सोमवार, 31 मई 2021

👉 'सफल जीवन'

एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा-
गुरुदेव ये 'सफल जीवन' क्या होता है?

गुरु शिष्य को पतंग उड़ाने ले गए।
शिष्य गुरु को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था.

थोड़ी देर बाद शिष्य बोला-

गुरुदेव.. ये धागे की वजह से पतंग अपनी आजादी से और ऊपर की ओर नहीं जा पा रही है, क्या हम इसे तोड़ दें? ये और ऊपर चली जाएगी।

गुरु ने धागा तोड़ दिया ..

पतंग थोड़ा सा और ऊपर गई और उसके बाद लहरा कर नीचे आयी और दूर अनजान जगह पर जा कर गिर गई...

तब गुरु ने शिष्य को जीवन का दर्शन समझाया...
बेटे..  'जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर हैं..
हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें, जिनसे हम बंधे हैं वे हमें और ऊपर जाने से रोक रही हैं; जैसे :
-घर-
 -परिवार-
  -अनुशासन-
   -माता-पिता-
    -गुरू-और-
     -समाज-

और हम उनसे आजाद होना चाहते हैं...

वास्तव में यही वो धागे होते हैं - जो हमें उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं..

इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा, जो बिन धागे की पतंग का हुआ...'

अतः जीवन में यदि तुम ऊंचाइयों पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना.."

धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही 'सफल जीवन कहते हैं.."

घर पर ही रहकर अपना और अपने का ध्यान रखे सभी का जीवन मंगलमय हो।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २५)

👉 तत्वज्ञान क्या है

अब यहां पर ज्ञान का स्वरूप जानने से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि आखिर दुःख की उत्पत्ति होती किन कारणों से? वैसे तो जीवात्मा अपने मूल रूप में आनन्दमय है। तब अवश्य ही कोई कारण ऐसा होना चाहिये जो उसके लिये दुःख की सृष्टि करता है। उसको भी योगवाशिष्ठ में इस प्रकार बताया गया है—
‘‘देह दुःख विदुर्व्याधि
माध्याख्यं मानसामयम् ।
मौर्ख्य मूले हते विद्या
तत्वज्ञाने परीक्षयः ।।’’
—शारीरिक दुःखों को व्याधि और मानसिक दुःखों को आधि कहते हैं। यह दोनों मुख्य अर्थात् अज्ञान से ही उत्पन्न होती हैं और ज्ञान से नष्ट होती हैं।

संसार के सारे दुःखों का एकमात्र हेतु अविद्या अथवा अज्ञान ही है। जिस प्रकार प्रकाश का अभाव अन्धकार है और अन्धकार का अभाव प्रकाश होता है, उसी प्रकार ज्ञान का अभाव अज्ञान और अज्ञान का ज्ञान होना स्वाभाविक ही है और जिस प्रकार ज्ञान का परिणाम सुख-शान्ति और आनन्द है उसी प्रकार अज्ञान का फल दुःख, अशान्ति और शोक-सन्ताप होना ही चाहिये।

यह युग-युग का अनुभूत तथा अन्वेषित सत्य है कि दुःखों की उत्पत्ति अज्ञान से ही होती है और संसार के सारे विद्वान, चिन्तक एवं मनीषी जन इस बात पर एकमत पाये जाते हैं। इस प्रकार सार्वभौमिक और सार्वजनिक रूप से प्रतिपादित तथ्य में संदेह की गुंजाइश रह ही नहीं जाती—इस प्रकार अपना-अपना मत देते हुये विद्वानों ने कहा है—चाणक्य ने लिखा—‘‘अज्ञान के समान मनुष्य का और कोई दूसरा शत्रु नहीं है।’’ विश्वविख्यात दार्शनिक प्लेटो ने कहा है—‘अज्ञानी रहने से जन्म न लेना ही अच्छा है, क्यों कि अज्ञान ही समस्त विपत्तियों का मूल है।’’ शेक्सपियर ने लिखा है—‘‘अज्ञान ही अन्धकार है।’’

जीवन की समस्त विकृतियों, अनुभव होने वाले दुःखों, उलझनों और अशान्ति आदि का मूल कारण मनुष्य का अपना अज्ञान ही होता है। यही मनुष्य का परम शत्रु है। अज्ञान के कारण ही मनुष्य भी अन्य जीव-जन्तुओं की तरह अनेक दृष्टियों से हीन अवस्था में ही पड़ा रहता है। ज्ञान के अभाव में जिनका विवेक मन्द ही बना रहता है उनके जीवन के अन्धकार में भटकते हुये तरह-तरह के त्रास आते रहते हैं। अज्ञान के कारण ही मनुष्य को वास्तविक कर्तव्यों की जानकारी नहीं हो पाती इसलिये वह गलत मार्गों पर भटक जाता है और अनुचित कर्म करता हुआ दुःख का भागी बनता है। इसलिये दुःखों से निवृत्ति पाने के लिये यदि उनका कारण अज्ञान को मिटा दिया जाये तो निश्चय ही मनुष्य सुख का वास्तविक अधिकारी बन सकता है।

अज्ञान का निवारण ज्ञान द्वारा ही हो सकता है। शती उसकी विपरीत वस्तु आग द्वारा ही दूर होता है। अन्धकार की परिसमाप्ति प्रकाश द्वारा ही सम्भव है। इसलिये ज्ञान प्राप्त का जो भी उपाय सम्भव हो उसे करते ही रहना चाहिये।

ज्ञान का सच्चा स्वरूप क्या है? केवल कतिपय जानकारियां ही ज्ञान नहीं माना जा सकता। सच्चा ज्ञान वह है जिसको पाकर मनुष्य आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार कर सके। अपने साथ अपने इस संसार को पहचान सके। उसे सत् और असत् कर्मों की ठीक-ठीक जानकारी रहे और वह जिसकी प्रेरणा से असत् मार्ग को त्याग कर सन्मार्ग पर असंदिग्ध रूप से चल सके। कुछ शिक्षा और दो-चार शिल्पों को ही सीख लेना भर अथवा किन्हीं उलझनों को सुलझा लेने भर की बुद्धि ही ज्ञान नहीं है। ज्ञान वह है जिससे जीवन-मरण, बन्धन-मुक्ति, कर्म-अकर्म और सत्य-असत्य का न केवल निर्णय ही किया जा सके बल्कि गृहणीय को पकड़ा और अग्राह्य को छोड़ा जा सके, वह ज्ञान आध्यात्मिक ज्ञान ही है।
अज्ञान की स्थिति में कर्मों का क्रम बिगड़ जाता है। संसार में जितने भी सुख-दुःख आदि द्वन्द्व हैं वे सब कर्मों का फल होता है। अज्ञान द्वारा अपकर्म होना स्वाभाविक ही है और तब उनका दण्ड मनुष्य को भोगना ही पड़ता है। इतना ही क्यों सकाम भाव से किये सत्कर्म सुख के फल रूप में परिपक्व होते हैं और असत्य होने से कुछ ही समय में दुःख रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इसलिये कर्म ही अधिकतर बन्धनों अथवा दुःख को मनुष्य पर आरोपित कराते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३९
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग २५)

मर्यादाओं का रक्षक है भक्त

हिमालय के श्वेतशिखरों पर भगवान सूर्य अपनी सहस्र रश्मियों से स्वर्ण राशि उड़ेलने लगे थे। सूर्यदेव के इस अपूर्व अनुदान से हिमालय का यह सम्पूर्ण प्रान्त स्वर्णिम आभा से भर रहा था। थोड़ी दूर पर ही स्थित हिम झील का जल भी इस आभा को अपने में समेट रहा था। यहाँ पर उपस्थित ऋषियों एवं देवों के समुदाय ने अपने प्रातःकर्म पूरे कर लिये थे। अभी कुछ ही देर पहले उन्होंने भगवान भुवनभास्कर से सम्पूर्ण जगती के लिए ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ की याचना की थी। ‘‘निर्मल बुद्धि, निर्मल भावनाओं से जन्म पाती है’’- ब्रह्मर्षि विश्वामित्र महर्षि क्रतु से कह रहे थे। आज न जाने क्यों उन्हें अपना अतीत याद आ रहा था। ‘‘भावनाएँ दूषित हों तो बुद्धि एवं कर्म सभी दूषित हो जाते हैं।’’
    
ऐसा लग रहा था कि प्रह्लाद की पावन भगवद्भक्ति का मधुर गीत अभी भी उनके अंतःस्रोत से झर रहा था। ‘‘परम भगवद्भक्त होते हुए भी प्रह्लाद ने कितना सौम्य व सदाचारपूर्ण जीवन जिया था। सभी विधि-निषेधों से परे होते हुए भी उन्होंने सभी विधि-निषेधों को माना। लोक और वेद को उन्होंने अपने आचरण से महिमामण्डित किया।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की इस अंतर्वाणी को देवर्षि नारद अपने अंतःकरण में जैसे सुन रहे थे। वे किंचित हँसते हुए बोले-‘‘यदि ऋषि समुदाय की आज्ञा हो तो मैं अपना अगला सूत्र प्रस्तुत करूँ।’’ देवर्षि के इस वचन का ऋषि समुदाय एवं योगित्य वर्ग ने ‘अहोभाग्य’ कहकर स्वागत किया।
‘लोकेवेदेषु तदनुकूलाचरणं तद्विरोधिषूदासीनता॥ ११॥’
    
देवर्षि नारद की मधुर वाणी से यह कथा सूत्र प्रकट हुआ। इसे प्रकट करते हुए उन्होंने कहा- ‘‘भक्त लोक और वेद के अनुकूल आचरण करता है। इसके विरोधी आचरण के प्रति वह उदासीन रहता है।’’ देवर्षि की बात के सूत्र को पकड़ते हुए महर्षि देवल बोल पड़े- ‘‘लोक और वेद की मर्यादाओं की अवहेलना तो उद्धत अहं करता है। भक्त तो सर्वथा अहं शून्य और विनम्र होता है। उससे तो कभी किसी तरह से मर्यादाओं की अवहेलना होती ही नहीं।’’ ‘‘सत्य यही है’’- कहते हुए वेदज्ञान को सम्पादित करने वाले, पुराणों की रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास को यमुना तीर पर कुटी बनाकर तपश्चर्या करने वाले भक्तवर शमीक की याद आ गयी। ऋषि शमीक हस्तिनापुर से थोड़ी दूर यमुना किनारे कुटिया बनाकर रहते थे। भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे-ऋषि शमीक। वे अपने आराध्य को कण-कण में देखने के अभ्यासी थे। सृष्टि का जड़ चेतन उनकी दृष्टि में उनके आराध्य का प्रतिरूप था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५२


शनिवार, 29 मई 2021

👉 ईश्वर से डर

एक दिन सुबह-सुबह दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजा खोला तो देखा एक आकर्षक कद- काठी का व्यक्ति चेहरे पे प्यारी सी मुस्कान लिए खड़ा है।
मैंने कहा, "जी कहिए.."
तो उसने कहा,अच्छा जी, आप तो  रोज़ हमारी ही गुहार लगाते थे?
मैंने  कहामाफ कीजिये, भाई साहब! मैंने पहचाना नहीं आपको..."

तो वह कहने लगे, "भाई साहब, मैं वह हूँ, जिसने तुम्हें साहेब बनाया है... अरे ईश्वर हूँ.., ईश्वर.. तुम हमेशा कहते थे न कि नज़र में बसे हो पर नज़र नहीं आते... लो आ गया..! अब आज पूरे दिन तुम्हारे साथ ही रहूँगा।"

मैंने चिढ़ते हुए कहा,"ये क्या मज़ाक है?" "अरे मज़ाक नहीं है, सच है। सिर्फ़ तुम्हें ही नज़र आऊंगा। तुम्हारे सिवा कोई देख-सुन नही पाएगा मुझे। "कुछ कहता इसके पहले पीछे से माँ आ गयी.. "अकेला ख़ड़ा-खड़ा क्या कर रहा है यहाँ, चाय तैयार है, चल आजा अंदर.अब उनकी बातों पे थोड़ा बहुत यकीन होने लगा था, और मन में थोड़ा सा डर भी था.. मैं जाकर सोफे पर बैठा ही था कि बगल में वह आकर बैठ गए। चाय आते ही जैसे ही पहला घूँट पीया कि मैं गुस्से से चिल्लाया,अरे मॉं, ये हर रोज इतनी चीनी? "इतना कहते ही ध्यान आया कि अगर ये सचमुच में ईश्वर है तो इन्हें कतई पसंद नहीं आयेगा कि कोई अपनी माँ पर गुस्सा करे। अपने मन को शांत किया और समझा भी  दिया कि 'भई, तुम नज़र में हो आज... ज़रा ध्यान से!'

बस फिर मैं जहाँ-जहाँ... वह मेरे पीछे-पीछे पूरे घर में... थोड़ी देर बाद नहाने के लिये जैसे ही मैं बाथरूम की तरफ चला, तो उन्होंने भी कदम बढ़ा दिए..मैंने कहा, "प्रभु, यहाँ तो बख्श दो..."

खैर, नहाकर, तैयार होकर मैं पूजा घर में गया, यकीनन पहली बार तन्मयता से प्रभु वंदन किया, क्योंकि आज अपनी ईमानदारी जो साबित करनी थी.. फिर आफिस के लिए निकला, अपनी कार में बैठा, तो देखा बगल में  महाशय पहले से ही बैठे हुए हैं। सफ़र शुरू हुआ तभी एक फ़ोन आया, और फ़ोन उठाने ही वाला था कि ध्यान आया, 'तुम नज़र में हो।'

कार को साइड में रोका, फ़ोन पर बात की और बात करते-करते कहने ही वाला था कि 'इस काम के ऊपर के पैसे लगेंगे' ...पर ये  तो गलत था, : पाप था, तो प्रभु के सामने ही कैसे कहता तो एकाएक ही मुँह से निकल गया,"आप आ जाइये। आपका काम हो  जाएगा।"

फिर उस दिन आफिस में ना स्टॉफ पर गुस्सा किया, ना किसी कर्मचारी से बहस की 25-50 गालियाँ तो रोज़ अनावश्यक निकल ही जातीं थीं मुँह से, पर उस दिन सारी गालियाँ, 'कोई बात नहीं, इट्स ओके...'में तब्दील हो गयीं।

वह पहला दिन था जब क्रोध, घमंड, किसी की बुराई, लालच, अपशब्द, बेईमानी, झूंठ- ये सब मेरी दिनचर्या का हिस्सा नहीं बने।
शाम को ऑफिस से निकला, कार में बैठा, तो बगल में बैठे ईश्वर को बोल ही दिया...

"प्रभु सीट बेल्ट लगा लें, कुछ नियम तो आप भी निभाएं... उनके चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान थी..."
घर पर रात्रि-भोजन जब परोसा गया तब शायद पहली बार मेरे मुख से निकला,
"प्रभु, पहले आप लीजिये।"

और उन्होंने भी मुस्कुराते हुए निवाला मुँह मे रखा। भोजन के बाद माँ बोली, "पहली बार खाने में कोई कमी नहीं निकाली आज तूने। क्या बात है ? सूरज पश्चिम से निकला है क्या, आज?"

मैंने कहा माँ आज सूर्योदय मन में हुआ है... रोज़ मैं महज खाना खाता था, आज प्रसाद ग्रहण किया है माँ, और प्रसाद में कोई कमी नहीं होती।"

थोड़ी देर टहलने के बाद अपने कमरे मे गया, शांत मन और शांत दिमाग  के साथ तकिये पर अपना सिर रखा तो ईश्वर ने प्यार से सिर पर हाथ फिराया और कहा,
"आज तुम्हें नींद के लिए किसी संगीत, किसी दवा और किसी किताब के सहारे की ज़रुरत नहीं है।"

गहरी नींद गालों पे थपकी से उठी
कब तक सोयेगा .., जाग जा अब।
माँ की आवाज़ थी... सपना था शायद... हाँ, सपना ही था पर नीँद से जगा गया... अब समझ में आ गया उसका इशारा...

"तुम मेरी नज़र में हो...।"
जिस दिन ये समझ गए कि "वो" देख रहा है, सब कुछ ठीक हो जाएगा। सपने में आया एक विचार भी आँखें खोल सकता है।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २४)

👉 दुखों का कारण

पूर्वोक्त लौकिक आनन्दों में यह विशेषताएं नहीं होतीं। उनकी प्राप्ति के लिये कारण और साधन की आवश्यकता होती है। वह किसी हेतु से उत्पन्न होता है और हेतु के मिट जाने पर नष्ट हो जाता है। इतना ही क्यों—यदि एक बार उसका आधार बना भी रहे तो भी उस आनन्द में जीर्णता, क्षीणता, प्राचीनता और अरुचिता आ जाती है। लौकिक आनन्दों की परि-समाप्ति दुःख में ही होती है। आज जो किसी कारण से प्रसन्न है, आनन्दित है वह कल किसी कारण से दुःखी होने लगता है। लौकिक आनन्द की कितनी ही मात्रा क्यों न मिलती जाय, तथापि और अधिक पाने की प्यास बनी रहती है। उससे न तृप्ति मिलती है और न सन्तोष। जिस अनुभूति में अतृप्ति, असन्तोष और तृष्णा बनी रहे वह आनन्द कैसा? लौकिक आनन्द के कितने ही सघन वातावरण में क्यों न बैठे हों एक छोटा-सा अप्रिय समाचार या छोटी-सी दुःखद बात उसे समूल नष्ट कर देती है। तब न किसी के मुख पर हंसी रह जाती है और न हृदय में पुलक! लौकिक आनन्द और मोक्षानन्द की परस्पर तुलना ही नहीं की जा सकती।

लौकिक आनन्दों में इस असफलता का कारण यह होता है कि वे असत्य एवं भ्रामक होते हैं। उनकी अनुभूति, प्रवंचना अथवा मृगतृष्णा के समान ही होती है। इस असत्यता का दोष ही लौकिक आनन्द को निकृष्ट एवं अग्राह्य बना देते हैं। आनन्द केवल आत्मिक आनन्द ही होता है। मोक्ष का आनन्द ही वास्तविक तथा अन्वेषणीय आनन्द है। लौकिक आनन्दों की अग्राह्यता का प्रतिपादन इसीलिये किया गया है कि जो व्यक्ति उसके झूंठे प्रवचनों में फंस जाता है, उन्हें पकड़ने, पाने के लिये दौड़ता रहता है, उनको स्थिर और स्थायी बनाने में लगता है, वह अपना सारा जीवन इसी मायाजाल में उलझकर खो देता है। भ्रम में पड़े रहने के कारण उसे वास्तविकता का ध्यान ही नहीं आता। लौकिक आनन्दों के फेर में पड़कर जिसे वास्तविक आनन्द का ध्यान ही न आयेगा वह उसको पाने के लिये प्रयत्नशील भी क्यों होगा। जिस हिरण को मरुमरीचिक जल भ्रम में भुला लेती है तन-मन से उसी को पकड़ने के पीछे पड़ा रहता है। अब पाया, अब पाया करता हुआ वह निःसार दुराशा का यन्त्र बना भटकता रहता है और इस प्रकार वास्तविक जल की खोज से वंचित हो जाता है। परिणाम यह होता है कि भटक-भटक कर प्यासा ही मर जाता है। जिस जीवन में वह पानी और परितृप्ति दोनों को पाकर कृतार्थ हो सकता था वह जीवन यों ही चला जाता है, नष्ट हो जाता है। यही हाल लौकिक आनन्दवादियों का होता है। जिस जीवन में वे मोक्ष और उसका वास्तविक सुख प्राप्त कर सकते हैं वे उसे माया-छाया और भ्रामक सुख की मरीचिका में नष्ट कर अपनी अनन्त हानि कर लेते हैं। इसीलिये लौकिक सुखों को प्रबलता के साथ अग्राह्य एवं गर्हित बताया गया है। वास्तविक आनन्द लौकिक लिप्साओं और सांसारिक भोग-विलासों में नहीं है वह मोक्ष और मोक्ष की स्थिति में है। उसी को पाने का प्रयत्न करना चाहिये, वही मानव जीवन का लक्ष्य है, उसी में शांति और तृप्ति मिलेगी।

इस प्रकार स्पष्ट है कि दुःख तो दुःख ही है सांसारिक सुख भी दुःख का एक स्वरूप है। इनकी निवृत्ति से ही सच्चे सुख की प्राप्ति सम्भव है। किन्तु इनकी निवृत्ति का उपाय क्या है? इसके लिये पुनः योगवाशिष्ठ में कहा गया है—
‘‘ज्ञानान्निर्दुःखतामेति
ज्ञानादज्ञान संक्षयः ।
ज्ञानादेव परासिद्धि
नन्दियस्याद्राम वस्तुतः ।।’’

—हे राम! ज्ञान से ही दुःख दूर होते हैं, ज्ञान से अज्ञान का निवारण होता है, ज्ञान से ही परम सिद्धि होती है और किसी उपाय से नहीं।
और भी आगे बताया गया है—
‘‘प्रज्ञा विज्ञात विज्ञेय
सम्यग् दर्शन माधयः ।
न दहन्ति वनं वर्षा
सिक्तमग्निशिखा इव ।’’
—जिसने जानने योग्य को जान लिया है और विवेक दृष्टि प्राप्त कर ली है, उस ज्ञानी को दुःख उसी प्रकार त्रासक नहीं होते जिस प्रकार वर्षा से भीगे जंगल को अग्नि शिखा नहीं जा पाती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३७
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग २४)

अन्य आश्रयों का त्याग ही है अनन्यता
    
भक्तों में अग्रणी प्रह्लाद। भावनाओं में परम अनन्यता की भावमयी मूर्ति प्रह्लाद। इन भक्तश्रेष्ठ के नाम में ही कुछ जादू था। सभी इनके स्मरण मात्र से भाव विह्वल हो गये। श्रवण की उत्सुकता जाग्रत हुई। हरिवाहन-विनितानन्दन गरुड़ कह रहे थे- ‘‘मैं भक्तश्रेष्ठ प्रह्लाद के भक्तिमय जीवन के कई पावन पलों का स्वयं साक्षी रहा हूँ। उन्होंने तो अपनी माँ के गर्भ में ही भक्ति का पाठ पढ़ा था। उस समय उनकी माता देवर्षि के सान्निध्य में रह रही थीं।’’
    
पक्षीराज गरुड़ के स्वरों ने देवर्षि की स्मृतियों को कुरेद दिया। उन्हें याद हो आये वे बीते दिन, जब वे अपनी भ्रमणकारी प्रवृत्ति के विपरीत एक स्थान पर स्थिर होकर रहे थे। प्रह्लाद की माता उनके आश्रम में प्रभु भक्ति में लीन रहती थीं। आश्रम के समीप का वह वनप्रान्त एक नवीन भावचेतना से पूरित हो गया था। अपनी माता के गर्भ में स्थित प्रह्लाद की चेतना चारों ओर एक दैवीभाव बिखेर रही थी। देवर्षि स्वयं उन्हें भक्ति के नवीन सूत्र सुनाया करते थे। उन्हीं दिनों उन्हें अनन्यता के उपदेश मिले थे।
    
अपनी स्मृतियों में विभोर देवर्षि को चेतन जब आया, जब गरुड़ जी के स्वर उनके कानों में पड़े। वह कह रहे थे कि ‘‘भक्त प्रह्लाद अपने गर्भकाल से ही असुरता के निशाने पर थे। उन्हें उस युग के सबसे महाशक्तिशाली जनों के कोप का भाजन बनना पड़ा। प्रह्लाद के पिता महाशक्तिशाली सम्राट हिरण्यकश्यपु एवं महान् तांत्रिक एवं यौगिक शक्तियों से सम्पन्न शुक्राचार्य। अपने युग की ये दो महान् शक्तियाँ प्रत्येक ढंग से प्रह्लाद का विनाश चाहती थीं। प्रह्लाद की मृत्यु ही इन दोनों का लक्ष्य थी। इनके पास अनेक साधन थे। अनेकों ढंग से ये हर दिन प्रह्लाद के विनाश की योजनाएँ रचते थे।
    
लेकिन प्रह्लाद को केवल नारायण के नाम का आश्रय था। नारायण के नाम और अपने नारायण की भक्ति के सिवा उन्होंने कभी किसी साधन या साधना के बारे में नहीं सोचा अन्यथा प्रतिभाशाली एवं असीम धैर्यवान् प्रह्लाद कभी भी किसी साधना में प्रवीण हो सकते थे। तंत्र एवं योग की सभी प्रक्रियाओं का ज्ञान उनके लिए सम्भव था। परन्तु इस अनूठे भक्त की अनन्य भक्ति तो केवल अपने भगवान के लिए थी। भगवान! भगवान!! और सिर्फ भगवान!!! अन्य कुछ भी नहीं।
    
सम्राट हिरण्यकश्यपु के प्रहार संघातक थे। कारागार की यातनाएँ, कभी पहाड़ से फिंकवाना तो कभी हाथी के नीचे कुचलवाने का आदेश देना, कभी उन्हें समुद्र में डुबा देने का आदेश। इतने पर भी जब उसे संतोष न हुआ तो अपनी वर प्राप्त बहन होलिका को प्रह्लाद को जला देने के लिए कहना। नित-नयी आपत्तियों को भक्त प्रह्लाद वरदान की तरह मानते थे। जब उन्हें होलिका ने जला देने का प्रयास किया तब इस घटना में होलिका की मृत्यु हो गयी। प्रह्लाद को उसकी मृत्यु पर सहज दुःख हुआ।
ऐसे में एक दिन उन्होंने देवर्षि से कहा था- ‘‘देवर्षि! मैं इतने लोगों के दुःख का कारण क्यों हूँ?’’ तब देवर्षि ने उनसे कहा- ‘‘पुत्र! तुम नहीं, उनकी प्रवृत्तियाँ उनके दुःखों का कारण हैं।’’ इसके बाद देवर्षि ने उनके मन को टटोलते हुए पूछा- ‘‘वत्स! क्या तुम्हें इन आपदाओं से कभी डर लगता है।’’ उत्तर में प्रह्लाद बड़े ही निश्छल भाव से हँसे और कहने लगे- ‘‘हे देवर्षि! मुझे तो आप ने ही यह पाठ पढ़ाया है कि भक्त के जीवन में आने वाली आपदाएँ, भक्त एवं भगवान दोनों की परीक्षा लेती हैं। भक्त की यह परीक्षा होती है कि उसकी प्रभुभक्ति कितनी प्रगाढ़ एवं अनन्य है और भगवान की परीक्षा कि वह अपने अनन्य भक्त की किस कुशलता से रक्षा करते हैं। साथ ही आपने यह भी बताया था कि भक्त से भले ही चूक हो जाये, परन्तु भगवान कभी भी नहीं चूकते। उनसे भक्त रक्षा में कभी प्रमाद नहीं होता।
    
और सचमुच ही भगवान नहीं चूके। उन्होंने अपने भक्त के लिए नृसिंह का रूप धरा। हिरण्यकश्यपु के घातक प्रहारों का उन्होंने संहार किया। भक्त प्रह्लाद की अनन्यता प्रभु भक्तों का अनुकरणीय आदर्श बनी।’’ गरुड़ के मुख से इस कथा को सुनकर महर्षियों के मुख पर प्रसन्नता के भाव छलके। उन्होंने हर्षित होकर कहा- ‘‘धन्य है भक्त प्रह्लाद, जिन्होंने भगवद्भक्ति की मर्यादाओं को परमोज्ज्वल रूप प्रदान दिया।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५०

गुरुवार, 27 मई 2021

👉 दोषारोपण🌻🌻

एक आदमी रेगिस्तान से गुजरते वक़्त बुदबुदा रहा था,“कितनी बेकार जगह है ये,बिलकुल भी हरियाली नहीं है और हो भी कैसे सकती है यहाँ तो पानी का नामो-निशान भी नहीं है।

तपती रेत में वो जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था उसका गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था. अंत में वो आसमान की तरफ देख झल्लाते हुए बोला- क्यों भगवान आप यहाँ पानी क्यों नहीं देते? अगर यहाँ पानी होता तो कोई भी यहाँ पेड़-पौधे उगा सकता था और तब ये जगह भी कितनी खूबसूरत बन जाती!

ऐसा बोल कर वह आसमान की तरफ ही देखता रहा मानो वो भगवान के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हो!तभी एक चमत्कार होता है,नज़र झुकाते ही उसे सामने एक कुंवा नज़र आता है!

वह उस इलाके में बरसों से आ-जा रहा था पर आज तक उसे वहां कोई कुँवा नहीं दिखा था… वह आश्चर्य में पड़ गया और दौड़ कर कुंवे के पास गया। कुंवा लाबालब पानी से भरा था.  

उसने एक बार फिर आसमान की तरफ देखा और पानी के लिए धन्यवाद करने की बजाये बोला - “पानी तो ठीक है लेकिन इसे निकालने के लिए कोई उपाय भी तो होना चाहिए !!”

उसका ऐसा कहना था कि उसे कुँवें के बगल में पड़ी रस्सी और बाल्टी दिख गयी।एक बार फिर उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ! वह कुछ घबराहट के साथ आसमान की ओर देख कर बोला, “लेकिन मैं ये पानी ढोउंगा कैसे?”

तभी उसे महसूस होता है कि कोई उसे पीछे से छू रहा है,पलट कर देखा तो एक ऊंट उसके पीछे खड़ा था!अब वह आदमी अब एकदम घबड़ा जाता है, उसे लगता है कि कहीं वो रेगिस्तान में हरियाली लाने के काम में ना फंस जाए और इस बार वो आसमान की तरफ देखे बिना तेज क़दमों से आगे बढ़ने लगता है।

अभी उसने दो-चार कदम ही बढ़ाया था कि उड़ता हुआ पेपर का एक टुकड़ा उससे आकर चिपक जाता है।उस टुकड़े पर लिखा होता है –

मैंने तुम्हे पानी दिया,बाल्टी और रस्सी दी।पानी ढोने  का साधन भी दिया,अब तुम्हारे पास वो हर एक चीज है जो तुम्हे रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने के लिए चाहिए। अब सब कुछ तुम्हारे हाथ में है ! आदमी एक क्षण के लिए ठहरा !! पर अगले ही पल वह आगे बढ़ गया और रेगिस्तान कभी भी हरा-भरा नहीं बन पाया।

मित्रों !! कई बार हम चीजों के अपने मन मुताबिक न होने पर दूसरों को दोष देते हैं। कभी हम परिस्थितियों को दोषी ठहराते हैं,कभी अपने बुजुर्गों को,कभी संगठन को तो कभी भगवान को।पर इस दोषारोपण के चक्कर में हम इस आवश्यक चीज को अनदेखा कर देते हैं कि - एक इंसान होने के नाते हममें वो शक्ति है कि हम अपने सभी सपनो को खुद साकार कर सकते हैं।

शुरुआत में भले लगे कि ऐसा कैसे संभव है पर जिस तरह इस कहानी में उस इंसान को रेगिस्तान हरा-भरा बनाने के सारे साधन मिल जाते हैं उसी तरह हमें भी प्रयत्न करने पर अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए ज़रूरी सारे उपाय मिल सकते हैं.

👉 दोस्तॊ !! समस्या ये है कि ज्यादातर लोग इन उपायों के होने पर भी उस आदमी की तरह बस शिकायतें करना जानते है। अपनी मेहनत से अपनी दुनिया बदलना नहीं! तो चलिए,आज इस कहानी से सीख लेते हुए हम शिकायत करना छोडें और जिम्मेदारी लेकर अपनी दुनिया बदलना शुरू करें क्योंकि सचमुच सब कुछ तुम्हारे हाथ में है !!

🌸हम बदलेंगे, युग बदलेगा।🌸

👉 भक्तिगाथा (भाग २३)

अन्य आश्रयों का त्याग ही है अनन्यता

आँखों में छलकते भावबिन्दु, हृदयों में उफनती भावोर्मियाँ-सभी की अंतर्चेतना गहन भावसमाधि में डूबने लगी। कुछ पल के लिए ऐसा लगा जैसे कि कालचक्र थम गया हो। बाहरी जीवनधारा थमने की भले ही प्रतीति न हुई हो, पर सभी के अंतस्थ प्राण अवश्य ठिठक गये थे। देवर्षि नारद के द्वारा कहे गये सूत्र एवं महर्षि देवल की अनुभूति कथा का रस था ही कुछ ऐसा, कि सभी की अंतश्चेतना उसमें भीग गयी थी। सभी की यह अवस्था कितनी देर रही, कहा नहीं जा सकता। चेतना को चैतन्य तब प्राप्त हुआ, जब आकाश सामगान के मंत्रों की अनुगूँज से पूरित होने लगा। दरअसल साम के ये मधुर स्वर पक्षीराज गरुड़ के पंखों से झर रहे थे।
    
विनितानन्दन गरुड़, भगवान के वाहन गरुड़ और सबसे बढ़कर भगवान विष्णु के वाहन गरुड़, उनकी यह उपस्थिति सभी की चेतना में भक्ति का नया गीत बनकर उतर गयी। वैनतेय ने सभी ऋषियों को नमन किया। देवर्षि तो जैसे उनके प्राणप्रिय सखा ही थे। भगवान नारायण के इन पार्षदों का मिलन अवर्णनीय था। कुछ ऐसा जैसा कि भक्ति की दो धाराएँ मिलकर भावसमाधि की नव सृष्टि कर रही हों। हिमालय के इन हिम-धवल शिखरों ने भी इसे अनुभव किया। पहले ही हो चुके भक्तिमय वातावरण में नवपुलक भर गयी। अब तो बस देवर्षि के मुख से नवसूत्र उच्चारित होना था-
‘अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता॥ १०॥’
अन्य आश्रयों का त्याग ही अनन्यता है।
    
हृदय वीणा की झंकृति की एक समवेत गूँज उठी। इस मधुर झंकृति में भक्ति के अनुभव नवगीत कौन पिरोयेगा? सभी की दृष्टि पक्षीराज गरुड़ की ओर जाकर टिक गयी। सप्तऋषियों ने भी आग्रह किया- ‘‘हे हरिवाहन! आज आप ही इस सूत्र की व्याख्या करें। आप स्वयं प्रभु के श्रेष्ठ भक्त हैं। भक्तों के लिए भगवान की विकलता आपने स्वयं देखी है। भक्तों के हृदय की विह्वलता के भी आप साक्षी रहे हैं। आपके हृदय की अनुभव कथा भी भक्ति में भीगी है।’’ सप्तर्षियों के इस आग्रह पर गरुड़ का गात्र पुलकित हो उठा। उन्होंने विनम्र भाव से कहा- ‘‘हे ऋषिगण! आप सब त्रिलोकी के मार्गदर्शक हैं। भगवान स्वयं आपके हृदय प्रेरक हैं। आपके आदेश को स्वीकारते हुए आज मैं भक्त प्रह्लाद की भक्तिकथा सुनाऊँगा।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४८

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २३)

👉 दुखों का कारण

वस्तु स्थिति को न जानने के कारण ही विविध भांति के दुःख संताप उत्पन्न। महर्षि वशिष्ठ ने भगवान राम को दुखों का कारण अज्ञान बताते हुये उससे मुक्त होने का उपाय ज्ञान साधना ही बताया है।
योगवाशिष्ठ का वचन है—
‘‘आयधो व्याधयश्चैव
द्वय दुःखस्य कारणम् ।
तत्क्षयो मोक्ष उच्यते ।।’’
अर्थात्—आधि, व्याधि—अर्थात् मानसिक और शारीरिक यह दो ही प्रकार के दुःख इस संसार में हैं। इनकी निवृत्ति विद्या अर्थात् ज्ञान द्वारा ही होती है। इस दुःख निवृत्ति का नाम ही मोक्ष है।’’

इस प्रकार इस न्याय से विदित होता है कि यदि मनुष्य जीवन से दुःखों का तिरोधान हो जाय तो वह मोक्ष की स्थिति में अवस्थित हो जाये। दुःखों का अत्यन्त अभाव ही आनन्द भी है। अर्थात् मोक्ष और आनन्द एक दूसरे के पर्याय हैं। इस प्रकार यदि जीवन के दुःखों को नष्ट किया जा सके तो आनन्द वाची मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है। बहुत बार देखा जाता है कि लोग जीवन में अनेक बार आनन्द प्राप्त करते हैं। वे हंसते, बोलते खाते, खेलते, मनोरंजन करते, नृत्य-संगीत और काव्य-कलाओं का, आनन्द लेते, उत्सव-समारोह और पर्व मनाते, प्रेम पाते और प्रदान करते, गोष्ठी और सत्संगों में मोद-विनोद करते और न जाने इसी प्रकार से आमोद-प्रमोद पाते और प्रसन्न बना करते हैं—तो क्या उनकी इस स्थिति को मोक्ष कहा जा सकता है?

नहीं, मनुष्य की इस स्थिति को मोक्ष नहीं कहा जा सकता। मोक्ष का आनन्द स्थायी, स्थिर, अक्षय, समान अहैतुकं और निःशेष हुआ करता है। वह न कहीं से आता और न कहीं जाता है। न किसी कारण से उत्पन्न होता है और न किसी कारण से नष्ट होता है। वह आत्म-भूत और अहैतुकं होता है। वह सम्पूर्ण रूप में मिलता है सम्पूर्ण रूप में अनुभूत होता है सम्पूर्ण रूप में सदा-सर्वदा ही बना रहता है। वह सार्वदेशिक सर्वव्यापक, और सर्वस्व सहित ही होता है। मोक्ष का आनन्द पाने पर न तो कोई अंश शेष रह जाता है और न उसके आगे किसी प्रकार के आनन्द की इच्छा शेष रह जाती है। वह प्रकाम, पूर्ण और परमावधिक ही होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३५
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

मंगलवार, 25 मई 2021

👉 बेटी

दिव्या विदा होकर चली गई, सुषमा को अभी भी विश्वास नही हो रहा था। दिन भर मानो घर मे रौनक ही दिव्या से ही थी।

कभी लड़ना, कभी बाहें गले मे डाल कर लटक जाना, कभी बाजार साथ, उनकी बेस्ट फ्रेंड थी दिव्या----
पूरा घर सांय सांय कर रहा था। यूं तो घर मे बेटा मोहित, बहू शिल्पा, नन्हा पोता सब थे, पर दिव्या-----

फिर से उनकी आंखें भरने लगी थीं। करवट बदल कर लेटी ही थीं, की एक तेज आवाज सुनाई दी, ओफ्फो मम्मी! कितनी देर सोती रहेंगी? मुझे कॉलेज निकलने में देर हो रही है।

इतनी तेज आवाज!!! शिल्पा तो नही हो सकती। दिव्या!!! वो हड़बड़ा कर उठीं---

संभल कर!, अरे ये क्या उनके सामने शिल्पा थी।

अचानक उनके मुँह से निकला, "कैसे बोल रही हो शिल्पा? क्या बिल्कुल ही भूल गई कि किससे बात कर रही हो? थोड़ा तमीज----"

 पर शिल्पा ने बीच मे ही बात काट कर कहा,
"किससे कर रही हूँ पता है---, मम्मी से---"
क्या एक कप चाय भी मुझे निकलने से पहले खुद ही बनानी होगी?

शिल्पा की आवाज में पहले वाली तेजी बरकरार थी।

अब तक सुषमा बिस्तर छोड़ चुकीं थीं, गुस्से में कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था, कि शिल्पा के चेहरे पर नज़र पड़ी,
होंठों पर मंद स्मित और आंखों में नमी---

सुषमा को अब सब समझ आ चुका था। आगे बढ़कर उन्होंने शिल्पा को गले लगा लिया---
मेरी बेटी---

अब दोनो मां बेटी की आंखें भीग चुकी थीं।

लाती हूँ चाय, पर शाम को सब्जी तू ही बनाएगी कहे देती हूँ।

कह कर सुषमा हल्के मन से किचन की तरफ बढ़ गई।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २२)

👉 अपनी अपनी दुनिया

संसार के स्वरूप निर्धारण में—उन्हें जानने समझने में पांच ज्ञानेन्द्रियों की भांति ही यह मनः संस्थान के चार चेतना केन्द्र भी काम करते हैं। अतएव उन्हें भी अनुभूति उपकरणों में ही गिना गया है। हमारा समस्त ज्ञान इन्हीं उपकरणों के आधार पर टिका हुआ है।

मनुष्यों की भिन्न मनःस्थिति के कारण एक ही तथ्य के सम्बन्ध में परस्पर विरोधी मान्यतायें एवं रुचियां होती हैं। यदि यथार्थता एक ही होती तो सबको एक ही तरह के अनुभव होते। एक व्यक्ति अपराधों में संलग्न होता है दूसरा परमार्थ परोपकार में। एक को भोग प्रिय है दूसरे को त्याग। एक को प्रदर्शन में रुचि है दूसरे को सादगी में। एक विलास के साधन जुटा रहा है दूसरा त्याग पथ पर बढ़ रहा है। इन भिन्नताओं से यही सिद्ध होता है कि वास्तविक सुख-दुख, हानि-लाभ कहां है किसमें है इसका निर्णय किसी सार्वभौम कसौटी पर नहीं मनःसंस्थान की स्थिति के आधार पर दृष्टिकोण के अनुरूप ही किया जाता है। यह सार्वभौम सत्य यदि प्राप्त हो गया होता तो संसार में मत-भेदों की कोई गुंजाइश न रहती। मनःसंस्थान जो अनुभव कराता है उसमें भी इन्द्रिय ज्ञान से कम नहीं वरन् अधिक ही भ्रांति भरी पड़ी है।

सुख और दुख की अनुभूति सापेक्ष है। दूसरे की तुलना करके ही स्थिति के भले-बुरे का अनुभव किया जाता है। कोई मध्य स्थिति का व्यक्ति अमीर की तुलना में गरीब है। किन्तु महादरिद्र की तुलना में वह भी अमीर है। ज्वर पीड़ित व्यक्ति स्वस्थ मनुष्य की तुलना में दुखी है पर केन्सर ग्रस्त की तुलना में सुखी। शरीर पीड़ा की कुछ अनुभूतियों को छोड़कर शेष 90 प्रतिशत दुख और सुख सापेक्ष होते हैं। उसी स्थिति में एक व्यक्ति अपने को सुखी अनुभव कर सकता है। और दूसरा दुखी। इन विभिन्न निष्कर्षों के आधार पर सत्य को पहचानना कठिन है।

संसार पदार्थों से बना है। पदार्थ अणुओं से बने हैं। अणु परमाणुओं से—परमाणु इलेक्ट्रोन, प्रोटोन आदि विखण्डों से—और वे विखण्ड तरंगों के घनीभूत रूप हैं। विज्ञान बताता है कि यह जगत तरंगों का परिणाम है, तरंग मय है, तरंग ही है। शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श की तन्मात्रायें और विचार विवेचना, अभिव्यक्ति, अनुभूति अभिव्यंजना आदि के पीछे केवल तरंगें काम करती हैं। यहां तरंगों के अतिरिक्त और कहीं कुछ नहीं है।

प्रकृति में परम सत्ता का निरन्तर संयोग मिलन, संस्फुरण, आदान-प्रदान, आकर्षण-विकर्षण ही तरंगें बनकर गतिशील रहता है और वह गति ही पदार्थ बनकर सामने आती रहती है। जो दीखता है उसके मूल में केवल तरंग स्फुरणा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। जो प्रिय अप्रिय है उसमें आत्मानुभूति की मात्रा की घट-बढ़ की उथल-पुथल के अतिरिक्त और कहीं कुछ भी नहीं है। जड़ चेतन के समस्त परमाणु एक क्रमबद्ध प्रक्रिया के अनुरूप एक दिशा में चलते जा रहे हैं। उस प्रवाह का कोई चाहे तो समुद्र तट पर बैठकर उसकी हिलोरों का आनन्द ले सकता है। भ्रमग्रस्त हर नई लहर के आने का लाभ और जाने की हानि समझता हुआ हंसने रोने का प्रलाप कर सकता है। नियति का क्रम अपने ढंग से चलेगा, किसी के सोचने का तरीका क्या है, इसकी उसे परवा नहीं। हाथी अपनी राह चलेगा ही कुत्ते उसका स्वागत करें या रोष दिखायें यह उनकी मर्जी। प्रकृति की स्वसंचालित व्याख्या हाथी की तरह ही चलेगी यहां हर वस्तु का रूप बदलेगा। आज का सृजन, संयोग कल विनाश एवं वियोग का रूप धारण करेगा। अपरिवर्तनवादी आकांक्षा अधूरी ही रहेगी। यहां स्थिरता के लिये कोई स्थान नहीं। जो संग्रह एवं स्थायित्व के अभिलाषी हैं उन्हें निराशा भरे पश्चात्ताप के अतिरिक्त और क्या हाथ लगेगा?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३४
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग २२)

अनन्यता के पथ पर बढ़ चलें हम

देवर्षि के उपदेश के अनुसार मैंने भक्ति प्रारम्भ की, परन्तु मेरे लिए यह करना आसान न था। अन्दर-बाहर अनेकों उपद्रव उठ खड़े हुए। इन्द्रियाँ और मन मुझे बार-बार दुष्प्रवृत्तियों की ओर खींचते थे। पिछले संचित कर्म जो अब प्रारब्ध बन चुके थे। इनके प्रहार दारुण थे। लोकलाँछन, कटुक्तियाँ, व्यंग्य सब कुछ असहनीय था। बाहर शत्रु संहारक हो रहे थे तो देह में रोग संघातक थे। इतनी जटिलताओं में मेरे पास केवल माँ का नाम था। जिस पर मुझे ठीक-ठीक भरोसा नहीं हो रहा था। तभी मेरे पास देवर्षि का दुबारा आगमन हुआ, ये कहने लगे-व्याकुल न हो देवल! बस माँ का नाम मंत्र रटे जाओ। दोषों की न तो चिंता करो और न चिंतन। ये जैसे हैं बने रहने दो। बस माँ के मंत्र में अपनी अनन्यता बढ़ाते जाओ।
    
देवर्षि के वचनों ने मुझे हिम्मत दी। मेरी भक्ति अनन्यता के पथ पर बढ़ चली। ध्यान तो मेरा लगता नहीं था, बस मंत्र रटन थी। इस रटन को मैं प्रगाढ़ करता गया। कुसंस्कारों की कठोर ठोकरें मुझे जितनी चोटें पहुँचातीं, उतनी ही व्याकुलता से मैं माँ को पुकारता। कष्ट जितने बढ़ते मेरी पुकार उतनी ही बढ़ती। धीरे-धीरे मुझमें भरोसा आया कि माँ मेरा, मुझ पाप-पंक में पड़े अपने इस अधम संतान का अवश्य उद्धार करेगी। मैं तो बस बार-बार यही रटता था-

आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं,
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः,
क्षुधा तृषार्ता जननीं स्मरन्ति॥
    
हे माता दुर्गे! करुणासिंधु महेश्वरी! मैं विपत्तियों में फँसकर आज जो तुम्हारा स्मरण करता हूँ, इसे मेरी विनती मानना; भूख-प्यास से पीड़ित बालक माता का ही स्मरण करते हैं।
    
और सच में ही माता ने मेरी पुकार सुन ली। वृत्तियों की चपलता कब शान्त हुई, कब चित्त निरुद्ध हुआ, पता ही नहीं चला। अब तो समस्त भुवनों में वही भुवनेश्वरी झलकती हैं।’’ महर्षि देवल ने अपनी भक्तिकथा समाप्त करते हुए सभी की ओर देखा। सबकी आँखों में आँसू थे, ये प्रेमाश्रु थे। इन भावबिन्दुओं में सभी की भक्ति छलक रही थी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४६

रविवार, 23 मई 2021

👉 अहंकार

एक दिन रामकृष्ण परमहंस किसी सन्त के साथ बैठे हुए थे। ठण्ड के दिन थे। सांयकाल हो गया था। तब सन्त ने ठण्ड से बचने के लिए कुछ लकड़ियां एकट्ठा कीं और धूनी जला दी। दोनों सन्त धर्म और अध्यात्म पर चर्चा कर रहे थे।

इनसे कुछ दूर एक गरीब व्यक्ति भी बैठा हुआ। उसे भी ठण्ड लगी तो उसने भी कुछ लकड़ियां एकट्ठा कर लीं। अब लकड़ी जलाने के लिए उसे आग की आवश्यकता थी। वह तुरन्त ही दोनों संतों के पास पहुंचा और धूनी से जलती हुई लकड़ी का एक टुकड़ा उठा लिया।

एक व्यक्ति ने सन्त द्वारा जलाई गई धूनी को छू लिया तो सन्त गुस्सा हो गए। वे उसे मारने लगे। संत ने कहा कि तू पूजा-पाठ नहीं करता है, भगवान का ध्यान नहीं करता, तेरी हिम्मत कैसे हुई, तूने मेरे द्वारा जलाई गई धूनी को छू लिया।

रामकृष्ण परमहंस ये सब देखकर मुस्कुराने लगे। जब संत ने परमहंसजी को प्रसन्न देखा तो उन्हें और गुस्सा आ गया। उन्होंने परमहंसजी से कहा, ‘आप इतना प्रसन्न क्यों हैं? ये व्यक्ति अपवित्र है, इसने गन्दे हाथों से मेरे द्वारा जलाई गई अग्नि को छू लिया है तो क्या मुझे गुस्सा नहीं होना चाहिए?’

परमहंसजी ने कहा, ‘मुझे नहीं मालूम था कि कोई वस्तु छूने से अपवित्र हो जाती है। अभी आप ही कह रहे थे कि सभी व्यक्तियों में परमात्मा का वास है। और थोड़ी ही देर पश्चात् आप ये बात स्वयं ही भूल गए।’ उन्होंने आगे कहा, ‘वास्तव में इसमें आपकी गलती नहीं है। आपका शत्रु आपके अन्दर ही है, वह है अहंकार।

घमण्ड के कारण ही हमारा सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाता है, इसीलिए हमें इससे बचना चाहिए। इस बुराई पर विजय पाना बहुत कठिन है।

👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 23 May 2021


👉 भक्तिगाथा (भाग २१)

अनन्यता के पथ पर बढ़ चलें हम
    
ऐसा कहते हुए देवर्षि अपनी किन्हीं स्मृतियों मे खो गये। इन स्मृतियों की मधुरता उनके होठों पर मुस्कान बनकर खेलने लगी। उनके पास बैठे महर्षि देवल देवर्षि का यह भाव परिवर्तन देख रहे थे। उनसे रहा न गया और उन्होंने पूछ ही लिया- ‘‘किसी भक्त के चरित्र का स्मरण हो आया क्या देवर्षि?’’ नारद ने महर्षि देवल की ओर बड़ी स्नेहिल दृष्टि से देखा और बड़े आत्मीय स्वरों में बोले- ‘‘हाँ महर्षि! वह परम भक्त स्वयं आप हैं।’’ देवर्षि के ये वचन सुनकर देवल थोड़ा संकुचित हुए और कहने लगे- ‘‘भगवन्! भला मैं किस तरह का भक्त हूँ। मेरा अतीत तो आप जानते ही हैं। बस माता जगदम्बा के स्मरण ने मुझे आप सब भगवद्भक्तों का सेवक होने का अवसर दिया है।’’
    
‘‘सो तो ठीक है महर्षि देवल, परन्तु मेरा अनुरोध है कि अपनी भक्तिकथा आप स्वयं सुनायें।’’ देवर्षि के इस कथन पर सभी ने हामी भरी। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र तो इस प्रस्ताव पर विभोर हो गये और बोले- ‘‘जिसे पराम्बा जगदीश्वरी ने स्वयं अपना पुत्र कहा है, उनकी कथा हम स्वयं सुनेंगे।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के इस कथन पर महर्षि देवल ने बड़े विनय भरे स्वरों में कहा- ‘‘यह सच है ऋषिगण कि मैं माँ की ममता से कृतार्थ हुआ हूँ, लेकिन इसका कारण मेरा कोई गुण नहीं, बल्कि माता का अपनी संतान के प्रति प्रेम है।
    
मैं तो बचपन से ही कुसंगति के कारण अनेक बुरे कर्मों में लिप्त हो गया। कुसंस्कार अपने अनुरूप कुसंग, कुप्रवृत्ति, कुकर्म एवं कुपरिणाम देते हैं। मेरे साथ भी यही प्रक्रिया चल रही थी। मेरे दुर्गुणों ने ही मुझे दोषों से घेर लिया था। पाप का अँधेरा था, पीड़ा गहरी थी। अपनी ही दुष्प्रवृत्तियों के कारण देह रोगी हो चली थी और मन संतप्त। किसी दिशा में कोई किरण नहीं नजर आ रही थी। तभी माँ के कृपापुञ्ज बनकर आए देवर्षि ने बड़ी आश्वस्ति से कहा-देवल! माँ की कृपा से सब कुछ सम्भव है। उनकी कृपा से न केवल तुम्हारी पीड़ा का निवारण हो सकता है, बल्कि तुम स्वयं औरों की पीड़ा का निवारण कर सकते हो।
    
इन वचनों के साथ देवर्षि ने मुझे माता सिंहवाहिनी-अष्टभुजा दुर्गा का ध्यान बताया और उनके पावन मंत्र का उपदेश दिया। भगवान विष्णु के परम भक्त नारद के श्रीमुख से दुर्गा का ध्यान एवं मंत्रोपदेश कुछ अचरज सा लगा, परन्तु देवर्षि हँसते हुए बोले-इस अचरज भरे प्रश्न का उत्तर तुम्हें ब्राह्मी अवस्था में पहुँचने पर मिलेगा। विष्णु ही वैष्णवी हैं, दुर्गा ही गायत्री हैं, परन्तु साधना का पथ जन्मांतर के संस्कारों पके अनुरूप निर्धारित होता है। यदि पिछले जन्म के संस्कारों को पहचान कर भक्ति साधना की जाय तो चित्त का निरोध शीघ्र होता है। देवर्षि ने ही बताया कि मुझमें भगवती पराम्बा हिमालय नन्दिनी की भक्ति के संस्कार हैं।
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४५

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २१)

👉 अपनी अपनी दुनिया

सच तो यह है कि स्वाद की तरह रंगों की अनुभूति में भी हर मनुष्य का अनुभव एक दूसरे से पूरी तरह नहीं मिलता और उसमें अन्तर होता है। यह अन्तर इतना सूक्ष्म होता है कि उसका वर्णन हमारी शब्दावली ठीक तरह से नहीं कर सकती। एक वस्तु की मिठास एक व्यक्ति को जैसी अनुभव होती है, दूसरे को उसकी अनुभूति जैसी होगी, उसमें अन्तर रहेगा और अन्तर इतना हलका है कि सभी लोग गन्ने को ‘मीठा’ कह सकते हैं पर इस मिठास को किसने किस तरह के स्तर का अनुभव किया इस की कोई सूक्ष्म परीक्षा व्यवस्था हो तो सहज ही यह कहा जा सकता है कि एक ने दूसरे से काफी अन्तर वाली मिठास चखी हैं। इसका कारण मुख में रहने वाली रासायनिक द्रवों की संरचना एवं मात्रा में अन्तर होना होता है।

हमारी आंखें जिस वस्तु का जो रंग देखती हैं क्या वस्तुतः वह उसी रंग की है? हमारी आंखों को जिस वस्तु का जो रंग दीखता है क्या अन्य जीवों को भी वैसा ही दीखता है? इन दोनों प्रश्नों का उत्तर बेखटके नहीं दिया जा सकता है।

तथ्य यह है कि वस्तुतः किसी पदार्थ का कोई रंग नहीं है। अणुओं की विशेष प्रकार की संरचना ही सघन होकर विभिन्न प्रकार की वस्तुओं जैसी बनती है। अणुओं का कोई रंग नहीं। फिर रंगीनी क्या है?

वस्तुएं सूर्य की केवल सफेद किरणों को आत्मसात करती हैं और उन किरणों के किसी एक रंग को प्रतिबिम्बित करती हैं। पौधे की पत्तियां रहे रंग की इसलिए दीखती हैं कि वे सूर्य किरणों का हरा रंग पचा नहीं पातीं और उसकी उलटी कर देती हैं। पत्तियों द्वारा किरणों का हरा रंग वापिस फेंक देना यही है उनका हरा रंग दिखाई पड़ना।

तत्व ज्ञानियों का यह कथन एक दृष्टि से सर्वथा सत्य है कि—‘‘हर मनुष्य की अपनी दुनिया है। वह उसकी अपनी बनाई हुई है और उसी में रमण करता है। दुनिया वस्तुतः कैसी है? इस प्रश्न का एक ही उत्तर हो सकता है कि वह जड़ परमाणुओं की नीरस और निर्मम हलचल मात्र है। यहां अणुओं की धूल बिखरी पड़ी है और वह किन्हीं प्रवाहों में बहती हुई इधर-उधर भगदड़ करती रहती है। इसके अतिरिक्त यहां ऐसा कुछ नहीं है जिसे स्वादिष्ट अस्वादिष्ट या रूपवान कुरूप कहा जा सके। हमें नीम की पत्ती कड़वी लगती हैं पर ऊंट उन्हें रुचि पूर्वक खाता है संभव है उसे वे पत्तियां बिस्कुट या मिठाई की तरह मधुर लगती हों। वस्तुतः कोई वस्तु न मधुर है न कड़वी हमारी अपनी संरचना ही अमुक वस्तुओं के साथ तालमेल बिठाने पर जैसी कुछ उलटी-पुलटी प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है उसी आधार पर हम उसका रंग स्वाद आदि निर्धारण करते हैं।

यही बात प्रिय अथवा अप्रिय के सम्बन्ध में लागू होती है। अपने और बिराने के सम्बन्ध में भी अपनी ही दृष्टि और अपनी ही मान्यता काम करती है। वस्तुतः न कोई अपना है न बिराना। इस दुनिया के आंगन में अगणित बालक खेलते हैं। इनमें से कभी कोई किसी के साथ हो लेता है, कभी प्रतिपक्षी का खेल खेलता है। इन क्षणिक संयोगों और संवेगों को बालबुद्धि जब बहुत अधिक महत्व देने लगती है तो प्रतीत होता है कि कुछ बहुत बड़ी अनुकूलता-प्रतिकूलता उत्पन्न हो गई है। हर्ष शोक के आवेशों में घटना क्रम उतना उत्तरदायी नहीं होता जितना कि  अपना मनःस्तर स्वयं सोचने का दृष्टिकोण। सन्त और चोर के—ज्ञानी और अज्ञानी के—दृष्टिकोण में एक ही स्थिति के सम्बन्ध में जो जमीन आसमान जैसा अन्तर रहता है उसका कारण प्रथक-प्रथक मनःस्थिति ही है। घना क्रम का उतना श्रेय या दोष नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३२
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

शुक्रवार, 21 मई 2021

👉 डर पर जीत हासिल करने की सीख देती कहानी

सुमित और रोहित एक छोटे से गाँव में रहते थे। एक बार दोनों ने फैसला किया कि वे गाँव छोड़कर शहर जायेंगे और वही कुछ काम-धंधा खोजेंगे। अगली सुबह वे अपना-अपना सामान बांधकर निकल पड़े। चलते-चलते उनके रास्ते में एक नदी पड़ी, ठण्ड अधिक होने के कारण नदी का पानी जम चुका था। जमी हुई नदी पे चलना आसान नहीं था, पाँव फिसलने पर गहरी चोट लग सकती थी।

इसलिए दोनों इधर-उधर देखने लगे कि शायद नदी पार करने के लिए कहीं कोई पुल हो! पर बहुत खोजने पर भी उन्हें कोई पुल नज़र नहीं आया। रोहित बोला, “हमारी तो किस्मत ही खराब है, चलो वापस चलते हैं, अब गर्मियों में शहर के लिए निकलेंगे! “नहीं”, सुमित बोला, “नदी पार करने के बाद शहर थोड़ी दूर पर ही है और हम अभी शहर जायेंगे…”और ऐसा कह कर वो धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।

अरे ये क्या का रहे हो….पागल हो गए हो…तुम गिर जाओगे…”रोहित चिल्लाते हुए बोल ही रहा था कि सुमित पैर फिसलने के कारण गिर पड़ा। “कहा था ना मत जाओ..”, रोहित झल्लाते हुए बोला। सुमित ने कोई जवाब नही दिया और उठ कर फिर आगे बढ़ने लगा एक-दो-तीन-चार….और पांचवे कदम पे वो फिर से गिर पड़ा.. रोहित लगातार उसे मना करता रहा…मत जाओ…आगे मत बढ़ो…गिर जाओगे…चोट लग जायेगी… लेकिन सुमित आगे बढ़ता रहा।

वो शुरू में दो-तीन बार गिरा ज़रूर लेकिन जल्द ही उसने बर्फ पर सावधानी से चलना सीख लिया और देखते-देखते नदी पार कर गया। दूसरी तरफ पहुँच कर सुमित बोला, ” देखा मैंने नदी पर कर ली…और अब तुम्हारी बारी है!” “नहीं, मैं यहाँ पर सुरक्षित हूँ… लेकिन तुमने तो शहर जाने का निश्चय किया था।” “मैं ये नहीं कर सकता! नहीं कर सकते या करना नहीं चाहते!  सुमित ने मन ही मन सोचा और शहर की तरफ आगे बढ़ गया।

शिक्षा:-
दोस्तों, हम सबकी ज़िन्दगी में कभी न कभी ऐसे मोड़ आ ही जाते हैं जब जमी हुई नदी के रूप में कोई बड़ी बाधा या Challenge  हमारे सामने आ जाता है। और ऐसे में हमें कोई निश्चय करना होता है। तब क्या हम खतरा उठाने का निश्चय लेते हैं और तमाम मुश्किलों, डर, और असफलता के भय के बावजूद नदी पार करते हैं? या हम Safe रहने के लिए वही खड़े रह जाते हैं जहाँ हम सालों से खड़े थे?

जहाँ तक दुनिया के सफल लोगों का सवाल है वे रिस्क लेते हैं…अगर आप नहीं लेते तो हो सकता है आज आप बिलकुल सुरक्षित हों आपके शरीर पर एक भी घाव ना हों…लेकिन जब आप अपने भीतर झाकेंगे तो आपको अपने अन्दर ज़रूर कुछ ऐसे ज़ख्म दिख जायेंगे जो आपके द्वारा अपने सपनो को के लिए कोई प्रयास ना करने के कारण आज भी हरे होंगे।

दोस्तों, पंछी सबसे ज्यादा सुरक्षित एक पिंजड़े में होता है…लेकिन क्या वो इसलिए बना है? या फिर वो आकश की ऊँचाइयों को चूमने और आज़ाद घूमने के लिए दुनिया में आया है? फैसला आपका है…आप पिंजड़े का पंछी बनना चाहते हैं या खुले आकाश का?

👉 भक्तिगाथा (भाग २०)

अनन्यता के पथ पर बढ़ चलें हम

प्रतीक्षा के इन पलों में सभी की अंतश्चेतना में भक्ति के नये सूत्र की जिज्ञासा गहरी हुई। देवर्षि इस सच से परिचित थे। उन्होंने वीणा के तारों की झंकृति के साथ मधुर स्वरों में उच्चारित किया-
‘तस्मिन्नन्यता तद्विरोधिबूदासीनता च’॥ ९॥
उस प्रिय परात्पर चेतना में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषय में उदसीनता को निरोध कहते हैं।
    
नारद की वाणी इतनी सजल थी कि वह सहज ही सबमें संव्याप्त हो गयी। दो पलों तक समूची व्यापकता में मौन पसरा रहा। एक नीरव निःस्पन्दता सब तरफ छायी रही। अंततः महर्षि मरीचि मुखर हुए। उन्होंने कहा कि ‘‘देवर्षि सभी तपस्वी, साधक एवं सिद्ध इस निरोध अवस्था को पाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। शास्त्रकारों ने चित्त के निरोध को योग की संज्ञा दी है। आप बताएँ कि निरोध का स्वरूप क्या है और इसकी साधना की प्रक्रिया क्या है?’’
    
महर्षि मरीचि के ये वचन सभी को अपने से लगे। ब्रह्मर्षि क्रतु तो इस जिज्ञासा पर अति प्रसन्न हो गये और कहने लगे- ‘‘देवर्षि सच तो यही है, चित्त का निरोध ही मानव चेतना का आरोग्य है। इसके विपरीत जो कुछ भी है, उसमें मानव मन रुग्ण एवं संतप्त ही रहता है।’’ अभी तक देवर्षि मौन भाव से महर्षियों के इस कथन को सुन रहे थे। उनकी आँखें हिमालय की सुषमा को निहार रही थीं। श्वेत हिमशिखर और निरभ्र आकाश सभी पर अपनी परम निर्मलता की वृष्टि कर रहे थे। समूची प्रकृति देवात्मा हिमालय के सान्निध्य में निरोध अवस्था में विराज रही थी। समूचे अस्तित्व में आनन्द और चैतन्यता घुल-मिल रहे थे।
    
देवर्षि का दृष्टा अंतःकरण इन अनुभूतियों के साथ एकरस था। उन्होंने मन्दस्मित के साथ देवों और महर्षियों को कहा- ‘‘हे प्रज्ञाजन! भक्ति का यह नया सूत्र पिछले कहे हुए सूत्र का ही विस्तार है। पिछले सूत्र में भक्ति साधना में निरोध और न्यास की बात थी। उन्हीं की समरूपता इस सूत्र के अनन्यता और उदासीनता में है। एक होता है, दूसरा स्वयं ही आ जाता है। प्रथम यदि क्रिया है तो दूसरा परिणाम। निरोध शब्द में निषेध या नकार नहीं है, बल्कि इसमें आत्म विकास की निरन्तरता और उसका चरम है। निरोध चित्त की ऐसी अवस्था है, जिसमें एकाग्रता, शान्ति, विश्रान्ति एवं बोध का परम जागरण है। भक्त जब अपने आराध्य में अनन्य भाव रखता है तो इसकी शुरुआत हो जाती है। ज्यों-ज्यों उसकी अनन्यता प्रगाढ़ एवं परिपक्व होती है, त्यों-त्यों उसका अंतःकरण सभी ्रकार के दोषों से मुक्त होता है। उसे दोषों को छोड़ना नहीं पड़ता, बल्कि ये अपने आप ही छूटते हैं। उसकी भाव चेतना उपराम एवं उदासीन (उत्+आसीन) ऊपर चली जाती है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४४

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २०)

👉 अपनी अपनी दुनिया

दुनिया वैसी है नहीं—जैसी कि हम उसे देखते हैं। सच तो यह है कि संसार के समस्त पदार्थ कुछ विशेष प्रकार के परमाणुओं की भागती-दौड़ती हलचल मात्र है। हमारी आंखों की संरचना और मस्तिष्क का क्रिया-कलाप जिस स्तर का होता है, उसी प्रकार की वस्तुओं की अनुभूति होती है।

हमारी आंखें जैसा कुछ देखती हैं, आवश्यक नहीं दूसरों को भी वैसा ही दीखें। दृष्टि के मन्द, तीव्र, रुग्ण, निरोग होने की दशा में दृश्य बदल जाते हैं। एक को सामने का दृश्य एक प्रकार का दीखता है तो दूसरे को दूसरी तरह का। यही बात स्वाद के सम्बन्ध में है। रोगी के मुंह का जायका खराब होने के कारण हर वस्तु कड़वी लगती है। पेट भरा होने या अपच रहने पर स्वादिष्ट वस्तु का भी स्वाद बिगड़ जाता है। बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती, हर मनुष्य के स्रावों में कुछ न कुछ रासायनिक अन्तर रहता है जिसके कारण एक ही खाद्य पदार्थ का स्वाद हर व्यक्ति को दूसरे की अपेक्षा कुछ न कुछ भिन्न प्रकार का अनुभव होता है। यों नमक, शकर आदि का स्वाद मोटे रूप से खारी या मीठा कहा जा सकता है पर यदि गम्भीर निरीक्षण किया जाय तो प्रतीत होगा कि इस खारीपन और मिठास के इतने भेद प्रभेद हैं जितने कि मनुष्य। किसी का स्वाद किसी से पूर्णतया नहीं मिलता, कुछ न कुछ भिन्नता रहती है। यही बात आंखों के संबन्ध में है आंखों की संरचना और मस्तिष्क की बनावट में जो अन्तर पाया जाता है उसी के कारण एक मनुष्य दूसरे की तुलना में कुछ न कुछ भिन्नता के साथ ही वस्तुओं तथा घटनाओं को देखता है।

मनुष्यों और पक्षियों की आंखों की सूक्ष्म बनावट को देखता है। मस्तिष्कीय संरचना में काफी अन्दर है इसलिए वे वस्तुओं को उसी तरह नहीं देखते जैसे कि हम देखते हैं। उन्हें हमारी अपेक्षा भिन्न तरह के रंग दिखाई पड़ते हैं।

रूस की पशु प्रयोगशाला ने बताया है कि बैल को लाल रंग नहीं दीखता, उनके लिए सफेद और लाल रंग एक ही स्तर के होते हैं। इसी तरह मधु-मक्खियों को भी लाल और सफेद रंग का अन्तर विदित नहीं होता। जुगनू सरीखे कीट पतंग एक अतिरिक्त रंग ‘अल्ट्रावायलेट’ भी देखते हैं जो मनुष्यों की आंखें देख सकने में असमर्थ हैं। पक्षियों को लाल, नीला, पीला, और हरा यह चार रंग ही दीखते हैं। हमारी तरह वे न तो सात रंग देखते हैं और न उनके भेद उपभेदों से ही परिचित होते हैं।

ठीक इसी प्रकार हरी घास की हरीतिमा सबको एक ही स्तर की दिखाई नहीं पड़ेगी। किन्तु हमारी भाषा का अभी इतना विस्तार नहीं हुआ कि इस माध्यम से हर व्यक्ति को जैसा सूक्ष्म अन्तर उस हरे रंग के बीच दिखाई पड़ता है उसका विवरण बताया जा सके। यदि अन्तर प्रत्यन्तर की गहराई में जाया जाय तो स्वाद और रंग के अन्तर बढ़ते ही चले जायेंगे और अन्ततः यह मानना पड़ेगा कि जिस तरह हर मनुष्य की आवाज, शकल और प्रकृति में अन्तर होता है उसी प्रकार रंगों की अनुभूति में भी अन्तर रहता है। स्वाद के सम्बन्ध में भी यही बात है। गन्ध में भी यही अन्तर रहेगा। सुनने और छूने में भी हर व्यक्ति को दूसरे से भिन्न प्रकार का अनुभव होता है। यह भिन्नता बहुत ही सूक्ष्म स्तर की होती है, पर होती अवश्य है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३०
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

मंगलवार, 18 मई 2021

👉 दानवीर कर्ण

एक बार की बात है, कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे। रास्ते में अर्जुन ने श्री कृष्ण जी, से पूछा कि हे प्रभु! एक जिज्ञासा है, मेरे मन में, यदि आज्ञा हो तो पूछूँ? श्री कृष्ण जी ने कहा, पूछो अर्जुन। तब अर्जुन ने कहा कि मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है। कि दान तो मै भी बहुत करता हूँ, परन्तु सभी लोग कर्ण को ही सब से बड़ा दानी क्यों कहते हैं?

यह प्रश्न सुन कर श्री कृष्ण जी मुस्कुराये और बोले कि आज मैं तुम्हारी यह जिज्ञासा अवश्य शान्त करूंगा। श्री कृष्ण जी ने पास की ही दो स्थित पहाड़ियों को सोने का बना दिया। इस के पश्चात् वह अर्जुन से बोले कि "हे अर्जुन" इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस-पास के गाँव वालों में बाँट दो।

अर्जुन प्रभु से आज्ञा ले कर तुरन्त ही यह काम करने के लिए चल दिया। उस ने सभी गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा कि वह लोग पंक्ति बना लें। अब मैं आपको सोना बाटूंगा और सोना बांटना आरम्भ कर दिया।

गाँव वालों ने अर्जुन की बहुत प्रशंसा की। अर्जुन सोने को पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए। लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बाँटते रहे।

उन मे अब तक अहंकार आ चुका था। गाँव के लोग वापस आ कर दोबारा से लाईन में लगने लगे थे। इतने समय पश्चात अर्जुन बहुत थक चुके थे। जिन सोने की पहाड़ियों से अर्जुन सोना तोड़ रहे थे, उन दोनों पहाड़ियों के आकार में कुछ भी कमी नहीं आई थी।

उन्होंने श्री कृष्ण जी से कहा कि अब मुझ से यह काम और न हो सकेगा। मुझे थोड़ा विश्राम चाहिए, प्रभु ने कहा कि ठीक है! तुम अब विश्राम करो और उन्होंने कर्ण को बुला लिया।

उन्होंने कर्ण से कहा कि इन दोनों पहाड़ियों का सोना इन गांव वालों में बाँट दो। कर्ण तुरन्त सोना बाँटने चल दिये। उन्होंने गाँव वालों को बुलाया और उन से कहा यह सोना आप लोगों का है, जिस को जितना सोना चाहिए वह यहां से ले जाये। ऐसा कह कर कर्ण वहां से चले गए।

अर्जुन बोले कि ऐसा विचार मेरे मन में क्यों नही आया?

इस पर श्री कृष्ण जी ने उत्तर दिया, कि तुम्हे सोने से मोह हो गया था। तुम स्वयं यह निर्णय कर रहे थे, कि किस गाँव वाले की कितनी आवश्यकता है। उतना ही सोना तुम पहाड़ी में से खोद कर उन्हे दे रहे थे।

तुम में दाता होने का भाव आ गया था, दूसरी ओर कर्ण ने ऐसा नहीं किया। वह सारा सोना गाँव वालों को देकर वहां से चले गए। वह नहीं चाहते थे कि उनके सामने कोई उन की जय जय-कार करे या प्रशंसा करे। उनके पीठ पीछे भी लोग क्या कहते हैं, उस से उनको कोई अन्तर नहीं पड़ता।

यह उस व्यक्ति की निशानी है, जिसे आत्मज्ञान प्राप्त हो चुका है। इस प्रकार श्री कृष्ण ने अर्जुन के प्रश्न का उत्तर दिया, अर्जुन को भी उसके प्रश्न का उत्तर मिल चुका था।

दान देने के बदले में धन्यवाद या बधाई की इच्छा करना  उपहार नहीं सौदा कहलाता है।

यदि हम किसी को कुछ दान या सहयोग करना चाहते हैं। तो हमे यह कार्य बिना किसी अपेक्षा या आशा के करना चाहिए। ताकि यह हमारा सत्कर्म हो, ना कि हमारा अहंकार।

बड़ा दानी वही है जो बिना किसी इच्छा के दान देता है और जब वह दान देता है। तो यह नहीं चाहता, कि कोई मेरी जय जयकार करें। वह तो केवल दान देता है, बदले में उसे और कुछ नहीं चाहिए होता। जो दान देने में ऐसा भाव रखता है, वही असली दान देने वाला कहलाता है।

👉 भक्तिगाथा (भाग १९)

विकारों से मुक्त, भक्तों के आदर्श शुकदेव
    
महर्षि पुलह के आग्रह से देवर्षि भी उत्साहित हुए और कहने लगे कि ‘‘शुकदेव तो गोलोक की अधिष्ठातृशक्ति पराम्बा भगवती श्रीराधा के लीला शुक थे। इसे प्रभु की आह्लादिनी शक्ति मां राधा की भक्तिलीला कहें कि उन्होंने अपने प्रिय शुक को धराधाम भेज दिया। धराधाम में शुकदेव शुक पक्षी के रूप में पर्याप्त समय तक विचरण करते रहे और अपनी इस विचरण यात्रा में वह जा पहुँचे अमरनाथ, जहाँ भगवान् भोलेनाथ, पार्वती को अमर कथा सुना रहे थे। जिज्ञासा पर्वततनया पार्वती की ही थी। उन्होंने पूछा था कि देवाधिदेव आप अजर अमर हैं- जबकि मुझे जन्म लेना और शरीर छोड़ना पड़ता है। इस प्रश्न पर भगवान् भोलेनाथ बोले- प्रिये! मैं आत्मा की अमरता का तत्त्व जानता हूँ। यदि तुम भी यह अमृतमय अमरकथा जान लो तो तुम्हें भी मेरी स्थिति मिल जाएगी। पार्वती के हाँ कहने पर कथा प्रारम्भ हो गयी। परन्तु लीलामयी की लीला- उन्हें बीच में ही निद्रा आ गयी और यह सम्पूर्ण कथा-लीला शुक सुनते रहे।
    
कथा की समाप्ति पर जब भोलेबाबा की भावसमाधि टूटी तो उन्होंने पार्वती को सोते देखा। तब यह कथा किसने सुनी? इस सवाल के उत्तर में उन्होंने शुकदेव को निहारा। पहले तो भोलेनाथ कुपित हुए पर जब शुकदेव जी अपना पक्षी शरीर त्यागकर चेतनअंश से महर्षि व्यास की पत्नी वाटिका के गर्भ में प्रवेश कर गए तो कृपालु भोलेनाथ ने उन्हें अनेकों वरदान दे डाले। गर्भकाल में शुकदेव को भगवान श्रीकृष्ण की कृपा मिली और समयानुसार उनका अवतरण हुआ।
    
आत्मा के अमृततत्त्व के ज्ञाता शुकदेव सदा से नित्य-शुद्ध-बुद्ध एवं मुक्त थे। उनमें किसी भी तरह का कोई कलुष न था। सहज ही उनका चित्त निरोध अवस्था में प्रतिष्ठित था। न्यास उनके स्वभाव में था। आसक्ति उन्हें छू भी नहीं गयी। कर्मों का कीचड़ भला उनमें कैसे लिपटता। उनमें तो भगवान् की भक्ति सहज ही व्याप्त थी। अपने भक्ति संवेदनों से संवेदित होकर शुकदेव वन की ओर तप हेतु चल पड़े। महर्षि व्यास अपने पुत्र को लौकिक एवं वैदिक कर्मों के लिए शिक्षित करना चाहते थे। सो वे भी उनके पीछे-पीछे चल पड़े। पिता-पुत्र में बड़ा रोचक संवाद हुआ। महर्षि व्यास ने उन्हें ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास का आश्रम धर्म समझाने की चेष्टा की।
    
नित्यज्ञानी शुकदेव पिता के इस कथन पर बोले- हे पिता यदि स्त्री

त्याग का व्रत लेने वाले ब्रह्मचारी मुक्त हो सकते तो सृष्टि के सभी नपुंसक मुक्त हो जाते, क्योंकि वे सभी स्त्री त्यागी हैं। यदि मुक्ति गृहस्थी करने वाले- सन्तान को जन्म देने वालों को मिलती तो पेट-प्रजनन में जुटे सभी मनुष्य एवं पशु मुक्त होते। और यदि मुक्ति वन में रहने वाले वानप्रस्थों को मिलती तो वन में विचरण करने वाले वन पशु नित्य मुक्त होते। यदि संन्यास लेने और भिक्षा मांगने वाले मुक्त हो पाते तो संसार के समस्त भिक्षुक मुक्त होते। पर ऐसा नहीं है, मुक्ति तो ऋत् के ज्ञान  में है- ‘‘ऋतम् ज्ञानेन मुक्ति’’।
    
यह चर्चा हो रही थी और शुकदेव आगे बढ़ते जा रहे थे। एक स्थान पर पर्वतीय नदी में कुछ नवयुवतियाँ, स्वर्ग की अप्सराएँ स्नान कर रही थीं। शुकदेव उनके पास से निकले-परन्तु उनमें कोई परिवर्तन न आया। वे यथावत स्नान करती रहीं। परन्तु जब महर्षि व्यास उधर से निकले तो उन्होंने अपने वस्त्र सम्हाले। उनके मुख पर लाज की रेखाएँ चमक उठीं। इस अनोखे प्रसंग पर महर्षि व्यास चकित हुए और उनसे बोले कि यह कैसी विचित्र बात है कि मुझ वृद्ध को देखकर तो तुम्हें लाज आती है परन्तु मेरे युवा पुत्र को देखकर तुम तनिक भी लज्जित नहीं हुईं। वैसे ही निर्वस्त्र स्नान करती रहीं।
    
महर्षि के इस कथन के उत्तर में इन देवस्त्रियों ने  कहा- महर्षि आपके पुत्र आयु से युवा हैं- परन्तु उनका चित्त सहज निरुद्ध अवस्था में है। वे लोक और वेद का न्यास कर चुके हैं। उनकी भावना में भावमय भगवान् प्रतिष्ठित हैं। वे साक्षात् भक्ति हैं। जबकि आप के साथ ऐसा नहीं है। आप में तप है, ज्ञान है परन्तु भक्ति की सम्पूर्ण प्रतिष्ठा नहीं हो पायी है। आप का चित्त मोह से चंचल है। उसे निरोध अवस्था में प्रतिष्ठित करने के लिए अभी आपको बहुत कुछ करना पड़ेगा। देवस्त्रियों की इस दो टूक बात से महर्षि को चेत हुआ। उन्हें शुकदेव की उच्चतम अवस्था का भान हुआ।’’ इस कथा को सुनाते हुए देवर्षि बोले- ‘‘हे महर्षियों, शुकदेव का जीवन सभी भक्तों के लिए आदर्श है। उनकी भावनाएँ भगवान् में ही विहार करती है।’’ महर्षि पुलह ने सिर हिलाकर देवर्षि का अनुमोदन किया। भक्तिगाथा की अगली कड़ी की सभी को प्रतीक्षा थी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४२

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १९)

👉 समस्त दुखों का कारण अज्ञान

अपनी आंखें सघन रात्रि में घोर अन्धकार का अनुभव करती हैं, कुछ भी देख नहीं सकतीं। पर उसी स्थिति में उल्लू, चमगादड़, बिल्ली, चीता आदि प्राणी भली प्रकार से देखते हैं। विज्ञान कहता है कि जगत में प्रकाश सर्वदा और सर्वत्र विद्यमान है। अन्धकार नाम की कोई चीज इस दुनिया में नहीं है। मनुष्य की आंखें एक सीमा तक के ही प्रकाश कम्पनों को देख पाती हैं जब प्रकाश की गति मनुष्य की नेत्र शक्ति की सीमा से कम होती है तो उसे अन्धकार प्रतीत होता है।

आकाश में अनेक रंगों के भिन्न-भिन्न गति वाले प्रकाश कम्पन चलते रहते हैं। मनुष्य के नेत्र उनमें से केवल सात रंगों की स्वल्प जितनी प्रकाश तरंगों को ही अनुभव कर पाते हैं और शेष को देखने में असमर्थ रहते हैं। पीलिया रोग हो जाने पर हर वस्तु पीली दीखती है। ‘रैटिनाइटिस पिग मैन्टोजा’ रोग हो जाने पर एक सीधी रेखा धब्बे या बिन्दुओं के रूप में दिखाई देती है। आकाश को ही लीजिये वह हमें नीली चादर वाला गोलाकार पर्दे जैसा लगा दीखता है और लगता है उसमें समतल तारे टके हुए हैं। पर क्या वह ज्ञान सही है? क्या आकाश की सीमा उतनी ही है जितनी आंखों से दीखता है? क्या तारे उतने ही छोटे हैं जितने कि आंखों को प्रतीत होते हैं? क्या वे सब समतल बिछे हैं? क्या आकाश का रंग वस्तुतः नीला है? इन प्रश्नों का उत्तर खगोल शास्त्र के अनुसार नहीं हो सकता है। पर इन आंखों को क्या कहा जाय जो हमें यथार्थता से सर्वत्र भिन्न प्रकार की जानकारी देती हैं और भ्रम में डालती हैं।

यही हाल नासिका का है। हमें कितनी ही वस्तुएं गन्ध हीन लगती हैं। पर वस्तुतः उनमें गन्ध रहती है और उनके स्तर अगणित प्रकार के होते हैं। कुत्तों की नाक इस गन्ध स्तर की भिन्नता को समझती है और बिछुड़ जाने पर अपने घर तक उसे पहुंचा देती है। प्रशिक्षित कुत्ते इसी गन्ध के आधार पर चोरी हत्या आदि अपराध करने वालों को ढूंढ़ निकालते हैं। यही बात सुगन्ध दुर्गन्ध के भेद भाव से सम्बन्धित है। प्याज लहसुन आदि की गन्ध कितनों को बड़ी अरुचिकर लगती है, भोजन में थोड़ी सी भी पड़ जाने से मितली आती हैं पर कितनों को इनके बिना भोजन में जायका ही नहीं आता। यही बात सिगरेट शराब आदि की गन्ध के बारे में भी है। इन परिस्थितियों में नासिका के आधार पर यथार्थता का निर्णय कैसे किया जाय?

जिह्वा स्वादों की जो अनुभूति कराती है वह भी वस्तुस्थिति नहीं है। खाद्य पदार्थ के साथ मुख के स्राव मिलकर एक विशेष प्रकार का सम्मिश्रण बनाते हैं उसी को मस्तिष्क स्वाद के रूप में अनुभव करता है। यदि वही वास्तविकता होती तो नीम के पत्ते मनुष्य की तरह ऊंट को भी कड़ुए लगते और वह भी उन्हें न खाता। ऊंट को नीम की पत्तियों का स्वाद मनुष्य की जिह्वा अनुभूतियों से सर्वथा भिन्न प्रकार का होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि पदार्थों का वास्तविक स्वाद जीभ पकड़ नहीं पाती। भिन्न-भिन्न प्राणी अपनी जीभ बनावट के अनुसार उसका स्वाद अनुभव करते हैं। कच्चा मांस मनुष्य के लिए अरुचिकर होता है यह इसी को मांसभोजी पशु बड़ी रुचि पूर्वक खाते हैं। मलीन वस्तुओं को मनुष्य की जीभ सहज स्वीकार नहीं कर सकती पर शूकर को उसमें प्रिय स्वाद की अनुभूति होती है। मुंह में छाले हो जाने पर बुखार या अपच रहने पर अथवा ‘गुड़ मार बूटी’ खाकर रसना मूर्छित कर देने पर वस्तु के स्वाद का अनुभव नहीं होता। इस अधूरी जानकारी वाली जिह्वा इन्द्रिय को सत्य की साक्षी के रूप में कैसे प्रामाणिक माना जाय?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ २८
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी*

सोमवार, 17 मई 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग १८)

विकारों से मुक्त, भक्तों के आदर्श शुकदेव

‘निरोधस्तु लोक वेदव्यापार न्यासः॥ ८॥’
लौकिक और वैदिक समस्त कर्मों का त्याग निरोध है।
    
देवर्षि ने बड़े मधुर स्वरों में यह सूत्र उच्चारित किया। उनकी वाणी ने हिमवान् के आंगन में बैठे सभी देवों और ऋषियों की हृदय वीणा झंकृत कर दी। सभी के अन्तस में बड़े अलौकिक भक्तिसंगीत की गूंज उठी। निरोध और न्यास इन दो बिन्दुओं के बीच सभी की चेतना आ सिमटी। अन्तर्गगन में विहार करने वाले देवर्षि से उपस्थित जनों की यह चैतन्य दशा छुपी न रही। उन्होंने कहा- ‘‘निरोध त्याग नहीं है। यह तो चित्त के चैतन्य की उन्नत भाव दशा है। इसमें चित्त स्वभावतः ही शान्त, एकाग्र, स्थिर और विकल्प-विक्षेप विहीन हो जाता है। चित्त ज्यों-ज्यों इस भावदशा की ओर आगे बढ़ता है, त्यों-त्यों लौकिक एवं वैदिक कर्म छूटते जाते हैं।’’
    
देवर्षि की अमृतवाणी हिमालय के मीठे जल प्रपात की भांति झर रही थी। इसमें ध्वनि तो थी पर आध्यात्मिक संगीत की तरह। वहाँ उपस्थित सभी ऋषियों एवं देवों के चित्त स्वाभाविक ही इसमें स्वरित हो रहे थे। बाह्य प्रकृति के ऊर्जाकणों में ये भक्ति संवेदन घुल रहे थे। सूर्यदेव की प्रकाश किरणें, हिमालय के महागगन में विहार करने वाले पक्षी, वहाँ विचरण करने वाले पशु- सभी में यह भक्ति चेतना तरंगित हो रही थी। संवेदना के संवेदन सहचर्य को जन्म देते हैं। यह सत्य यहाँ प्रत्यक्ष हो रहा था। और जब यह संवेदना भक्ति की हो तो सहचर्य स्वयं ही बड़ा भावमय हो जाता है। कुछ ऐसे ही अन्तर्मिलन एवं भावमिलन का भावपूर्ण संयोग यहाँ घटित हो रहा था।
    
देवर्षि कह रहे थे कि ‘‘चित्त चेतना के विमल होने के साथ न्यास स्वभावतः प्रतिष्ठित होता है और जब न्यास प्रतिष्ठित होता है तो स्वाभाविक ही निरोध की अवस्था आ जाती है। इसका उलटा भी सच है कि यदि चित्त में निरोध की अवस्था आ जाय तो न्यास अपने आप ही घटित हो जाता है। इसे मैंने युवा शुकदेव में स्वयं देखा है।’’ देवर्षि के मुख से महामुनि शुकदेव का नाम सुनते ही सभी को व्यासपुत्र शुकदेव का स्मरण हो आया। व्यासपुत्र शुकदेव! नित्यज्ञानी शुकदेव!!  परमभक्त शुकदेव!!!  भागवत के परम आचार्य शुकदेव!!!!

ऐसे भक्त के पावन प्रसंग को सुनने के लिए सभी उत्कंठित हो उठे। महर्षि पुलह तो अपनी उत्कण्ठा को क्षणभर भी न छुपा सके। वह तुरन्त बोल पड़े- ‘‘देवर्षि! जिनमें विकार का लेश भी नहीं है। जिन्हें कभी कामनाओं की कीचड़ ने नहीं छुआ- ऐसे शुकदेव की भक्तिकथा को हम सभी अवश्य सुनना चाहते हैं।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४१

👉 विशेष अनुदान विशेष दायित्व

भगवान् ने मनुष्य के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रूप में कुछ विभूतियाँ दी हैं। जिसको सोचना, विचारणा, बोलना, भावनाएँ, सिद...