गुरुवार, 7 मई 2026

👉 आत्मनिरीक्षण का स्वभाव बनाइए (भाग 1)

कस्यं मृजाना अतियन्तिरिप्रमायुर्दधानाः प्रतरंनवीय॥
आप्यायमानाः प्रजया धनेनाध स्याम सुरभयो गृहेषु॥
अ. 18। 31।17॥

“आत्मनिरीक्षण रूपी छलनी में शुद्ध बन कर अपनी अशुद्धि, मल अथवा अपमृत्यु को साफ कर दूर करते हैं। और नव दीर्घ आयुष्य धारण करते हैं। तत्पश्चात् हम धन और प्रजा के साथ अभ्युदय को प्राप्त होते हुए अपने घर में सुगन्धि रूप बन कर रहें।”

उक्त वेदमंत्र में आत्मसुधार के लिए बहुत ही सरल और स्पष्ट राजमार्ग बताते हुए आत्मनिरीक्षण की प्रेरणा दी गई है। मंत्र के प्रारम्भ में आया है आत्मनिरीक्षण रूपी छलनी में शुद्ध बनकर अपनी अशुद्धि व भल अथवा अपमृत्यु को साफ करते हैं। इसके अनुसार आत्मनिरीक्षण करते रहने से सारे दोष, बुराइयाँ, दुर्व्यसन आदि ठीक उसी प्रकार अलग-अलग हो जाते हैं जैसे छलनी में किसी पदार्थ को छानने पर उसका खराब अंश अलग रह जाता है और वस्तु शुद्ध और मल रहित बन जाती है। आत्मनिरीक्षण का अवलम्बन लेने पर मनुष्य के दोष अशुद्धि, बुराइयाँ आदि भी ठीक इसी प्रकार दूर हो जाती हैं।

मानव स्वभाव की कमजोरी के कारण उसमें कुछ न कुछ दोष, बुराइयाँ आदि अपना घर बनाये रहती हैं। किन्तु इन्हें स्वच्छन्दतापूर्वक पनपने देना मनुष्य के लिए बहुत घातक सिद्ध होता है। उस समय मनुष्य की वही हालत होती है जैसे उस खेत की, जो मालिक की देखभाल आदि से वंचित झाड़ झंखाड़, अनावश्यक कूड़ा, घास-पत्ता आदि से अनुपयोगी बन जाता है। ऐसे मालिक की देखभाल के अभाव में घर की दुर्दशा होती है। ठीक उसी प्रकार मानव जीवन बंजर जमीन, सफाई और निरीक्षण के अभाव में घर की तरह बेढंगा, दोषपूर्ण, अशुद्ध और विकृत बन जाता है। एक छोटे से अवगुण दोष के कारण जीवन में बट्टा लग जाता है। यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि थोड़ी सी खराबी होने पर चाँदी का सिक्का बेकार हो जाता है, अच्छे से अच्छे भोजन को एक मक्खी अथवा कीड़ा घृणा युक्त बना देता है। घड़े में छोटा सा छेद होने पर उसको खाली कर देता है, एक छोटा सा फोड़ा जानलेवा बन जाता है। ठीक उसी प्रकार किसी भी सुपात्र की उपयोगिता एवं महत्ता उसके एक अवगुण एवं दोष से नष्ट हो जाती है। एक दोष से मनुष्य का सम्पूर्ण व्यक्तित्व समाप्त हो जाता है पचास वर्षों की बहुत बड़ी नेकनामी को कुछ क्षण की बदनामी नष्ट कर देती है।

मनुष्य के चरित्र व्यवहार, स्वभाव, विचार, जीवन यापन दृष्टिकोण आदि में कुछ न कुछ कमी रह जाना स्वाभाविक है किन्तु जैसा कि ऊपर व्यक्त किया जा चुका है, एक छोटी सी बुराई भी जीवन की समस्त अच्छाइयों पर पानी फेर देती है। जिस प्रकार एक हल्के से धब्बे से किसी भी चित्र की सुन्दरता नष्ट हो जाती है उसी प्रकार किसी भी दोष से दूषित मनुष्य का जीवन कलंकित हो जाता है। चन्द्रमा के छोटे दो धब्बे उसके सौंदर्य में कितने बड़े बाधक हैं जो हर देखने वाले की आँखों में खटक जाते हैं। किसी मशीन का एक भी पुरजा बिगड़ जाने पर सारी मशीन का संतुलन और तत्परता नष्ट हो जाती है। इसी प्रकार मनुष्य जीवन व्याप्त दोष, बुराइयों, अशुद्धियों आदि को दूर करके पूर्णता व अभ्युदय की ओर अग्रसर होने के लिए आत्म निरीक्षण रूपी छलनी की आवश्यकता है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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👉 अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित कीजिए। (भाग 3)

यदि दोनों प्रकार के प्रयत्न करते हुए भी समस्या हल नहीं होती तो किसी प्रकार काम चलाऊ रास्ता निकाल कर उसी में प्रसन्न और संतुष्ट रहने की कोशिश करनी चाहिए। अपने से अधिक दुखी लोगों के साथ अपनी तुलना करने से मनुष्य यह अनुभव कर सकता है कि कुछ कष्ट होते हुए भी भगवान पर उसकी बड़ी कृपा है कि उसने उतना दुखी नहीं बनाया जितने अन्य लोग दुखी हैं। अस्पतालों में पड़े हुए बीमार, अंग-भंग, साधनहीन, संकट जंजालों में फँसे हुए, पारिवारिक उलझनों में बुरी तरह उलझे हुए अनेकों व्यक्ति इस संसार में बहुत ही दयनीय स्थिति में जीवन यापन करते हैं। उनसे अपनी तुलना की जाए तो प्रतीत होगा कि उनकी अपेक्षा अपनी स्थिति हजारों गुनी अच्छी है। यदि पशु पक्षियों, कीट पतंगों से अपनी तुलना की जाए तब तो निश्चय ही यह प्रतीत होगा कि अपने को प्राप्त सुविधाएं इतनी अधिक हैं कि इन थोड़ी सी कठिनाइयों को नगण्य ही माना जा सकता है।

इसी प्रकार जो व्यक्ति अभी हमें बुरे और अपने शत्रु प्रतीत होते हैं, उनके कुछ अपकारों की बात सोचना छोड़कर यदि उनके उपकारों को उनके द्वारा किये हुए सद्व्यवहारों को स्मरण करें तो निश्चय ही वे हमें शत्रु नहीं मित्र दिखाई पड़ेंगे। माता-पिता ने हमें एम.ए. तक नहीं पढ़ाया, यदि वे उतनी शिक्षा दिला देते तो आज हम ऊँची सर्विस प्राप्त करते होते, यह विचार मन में आने पर माता-पिता शत्रु जैसे प्रतीत होते हैं उनके प्रति द्वेष एवं दुर्भाव उत्पन्न होता है। पर यदि हम अपनी विचार धारा बदल दें और उनने जिन आर्थिक कठिनाइयों में रहते हुए उतने बड़े कुटुम्ब का पालन करते हुए, हमारा पालन पोषण किया एवं जितनी संभव थी उतनी शिक्षा व्यवस्था की, तो उनके उपकारों के प्रति मन श्रद्धा से झुक जाएगा और वे मित्र ही नहीं देवता के समान उपकारी प्रतीत होंगे।

दृष्टिकोण में थोड़ा अन्तर कर देने से हम असंतुष्ट और खिन्न जीवन को संतोष में परिणित कर सकते हैं। ईश्वर ने सुर दुर्लभ मानव जीवन प्रदान करके इतनी बहुमूल्य सम्पदा हमें प्रदान की है कि उसका मूल्य लाखों करोड़ों रुपयों में भी नहीं चुकाया जा सकता। जैसा शरीर कुल, सम्मान, विद्या, परिवार आदि अपने को प्राप्त है उसमें से प्रत्येक को विशेषता और सुविधा का चिन्तन करें, साथ ही यह भी सोचें कि यदि यह बातें उपलब्ध न होती तो उनके अभाव में अपना जीवन कितना नीरस होता- तो इस चिन्तन से हमें प्रतीत होगा कि हमारी वर्तमान परिस्थिति दुख दारिद्र से भरी नहीं, वरन् सुख सुविधाओं से सम्पन्न है।

दूसरों के द्वारा अपने प्रति जो उपकार हुए हैं उनका यदि हम विचार करते रहें तो यही अनुभव होगा कि हमारे निकटवर्ती सभी लोग बड़े उपकारी और सेवाभावी और स्वर्गीय प्रकृति के हैं। इनके साथ रहने में अपने को सुख ही सुख अनुभव करना चाहिए। इसके विपरीत यदि उनके दोष ढूँढ़ने लगे और उन घटनाओं को स्मरण किया करें जिसमें उनने कुछ अपकार किये तो हमें अपने सभी स्वजन संबंधी बड़े दुष्ट प्रकृति के, अपकारी, असुर एवं शत्रु प्रतीत होंगे और ऐसा लगेगा कि इन लोगों का संपर्क हमारे लिए नरक के समान दुखदायी है।

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 07 May 2026


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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 07 May 2026


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👉 आत्मनिरीक्षण का स्वभाव बनाइए (भाग 2)

आत्म निरीक्षण के पथ पर चलते हुए मनुष्य को अपने जीवन एवं तत्सम्बन्धित विषयों को सूक्ष्म दृष्टि से देखते रहना चाहिए और उनका सुधार करना चाहिए। ...