सोमवार, 15 जून 2026

👉 काम करने से जी न चुराइये (भाग 2)

मनुष्य-जीवन का सच्चा सदुपयोग उसे सत्कर्मों में लगाने से ही होता है। कुछ दिन मौज-मजा लूटने में ही उसे बिता दिया तो इसमें श्रेय की कौन-सी बात रही। भावी सन्तति को सच्ची दिशा में ले जाने के लिये, प्रत्येक व्यक्ति को कर्म करना आवश्यक है। निष्क्रियता से व्यक्तित्व का विकास रुकता है, जिससे मानवीय पतन की सम्भावनायें बढ़ जाती हैं। शिकागो विद्यालय के शरीर क्रिया विज्ञान के प्रख्यात पण्डित डॉक्टर एलेक्जेंडर क्लीटमैन ने 35 वर्षों के अन्वेषण से आलस्य की प्रतिक्रियाओं का पता लगाया, उन्होंने लिखा है-”आलस्य का अर्थ है व्यक्ति की मानसिक अयोग्यता और इसका परिणाम विनाश ही हो सकता है।”

आलस्य से शरीर का तापमान गिरता है। यह ह्रास एक-दो डिग्री तक होता है, इससे शिथिलता बढ़ जाती है।” आलस्य में जीवन बिताने वाले लोगों की उम्र इसीलिये कम हो जाती है। इसके विपरीत श्रमिकों, मजदूरों की आयु अधिक होती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय भी यही हैं कि संसार की अधिक उम्र वाली जातियाँ वही हैं, जहाँ काम की प्रतिष्ठा होती है।

सन्त विनोबा ने अपने एक प्रवचन में काठियावाड़ के मध्यम वर्ग को सम्बोधित करते हुये बड़े महत्वपूर्ण शब्द कह थे । उन्होंने बताया “मैं इतना ही कहूँगा कि काम के लिये आपमें इज्जत और प्रेम का भाव होना चाहिये। इसके अभाव में अच्छी सेवा न हो सकेगी। काम तो होगा, लेकिन जिस हेतु से वह काम शुरू हुआ है, वह हेतु पूरा नहीं होगा। इसलिये काम के लिये शरीर अच्छा,मजबूत बनाओ और काम के लिये प्रीति और आदर रखो। इसके लिए अपनी चेष्टाओं को निरन्तर जागृत रखने और शक्ति शाली बनाने की अधिक आवश्यकता प्रतीत होती है। शक्ति शरीर की बिजली है और कर्म प्रकाश। हमारी शक्ति जितनी प्रगाढ़ होगी, क्रिया की रोशनी उतना ही जगमगायेगी और दूसरों को रास्ता बतायेगी।

श्रमशीलता को असम्मान तथा हीनता का बोधक मानना नासमझ लोगों को शोभा दे सकता है। आज के शिक्षित वर्ग में यह बुराई गहराई तक प्रवेश कर गई है, जिससे सभी ओर दुःख और निराशा, आत्म-प्रवंचना और आत्महत्याओं के दृश्य दिखाई देते हैं। इससे जन-जीवन बड़ा अस्त-व्यस्त हुआ है। पाश्चात्य देशों की, जिनमें अमेरिका, रूस, ब्रिटेन आदि प्रमुख हैं, उन्नति का एक ही रहस्य है कि वहाँ काम की इज्जत है, आलस्य की नहीं। संसार के बड़े-बड़े महापुरुषों, सन्त-महात्माओं, समाज सुधारकों ने व्यवहारिक जीवन में इस बात के उदाहरण प्रस्तुत किये है कि काम बड़प्पन का चिन्ह है। भगवान कृष्ण, राम, बुद्ध, नामदेव, सुकरात, मुहम्मद आदि सभी महापुरुषों ने कर्म की महत्ता प्रतिपादित की है। महात्मा गान्धी जी स्वयं चक्की पीस कर उसका आटा खाते थे। इनमें से किसी की इज्जत कम नहीं हुई। आज भी लोग इन्हें श्रद्धा से माथा टेकते हैं।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 

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👉 इच्छाएँ और उनका सदुपयोग (भाग 1)

मनुष्य इच्छाओं का पुतला है। उसके व्यावहारिक जीवन में प्रतिक्षण अनेकों आकाँक्षायें उठा करती है। स्वास्थ्य की, धन की, स्त्री और यश की अनेकों कामनायें प्रत्येक मनुष्य में होती हैं। इसके विविध काल्पनिक चित्र मस्तिष्क में बनते बिगड़ते रहते हैं। जैसे ही कोई इच्छा स्थिर हुई कि मानसिक शक्तियाँ उसी की पूर्ति में जुट पड़ीं, शारीरिक चेष्टायें उसी दिशा में कार्य करने लगती हैं। संसार की विभिन्न गतिविधियाँ व क्रिया कलाप चाहे वह भौतिक हों अथवा आध्यात्मिक, इच्छाओं की पृष्ठभूमि पर निरूपित होते हैं। रचनात्मक कदम तो पीछे का है, पहले तो सारी योजनाओं को निर्धारित कराने का श्रेय इन्हीं इच्छाओं को ही है।

स्थिर तालाब के जल में जब किसी मिट्टी के ढेले या कंकड़ को फेंकते हैं तो उसमें लहरें उठने लगती हैं। पत्थर के भार व फेंकने की गति के अनुरूप ही लहरों का उठना, तेजी व सुस्त गति से होता है। ठीक इसी प्रकार हमारी इच्छायें क्या हैं, यह हमारी शारीरिक चेष्टायें, चेहरे के हाव-भाव बताते रहते है। व्यभिचारी व्यक्ति की आँखों से हर क्षण निर्लज्जता के भाव परिलक्षित होंगे। चेहरे का डरावनापन अपने आप व्यक्त कर देता है कि यह व्यक्ति चोर, डाकू, बदमाश है। कसाई की दुर्गन्ध से ही गाय यह पहचान लेती है कि वह वध करना चाहता है।

इसी प्रकार सदाचारी, दयाशील व्यक्तियों के चेहरे से सौम्यता का ऐसा माधुर्य टपकता है कि देखने वाले अनायास ही उनकी ओर खिंच जाते हैं। विचारयुक्त व गम्भीर मुखाकृति बता देती है कि यह व्यक्ति विद्वान, चिन्तनशील व दार्शनिक है। प्रेम व आत्मीयता की भावना से आप चाहे किसी जीव-जन्तु को देखें, वह भयभीत न होकर आपके उदार भाव की अन्तरमन से प्रशंसा करने लगेगा।

अनन्त आनन्द के केन्द्र परमात्मा के हृदय में एक भावना उठी- “एकोऽहंबहुस्यामि” और इसी का मूर्तिमान रूप यह मंगलमय संसार बन कर तैयार हो गया। यह उनकी सद्-इच्छा का ही फल है कि संसार में मंगलदायक और सुखकर परिस्थितियाँ अधिक हैं। यदि ऐसा न होता तो यहाँ कोई एक क्षण के लिये भी जीना न चाहता। पर अनेकों दुःख तकलीफों के होने पर भी हम मरना नहीं चाहते, इसलिये कि यहाँ आनन्द अधिक हैं।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 15 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 June 2026


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👉 हमारी चरित्र-भ्रष्टता कैसे मिटे? (भाग 1)

बुराई, भ्रष्टाचार, अपराधों के सम्बन्ध में हमारी शिकायतें दिनों दिन बढ़ती जा रही हैं। प्रतिदिन एक बँधे हुए ढर्रे की तरह हम नित्य ही इस सम्बन्...