सोमवार, 1 जून 2026

👉 मन को दुर्बल न बनने दें (भाग 3)

यदि भय और आशंकाओं का सम्बन्ध मनुष्य की हृदय-स्थिति से न होता और उनका निवास प्रसंग अथवा परिस्थितियों में होता तो वह उस स्थिति में सभी मनुष्यों पर समान रूप से प्रतिक्रियाएँ होना चाहिये। जब ऐसा होता नहीं, किसी भयानक परिस्थिति को देखकर कहाँ कोई एक बुरी तरह डर कर घबरा कर भागने का रास्ता खोजने लगता है, वहाँ कोई दूसरा उसी परिस्थिति में अपने संतुलन ओर साहस के आधार पर वीरतापूर्वक उसका सामना करने के लिये उत्साहित हो उठता है। यह अन्तर परिस्थिति का नहीं केवल मनःस्थिति का होता है। जिसका मन निर्बल और कायर होगा, उसका घबरा जाना स्वाभाविक है। जिसका मनोबल बढ़ा-चढ़ा होगा, उसके मन में भय अथवा पलायन का भाव ही न आयेगा। वह तो ताल ठोक कर टक्कर लेने को उद्यत हो उठेगा।

मनुष्य की सारी बाह्य क्रियाओं की जड़ उसके मन में ही होती है। मनुष्य की शारीरिक क्रियाओं का संचालक मन ही होता है। मन स्वस्थ, बलवान, ओर संतुलित होगा, क्रियायें भी सुन्दर, सतेज ओर व्यवस्थित होंगी। मन निर्बल और अस्थिर होगा, क्रिया-कलाप भी सारहीन और अस्त-व्यस्त होगा।

कारण कोई भी रहे हों, किन्तु जिनके मन क्षीण, निर्बल ओर निस्तेज हो जाते हैं, उनका सारा जीवन भय, आशंकाओं, कट्टरता और संदेहों से भरा रहता है। मनोहीन मनुष्य हर बात में भयानक घटनाओं, सम्भावनाओं और परिणामों की कल्पना किया करते है। उन्हें सब ओर सब जगह अमंगल और अकल्याण ही दिखाई देता है। जिस प्रकार कायर और भीरु सिपाही को मोर्चे पर सिवाय मौत के और कुछ दिखाई नहीं देता, जबकि वहाँ पर विजय, यश और प्रतिष्ठा की भी सम्भावना होती है, उसी प्रकार निर्बल मन वाले को सब जगह असफलता और आशंका ही दीखती रहती है, जबकि सभी क्षेत्रों और कार्यों में दूसरे लोग सफल और कृतकृत्य होते रहते हैं।

निर्बल मन वालों की विचार-धारा प्रतिगामिनी हो जाती है। ऐसा मनुष्य यदि एक सफल और एक असफल आदमी को एक साथ देखता है तो भी वह असफल व्यक्ति की स्थिति से प्रभावित होता। वह सोचता है यदि में भी इस काम को करूँ तो असफल हो जाऊँगा। उसका विश्वास उस सफल व्यक्ति पर नहीं जाता ओर न अपने लिये उसे उदाहरण ही बना पाता है। कायर व्यक्ति जिस प्रकार मैदान छोड़कर भागने वालों को अपना आदर्श बनाता है, मोर्चे पर डटने वालों को नहीं, उसी प्रकार मनोहीन व्यक्ति भी असफल, अकर्मण्य और अग्राह्य उदाहरणों को अपना आदर्श बनाता है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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👉 हम देवत्व की ओर बढ़ें असुरता की ओर नहीं (भाग 3)

मनुष्य जीवन एक अनुपम अवसर है। इसी बात का कि इस श्रेणियों में से जिस श्रेणी में चाहे अपना उत्थान अथवा पतन कर सकता है। किन्तु जीवन की सफलता एवं सार्थकता इसी बात में है कि मनुष्य अधिकाधिक उन्नति की ओर बढ़ता हुआ ईश्वरत्व प्राप्त कर ले। वह उन्नति करता हुआ मनुष्य से देवता और देवता से ईश्वर रूप होकर सदा सर्वदा के लिये जन्म मरण के चक्र से निवृत्त हो जाये। किसी कार्य की सार्थकता सफलता ही हैं और सफलता का अर्थ है उन्नति एवं विकास। मनुष्यता से देवत्व की ओर पहुँचना ही उसकी सार्थकता है। पतन की ओर प्रगति करना अग्रसर होना नहीं कहा जा सकता है और न मनुष्य से असुर बन जाना सार्थकता ही। सुन्दर से असुन्दर बनना नहीं, सुन्दर, सुन्दरतम बनना ही विकास है। अस्तु हमारी, आप सबके जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम सब श्रेष्ठता की ओर बढ़कर देवत्व की कक्षा में प्रवेश करें।

एक कक्षा से दूसरी कक्षा की ओर उछाल मारना ठीक नहीं। इस अभियान की क्रमिक प्रगति ही अधिक समुचित, सरल एवं विशद होगी। पहले हम मनुष्य से पूर्ण मनुष्य बनने के प्रयत्न में लगें और तब मनुष्यता की पूर्णता के बाद देवत्व की ओर बढ़ें।

मानना ही होगा, अभी हम मात्र मनुष्य ही हैं, पूर्ण मनुष्य नहीं। हमें अपने स्वार्थों एवं अधिकारों के प्रति काफी स्पृहा है। कभी कभी जब हमारी आसुरी वृत्तियाँ प्रबल हो जाती हैं, तब उनके प्रभाव में अपना कर्तव्य भूल जाते हैं और दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण भी कर बैठते हैं। यह बात अवश्य है कि बाद में समाधान होने के पश्चाताप भी करते हैं और क्षमा भी माँगते हैं। अच्छा हो कि हमसे यह भूल कभी न हो। इसका एक सरल सा उपाय यह है कि हम अपने अधिकारों की अपेक्षा अपने कर्तव्यों पर अधिक ध्यान दें। अपने कर्तव्यों तक सीमित रहने से स्वाभाविक है कि अधिकारों की जागरूकता कम हो जायेगी और इस प्रकार उनके प्रति हमारा ममत्व घटने लगेगा और निःस्वार्थ बुद्धि का विकास होने लगेगा। कर्तव्यों का अधिक भान ही तो स्वार्थ को प्रबुद्ध किया करता है। इस उपाय में अधिकारों के हनन होने का भय इसलिये नहीं है कि जब कोई नेक आदमी स्वयं अपने अधिकारों की स्पृहा न कर कर्तव्य करता रहता है, तब दूसरे लोग उसके अधिकार रक्षा को अपना कर्तव्य मान लेते हैं। कर्तव्यशील सत्पुरुष अपने अधिकारों से वंचित रह जाये यह सम्भव नहीं।

इस प्रकार स्वार्थ के प्रति ममत्व कम होते ही परमार्थ बुद्धि का विकास प्रारम्भ हो जायेगा और मनुष्य देवत्व की ओर चल पड़ेगा।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 01 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 June 2026


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👉 मन को दुर्बल न बनने दें (भाग 3)

यदि भय और आशंकाओं का सम्बन्ध मनुष्य की हृदय-स्थिति से न होता और उनका निवास प्रसंग अथवा परिस्थितियों में होता तो वह उस स्थिति में सभी मनुष्यो...