ही पूर्ण कर लिया जाए उनके प्रति लापरवाही न बरती जाए, तो ऐसे कर्मनिष्ठ व्यक्ति को मृत्यु का भय क्यों हो? तब महात्मा गाँधी, भगत सिंह, आजाद की तरह हंसते हुए मौत का वरण किया जा सकता है। विवेकानन्द, रामतीर्थ, रामकृष्ण परमहंस की तरह मृत्यु को सुखद बनाया जा सकता है। जो भगवान के दरबार में न्याय की परीक्षा के लिए, जीवन कर्मों का विवरण प्रस्तुत करने के लिए, आत्मा-परमात्मा के प्रिय मिलन के लिए सदैव उद्यत रहते है, उन्हें भय किस बात का? डरता तो वह है जो अपने दायित्वों के प्रति लापरवाही बरतता-उदासीन रहता और कुकर्मों में निरत रहते हुए जीवन को यों ही निरर्थक गंवा देता है।

मौत के इस उज्ज्वल पक्ष के दर्शन की जानकारी प्राप्त कर इसकी तैयारी में जुट पड़ना ही जीवन की सार्थकता है। इसके लिए कितने समय में कितना काम निपटाना है। क्या करना और किन उपायों को अपनाना है। यह सब योजनाबद्ध रूप से ही हो सकता है। हम जीवन की अवधि 75 वर्ष माने और बचपन 15 वर्ष का समझ, तो कार्य करने के लिए 60 वर्ष ही बचते हैं। यह मनुष्य की इच्छा पर निर्भर है कि ऐसे ही निरर्थक कामों में उसे व्यतीत कर दे या ऐसा कुछ करें जिससे आत्म संतोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह की उपलब्धि हो सके। पर यह हो तभी सकता है जब निश्चित समय में निश्चित कार्य निपटा लेने का स्मरण रहे। मृत्यु तो अनिवार्य है, उसे याद रखना एक प्राकृतिक चेतावनी अपनाना है, जिसका अर्थ होता है-जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग समय रहते कर लिया जाए।

किन्तु जितने लोग है जो ऐसा सोचते और करते है बहुधा लोग मृत्यु से बचने की कपोल कल्पना में ही खोये रहते है अथवा उसे विस्तृत कर देते है, मानों उसे कभी मरना ही न पड़ेगा। मौत को गर्व के साथ वरण करने वाले कुछ ही लोग होते है। इनमें से व्यक्ति सम्मिलित होते है जो अपने आप के प्रति पूर्ण आश्वस्त होते हैं। सृष्टा के विश्व उद्यान को सुन्दर और समुन्नत बनाने के कार्य को निष्ठा के साथ करने वाला व्यक्ति ईश्वर के न्यायालय में अपने सुकृत्यों का विवरण प्रस्तुत करने को उत्साहित रहता है। रणक्षेत्र में विजयी सेनापति विजय पताका लहराता हुआ अपने राजा के पास हर्षोल्लास उपस्थित होता है। उसे अपनी विजय पर गर्व होता है। इसके विपरीत युद्ध क्षेत्र से भागने वाला पराजित सिपाही राजा के सामने उपस्थित

मृत्यु उतनी भयावह नहीं जितना कि लोगों ने इसे समझा है। मृत्यु से डरने की अपेक्षा इसकी सुनियोजित तैयारी करने की आवश्यकता है। इस सत्य को समझकर जीवन व्यवहार में परिष्कार-परिमार्जन प्रारम्भ कर दिया जाए तो कोई कारण नहीं कि मृत्यु का भय बना रहे। अपने चरित्र का आधार लेकर सत्कर्मों में संलग्न व्यक्ति अपने कर्तव्यों को पूर्ण करता रहे। यही जीवन यात्रा का सच्चा मार्ग है। कर्तव्य परायणता में ही वास्तविक सुख और शान्ति सन्निहित है। इन्हें पालन कर मौत से तो नहीं पर उसे भय से निश्चय ही बचा जा सकता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988

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👉 सच्चिदानन्द की आस्था और अनुभूति (अन्तिम भाग)

चेतना पर माया, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर के जो आवरण पड़े हैं, इनके कारण जीव इस उद्गम स्त्रोत तक पहुँच नहीं पाता। प्यास निरन्तर बनी रहती है। कस्तूरी अपनी नाभि में लिये हिरन जिस प्रकार सुगन्ध की खोज में मारा-मारा फिरता है, उसी प्रकार जीव आनन्द की खोज में विविध योजनाएँ बनाता, कल्पना करता एवं अथक प्रयत्न करता है। यह पुरुषार्थ असफल, असमाधानकारक ही होता है। अन्तःकरण की गहन परतों में छिपे आनन्द के स्त्रोत की खोज बाह्य जगत में चलने के कारण भटकाव, थकान, अशाँति, निराशा के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता।

आनन्द की मिठास और भी गहन है। इसकी विकृति वासना, तृष्णा, अहंता के रूप में बाहर परिलक्षित होती है। आनन्द की प्रतिच्छाया होने के कारण वासना आकर्षक एवं लुभावनी लगती है। विषयों के सेवन में मन लगने लगता है तो व्यक्ति विलासी, प्रमादी, आलसी होता चला जाता है। जिह्वा का असंयम, कामेन्द्रियों का उपभोग, संग्रह का लोभ अनेकानेक मानसिक एवं शारीरिक व्याधियों को जन्म देता है।

विषयों के सेवन में जब इतनी तृप्ति एवं तुष्टि मनुष्य को मिलती है तो उसके मूल स्त्रोत में कितनी मिठास होगी, यह कल्पना मात्र से ही हृदय पुलकित हो उठता है। भगवान रसमय है। इस रस को आत्म-सत्ता के रूप में ईश्वर ने मनुष्य को धरोहर बनाकर दिया है। यह रस भौतिक नहीं आत्मिक है। इसे अन्तःकरण के उल्लास, सन्तोष, शाँति जैसी दिव्य संवेदनाओं के रूप में अनुभव किया जाता है। भक्ति रस की धाराएँ ऐसे ही अन्तःकरण में बहती हैं। ये ही कभी मीरा, कभी चैतन्य एवं कभी रामकृष्ण परमहंस जैसी विभूतियों के रूप में प्रकट होती हैं। सर्वोच्च सत्ता, परब्रह्म से, मिलन संयोग की स्थिति ऐसी ही जागृति पर आती है।

सत् चित् आनन्द की अनुभूति एवं सुनियोजित सद्गति व्यक्ति को कहीं का कहीं पहुँचा देती है। इसी अनुभूति का अभाव भटकाव को जन्म देता है। कारण शरीर की इन तीन धाराओं को, उनके उद्देश्य को एवं विकृति के दुष्परिणामों को जानना आवश्यक है। समस्त व्याधियों के मूल में जो बीज है वह है व्यक्ति की स्वयं के मरण-धर्मा होने की अनुभूति न होना। आदर्शवादी, उत्कृष्टता में विश्वास का अभाव तथा आनन्द की प्राप्ति हेतु बाह्य जगत में भटकाव। मनुष्य आत्मा-गरिमा से यदि परिचित होने का प्रयास करे, तो वह जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि- रसानुभूति का आनन्द ले सकता है। समस्त विकारों से मुक्ति मिल जाती है जब व्यक्ति स्वयं की अजरता, अमरता पर चिंतन करता है। नश्वर शरीर के लिए वह अपनी क्षमताएँ नष्ट नहीं करता, वरन् सत् की खोज, चित् की स्वीकारोक्ति व आनन्द की अनुभूति में अपने जीवन का सदुपयोग कर परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1981

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 02 July 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 02 July 2026


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