गुरुवार, 6 अगस्त 2026

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (अंतिम भाग)

सुख-दुःख के प्रति यदि मनुष्य का दृष्टिकोण सम हो जाये तो उसके लिये चिन्ता, शोक, व्यग्रता तथा विकलता के सारे ही कारण समाप्त हो जायें। अपने प्रति सुखद परिस्थितियाँ पाकर जहाँ कोई प्रसन्न होता है, वहाँ प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उसे और न कुछ इसी विचार से प्रसन्न होना चाहिए जो परिस्थितियाँ मेरे लिए दुःख का हेतु बनी हुई हैं उनमें कहीं न कहीं हमारा कोई दूसरा मानव-बन्धु सुख का अनुभव प्राप्त कर रहा है।

निःसन्देह वह मनुष्य बहुत ही दयनीय है जो सुख में तो प्रसन्न और अप्रिय परिस्थिति में आँसू बहाता है। वह प्रकृति के इस मोटे से विधान को नहीं समझ पाता कि जब उसे प्रसन्नता प्राप्त हुई है उससे पहले वह प्रतिकूल परिस्थितियों से परेशान था। दुःख के कारण दूर हुए और उसे सुख प्राप्त हुआ। आज जब वह दुखंद परिस्थितियों में है तो क्यों रोता है। दुःख के पीछे सुख और सुख के पीछे दुःख संसार का एक अविकल नियम है,न तो यह कभी बदला है और न बदला जा सकता है। तब फिर निरर्थक द्वन्द्वात्मक स्थिति को क्यों स्वीकार किया जाये। बड़ी से बड़ी आपत्ति और भयानक से भयानक दुःख आने पर मनुष्य उससे अभिभूत रहता हुआ भी किसी न किसी समय क्षण-भर को उसे भूल ही जाता है और एक शान्तिपूर्ण स्वाभाविक अवस्था में आ जाता है तब क्या कारण है कि शान्ति के उस क्षणिक समय को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

वास्तविक बात तो यह है कि न तो दुःख हमें हर समय पकड़े रहता है और न उसमें ऐसी कोई शक्ति होती है कि हमारे अनचाहे वह हमें अप्रसन्न अथवा विषादग्रस्त बनाये रहें। यदि ऐसा होता तो एक बार आये हुये दुःख से मनुष्य कभी न छूट पाता। आठों याम जीवन-भर वह एक ही दुखंद स्थिति में तड़पता रहता। किन्तु ऐसा कभी होता नहीं। दुःखद परिस्थितियाँ आती हैं—मनुष्य परेशान होता है—और फिर एक दो दिन में वह स्थिति समाप्त हो जाती है। इसका ठीक-ठीक अर्थ यही है कि दुःख-सुख का अपना कोई अस्तित्व अथवा प्रभाव नहीं है। उसकी वेदना हमारे स्वीकृति, अस्वीकृति पर निर्भर करती है। जिन परिस्थितियों को हम दुःखद स्वीकृत कर लेते हैं वे हमें दुःख और जिन परिस्थितियों को हम सुखद स्वीकार कर लेते हैं वे हमें सुख देने लगती हैं।

मनुष्य की यह स्वीकृति, अस्वीकृति एक मात्र उसके दृष्टिकोण तथा मानसिक स्तक पर निर्भर करती है। यदि हमारा मानसिक स्तर गिरा हुआ है। हममें मनुष्योचित धीरता गम्भीरता और सहिष्णुता की कमी है तो अवश्य ही हम जरा-जरा-सी प्रतिकूलताओं में दुःखी होकर रोते कलपते रहेंगे। इसके विपरीत यदि हम अन्दर से गम्भीर आत्मा से ऊँचे हैं तो कोई भी परिस्थिति हमें प्रभावित नहीं कर सकती। हम सुख-दुःख मय इस नियति-नाटिका को उत्साहपूर्वक देखते हुए जीवन यापन करते रहेंगे। ऐसी स्थिति में तो हमें क्या दुःख और क्या सुख कोई भी विक्षुब्ध न बना पायेंगे।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1966
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 06 Aug 2026



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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 06 Aug 2026


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भगवान सब को देखता है।

एक बार एक भला आदमी बेकारी से दुखी था। उसकी यह दशा देखकर एक चोर को सहानुभूति उपजी। उसने कहा-मेरे साथ चला करो चोरी में बहुत धन मिला करेगा। वह बेकार आदमी तैयार हो गया। पर उसे चोरी आती न थी। उसने साथी से कहा मुझे चोरी आती तो है नहीं करूँगा कैसे? चोर ने कहा इसकी चिन्ता न करो मैं सब सिखा लूँगा। पहले हलका काम कराऊँगा फिर कठिनाई के मौके पर चलना। वह तैयार हो गया।

चोर एक किसान का पका हुआ खेत काटने गया। वह खेत गाँव से कुछ दूर जंगल में था। वैसे तो रात में उधर कोई रखवाली नहीं थी। तो भी चोर ने उस नये साथी को खेत के मेंड़ पर खड़ा कर दिया कि वह निगरानी करता रहे कि कही कोई देखता तो नहीं है। वह खुद खेत काटने लग गया।

नये चोर ने थोड़ी ही देर में आवाज लगाई कि -भाई जल्दी उठों ,यहाँ से भाग चलें ,खेत का मालिक पास ही खड़ा देख रहा है, मैं तो भागता हूँ।, चोर काटना छोड़ कर उठ खड़ा हुआ ओर वह भी भागने लगा। कुछ दूर जाकर दोनों खड़े हुए तो चोर ने साथी से पूछा-मालिक कहाँ था? कैसे देख रहा था? उसने कहा- ईश्वर सब का मालिक है। इस संसार में जो कुछ है, उसी का है। वह हर जगह मौजूद है और सब कुछ देखता है। मेरी आत्मा ने कहा-ईश्वर यहाँ भी मौजूद है और हमारी चोरी को देख रहा है। ऐसी दशा में हमारा भागना ही उचित था।

भगवान सब जगह है और सब को देख रहा है। उसके न्याय और दंड से कोई बच नहीं सकता। यह विश्वास करने वाला मनुष्य ही पापों से बच सकता है।

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