शनिवार, 6 जून 2026

👉 हम सब परस्पर एकता के सूत्र में जुड़े हैं

समुद्र में असंख्यों लहरें उठती हैं—उनका अस्तित्व अलग-अलग होता है। हर लहर पर एक स्वतन्त्र सूरज चमकता दिखाई देता है, इतने पर भी यदि तात्विक दृष्टि से देखा जाय तो प्रतीत होगा कि इस भिन्नता के भीतर एक अविछिन्न एकता की सत्ता विद्यमान है। सारा समुद्र एक ही है। एक ही सूर्य असंख्यों लहरों पर चमकता है। इन प्रतिबिंबों की अनेकता के कारण कितने ही सूर्यो की सत्ताएँ सिद्ध नहीं होती। हवा और जल के संयोग से उत्पन्न होते रहने वाले बबूले एक-दूसरे से अलग दिखाई भले ही दें वे सुविस्तृत जलाशय से पृथक नहीं माने जा सकते।

मनुष्य की संख्या करोड़ों में है। उनकी देह तथा आकृति-प्रकृति में भी अन्तर है। इतने पर भी वे सभी एक ही अनन्त विश्वात्मा के अविछिन्न अंग अवयव हैं। माला के मध्य पिरोये हुए सूत्र की तरह एक ही आत्मा सबको एकता के बन्धनों में बाँधे हुए है। देखने में हम एक दूसरे से पृथक लग सकते हैं,पर हमारा अस्तित्व पूर्ण तथा एक दूसरे पर निर्भर है। एकाकी जीवन एक क्षण के लिए भी सम्भव नहीं। सकते। दूसरे का सहयोग पाये बिना अपना निर्वाह किसी भी प्रकार नहीं हो सकता।

प्राणिमात्र के भीतर काम करने वाली इस एकात्म चेतना की अनुभूति ही अध्यात्म दर्शन का मूलभूत उद्देश्य है। समष्टि की इकाई ही व्यष्टि हे। समाज का एक पुर्जा ही मनुष्य है। इस मान्यता को अपनाकर आत्मोपभ्येन सर्वत्र की दृष्टि हम विकसित करें और आत्मा को विश्वात्मा का घटक मात्र माने तो वह जीवन लक्ष्य प्राप्त हो सकता है, जिसे ईश्वर की उपलब्धि कहते हैं।

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👉 कुकर्मों की सर्वनाशी विभीषिका (भाग 2)

प्रकृति का सारा कार्य व्यवस्थाओं और मर्यादाओं के आधार पर चल रहा है। इनका व्यतिक्रम सृष्टिकर्ता को सहन नहीं। उद्दण्ड उच्छृंखल को पनपने का अवसर मिले तो संसार की सारी व्यवस्था लड़खड़ा जायगी और अनैतिकता की अराजकता से वे समस्त आधार नष्ट हो जायेंगे जिनके सहारे मनुष्य जाति ने प्रगति की इतनी लम्बी मंजिल पार की है। सृजेता उन्हीं उद्दण्ड तत्वों को निर्दयता पूर्वक उखाड़ फेंकता है जो सृष्टि के सरल स्वाभाविक क्रम में व्यवधान उत्पन्न करने का दुस्साहस करने पर अड़े हुए हैं।

राजदण्ड, सामाजिक असहयोग और तिरस्कार के अतिरिक्त आत्मदण्ड भी कम भयंकर नहीं हैं। इन तीन को करारी चोटें कुकर्मी पर ऐसी आघात करती हैं जिन्हें तिलमिलाने वाली पीड़ा के बिना सहन नहीं किया जा सकता। आत्म-प्रताड़ना के विक्षोभ तरह-तरह के शारीरिक और मानसिक रोगों के रूप में सामने आते हैं। गुण, कर्म, स्वभाव में निकृष्टताएं भर जाने से व्यक्ति प्रेत−पिशाचों की जैसी उद्विग्नता की आग में निरन्तर जलता, झुलसता रहता। वह शान्ति प्रफुल्लता उसे क्षण भर के लिए भी नहीं मलती जिसे मनुष्य जीवन की महानतम उपलब्धि माना जाता है।

मक्खी शीरे की गन्ध, रूप और स्वाद की कल्पना में इतनी विभोर हो जाती है कि उसे धैर्य और क्रम का ध्यान नहीं रहता। बेतहाशा टूट कर गिरती है और सोचती है कि जितना अधिक शीरा—जितनी अधिक मात्रा में खाया जा सके उसे उतना खा लेने का अवसर न चूका जाय। इस उतावली भरी मूर्खता में वह शीरे के भीतर धँस जाती है उसके पंख और पैर चिपक जाते हैं। जिस लिप्सा ने उसे अधीर बनाया वही उसके लिए प्राणघातक संकट भी प्रस्तुत खड़ा करती है। मूर्ख मक्खी को इतना बोध रहा होता कि सस्ते सुखोपभोग की आतुरता अन्ततः प्राणों को संकट में डालने वाली विपत्ति उत्पन्न कर सकती है तो शायद वह सोच−समझकर ही कदम बढ़ाती।

पाप कर्मों में अधिक जल्दी—अधिक मात्रा में सरलता पूर्वक सुखोपभोग के साधन प्राप्त करने का आतुर आकर्षण ही प्रधान रहता है। यही प्रलोभन मनुष्य को नीति विरुद्ध कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। जन−साधारण का हृदय जीवन के लिए श्रेष्ठ सम्मानास्पद कार्य करने की और उत्कृष्ट जीवनयापन की आवश्यकता पड़ती है इसके लिए अपने को ढालना और सुधारना पड़ता है तब कहीं यह सम्भव होता है कि दूसरों का श्रद्धा सिक्त सम्मान प्राप्त करके अपने अन्तःकरण का भूख बुझाई जाय। आतुर व्यक्ति इस सरल मार्ग को छोड़कर आतंकवादी रीति−नीति अपनाते हैं और दूसरों को अपनी विघातक उद्दण्डता से भयभीत करके उन पर छा जाना चाहते हैं। इस तरह उन्हें बड़प्पन की एक उथली सी झलक मिलती तो है पर उससे चिरस्थायी प्रयोजन तनिक भी पूरा नहीं होता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1974 

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 06 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 June 2026


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