शनिवार, 30 मई 2026

👉 मन को दुर्बल न बनने दें (भाग 1)

सिद्धि का आधार शक्ति माना गया हैं। संसार का कोई उद्योग, कोई भी पुरुषार्थ और कोई भी कार्य शक्ति के बिना नहीं किया जा सकता। कोई बड़ा ही नहीं एक साधारण और सामान्य काम में भी शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। अशक्त मनुष्य संसार में कुछ भी नहीं कर सकता।

संसार में प्रधानतः दो शक्तियाँ काम करती हैं। एक शारीरिक-बल दूसरा मानसिक-बल आगे की अन्य शक्तियाँ-जैसे बौद्धिक-बल आध्यात्मिक अथवा आत्मिक-बल भी पूर्वोक्त दो बलों के आधार पर ही पाये ओर विकसित किये जाते हैं।

शारीरिक-बल और मानसिक-बल में भी मानसिक-बल की प्रधानता हैं। शारीरिक-बल का अपने-आपमें कोई अधिक महत्व नहीं है। मनोबल का सहयोग पाये बिना शारीरिक-बल निकम्मा बना रहता है। बहुत बार देखा जा सकता है कि शारीरिक-बल कम होने पर भी लोग मनोबल के आधार पर बहुत से काम कर जाते हैं। शरीर-बल प्रधान सैनिक जिनका मानसिक-बल निर्बल होता है। मनोबल प्रधान और इम्यून शारीरिक-बल वाले सैनिकों से परास्त हो जाते है। जंगल में शेर की तुलना में हाथी, गैंडे, सुअर आदि बहुत से जानवर शरीर-बल में बहुत अधिक होते हैं, किन्तु मनोबल की कमी के कारण शेर से डरते ओर उसका आतंक मानते रहते हैं। वास्तविक बल मनोबल ही होता है-शारीरिक-बल तो मात्र यांत्रिक बल ही होता हैं।

शरीर में क्षमता होते हुए भी जब मनुष्य का मन असहयोगी हो जाता है तो वह जरा देर भी काम नहीं कर सकता। मन में उत्साह ओर सहयोग होने पर यदि एक बार शरीर थका भी हो तो भी मनुष्य बहुत देर तक काम करता रहता है। शरीर की सारी क्रियायें मन की सहायता से ही सम्पादित होती है।

बौद्धिक-बल उत्पन्न करने के लिये भी मानसिक अभ्यास की आवश्यकता होती है। मनुष्य की बुद्धि का विकास अध्ययन, अनुभव और विषय में गहरे पैठने से होता है। जिसका मन निर्बल है, असहयोगी या उत्साह हीन है, वह न तो अध्ययन का परिश्रम कर सकता है, न सजग रहकर अनुभव संचय कर सकता है। और न उत्साहपूर्वक किसी विषय में गहरे पैठ सकता है। यदि वह यह सब करेगा भी तो मानसिक सहयोग के अभाव में कुछ लाभ नहीं उठा सकता।

न जाने कितने उत्साह अथवा अभिरुचि से रहित मन वाले लोग वर्षों पड़ते रहते हैं, नौकरी ओर व्यापार करते हैं, किन्तु प्रगति के नाम पर एक कदम भी आगे नहीं बड़ पाते पूरी सिद्धि तो उनके लिए असम्भव होती है। मन का असहयोग, विद्रोही, निरुत्साही, चंचल आदि होना उसकी निर्बलता के ही लक्षण होते हैं।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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👉 हम देवत्व की ओर बढ़ें असुरता की ओर नहीं (भाग 1)

किसी अवसर का समुचित लाभ उठा लेना ही उस अवसर की सार्थकता कही गई है। मानव जीवन भी एक अवसर ही नहीं एक अनुपम अवसर है। जो बुद्धिमान इस अवसर की महत्ता समझते हैं, वे इसका लाभ उठाने में कभी नहीं चूकते। जीवन का लाभ उठाने का अर्थ है, इसको सफल एवं सार्थक बना लेना। इसकी श्रेष्ठ रचना ही इसकी सार्थकता मानी गई है और सार्थकता का अभिप्राय है, इसकी चेतना को देवत्व की ओर उठाया जाये। मनुष्य से बढ़कर देवताओं की कक्षा में प्रवेश किया जाये।

मनुष्य जीवन मध्यम श्रेणी है। इसके दायें बायें दो और श्रेणियाँ हैं। देवता और असुर। मनुष्य की क्षमता में है कि वह चाहे तो अपनी गतिविधियों तथा विचार प्रवृत्तियों के आधार पर देवता बन जाये अथवा असुर रूप में पतित हो जाये।इन दोनों श्रेणियों के बीज मनुष्य के अन्दर विद्यमान् हैं। वह जितनी तत्परता से जिन बीजों का विकास कर लेगा उतने अनुपात में ही देवता अथवा असुर बन जायेगा। यद्यपि इन दोनों श्रेणियों की एक पराकाष्ठा भी है। वे हैं परमात्म रूप एवं पिशाचता। देवत्व जब बढ़कर अपनी परिधि पार कर जाता है तब ईश्वर रूप हो जाता है और असुरता उतरते उतरते पिशाचता के रूप में परिणत हो जाती है।

मनुष्यता की पहचान यह है कि वह अपने और दूसरों के प्रति एक संतुलित दृष्टिकोण रखता है। यद्यपि उसे अपने अधिकारों तथा स्वार्थों का ध्यान अवश्य रहता है तथापि दूसरों के अधिकारों का भी उल्लंघन नहीं करता उनके स्वार्थों का हनन नहीं करता। वह जो कुछ उसका है लेना चाहता है और जो कुछ दूसरों का है उसको देने का साहस रखता है। अपनी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखते हुए दूसरों की सुख सुविधाओं में व्याघात उत्पन्न नहीं करता।

देवता का लक्षण यह है कि वह अपने स्वार्थ तथा अधिकारों को द्वितीय स्थान पर तो रखते ही हैं बल्कि उनकी हानि करके भी दूसरों की सुख सुविधा बढ़ाने का प्रयत्न किया करते हैं। अपनी उन्नति रोक कर दूसरों को उन्नति पथ पर बढ़ाने में प्रसन्नता अनुभव करते हैं। दूसरों के सुख में अपना सुख और दूसरों के दुःख में अपना दुःख समझकर परमार्थ में तत्पर रहते हैं। जब यह पुण्य प्रवृत्ति आगे बढ़कर अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है, तब उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं रह जाता। उनके पास जो कुछ होता है, उसमें निस्पृह हो जाता है। उनकी सारी गतिविधियाँ और सारी चिन्ताएँ दूसरे की सेविका बन जाती हैं।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 30 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 May 2026



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👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( अंतिम भाग )

एक गिलास ठंडा पानी पीकर अपना क्रोध शाँत करने की विद्या बड़ी उत्तम है। क्रोध आये तो आप कुछ देर के लिये उस स्थान से हट जाइये किसी शीतल बगीचे म...