बुधवार, 15 जुलाई 2026

👉 विलासिता हमें अपंग करके छोड़ेगी (भाग २)

1924 में प्रोफेसर इलियट स्मिथ ने मिश्र की 30000 ममी (मिश्र में एक विशेष प्रकार के मशाल में शवों को सुरक्षित रखने की परम्परा है, इन शवों को ही ममी कहते है) का परीक्षण किया। उच्च वर्ग वाले शवों को छोड़कर अन्य लोगों के दाँत का क्षय बहुत कम मिला। कुछ अर्थराइटिस, किडनी के स्टोन के तीन और एक गाल के स्टोन का रोगी मिला। रिकेट्स और कैन्सर रोम के एक भी लक्षण किसी भी ममी में नहीं मिले। उस समय मिश्र के लोग भी अकृत्रिम और प्राकृतिक भोजन करते थे, वे लगभग पूर्ण शाकाहारी थे, तब ऐसी स्थिति थी, किन्तु स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है पर अकेले कैंसर में ही हजारों रोगी है, इससे रोगों की बढ़ोत्तरी और स्वास्थ्य में अवांछित परिवर्तन का पता चलता है। कुछ हजार वर्ष बाद तो सम्भवतः एक ही बच्चा शुद्ध जन्म नहीं लेगा, उनमें से अधिकाँश कोई न कोई रोग लेकर जन्मेंगे कई तो ऐसे भी होंगे, जो आज के वीर्य रोगों से रोगी मनुष्य की क्रमागत संतान होने के कारण नपुंसक और लिंगहीन भी होंगे। आज की बीमारियों के सारे लक्षण संस्कार रूप में पहुँचने की बात विज्ञान पुष्ट ही कर चुका है, इसलिये कोई सन्देह नहीं, जो आने वाली कार्टून पीढ़ी अपने अनेक अंग ही खो दे। पैर की उँगलियों और बालों के बारे में तो जीवन-शास्त्री आशंका व्यक्त ही करते है कि हाथों में केवल एक-एक उँगली होगी और सारे के सारे बालों से पुरुषों को ही नहीं, स्त्रियों को भी मुक्ति मिल जायेगी।

इसका कारण हे, मानवीय मस्तिष्क के धन क्षेत्र का निरन्तर विस्तार। अब मनुष्य चलता बहुत अधिक है पर बैठे-बैठे चलता है। रेलें, मोटरें, ताँगे और रिक्शे चलाते है, अब मनुष्य खाता बहुत है पर भूख नहीं, जीभ खिलाती है, अब मनुष्य सुनता बहुत है पर स्वाभाविक इच्छा के अनुरूप नहीं मोटरें, रेल-गाड़ियाँ जहाज, मिलों-कारखानों के भौंपू, मशीनों की गड़गड़ाहट सुननी पड़ती है, अब मनुष्य देखता बहुत है पर आत्मा को बलवान और सौंदर्यवान बनाने वाले प्राकृतिक दृश्य, हरियाली और पुष्प, पौधों को शोभा नहीं, सिनेमा के दृश्य कृत्रिम पेन्सिलों से रंगे हुये चित्र वह भी दूषित भाव पैदा करने वाले। पहले लोग पदयात्रायें करते थे।, एकान्तवास रखा करते थे, प्राकृतिक दृश्यों के बीच रहा करते थे, संगीत और लोक गीतों का आनन्द लिया करते थे, इससे सूक्ष्म मनोजगत को प्रफुल्लित और आत्मा को शाँति देने वाले ‘हारमोन्स’ का स्राव होता रहता था और मनुष्य स्वस्थ और सुडौल बना रहता था। स्वाभाविक प्रक्रियायें बेकार मस्तिष्क की भूख बन गई है। 

सोचने-विचारने की प्रक्रिया के सम्बन्ध रखने वाले केन्द्रों, स्नायु-कोषों और नस-तंतुओं में निवास होता जा रहा है बढ़ी हुई जनसंख्या को तो भोजन चाहिये चाहे वह भीख माँग कर अमेरिका से मिले या समुद्र की मछलियों और अन्य जीवों को मारकर मिले। मस्तिष्क के अवयव बढ़ेंगे तो उन्हें भी चारा चाहिये। उन्हें प्रकृति ने जितना नियत किया है, उससे अधिक मिल नहीं सकता, फलस्वरूप वे हिंसा करते है, अर्थात् आँख की, नाक, कान और पेट की शक्ति चूसते है, इससे होगा यह कि और अंग कमजोर होते चले जायेंगे। विचार शक्ति प्रौढ़ होती चली जायेगी और इन्द्रियों की क्षमता गिरती चली जायेगी। अर्थात् यह कार्टून की आकृति वाले लोगों में शरीर ही क्षीण न होगा वरन् बहरे भी हो सकते है, गूँगे भी, आँखों से कम दीखने और एक फर्लांग चलकर थक जाने की बीमारियाँ जोर पकड़ लेंगी। इनसे बचने के लिए तब श्रवण यन्त्रों, अणुवीक्षण, दूरवीक्षण यन्त्रों को लोग उसी तरह शरीर से लटकाये घूमा करेंगे, जैसे स्त्रियाँ तरह-तरह के जेवरों से जकड़ी रहती है। मनुष्य और कम्प्यूटर में तब कोई विशेष अन्तर न रह जायेगा।

मनुष्य को प्रकृति ने जो दाँत दिये है, वह शाकाहार के लिये उपयुक्त है, माँसाहारी जन्तुओं के दाँत बड़े और नुकीले (कैनाइन टीथ) होते है। उनके पंजों के नाखून भी मुड़े हुए और तीखे होते है, क्योंकि माँस नोंचने में उनसे सहायता मिलती है, मनुष्य का पिछला इतिहास बताता है कि उनका मुख आगे निकला हुआ और जबड़े लम्बे होते थे, क्योंकि तब उसे अधिकाधिक कच्चा खाना पड़ता था, यदि मनुष्य माँस भक्षी हुआ तो उसके दाँत और उँगलियों के नाखून भालुओं, चीतों जैसे हो सकते है या फिर कच्चे और दाँतों से चबाकर खाने वाले खाने के कम उपयोग से उसका मुखर भीतर ही धँसता चला जायेगा। मुख ऐसा लगेगा, जैसे किसी गुफा में घुसने के लिए ‘होल’ (छेद) बनाया गया हो।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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👉 हमारी आध्यात्मिक जिज्ञासा और आकांक्षा (भाग ३)

मनुष्य जब इतिहास के सत्पात्रों के विषय में बढ़ता अथवा उनकी वीरता, बलिदान और त्याग की कथायें सुनता, किसी सत्पुरुष को जनसेवा और लोक रतन के कार्य करते देखता तो उसके मन में इच्छा होती है कि वह भी जनहित में ऐसे ही साहस और वीरता के काम कर सकता। इसी प्रकार त्याग एवं बलिदान द्वारा आत्मा को सुख दे पाता। इसी स्फूर्ति, दृढ़ता और उत्साह आदि गुणों का अधिकारी बनता तो कितना आनन्द, कितना उल्लास और कितनी सुख शाँति होती।

तात्पर्य यह है कि मनुष्य जिस और जहाँ भी सत्य, शिव और सुंदरम् के साथ सतोगुण का दर्शन करता है, उसकी आत्मा में वैसा बनने की प्यास जाग उठती है। उस उन दृश्यों, उन गुणों और उन महानताओं से तादात्म्य अनुभव होने लगता है। उसकी वह कामना, जिज्ञासा अथवा इच्छा उसकी आत्मीयता की ही द्योतक होती है। वास्तविकता यह है कि वह आकर्षण, वह आत्मीयता उस दृश्य की नहीं होती, जिसे वह बाहर देखता है। उसकी सारी सौन्दर्यानुभूति उसकी अपनी अन्तरात्मा की होती है, जो दृश्य का आत्मबल पाकर स्फुरित ही उठती है और जिसे वह अज्ञानवश बाह्य उपकरणों में मानता है।

मनुष्य का वही सुन्दर स्वरूप जिसे वह बाह्य दृश्यों, पर आरोपित करके देखता है, उसका अपना वास्तविक स्वरूप है, जिसकी उसे जिज्ञासा करनी चाहिये। उसी आन्तरिक सौंदर्य और आनन्दानुभूति को बिना किसी उपादान अथवा आनन्द के देखना और पाना आत्म साक्षात्कार है।

मनुष्य अपने आत्म रूप में बड़ा ही सुन्दर और आनंद मय है। यही कारण है कि जब वह किसी को गदा देखता है तो कामी कामना नहीं करता कि वह भी वैसा ही हो जाता। किसी अपराधी को जेल जाते देखकर उसके मन में यह जिज्ञासा कभी नहीं होती कि वह भी वैसा अपराध करके जेल जा सकता है। किसी शुष्क अथवा निकृष्ट पशु पक्षी को देखकर उसके हृदय में यह उत्सुकता नहीं होती कि वह भी उसी की तरह सूख जाता अथवा उसी की तरह कुरूप बन जाता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 15 July 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 July 2026


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