रविवार, 30 अगस्त 2026

👉 प्रेम साधना के पथ पर (अंतिम भाग)

निस्वार्थ सच्चा प्रेम ज्ञान भी है, शक्ति भी। जो प्रेम की प्रेरणा से कार्य करता है उसे न कोई कि वास्तव में यह प्रेम की एक आन्तरिक दशा हे देने को बाध्य करती है, अपना स्वयं का ख्याल नहीं करती। उत्सर्ग पर ही, त्याग पर ही प्रेम जीवित रहता है। प्रेम साधना पथ पर अग्रसर होने के लिए त्याग को जीवन में अपनाना आवश्यक है। ज्यों-ज्यों त्याग वृत्ति बढ़ेगी प्रेम का पौधा भी उसी क्रम में बढ़ता जायेगा और सम पर जब फलित और पुष्पित होगा तो सारा वातावरण उसकी मधुर गंध से महक उठेगा, जहाँ मनुष्य को अपार शक्ति, आनन्द, सन्तोष, प्रसन्नता प्राप्त होगी।

प्रेम सहिष्णु होता है वह सब कुछ सहता है यही तो सच्चे प्रेम की पहिचान है। ईश्वर प्रेम के पीछे लोग कितने दुःख और परेशानियाँ सहन करते हैं। मीरा ने जहर का प्याला पिया, दयानन्द को सत्रह बार जहर खाना पड़ा और अपमान सहन करना पड़ा। कितने ही देवभक्तों ने देश प्रेम के लिए अपने बलिदान किए, भयंकर यातनाएँ सहन कीं। मासूम बच्चे दीवारों में चुनना दिये गये किन्तु यह सब किस लिए? प्रेम के लिए। प्रेम भरपूर सहनशीलता चाहता है। क्रोध अथवा झुँझलाहट उसके पास नहीं फटकते। आपत्तिकाल को भी प्रेम सहिष्णुता के माध्यम से सुखमय बना लेता है। प्रेम शिकायत नहीं करता जो कुछ आये उसे सहन करने को तैयार रहता है तभी तो प्रेम साधना की सुदीर्घ मंजिल प्राप्त होती है। प्रेमी सभी परिस्थितियों का सहर्ष स्वागत करता है। जिससे भी प्रेम का नाता जोड़ लिया है उसके लिये सब कुछ सहन करना, अपने प्रेम सम्बन्ध को ही प्रमुख मान अन्य परिस्थितिजन्य झंझावातों से, कठिनाइयों से विचलित न होना, उन्हें सहर्ष सहन करना ही सच्चे प्रेम के लिए अभीष्ट है।

निस्वार्थता प्रेम का मूलाधार है। जो प्रेम किया जाय वह निस्वार्थ हो। स्वार्थ ही गन्दी बू प्रेम में पैदा हो जाती है तो वह प्रेम नहीं रहता प्रत्युत पाप बन जाता है, यह स्वार्थ भले ही कैसा भी हो, प्रेम पथ के पथिक के लिये सर्वथा त्याज्य है। स्वार्थ मय प्रेम संकुचित होता है इसलिए वह दुखदायी और भार स्वरूप होता है। थोड़ा और बहुत स्वार्थ भी प्रेम को कलंकित करता है।

प्रेम ही जीवन है, जीवन ही प्रेम है। प्रेम साधना ही जीवन साधना है। प्रेम साधना के पथ पर अग्रसर होकर अपने सारे भेद भावों, विकारों को निकालकर सब से प्रेम करना शुरू कीजिये। उस परमपिता परमात्मा से प्रेम कीजिए। उसके बताए हुए विश्व से, मानव जाति से, पशु-पक्षियों से सब से प्रेम कीजिए। प्रेम से ही जीवन को सराबोर कीजिए। अनन्त जीवन धार की एक कड़ी रूप में ही यह हमारा भौतिक जीवन हे। प्रकृति के विधान के अनुसार यह शरीर और अनन्य जगत समय पर नष्ट हो जाता है किन्तु जीवन धारा अगाध गति से चलती रहती है। वही सत्य है सत्य के लिये समग्र के लिए ही प्रेम कीजिए। प्रेम, प्रेम सर्वत्र प्रेम ही के दर्शन कीजिए। चार दिन की जिन्दगी के लिये तुच्छ स्वार्थ, अहंकार, संग्रह के लिए जीवन को नष्ट करना, जीवन के साथ विश्वासघात है, ईश्वर के प्रति विश्वासघात है। प्रेम-स्वरूप यह सृष्टि और हमारा जीवन प्रेममय होने के लिए ही है।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1975 

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