गुरुवार, 11 जून 2026

👉 उतना बोलिए जितना आवश्यक हो (भाग 2)

व्यवहारिक जीवन में भी मौन अनर्थों को पैदा होने से रोकता है। मौन कभी भी दूसरों को हानि नहीं पहुँचा सकता। समाज में विग्रह, लड़ाई, झगड़े, कलह, आदि को शुरुआत वाणी से ही होती है। एक दूसरे को भला बुरा कहने पर ही लोग उत्तेजित होकर अनर्थ करते हैं। लेकिन जब मौन का अवलम्बन लिया जाय, तो बुरे शब्द मुख से नहीं निकलेंगे और विग्रह की स्थिति ही पैदा होगी। इतना ही नहीं कोई व्यक्ति लड़ना चाहे, चलाकर छेड़छाड़ करे, झगड़ने लगे, ऐसी स्थिति में दूसरा पक्ष यदि मौन का अवलम्बन ले ले तो झगड़ा कभी हो ही नहीं सकता।

मौन की स्थिति में ही हम दूसरों को अधिक सुन सकते हैं और अपने ज्ञानकोष को बढ़ा सकते हैं। लोगों को समझने, उनका अध्ययन करने के लिए भी मौन की आवश्यकता होती है। एक कहावत के अनुसार- “मौन बुद्धिमानी है और अच्छे मित्र बनाता है।” सचमुच जो वाचाल होते है उनसे भले आदमी दूर रहने की ही प्रयत्न करते हैं। मौन की स्थिति में हम अपने अज्ञान, मूर्खता फूहड़पन को भी प्रकाशित होने से रोक सकते हैं। भर्तृहरि ने कहा है- “विधाता ने मौन अर्थात् चुप रहना अज्ञानता का ढक्कन बनाया है। ज्ञानियों की सभा में अज्ञानियों के लिए मौन ही सर्वोत्तम आभूषण और रक्षक कवच है।” अज्ञानी आदमी यदि वाचाल होगा तो जल्दी ही अपनी मूर्खता प्रकट कर देगा लेकिन मौन का अवलंबन लेकर वह अज्ञान-प्रदर्शन से अपने आपको रोक सकता है। जिस तरह गन्दगी के दुष्प्रभाव और बदबू को दूर करने के लिये उसे ढक देना आवश्यक है, उसी तरह अज्ञान, मूर्खता, फूहड़पन को छिपाये रखने के लिए मौन अपेक्षित है।

शास्त्रों में तीन तरह के पाप बताए हैं। वाणी, कर्म और मन से किए गये दुष्कृत्य ही ये त्रिपाप हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मौन के अवलम्बन से हम वाणीकृत पापों से तो निश्चित रूप से बच ही सकते हैं। किसी को अप्रिय, कठोर वचन बोलना, गाली देना, झूठ बोलना, चुगलखोरी, आलोचना, आदि वाचिक पापों से मौन ही हमें बचा सकता है। इस तरह मौन का अवलम्बन लेने से हम जीवन में किए जाने वाले एक तिहाई पापों से बच जाते हैं।

हम जीवन में जितना अनर्थक प्रलाप करते हैं, निरर्थक शब्द बोलते हैं, यदि उतने समय में कुछ काम किया जाय, तो उतने से एक नया हिमालय पहाड़ बन जाय। शब्दों की इस अथाह शक्ति को व्यर्थ ही नष्टकर क्या हम दीन नहीं बन रहे? यदि इन शब्दों का उपयोग हम किसी को सांत्वना देने में भगवद् भजन, प्रभु नाम स्मरण, संगीत, जप कीर्तन आदि में, करें तो हमारा और समाज का कितना भला हो? साथ ही हम वाचालता से उत्पन्न दोष, जिनसे लड़ाई, झगड़े, क्लेश, ईर्ष्या, द्वेष आदि का उदय होता है, उनसे बच जायें।
वाचालता, व्यर्थ प्रलाप, चाहे वह किसी प्रेरणा से क्यों न हो हानिकर है। इस सम्बन्ध में एक्रेन रिवले से लिखा है “अण्डे देने के बाद मुर्गी यह मूर्खता करती है कि वह चहचहाने लगती है। उसकी चहचहाहट सुन कर डोमकौवा आ जाता है, वह उसके अण्डे भी छीन लेता है तथा उन वस्तुओं को भी खा जाता है, जो उसने अपनी भावी सन्तान के लिए रखी थीं।” कहावत है “वह कुत्ता अच्छा नहीं होता जो ज्यादा भौंकता है। इसी तरह वाचाल व्यक्ति को भला नहीं कहा जा सकता।”

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 

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👉 सच्चाई जीवन की सर्वश्रेष्ठ रीति-नीति (अन्तिम भाग)

सत्य का सम्पूर्ण तत्व है। उसके खण्ड नहीं किये जा सकते। सत्य बोला जाय और उसके अनुसार आचरण न किया जाय। सत्याचरण और सत्य भाषण तो किया जाय किन्तु मनोदशा उसके अनुसार न रखी जाय तो उसे सत्यनिष्ठा नहीं कहा जायेगा। ऐसे विखंडित सत्य से किसी प्रकार के लाभ की आशा नहीं की जा सकती। टूटा-फूटा, अस्त-व्यस्त अथवा कौटिल्यपूर्ण सत्य भी अमृत का ही एक स्वरूप है। सत्य का स्वरूप वर्णन करते हुए शास्त्रकार ने कहा है-
“सत्य यथाथे वांग्  मनसे यथा दृष्टं तथानुमतिं तथा वांग् मनश्चेति, परत्र स्वबोध संक्रान्तये वागुप्ता सा यदि न वंचिता, भ्रान्ता वा, प्रतिपन्ति बन्ध्या व भवेत्।”

“सत्य का तात्पर्य है- वाणी के साथ-साथ मन का भी सच्चा होना। जैसा देखा जाय अथवा जैसा अनुमान किया जाय, वैसा ही भाव प्रकट करने का निश्चय रखते हुए बात कहना ‘सत्य’ माना जायेगा। उसमें छल न हो। दूसरों को भ्रम में डालने वाला अथवा वस्तुस्थिति से भिन्न ज्ञान देने का प्रयत्न न किया जाय।” इस प्रकार सर्वांगपूर्ण सत्य ही सत्य है, विखंडित सत्य-असत्य का ही एक प्रकार होता है।

जिस प्रकार सत्य का आचरण हर दशा में कल्याणकारी होता है, उसी प्रकार असत्य का आचरण हर प्रकार से अमाँगलिक होता है। भाषण, आचरण अथवा विचार किसी में भी असत्य का दोष मानव-जीवन में उसके अंतर और बाह्य दोनों में विषमता पैदा कर देता है। व्यक्तित्व को हर प्रकार से कलुषित और दोषपूर्ण बना देता है। असत्य का त्याग करना जीवन में आनन्द और विकास के बीज बोने के समान है। असत्य का त्याग और सत्य का आचरण मानव-जीवन की सबसे सुन्दर नीति है। इस नीति का अनुसरण करने वाला क्या भौतिक और क्या आध्यात्मिक किसी भी क्षेत्र में असफल नहीं होता। सत्य बोलने, सत्य के अनुरूप सोचने और सत्य से स्वीकृत कर्म करने से ही मनुष्य सत्यस्वरूप परमात्मा को प्राप्त कर सकता है।

सत्य की यह महत्ता कोई कल्पना अथवा वैज्ञानिक विलास नहीं है। यह एक ठोस और सारपूर्ण सिद्धान्त है। विद्वान् जोफसपार्कर ने कहा है- “असत्य अस्थिर और उतावला होता है। उसे कभी भी पहचाना और दण्डित किया जा सकता है। सत्य शांत और गम्भीर होता है। उसे ईश्वर का उच्च न्यायालय भी केवल सम्मानित ही कर सकता है।”

सत्य संसार की सबसे बड़ी शक्ति और सबसे प्रभावकारी नीति है। इस पर चलने वाला व्यक्ति न तो कभी अशाँत होता है, न भयभीत और न उसे असफल होने की आशंका रहती है। भय-शोक, संताप और अशांति आदि आसुरी दण्ड केवल असत्य परायणों के लिये ही निश्चित है। सत्य परायण के लिए लोक में शाँति और सम्मान एवं परलोक में स्वर्ग सुरक्षित रखा है, जिसे वह अधिकार पूर्वक प्राप्त कर लेता है।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 11 June 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 June 2026


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👉 उतना बोलिए जितना आवश्यक हो (भाग 2)

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