शनिवार, 22 अगस्त 2026

👉 अधूरी शिक्षा से ही संतोष न कर लीजिए।

आज कल बौद्धिक ज्ञान को शिक्षा कहते हैं। मास्टरी, डाक्टरी, इंजीनियरी, कला-कौशल आदि की योग्यताएं शिक्षा कहलाती हैं इनके द्वारा धन, मान तथा सुख सामग्री की प्राप्ति होती है। क्या शिक्षा का प्रयोजन यही है? नहीं, केवल इतने मात्र से काम नहीं चल सकता। शरीर को आनन्द मिला पर आत्मा अशाँत रही तो वह वैभव फीका है, निस्सार है। सच्चा आनन्द वह है जिसमें साँसारिक और आत्मिक जीवन की उभय पक्षीय उन्नति एवं तृप्ति प्राप्त हो। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को पूर्णरूपेण सुखी बनाना है।

हम संसार की अनेक बातें जानते हैं, पर अपनी आत्म-सत्ता के संबंध में हमारा ज्ञान बहुत थोड़ा है। दुनियावी स्वार्थ में हम भले ही चौकस हों, पर आत्मिक स्वार्थों के क्षेत्र में पग-पग पर बाजी हारते हैं। थोड़ी सी भोग सामग्री हमारे पास भले ही जमा हो जाय पर आत्मिक सम्पत्तियों से प्रायः हम रीते ही रहते हैं। यह समझ किस काम की? इस शिक्षा से, इस चतुराई से क्या लाभ, जिसके द्वारा एकाँगी तुच्छ को प्राप्त करना तो सुलभ हो जाय पर वास्तविक लाभ की पहचान और उपलब्धि में कुछ भी प्रयोजन सिद्ध न हो। शिक्षा तो वह है- जिससे बुद्धि का उचित परिमार्जन हो और जीवन के हर पहलू पर ठीक तरह विचार कर सकने की क्षमता प्राप्त हो जाय।

कहते हैं कि “इंसान को इशारा काफी होता है।” जो संकेत मात्र से साधारण विचार बुद्धि से अपना हित अनहित समझ ले। कुमार्ग पर चलने से अपरिमित हानि होती है और लाभ अत्यन्त तुच्छ और क्षणिक। जिसे कौड़ी के मोल हीरा बेचते हुए झिझक नहीं होती उसे शिक्षित किस प्रकार कहा जाय? शिक्षित कहना तो दूर उसे तो इंसान तक नहीं कह सकते, क्योंकि “इन्सान को इशारा काफी होता है।” जब कोई अनुचित कार्य किया जाता है तो आत्मा इशारा करती है, अन्तःकरण पुकारता है कि यह न करो यह अनुचित है। यह बड़ा जोरदार इशारा है जो इशारा नहीं समझता और केवल लोभ तथा भय को ही समझता है वह तो पशु है। उसे तो नर पशु ही कहा जा सकता है।

साँसारिक जानकारी की बहुत सी बातें स्कूलों में सिखाई जाती है, वे उचित भी हैं और आवश्यक भी, पर इतने मात्र से ही संतुष्ट हो बैठना पर्याप्त न होगा। हमें शिक्षा का वह भाग भी प्राप्त करना चाहिए जिससे सत् असत् का विवेक होता है और सच्चे स्वार्थ साधन के लिए उत्साह पैदा होता है। ऐसी शिक्षा के लिए स्वाध्याय, सत्संग, संयम, सदाचार तथा सच्चिदानंद प्रभु का आश्रय लेना होता है। ऐसी शिक्षा अपने प्रकाश से अन्तरात्मा के अन्धकार को दूर करके आत्मिक और साँसारिक जीवन को सुखी बना सकती है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949

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👉 प्रेम के अभाव ने ही हमें प्रेत पिशाच बनाया है। (भाग 2)

जब कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के लिए प्रति अपने “मैं” को छोड़ देता है तो उसे प्रेम कहते हैं जब कोई ‘सर्व’ के प्रति अपने ‘मैं’ को छोड़ देता है तो वह भक्ति कहलाती है। 

मानव में प्रभु के मिलन के लिए प्रेम आवश्यक है। श्री रामानुजाचार्य के पास एक व्यक्ति दीक्षित होने आया और बोला प्रभु के पाने के लिए आप मुझे दीक्षा दीजिए। श्री रामानुजाचार्य बोले तुमने किसी से प्रेम किया है उसने कहा कि नहीं हम तो प्रभु से मिलना चाहते हैं। तब रामानुजाचार्य बोले मैं दीक्षा देने में असमर्थ हूँ क्योंकि यदि तुम्हारे पा सप्रेम होता तो मैं उसे परिशुद्ध कर ईश्वर की ओर ले जाता लेकिन तुम में प्रेम ही नहीं है।

प्रेम और सत्य एक रुपये के दो पहलू है एक दूसरे के पूरक और आधार है। सत्य का आधार मस्तिष्क है तो प्रेम का आधार हृदय है। सत्य में वह आत्मीयता नहीं जो प्रेम में है। सत्य यदि रुक्ष और कटु है तो प्रेम मधुर और कोमल है। सत्य जैसे जानने की बात है तो प्रेम वैसा ही होने की भी। सत्य से निर्भयता आती है और प्रेम से निराभिमानता।

आज कल प्रेम के विषय में गलत भ्रान्ति है। काम को ही प्रेम समझा जाता है। इस भ्रम के फैलाने में सिनेमा गन्दे उपन्यास तथा कहानियों का प्रधान हाथ है। जो दर्शकों और पाठकों को गलत दिशा दे रहे हैं। काम प्रेम का आभास तथा भ्रम है। जैसे कोई व्यक्ति कोहरे का धुँआ समझ लेता है मृग मरुभूमि में प्रकाश के झिलमिलाने से उसे पानी समझ लेता है। और प्यास बुझाते को दौड़ता है। जिसे मृग तृष्णा कहते हैं। जैसे उसे आभास और भ्रम हो जाता है। वैसे ही मान को भी काम में प्रेम का आभास या भ्रम दिखाई देता है।

प्रेम और काम में बहुत अन्तर है प्रेम जितना विकसित होता है काम उतना ही संकीर्ण हो जाता है। प्रेम सृजनात्मक शक्ति का ऊर्ध्वीकरण है तो काम सृजनात्मक शक्ति की पतनोन्मुखी स्थिति है इसलिए जब प्रेम पूर्णता की स्थिति में बढ़ता है तो काम शून्यता की स्थिति में पहुँचता जाता है। इस प्रकार की स्थिति में जीने वाला व्यक्ति ब्रह्मचर्य की दशा को प्राप्त करता जाता है। अपनी सृजनात्मक शक्ति के द्वारा ही आत्मबल दूसरों के हित में रह रहना प्रेम का रूप है। प्रेम का व्यावहारिक रूप सेवा है। काम तो प्रकृति ही सम्मोहन शक्ति है जो सन्तति के उत्पन्न हेतु निर्मित है उसकी अधिकता या उसका दुरुपयोग करना व्यभिचार है। काम के दमन से काम से मुक्ति नहीं हो सकती और प्रेम के द्वारा ही उससे मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। तुलसीदास जी बड़े कामुक थे। जब उनका प्रेम भगवान में लग गया तो काम वासना छूट गई। राम गुणगान में रामचरित मानस का सृजन किया। सही सृजनात्मक शक्ति प्रेम के द्वारा पतनोन्मुख दिशा में न बहकर सर्वभूत हिते रता हुई यही प्रेम और भक्ति का परिणाम है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1975 

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