बुधवार, 17 जून 2026

👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( भाग 1)

मनुष्य स्वभाव में अनेकों मनोविकार ऐसे हैं, जो निरन्तर उसकी मानसिक तथा शारीरिक योग्यता का विनाश किया करते हैं। घृणा, द्वेष, काम, मद मोह और लोभ जैसे दुर्गुणों को स्वच्छन्दता देने से मानसिक विष सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हो जाता है। इससे बुद्धि, ज्ञान, स्वास्थ्य आदि पर विषैला प्रभाव पड़ता है और व्यक्ति दिन-दिन हीन परिस्थितियों की ओर गिरता चला जाता है। किन्तु क्रोध तो इन समस्त दुर्गुणों का सम्राट है। इससे होने वाले तात्कालिक परिणाम भी इतने भयंकर होते हैं कि उन्हें देखकर जी काँप उठता है। ऐसी घटनायें आये दिन आँखों के आगे से गुजरा करती हैं, जिनमें मनुष्य छोटे से कारण से उत्तेजित होकर वीभत्स दृश्य उपस्थित कर देते हैं।

महर्षि बाल्मीक ने लिखा है :-
क्रोधः प्राणहरः शत्रुः क्रोधोऽमित्र मुखो रिपुः।
क्रोधोऽसि महातीक्ष्णः सर्वक्रोधोऽपकर्षति॥
तपते यतते चैवं दानं प्रयच्छति।
क्रोधेनं सर्व हरति तस्मात् क्रोध विवर्जंयेत्॥
(उत्तरकाँड 71)

अर्थात्- क्रोध प्राण हरण करने वाला शत्रु है, क्रोध अमित्र मुखधारी बेरी है, क्रोध एक तीक्ष्ण तलवार है, क्रोध सब प्रकार से गिरा देने वाला है, क्रोध तप, संयम और दान का अपहरण कर लेता है, अतएव क्रोध से सदैव बचना चाहिये।

क्रोध का मन के दूसरे विकारों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। उत्तेजना और आवेश आते ही सत्य-असत्य का विवेक मारा जाता है, जिससे लड़ाई, झगड़ा, कटुता, मारपीट, हत्याओं की घटनायें तक हो जाती है, किसी व्यक्ति के प्रति निरन्तर क्रोध बनाये रखने से स्थायी कटुता का भाव पैदा हो जाता है। जिससे दोषदर्शन, उत्पीड़न और अकारण औरों का नुकसान करते रहने की आदत पड़ जाती है। इस प्रकार एक ही विकार से अनेकों विकारों की शाखा-प्रशाखायें फूट पड़ती हैं। अस्थिरता, क्षणिकता, बुद्धि का कुण्ठित होना, उद्विग्नता, अहंकार असहिष्णुता आदि दुर्गुण क्रोधी मनुष्य में अपने आप ही आ जाते हैं। चिड़चिड़ापन भी क्रोध का ही एक छोटा रूप है। यह प्रायः अशक्त पुरुषों का मनोविकार है, इसलिये एक आवेश में ही वह समाप्त भी हो जाता है। किन्तु क्रोध मन को एक उत्तेजित और खिंची हुई अवस्था में रख देता है। जिससे रक्त में गर्मी पैदा होती है। इससे उसके संचालन में तेजी आती है। यह झटके तीव्रता से आते रहे तो स्वास्थ्य पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। विचारों में भी प्रेम, सत्य, न्याय, दया और विवेक आदि का लोप हो जाता है। आध्यात्मिक शक्तियों के विषय में तो यह सबसे प्रबल शत्रु माना गया है।

क्रोध से शारीरिक शक्तियों का पतन हो जाता है। किसी क्रोधी व्यक्ति को देखिये, किस प्रकार उसका चेहरा तमतमा उठता है, नेत्र लाल हो जाते हैं, ओठ चलने लगते हैं। आन्तरिक अवयवों पर भी इसका दूषित प्रभाव पड़ता है। हृदय धड़कने लगता है। आँतों का पानी सूख जाता है, जिससे शरीरस्थ मल सूख कर आँतों से चिपक जाता है। इससे शरीर सूख कर काँटा हो जाता है पाचन क्रिया शिथिल पड़ जाती है। खून में एक प्रकार का विष पैदा हो जाता है, जिससे जीवन-शक्ति कमजोर पड़ जाती है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

👉 इच्छाएँ और उनका सदुपयोग (भाग 3)

इस व्यवस्था में लम्बी अवधि की प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है, पर व्यक्तित्व के निखार का यही रास्ता है। अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिये पहले आप उस काम के करने की दृढ़ इच्छा मन में करलें, पीछे सारी मानसिक शक्तियों को उसमें लगा दें, तो सफलता की सम्भावना बढ़ जाती है। दृढ़ इच्छा शक्ति से किये गये कार्यों को विघ्न बाधायें भी देर तक रोक नहीं पातीं। संसार में जिन लोगों ने भी बड़ी इच्छाओं की पूर्ति की, उन्होंने पहले उसकी पृष्ठभूमि को अधिक सुदृढ़ बनाया, पीछे उन कार्यों में जुट पड़े। तीव्र विरोध के बावजूद भी सिकन्दर झेलम पार कर भारत विजय दृढ़ मनस्विता के बल पर ही कर सका। शाहजहाँ की उत्कृष्ट अभिलाषा का परिणाम ताजमहल आज भी इस धरती पर विद्यमान् है।

जीवन लक्ष्य की प्राप्ति भी ऐसे ही महान् कार्यों की श्रेणी में आती है। दूसरों से सिद्धियों सामर्थ्यों की बात सुनकर, आवेश में आकर आत्म-साक्षात्कार की इच्छा कर लेना हर किसी के लिये आसान है। पर पीछे देर तक उस पर चलते रहना, तीव्र विरोध और अपने स्वयं के मानसिक झंझावातों को सहते हुये इच्छा पूर्ति की लम्बे समय तक प्रतीक्षा की लगन हम में बनी रहे तो परमात्मा की प्राप्ति के भागीदार बन सकना भी असम्भव न होगा।

इसके विपरीत यदि हमारी इच्छा शक्ति ही निर्बल, क्षुद्र और कमजोर बनी रही तो हमें अभीष्ट लाभ कैसे मिल सकेगा? अधूरे मन से ही कार्य करते रहे तो लाभ के स्थान पर हानि हो जाना सम्भव है। इच्छायें जब तक बुद्धि द्वारा परिमार्जित होकर संकल्प का रूप नहीं ले लेतीं, तब तक उनकी पूर्ति संदिग्ध ही बनी रहेगी। इच्छा-शक्ति यदि प्रखर न हुई तो वह लगन और तत्परता कहाँ बन पायेगी जो उसकी सिद्धि के लिये आवश्यक है।

मनुष्य इच्छायें करें, यह उचित ही नहीं आवश्यक भी है। इसके बिना प्राणि जगत निःचेष्ट एवं जड़वत् लगने लगेगा, किन्तु इसका एक विषाक्त पहलू भी है, वह है इनकी अति और अनौचित्य। मनुष्य जीवन को क्लेशदायक परिणामों की ओर ले जाने में अति और अनुचित इच्छाओं का ही प्रमुख हाथ है। स्वामी रामतीर्थ कहा करते थे-मनुष्य के भय और चिन्ताओं का कारण उसकी अपनी इच्छायें ही हैं। इच्छाओं की प्यास कभी पूर्ण रूप से सन्तुष्ट नहीं हो पाती। बात भी ऐसी ही है। आज जो 100 रुपये पाता है वह कल 1000 रुपये की सोचता है और यदि यह इच्छा पूरी तो गई तो दूसरे ही क्षण 1 लाख की कामना करने लग जाता है। इच्छा वह आग है जो तृप्ति की आहुति से और प्रखर हो उठती है। एक पर एक अंधाधुंध इच्छायें यदि उठती रहें तो मानव जीवन नारकीय यन्त्रणाओं से भर जाता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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