मनुष्य जीवन के साथ जुड़े हुए कर्तव्य एवं उत्तरदायित्वों को जीवन काल में ही पूर्ण कर लिया जाए उनके प्रति लापरवाही न बरती जाए, तो ऐसे कर्मनिष्ठ व्यक्ति को मृत्यु का भय क्यों हो? तब महात्मा गाँधी, भगत सिंह, आजाद की तरह हंसते हुए मौत का वरण किया जा सकता है। विवेकानन्द, रामतीर्थ, रामकृष्ण परमहंस की तरह मृत्यु को सुखद बनाया जा सकता है। जो भगवान के दरबार में न्याय की परीक्षा के लिए, जीवन कर्मों का विवरण प्रस्तुत करने के लिए, आत्मा-परमात्मा के प्रिय मिलन के लिए सदैव उद्यत रहते है, उन्हें भय किस बात का? डरता तो वह है जो अपने दायित्वों के प्रति लापरवाही बरतता-उदासीन रहता और कुकर्मों में निरत रहते हुए जीवन को यों ही निरर्थक गंवा देता है।
मौत के इस उज्ज्वल पक्ष के दर्शन की जानकारी प्राप्त कर इसकी तैयारी में जुट पड़ना ही जीवन की सार्थकता है। इसके लिए कितने समय में कितना काम निपटाना है। क्या करना और किन उपायों को अपनाना है। यह सब योजनाबद्ध रूप से ही हो सकता है। हम जीवन की अवधि 75 वर्ष माने और बचपन 15 वर्ष का समझ, तो कार्य करने के लिए 60 वर्ष ही बचते हैं। यह मनुष्य की इच्छा पर निर्भर है कि ऐसे ही निरर्थक कामों में उसे व्यतीत कर दे या ऐसा कुछ करें जिससे आत्म संतोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह की उपलब्धि हो सके। पर यह हो तभी सकता है जब निश्चित समय में निश्चित कार्य निपटा लेने का स्मरण रहे। मृत्यु तो अनिवार्य है, उसे याद रखना एक प्राकृतिक चेतावनी अपनाना है, जिसका अर्थ होता है-जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग समय रहते कर लिया जाए।
किन्तु जितने लोग है जो ऐसा सोचते और करते है बहुधा लोग मृत्यु से बचने की कपोल कल्पना में ही खोये रहते है अथवा उसे विस्तृत कर देते है, मानों उसे कभी मरना ही न पड़ेगा। मौत को गर्व के साथ वरण करने वाले कुछ ही लोग होते है। इनमें से व्यक्ति सम्मिलित होते है जो अपने आप के प्रति पूर्ण आश्वस्त होते हैं। सृष्टा के विश्व उद्यान को सुन्दर और समुन्नत बनाने के कार्य को निष्ठा के साथ करने वाला व्यक्ति ईश्वर के न्यायालय में अपने सुकृत्यों का विवरण प्रस्तुत करने को उत्साहित रहता है। रणक्षेत्र में विजयी सेनापति विजय पताका लहराता हुआ अपने राजा के पास हर्षोल्लास उपस्थित होता है। उसे अपनी विजय पर गर्व होता है। इसके विपरीत युद्ध क्षेत्र से भागने वाला पराजित सिपाही राजा के सामने उपस्थित
मृत्यु उतनी भयावह नहीं जितना कि लोगों ने इसे समझा है। मृत्यु से डरने की अपेक्षा इसकी सुनियोजित तैयारी करने की आवश्यकता है। इस सत्य को समझकर जीवन व्यवहार में परिष्कार-परिमार्जन प्रारम्भ कर दिया जाए तो कोई कारण नहीं कि मृत्यु का भय बना रहे। अपने चरित्र का आधार लेकर सत्कर्मों में संलग्न व्यक्ति अपने कर्तव्यों को पूर्ण करता रहे। यही जीवन यात्रा का सच्चा मार्ग है। कर्तव्य परायणता में ही वास्तविक सुख और शान्ति सन्निहित है। इन्हें पालन कर मौत से तो नहीं पर उसे भय से निश्चय ही बचा जा सकता है।
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988
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