जैन-धर्म में “तत्वाधिगम् सूत्र” में इस बात को और भी विवरण युक्त करते हुए लिखा है—
हिंसानृतास्तेयब्राह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम्।
(तत्वा. (7/2)
अर्थात्—प्राण हिंसा करना, झूठे बोलना, चोरी करना, व्यभिचार और परिग्रह इन पाँच पापों को छोड़ना ही व्रत है।
बौद्ध दर्शन में निवृत्ति मार्ग की चर्चा की जाती है। वह वस्तुतः आत्मोद्धार का ही पर्याय है। इसके लिए जिन साधनों का विस्तार किया गया है, वे भी उपनिषदों के आत्म-शोधन एवं जैन दर्शन के व्रतों के समान ही है। बौद्ध भिक्षु जब आत्म-कल्याण के लिये निवृत्ति पथ का अनुसरण करता है तो उसे भी इस तरह की पाँच प्रतिज्ञायें करनी पड़ती हैं—
पाणातिपाता वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
—मैं प्राणि-बध नहीं करूंगा।
अदिन्नादाना वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
—किसी की चोरी नहीं करूंगा।
कामे सुमिच्छासारा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
— व्यभिचार नहीं करूंगा।
मुसावादा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
—मैं कभी झूठ नहीं बोलूँगा।
सुरा-मेरेय-मज्ज पमाद ट्ठाना वेरमणी
सिक्खापदं समादियामि।
—माँस मदिरा आदि अभक्ष्य पदार्थों का सेवन नहीं करूंगा।
हिन्दू धर्म में भी यह सम्पूर्ण दुराचरण तो विवर्जित हैं ही साथ ही मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से जानी गई मन की सूक्ष्म विकारमय वृत्तियों से जिनके कारण बड़े दोष बन पड़ते हैं, निग्रह की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है जो वास्तव में दूसरे धर्मों के सिद्धान्तों की अपेक्षा अधिक तथ्यपूर्ण एवं वैज्ञानिक हैं। उदाहरणार्थ काम-वासना बुरी वस्तु है और वह आत्म-ज्ञान से विमुख करने वाली है पर मनुष्य केवल मनोबल के आधार पर वासना से मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि परिस्थितियों का प्रभाव भी तो अपना महत्व रखता है। मन की काम-वासना वस्तुतः वैज्ञानिक दृष्टि से अन्न दोष है अर्थात् यदि आहार अनियमित है तो मन की वासना पर कभी भी नियंत्रण नहीं किया जा सकता। इसलिए सच्चरित्रता के सिद्धान्तों को कुछ वाक्यों तक ही सीमित नहीं किया गया वरन् उनका बहुत अधिक विस्तृत विश्लेषण किया गया है। अर्थात् इन नियमों को प्रारम्भिक अवस्था, आहार-विहार, शिक्षा-दीक्षा, भाषा-व्यवहार, धर्म-कर्म आदि से ही बाँधने का प्रयास किया है। इस सर्वांगीण शुद्धि-प्रक्रिया को अपनाये बिना मनुष्य जीवन के दोषों से कदापि मुक्त नहीं हो सकता।
संसार में मनुष्य अपने क्षणिक सुख के लिए अनेक प्रकार के दुष्कर्म कर डालता है। उसे यह खबर नहीं होती कि इन दुष्कर्मों का फल हमें अन्त में किस प्रकार भुगतना पड़ेगा। मनुष्य को जो तरह-तरह के कष्ट उठाने पड़ते हैं, उनके लिए किसी अंश तक समाज और देशकाल की परिस्थितियाँ भी उत्तरदायी हो सकती हैं पर अधिकाँशतया वह अपने ही दुष्कर्मों के प्रतिफल भोगता है। किन्तु मनुष्य शरीर दुःख भोगने के लिए नहीं मिला। यह आत्म-कल्याण के लिए मुख्यतः कर्म-साधन है, इसलिए अपनी प्रवृत्ति भी आत्म-कल्याण या सुख प्राप्ति के उद्देश्य की पूर्ति होना चाहिए और इसके लिए बुरे कर्मों से बचना भी आवश्यक हो जाता है।
विकास का क्रम भी इसी तरह चलता है। साधनों को प्राप्त कर यदि आत्मा विवेक का सदुपयोग करता है और उसे अच्छे कर्मों में लगाता है तो आत्मा अपनी शक्तियों को बढ़ाता हुआ अनुकूल साधनों को भी बनाता रहता है और अन्त में प्रारब्ध से, स्वाधीन होकर अपनी पूर्ण उन्नति कर लेता है।
इन दोनों मार्गों में से एक का चुनाव करना आवश्यक हो जाता है। आत्म-ज्ञान की इच्छा रखने वाले एक साथ दोनों आचरण नहीं कर सकते। शास्त्रकार ने अपना निष्कर्ष स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करते हुए लिखा है—
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्वं पूषन्नपावृणु सत्य धर्माय दृष्टये॥
“सत्य का मुख ढ़का हुआ है ऐ सत्य शोधक! यदि तू उसे प्राप्त करना चाहता है तो उस ढक्कन को खोलना पड़ेगा जिससे सत्य ढ़क गया है। यदि तू उसे नहीं छोड़ सकता तो सत्य ही तुझे छोड़ जाएगा।” दोनों बातें एक साथ कदापि नहीं हो सकतीं। आत्म-ज्ञान को बुरे कर्मों ने भी इसी तरह ढ़क लिया है। उसे प्राप्त करने के लिए इस अशुद्ध अवस्था का परित्याग करना ही पड़ता है। साँसारिक विषय वासनाओं की इच्छाओं पर विजय करनी ही पड़ती है।
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1966
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