गुरुवार, 28 जून 2018

👉 रैन बसेरा

🔷 राजा परीक्षित को भागवत् सुनाते हुए जब शुकदेव को छः दिन बीत गये और सर्प के काटने से मृत्यु होने का एक दिन रह गया तब भी राजा का शोक और मृत्यु भय दूर न हुआ। कातर भाव से अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा क्षुब्ध हो रहा था।

🔶 शुकदेव जी ने राजा को एक कथा सुनाई- राजन् बहुत समय पहले की बात है। एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा निकला, रात्रि हो गई। वर्षा पड़ने लगी। सिंह व्याघ्र बोलने लगे। राजा बहुत डरा और किसी प्रकार रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूँढ़ने लगा। कुछ दूर पर उसे दीपक दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक गन्दे बीमार बहेलिये की झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था। अपने खाने के लिये जानवरों का माँस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था। बड़ी गन्दी, छोटी, अन्धेर और दुर्गन्ध युक्त वह कोठरी थी। उसे देखकर राजा पहले तो ठिठके पर पीछे उसने और कोई आश्रय न देखकर विवशता वश उस बहेलिये से अपनी कोठरी में रात भर ठहर जाने देने के लिए प्रार्थना की।

🔷 बहेलिये ने कहा- आश्रय हेतु कुछ राहगीर कभी-कभी यहाँ आ भटकते हैं और मैं उन्हें ठहरा लेता हूँ। लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत झंझट करते हैं। इस झोंपड़ी की गन्ध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर उसे छोड़ना ही नहीं चाहते। इसी में रहने की कोशिश करते हैं और अपना कब्जा जमाते हैं। ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ। अब किसी को नहीं ठहरने देता। आपको भी इसमें नहीं ठहरने देता। आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूँगा।” राजा ने प्रतिज्ञा की- कसम खाई कि वह दूसरे दिन इस झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा। उसका काम तो बहुत बड़ा है। यहाँ तो वह संयोगवश ही आया है। सिर्फ एक रात ही काटनी है।

🔶 बहेलिये न अन्यमनस्क होकर राजा को झोंपड़ी के कोने में ठहर जाने दिया, पर दूसरे दिन प्रातःकाल ही बिना झंझट किये झोंपड़ी खाली कर देने की शर्त की फिर दुहरा दिया। राजा एक कोने में पड़ा रहा। रात भर सोया। सोने में झोंपड़ी की दुर्गन्ध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सवेरे उठा तो उसे वही सब परमप्रिय लगने लगा। राज-काज की बात भूल गया और वहीं निवास करने की बात सोचने लगा।

🔶 प्रातःकाल जब राजा और ठहरने के लिये आग्रह करने लगा तो बहेलिये ने लाल पीली आँखें निकाली और झंझट शुरू हो गया। झंझट बढ़ा। उपद्रव और कलह का रूप धारण कर लिया। राजा मरने मारने पर उतारू हो गया। उसे छोड़ने में भारी कष्ट और शोक अनुभव करने लगा।”

🔷 शुकदेव जी ने पूछा-परीक्षित बताओ, उस राजा के लिए क्या यह झंझट उचित था? परीक्षित ने कहा- भगवान वह कौन राजा था, उसका नाम तो बताइए। वह तो बड़ा मूर्ख मालूम पड़ता है कि ऐसी गन्दी कोठरी में अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर राज-काज छोड़कर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता था। उसकी मूर्खता पर तो मुझे भी क्रोध आता है।”

🔶 शुकदेव जी ने कहा-परीक्षित वह और कोई नहीं तुम स्वयं हो। इस मल मूत्र की कोठरी देह में जितने समय तुम्हारी आत्मा को रहना आवश्यक था वह अवधि पूरी हो गई। अब उस लोक को जाना है जहाँ से आप आये थे। इस पर भी आप झंझट फैला रहे हैं। मरना नहीं चाहते एवं मरने का शोक कर रहे हों। क्या यह उचित है?”

🔷 राजा ने कथा के मर्म को स्वयं पर आरोपित किया एवं मृत्यु भय को भुलाते हुए मानसिक रूप से निर्वाण की अपनी तैयारी कर ली। अन्तिम दिन का कथा श्रवण उन्होंने पूरे मन से किया।

🔶 वस्तुतः मरने के लिये हर मानव हो हर घड़ी तैयार रहना चाहिये। यह शरीर तो कभी न कभी विनष्ट होना ही है। लेकिन आत्मा कभी नहीं मरती। उसी को ऊँचा उठाने के प्रयास जीवन पर्यन्त किये जाते रहें तो भागी जन्म सार्थक किया जा सकता है।

👉 आज का सद्चिंतन 28 June 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 June 2018


👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग 5)

🔷 उत्कृष्ट व्यक्तित्व का एक ही पक्ष है-भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं का दमन, न्यूनतम निर्वाह की अपरिग्रह परम्परा का वरण। जिनकी निजी महत्त्वाकांक्षाएँ अभिलाषाएँ, तृष्णा, लिप्साएँ असाधारण रूप से उभरी होती है, उनके लिए यह किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता कि वे नीति-नियमों का व्यतिरेक न करें। इसी प्रकार यह भी नहीं बन पड़ता कि समय, श्रम या साधनों का उपार्जन से कम उपयोग अपने लिए करें और उस बचत को उच्च स्तरीय प्रयोजनों के लिए नियोजित करें। लिप्सा में भौतिक दोष यह है कि उसकी तृप्ति की कोई मर्यादा नियत नहीं रहती। कमी कभी दूर नहीं होती और अधिक कमाने, जोड़ने, उड़ाने की व्याकुलता उसी अनुपात से बढ़ती चली जाती है। फल यह होता है कि आदर्शवादिता की मात्र उथली चर्चा या खोखली विडम्बना ही बन पाती है। वैसा कोई ठोस प्रयत्न नहीं बन पड़ता जैसा कि उत्कृष्ट जीवन के लिए अपेक्षित है। अतएव निस्पृह जीवन के लिए यह अनिवार्य है कि भौतिक आकाँक्षाओं और आवश्यकताओं को उतना नियन्त्रित किया जाय कि वे लगभग औसत नागरिक स्तर की जा पहुँचे। आत्म-निर्माण का, आत्म-परिष्कार का सुनियोजन इससे कम में नहीं बन पड़ता।

🔶 अध्यात्म जीवन जीने की एक शैली है। पूजा उपचार उसके लिए भावनात्मक पृष्ठभूमि बनाने वाले उपचार हैं। उपासनात्मक क्रिया-कृत्यों को याचना, रिश्वत, जेबकटी, बाजीगरी के रूप में जो अपनाते हैं, वे भूल करते हैं। देवताओं को मन्त्रबल से वशवर्ती बनाकर उनसे उचित अनुचित कुछ करा लेने की दुरभिसन्धि में नियत व्यक्ति जब अपनी दुरभिसन्धियों को भक्ति भावना, योग साधना आदि का नाम देते हैं, तब हँसी रोके नहीं रुकती। बाल क्रीड़ाओं से यदि ऊँचा उठा जा सके, तो अध्यात्म का एक मात्र यही स्वरूप रहा जाता है कि व्यक्तित्व को अधिकतम पवित्र, प्रखर एवं उदात्त बनाया जाय। जो क्षमता विभूतियाँ उपलब्ध हैं उन्हें सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए लगाया जाय। वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श हर घड़ी सामने रखकर अपनेपन का दायरा इतना बड़ा बना दिया जाय कि आत्मवत् सर्वभूतेषु की प्रतीति होने लगे। दूसरों के दुःख को बँटा लेने और अपने सुख को बाँट देने की उमंग इतनी उमगे कि उसे रोक सकने में संकीर्ण स्वार्थपरता कोई व्यवधान प्रस्तुत न कर सकें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Influence of Bioelectricity on Food Products – Part 2

🔷 Research tells us that maximum discharge of human bioelectricity takes place through the tips of fingers. Foodstuff repeatedly touched by bare hands and fingers cannot remain unaffected by the good or bad traits of the cook. It is true, that that while heating, many such internal impurities are removed. Nevertheless heating does not purify the food in totality.

🔶 Physical contact is not the only factor responsible for the internal impurity of food. Thoughts are waves of bioelectric current. As such, these are also propagated through sight while looking at things. (Hypnotists and mesmerists utilize this property of transmission of thoughts. The famous saying Love at first sight too illustrates this phenomenon.)

🔷 When one casts a glance on the edibles kept on the plate of a neighbor, the thoughts of the onlooker are also transmitted to these edibles. Food served reluctantly or by a person in an unhappy state of mind would certainly have negative effect on the eater. The same is true of the foodstuff forcibly snatched from somebody, or consumed alone in the company of several onlookers, and of the food earned by unfair means.

📖 Akhand Jyoti – April 2004 

👉 क्रोध हमारा आन्तरिक शत्रु है (भाग 5)

🔷 क्रोध एक प्रकार का भूत है जिसके संचार होते ही मनुष्य आपे में नहीं रहता। उस पर किसी दूसरी सत्ता का प्रभाव हो जाता है। मन की निष्ठ वृत्तियाँ उस पर अपनी राक्षसी माया चढ़ा देती हैं, वह बेचारा इतना हत बुद्धि हो जाता है कि उसे यह ज्ञान ही नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है।

🔶 आधुनिक मनुष्य का आन्तरिक जीवन और मानसिक अवस्था अत्यन्त विक्षुब्ध है, दूसरों में वह अनिष्ट देखता है, उनसे हानि होने की कुकल्पना में डूबा रहता है, जीवन पर्यन्त इधर उधर लुढ़कता, ठुकराया जाता रहता है, शोक दुःख, चिंता, अविश्वास, उद्वेग, व्याकुलता आदि विकारों के वशीभूत होता रहता है। ये क्रोध जन्य मनोविकार अपना विष फैलाकर मनुष्य का जीवन विषैला बना रहे हैं। उसकी आध्यात्मिक शक्तियों का शोषण कर रहे हैं। साधना का सबसे बड़ा विघ्न क्रोध नाम का महाराक्षस ही है।

🔷 क्रोध शान्ति भंग करने वाला मनोविकार है। एक बार क्रोध आते ही मन को अवस्था विचलित हो उठती है, श्वासोच्छवास तीव्र हो उठता है, हृदय विक्षुब्ध हो उठता है। यह अवस्था आत्मिक विकास के विपरीत है। आत्मिक उन्नति के लिए शान्ति, प्रसन्नता, प्रेम और सद्भाव चाहिए।

🔶 जो व्यक्ति क्रोध के वश में है, वह एक ऐसे दैत्य के वश में है, जो न जाने कब मनुष्य को पतन के मार्ग में धकेल दे। क्रोध तथा आवेश के विचार आत्म बल का ह्रास करते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/May/v1.17

👉 हम संयमी बनें

🔷 नियन्त्रित जीवन का आधार संयम है। इससे समस्त शक्तियाँ केन्द्रीभूत होती हैं, इन्हें जिधर ही लगा दो, उधर ही चमत्कारिक परिणाम उपलब्ध किये जा सकते हैं। संयम से शक्ति, स्वास्थ्य, मन की पवित्रता, बुद्धि की सूक्ष्मता और भावना की सुन्दरता जागृत होती है। इसके लिए अपने जीवन में दृढ़ इच्छा, शील व जीवनचर्या पर पर्याप्त ध्यान देना पड़ता है। आइये अब यह विचार करें कि हमें यह सावधानी कहाँ-कहाँ रखनी है, किन-किन अवस्थाओं में किस प्रकार संयम की उपयोगिता है।

🔶 आत्म-निर्माण के तीन क्षेत्र हैं- शरीर, मन और समाज। सुव्यवस्थित जीवन जीने के लिए स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की रचना अनिवार्य है। शरीर दुर्बल और रोग ग्रस्त है तो कोई सुखी न रहेगा। मन अपवित्र है तो द्वेष, दुर्भावना व कलह का ही वातावरण बना रहेगा। हमारे समाज में कुरीतियाँ और अनाचार फैल रहे हैं तो हम उनसे अछूते बचे रहेंगे, ऐसी कोई सुविधा इस संसार में नहीं है। इन तीनों अवस्थाओं के नियन्त्रण को ही ऋषियों ने मन, वचन और कर्म का संयम कहा है।

🔷 यह सत्य है कि संसार के सभी पदार्थ भोग के लिए हैं, किंतु इसकी भी एक सीमा और मर्यादा होती है। आहार शरीर को शक्ति प्रदान करता है किंतु चाहे भूख न हो, जो मिले खाते जाइए तो अपच का होना स्वाभाविक है। पेट की शक्ति के अनुरूप आहार की एक सीमा निर्धारित कर दी गई है, उतने में रहे तो यह आहार अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा। इससे स्वास्थ्य आरोग्य स्थिर रहेगा, किंतु जहाँ मर्यादा का उल्लंघन हुआ कि रोग-शोक के लक्षण दिखाई देने लगेंगे। इसलिए स्वास्थ्य विद्या के आचार्यों ने आहार ग्रहण करने के तरीकों पर अधिक संयम व सावधानी रखने को कहा है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 16


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.16