मंगलवार, 30 जनवरी 2018

👉 ज्ञान का नया संदेश

🔶 महर्षि_वेदव्यास ने एक कीड़े को तेजी से भागते हुए देखा। उन्होंने उससे पूछा, 'हे क्षुद्र जंतु, तुम इतनी तेजी से कहां जा रहे हो?' उनके प्रश्न ने कीड़े को चोट पहुंचाई और वह बोला, 'हे महर्षि, आप तो इतने ज्ञानी हैं। यहां क्षुद्र कौन है और महान कौन? क्या इस प्रश्न और उसके उत्तर की सही-सही परिभाषा संभव है?' कीड़े की बात ने महर्षि को निरुत्तर कर दिया।

🔷 फिर भी उन्होंने उससे पूछा, 'अच्छा यह बताओ कि तुम इतनी तेजी से कहां जा रहे हो?' कीड़े ने कहा, 'मैं तो अपनी जान बचाने के लिए भाग रहा हूं। देख नहीं रहे, पीछे से कितनी तेजी से बैलगाड़ी चली आ रही है।' कीड़े के उत्तर ने महर्षि को चौंकाया। वे बोले, 'तुम तो इस कीट योनि में पड़े हो। यदि मर गए तो तुम्हें दूसरा और बेहतर शरीर मिलेगा।'

🔶 इस पर कीड़ा बोला, 'महर्षि, मैं तो इस कीट योनि में रहकर कीड़े का आचरण कर रहा हूं, परंतु ऐसे प्राणी असंख्य हैं, जिन्हें विधाता ने शरीर तो मनुष्य का दिया है, पर वे मुझसे भी गया-गुजरा आचरण कर रहे हैं। मैं तो अधिक ज्ञान नहीं पा सकता, पर मानव तो श्रेष्ठ शरीरधारी है, उनमें से ज्यादातर ज्ञान से विमुख होकर कीड़ों की तरह आचरण कर रहे हैं।' कीड़े की बातों में महर्षि को सत्यता नजर आई। वे सोचने लगे कि वाकई जो मानव जीवन पाकर भी देहासक्ति और अहंकार से बंधा है, जो ज्ञान पाने की क्षमता पाकर भी ज्ञान से विमुख है, वह कीड़े से भी बदतर है।

🔷 महर्षि ने कीड़े से कहा, 'नन्हें जीव, चलो हम तुम्हारी सहायता कर देते हैं। तुम्हें उस पीछे आने वाली बैलगाड़ी से दूर पहुंचा देता हूं।' कीड़ा बोला: 'किंतु मुनिवर श्रमरहित पराश्रित जीवन विकास के द्वार बंद कर देता है।' कीड़े के कथन ने महर्षि को ज्ञान का नया संदेश दिया।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 31 Jan 2018


👉 समस्त शक्तियों का स्रोत

🔶 कोई भी व्यक्ति जितना कुछ वैभव, उल्लास और साधन सम्पत्ति अर्जित करता है, वह उपार्जन एक ही मूल्य पर होता है। वह मूल्य है- शक्ति। जिसमें जितनी क्षमता है, जितनी शक्ति है, वह उतना ही वैभव और उल्लास अर्जित कर लेता है। इन्द्रियों में शक्ति हो तो विभिन्न भोगों को भोगा जा सकता है और इन्द्रियाँ यदि अशक्त, असमर्थ हो जायें, तो आकर्षक से आकर्षक भोग भी उपेक्षणीय लगते हैं। उनकी ओर देखने का भी जी नहीं करता। नाड़ी संस्थान की क्षमता यदि क्षीण हो जाय, तो शरीर का सामान्य क्रियाकलाप भी ठीक प्रकार से नहीं चल पाता। मानसिक शक्ति यदि घट जाय, तो मनुष्य की गणना विक्षिप्त व्यक्तियों में होने लगती है और विक्षिप्तों जैसी नहीं भी हो, तो वह ऐसी हरकतें करने लगता है कि उसकी स्थिति उपहासास्पद बन जाती है। धन की शक्ति में यदि कोई व्यक्ति, शून्य हो तो वह दीन-हीन बना रहता है। अभावग्रस्तता से उसकी स्थिति दयनीयों जैसी बनी रहती है और वह जीवन की सामान्य आवश्यकतायें भी भली प्रकार पूरी नहीं कर पाता। मित्रता को भी शक्ति कहा जा सकता है, जिसका स्वरूप सामाजिक होता है। यदि सच्चा मित्र शक्ति न रहे, तो व्यक्ति अपने आप को एकाकी अनुभव करने लगता है और जीवन निरर्थक-निरीह लगने लगता है।
  
🔷 इन सभी शक्तियों में प्रधान है- आत्मबल। आत्मबल आध्यात्मिक पक्ष से संबंधित होने के कारण अन्य सभी शक्तियों से उच्च स्तर का समझा जाता है। यदि यह शक्ति पास में न रहे, तो मनुष्य प्रगति के पथ पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। जीवनोद्देश्य की पूर्ति आत्मबल से रहित व्यक्ति के लिए प्राय: असंभव ही रहती है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि क्या आध्यात्मिक और क्या भौतिक, सभी क्षेत्रों में अभीष्टï सफलता प्राप्त करने के लिए शक्ति का संपादन नितांत आवश्यक है। शक्ति संपादन के संबंध में यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि इनका स्वरूप चाहे जो हो, स्रोत एक ही है।

🔶 आभूषण चाहें कान के बने या गले का, सोना का ही उपयोग किया जाता है। पृथ्वी पर व्याप्त समस्त ऊष्माओं का केन्द्र सूर्य ही है, चाहे वह शरीर की गर्मी हो या आग की। भारतीय मनीषियों ने इसी प्रकार समस्त शक्तियों का स्रोत साधन एक ही माना है और उसे गायत्री नाम दिया है। भौतिक जगत में पंचभूतों को प्रभावित करने वाली जितनी भी शक्तियाँ हैं और आध्यात्मिक जगत में जितनी भी विचारात्मक, भावनात्मक तथा संकल्पनात्मक शक्तियाँ हैं, उन सब का मूल उद्ïगम एवं अजस्र भण्डार एक ही है, जिसे गायत्री नाम से संबोधित किया गया है। इस भण्डार में शक्ति सागर में जितना भी गहरे उतरा जाय, उतना ही बहुमूल्य रत्न राशि उपलब्ध होने की संभावना बढ़ती चली जाती है।
  
🔷 मनीषियों ने परब्रह्मï परमात्मा की चेतना, प्रेरणा सक्रियता एवं समर्थता को गायत्री कहा है तथा इसे विश्व की सर्वोपरि शक्ति बताया है। विभिन्न देवशक्तियाँ जो अन्यान्य प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होती हैं और विभिन्न देवनामों से पुकारी जाती हैं, इसी शक्ति के ज्योति स्फुलिंग है। वे समस्त शक्तियाँ उस परम शक्ति की ही किरणें हैं। उत्पादन, विकास एवं संहार में संलग्ïन ब्राह्मïी, वैष्णवी और शांभवी शक्तियों के प्रतीक प्रतिनिधि ब्रह्मïा, विष्णु, महेश परमब्रह्मï की इसी सर्वोपरि शक्ति से अपना काम चलाते हैं और अभीष्टï कार्यों को पूरा करने के लिए शक्तियाँ प्राप्त करते हैं। पंचतत्त्वों की चेतना को आदित्य, वरुण, मरुत, द्यौ और अंतरिक्ष कहकर पुकारते हैं। उनकी शक्ति का स्रोत भी परमब्रह्मï की वही चेतना है, जिसे गायत्री कहा गया है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन को बालक्रीड़ाओं में भटकने न दें (भाग 2)

🔷 देखना यह है कि जीवन सम्पदा को किस निमित्त लगाया जाये? इसके लिए प्रचलन देखने की आवश्यकता है। मछलियों में बड़ी छोटी को निगल जाती है और उस बड़ी को मछुए के जाल में अपना प्राण गँवाना पड़ता है। प्रचलन ऐसा ही है। बहुमत ऐसे ही निरर्थक काम करता रहता है। समस्त पृथ्वी पर जितने मनुष्य रहते हैं, उतने दृश्य और अदृश्य कृमि कीटक एक मील की परिधि में रहा करते हैं। पर उनकी उपयोगिता क्या? पेट प्रजनन के कुचक्र में इधर से उधर भटकते रहते हैं। इसी स्तर का जीवन अधिकाँश मनुष्य जीते हैं। उनकी नकल क्या करनी? वनमानुषों, नर पशुओं का अनुकरण भी कोई करने लायक बात है।

🔶 बहुसंख्यक लोगों का क्रिया-कलाप ही प्रचलन कहाता है। बहुसंख्यक तो अपनी आत्मा सत्ता के अस्तित्व तक को भुला बैठे हैं। उन्हें अपना आपा काया मात्र के रूप में परिलक्षित होता है। अपनापन उन्हें शरीर तक सीमित प्रतीत होता है इसलिए उसी की सुख-सुविधा साधने में जीवन को रुचिपूर्वक खपाते रहते हैं। पेट की भूख, जननेन्द्रिय की तरंग, धन की ललक, बड़प्पन की बड़ाई की सनक। बस इसी सीमा में उनके क्रिया-कलाप बनते हैं। बच्चे जनने और उन्हें पालने में तो चुहिया भी प्रवीण होती है।

🔷 वह तीन सप्ताह में प्रौढ़ हो जाती है और एक बार में आठ दस बच्चे जनती है। यह प्रजनन वर्ष में प्रायः चार बार होता है। इस प्रकार तीस-चालीस बच्चों की जननी वह एक वर्ष में ही बन जाती है। हर बार पति बदलने पड़ते हैं इस प्रकार ढेरों की वह पर्यंक शाथिनी बन लेती है। इसमें कौन-सा व कैसा बड़प्पन? क्या गौरव, क्या महत्व? मनुष्य भी किशोरावस्था में ही प्रजनन कर्म में लगता है और बच्चे पैदा करने के अतिरिक्त उन्हें पालता भी है। यही जाल-जंजाल इतना बड़ा है जिसका कि ताना-बाना बुनते बुढ़ापा आ धमकता है और मौत अपने थैले में चना चबैना की तरह समेट ले जाती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1986 पृष्ठ 3


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1986/February/v1.3

👉 जीवन को सार्थक बनाया या निरर्थक गँवाया जाय (भाग 6)

🔷 पड़ोस में आग लगने पर भोजन पकाने जैसा आवश्यक काम भी पीछे कभी के लिए छोड़ना पड़ता है। कितने ही काम सामने हो तो उसमें बुद्धिमानी का कदम यह होता है कि प्राथमिकता देने और पीछे धकेलने की एक सुव्यवस्थित शृंखला बनाई जाय। इसका निर्धारण ही सुव्यवस्था कहा जाता है। इस क्रम को बिगाड़ देने पर पूरा परिश्रम करने पर भी बात बनती नहीं और समस्याएँ सुलझने के स्थान पर और भी अधिक उलझ जाती है। इन दिनों प्रत्येक विज्ञजन के लिए करने योग्य सामयिक कार्य एक ही है, कि लोक मानस के परिष्कार का महत्त्व समझा जाय और आस्था संकट का निवारण करने के लिए प्राण प्रण से जुट पड़ा जाय। इस एक ही व्यवधान के समाधान पर समय की समस्त गुत्थियों का सुलझ सकना निर्भर है।

🔶 यह सब अनायास ही संभव नहीं हो सकता। इस श्रेय पथ पर चल सकना मात्र उन्हीं के लिए संभव है, जो अपनी आकांक्षा उत्कंठा को तृष्णा से हटाये और उसे उतनी ही भावना पूर्वक श्रेय साधना के लिए लगायें। यह आन्तरिक परिवर्तन ही बाह्य क्षेत्र में वह सुविधा उत्पन्न कर सकता है, जिसके सहारे शरीर निर्वाह की तरह ही आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण का महान प्रयोजन बिना किसी के, नितान्त सरलतापूर्वक सधता रहे। परमार्थ परायणों में से एक भी भूखा, नंगा नहीं रहा। उनके पारिवारिक उत्तरदायित्वों में से एक भी रुका नहीं पड़ा रहा। तरीके अनेकानेक हैं। अपना सोचा हुआ तरीका ही एक मात्र मार्ग नहीं है।

🔷 नये सिरे से नये उपाय सोचने पर ऐसे समाधान हर किसी को उपलब्ध हो सकते हैं जिनमें से साँप मरे न लाठी टूटे। निर्वाह किसी के लिए समस्या नहीं। कठिनाई एक ही है-अनन्त वैभव की लिप्सा और कुटुम्बियों को सुविधा सम्पदा से लाद देने की लालसा। यदि परिवार के समस्त सदस्यों को श्रमजीवी, स्वावलम्बी बनाने की बात सोची जाय, औसत नागरिक स्तर का निर्वाह स्वीकार किया जाय तो इतने भर से जीवन को सार्थक बनाने वाली राह मिल सकती है। प्रश्न एक ही है कि शरीर के लिए जिया जाय या आत्मा के लिए। दोनों में से एक को प्रधान एक को गौण मानना पड़ेगा। यदि आत्मा की वरिष्ठता स्वीकार की जा सके तो उन प्रयोजनों को पूरा करना पड़ेगा, जिनके लिए सृष्टा ने यह सुर दुर्लभ अवसर उच्चस्तरीय उपयोग के निमित्त प्रदान किया है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 31 Jan

🔷 Farmers shade their perspiration in the field and they grow the crop in their fields. In the same way good persons get co-operation and followers from all sides. If one is keen to get the answer of his problem he will surely find suitable person to answer. There are examples where the prisoners under iron curtain can learn a lot just using a chalk and precocious on some metal vessel as the writing pad. Actually it is the keen desire of the person that can give any thing is this word but for that what is needed is hard labour and constant practice whole heartedly.
 
🔶 All the three dimensions of spiritual growth atheism, concept of soul and duty must be covered for proper development. Devotion to God is devotion to ideality, because God is representation of all virtues of human life. Worship is the starting point to achieve those virtues in his own life.
 
🔷  A woman’s body is not her anatomy but is truly complimentary to the make figure. The women create the true happiness of the family. It is that motherhood of a lady which creates a heavenly atmosphere in family. Women mean the source of  loving atmosphere in family. She wipes of the gloomy condition among the members. Her life is full of love, sacrifice, tolerance and bliss of life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 9)

🔷 मित्रो! यह सब देखकर मुझे बड़ा क्लेश होता है, बड़ा दुःख होता है। लोगों ने तो रामचंद्र जी की भी मिट्टी पलीद कर दी थी। उनको गये हुए कितने वर्ष हो गये। भगवान श्रीकृष्ण की भी लोगों ने मिट्टी पलीद कर दी। उन्हें गये हुए पाँच हजार वर्ष से अधिक दिन हो गये। गाँधी जी की भी मिट्टी पलीद हो जाय, राणाप्रताप की भी मिट्टी पलीद हो जाय, तो क्या कह सकते हैं? लोग उनके नाम पर भी धंधा करने लग जायँ तो क्या कहा जा सकता है? तुम लोग मेरी भी मिट्टी पलीद क्यों कर रहे हो? मेरी जिंदगी में ही मुझे क्यों बदनाम कर रहे हो? मेरे जाने के बाद मुझे बदनाम करना? अभी तो अपनी सफाई पेश करने के लिए मैं जिन्दा हूँ। अभी मुझे क्यों तंग करते हो।

🔶 मित्रो! आप लोगों के पास जाना और जिन आदमियों को-लाखों मनुष्यों को, जिनको मैंने अपने खून-पसीने से और अपनी मेहनत के बाद तैयार किया है, उन्हें यह संदेश सुनाना कि गुरुजी क्या हैं और यह मिशन क्या है? हमारा मिशन इन्सान में भगवान पैदा करने की कल्पना करता है। हम इन्सान में भगवान पैदा करेंगे। हम इन्सान को भगवान बनायेंगे। भगवान की खुशामद करके मनोकामना पूर्ण कराने का प्रोत्साहन हम नहीं देंगे। हम ऐसा कोई आश्वासन नहीं देंगे, वरन् हम यह आश्वासन देंगे कि इंसान अपने आपमें भगवान है और अपने आपके भगवान को विकसित करने के लिए उनको खाद-पानी और बीज-तीनों की आवश्यकता पड़ेगी। हमको हर आदमी को आस्तिक बनाना पड़ेगा, जो कि आज नहीं है। आज जो है, वे नास्तिक हैं। आपको उन तक आस्तिकता का संदेश पहुँचाना पड़ेगा और आस्तिकता की व्याख्या करनी पड़ेगी, जो मैंने इस समय तक आपको कही।

🔷 मित्रो! आपको लोगों के पास जाना पड़ेगा। मनुष्यों में महानता विकसित करने के लिए, महानता के लिए बरगद का पेड़ उगाने के लिए, जीवन का कल्पवृक्ष उगाने के लिए उसमें खाद देनी पड़ेगी। खाद का नाम वह है-जिसको हम आस्तिकता कहते हैं। जिसको हम आध्यात्मिकता कहते हैं, अर्थात् अपने आप पर विश्वास करना और अपने आपका परिशोधन करना। आप हर आदमी से यह कहना कि मनुष्य को सुख और शांति देने के लिए, जीवन को कल्पवृक्ष बनाने के लिए जिस चीज की आवश्यकता है, उस चीज का नाम धार्मिकता है।

🔶 पौधे को विकसित करने के लिए बीज बोना-एक, पौधे में पानी देना-दो और खाद लगाना-तीन तीनों काम अगर आप कर लेंगे, तो आपका विशाल बरगद जैसा वृक्ष बढ़ता हुआ चला जायेगा। आपका जीवन रूपी बरगद का विशाल वृक्ष पल्लवित-पुष्पित होता हुआ चला जायेगा। उसके ऊपर फूल आयेंगे, उसके ऊपर फल आयेंगे और उसके ऊपर डालियाँ आयेंगी। ऐसे आदमी न केवल उस व्यक्ति को, जो अभावों में डूबा हुआ है, कंगाली में डूबा हुआ है, उसका न केवल उद्धार करेंगे, वरन् उसको इस लायक बना देंगे कि अपनी नाव में बिठा करके वह हजारों मनुष्यों को पार करने में सफल हो सके।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 27)

👉 शंकर रूप सद्गुरु को बारंबार नमन्

🔶 गुरुगीता अध्यात्मविद्या का परमगोपनीय शास्त्र है। हाँ, इसे समझने के लिए गहरी तत्त्वदृष्टि चाहिए। यह तत्त्व दृष्टि विकसित हो सके, तो पता चलता है कि वैदिक ऋचाएँ जिस सत्य का बोध कराती हैं, उपनिषद् की श्रुतियों में जिसका बखान हुआ है, गुरुगीता में भी वही प्रतिपादित है। अठारह पुराणों में जिन परमेश्वर की लीला का गुणगान है- वही सर्वेश्वर प्रभु शिष्यों के लिए सद्गुरु का रूप धरते हैं। अध्यात्म विद्या के सभी ग्रन्थों-शास्त्रों को पढ़ने का सुफल इतना ही है कि अपने कृपालु सद्गुरु के नाम में प्रीति जगे। सन्तों ने इसे कहा भी है-
    पढ़िबे को फल गुनब है, गुनिबे को फल ज्ञान।
    ज्ञान को फल गुरु नाम है, कह श्रुति-सन्त पुराण॥
  
🔷 यानि कि समस्त शास्त्रों को पढ़ने का फल यह है कि उस पर चिन्तन-मनन-निदिध्यासन हो। और इस निदिध्यासन का फल है कि साधक को तत्त्वदृष्टि मिले, उसे ज्ञान हो तथा ज्ञान का महाफल है कि उसे सद्गुरु के नाम की महिमा का बोध हो। उनके नाम में प्रीति जगे। उन्हें नमन का बोध जगे। यही श्रुति, सन्त और पुराण कहते हैं।
  
🔶 ऊपर के मंत्रों में गुरुभक्त शिष्यों को इसकी अनुभूति कराने की चेष्टा की गयी है। इसमें बताया गया है कि शिष्य का परम कर्त्तव्य है कि वह अपने सद्गुरु को नमन करें, क्योंकि वही संसार वृक्ष पर आरूढ़ जीव का नरक सागर में गिरने से उद्धार करते हैं। नमन उनश्री गुरु को, जो अपने शिष्य के लिए ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर होने के साथ स्वयं परब्रह्म परमेश्वर हैं। शिव रूपी उन सद्गुरु को नमन करना शिष्य का परम कर्त्तव्य है, जो समस्त विद्याओं का उदय स्थान और संसार का आदि कारण हैं और संसार सागर को पार करने के लिए सेतु हैं। वे गुरुदेव भगवान् ही अज्ञान के अन्धकार से अन्धे जीव की आँखों को ज्ञानाञ्जन की शलाका से खोलते हैं। गुरुवर ही अपने शिष्य के लिए पिता हैं, माता हैं, बन्धु हैं और इष्ट देवता हैं। वे ही उसे संसार के सत्य का बोध कराने वाले हैं। ऐसे परम कृपालु सद्गुरु को शिष्य बार-बार नमन करे और करता रहे

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 49

👉 जीवन की सफलता

जीवन ऊर्जा का महासागर है। काल के किनारे पर अगणित अन्तहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं। इनकी न कोई शुरुआत है, और न कोई अन्त; बस मध्य है...