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सोमवार, 6 दिसंबर 2021

👉 जिनमें साहस हो आगे आवें-

हमारा निज का कुछ भी कार्य या प्रयोजन नहीं है। मानवता का पुनरुत्थान होने जा रहा है। ईश्वर उसे पूरा करने वाले हैं। दिव्य आत्माएँ उसी दिशा में कार्य कर भी रही हैं। उज्ज्वल भविष्य की आत्मा उदय हो रही है, पुण्य प्रभाव का उदय होना सुनिश्चित है। हम चाहे तो उसका श्रेय ले सकते हैं और अपने आपको यशस्वी बना सकते हैं। देश को स्वाधीनता मिली, उसमें योगदान देने वाले अमर हो गये। यदि वे नहीं भी आगे आते तो भी स्वराज्य तो आता ही वे बेचारे और अभागे मात्र बनकर रह जाते। ठीक वैसा ही अवसर अब है। बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति अवश्यम्भावी है। उसका मोर्चा राजनैतिक लोग नहीं धार्मिक कार्यकर्त्ता संभालेंगे। यह प्रक्रिया युग-निर्माण योजना के रूप में आरम्भ हुई है। हम चाहते हैं इसके संचालन का भार मजबूत हाथों में चला जाए। ऐसे लोग अपने परिवार में जितने भी हों, जो भी हों, जहाँ भी हों, एकत्रित हो जाएँ और अपना काम सँभाल लें। उत्तर-दायित्व सौंपने की, प्रतिनिधि नियुक्त करने की योजना के पीछे हमारा यही उद्देश्य है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी १९६५

शनिवार, 23 अक्टूबर 2021

👉 विशेष अनुदान विशेष दायित्व

भगवान् ने मनुष्य के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रूप में कुछ विभूतियाँ दी हैं। जिसको सोचना, विचारणा, बोलना, भावनाएँ, सिद्धियाँ-विभूतियाँ कहते हैं। ये सब अमानतें हैं। ये अमानतें मनुष्यों को इसलिए नहीं दी गई हैं कि उनके द्वारा वह सुख-सुविधाएँ कमाये और स्वयं के लिए अपनी ऐय्याशी या विलासिता के साधन इकट्ठे करे और अपना अहंकार पूरा करे। ये सारी की सारी चीजें सिर्फ इसलिए उसको दी गयी हैं कि इन चीजों के माध्यम से वो जो भगवान् का इतना बड़ा विश्व पड़ा हुआ है, उसकी दिक्कतें और कठिनाइयों का समाधान करे और उसे अधिक सुन्दर और सुव्यवस्थित बनाने के लिए प्रयत्न करे।
    
बैंक के खजांची के पास धन रखा रहता है और इसलिए रखा रहता है कि सरकारी प्रयोजनों के लिए इस पैसे को खर्च करे। उसको उतना ही इस्तेमाल करने का हक है, जितना कि उसको वेतन मिलता है। खजाने में अगर लाखों रुपये रखे हों, तो खजांची उन्हें कैसे खर्च कर सकता है? पुलिस और फौज का कमाण्डर है, उसको अपना वेतन लेकर जितनी सुविधाएँ मिली हैं, उसी से काम चलाना चाहिए और बाकी जो उसके पास बहुत सारी सामर्थ्य और शक्ति बंदूक चलाने के लिए मिली है, उसको सिर्फ उसी काम में खर्च करना चाहिए, जिस काम के लिए सरकार ने उसको सौंपा है।
    
हमारी सरकार भगवान् है और मनुष्य के पास जो कुछ भी विभूतियाँ, अक्ल और विशेषताएँ हैं, वे अपनी व्यक्तिगत ऐय्याशी और व्यक्तिगत सुविधा और व्यक्तिगत शौक-मौज के लिए नहीं हैं और व्यक्तिगत अहंकार की तृप्ति के लिए नहीं है। इसलिए जो कुछ भी उसको विशेषता दी गई है। उसको उतना बड़ा जिम्मेदार आदमी समझा जाए और जिम्मेदारी उस रूप में निभाए कि सारे के सारे विश्व को सुंदर बनाने में, सुव्यवस्थित बनाने में, समुन्नत बनाने में उसका महान् योगदान संभव हो।
    
भगवान् का बस एक ही उद्देश्य है- निःस्वार्थ प्रेम। इसके आधार पर भगवान् ने मनुष्य को इतना ज्यादा प्यार किया। मनुष्य को उस तरह का मस्तिष्क दिया है, जितना कीमती कम्प्यूटर दुनिया में आज तक नहीं बना। करोड़ों रुपये की कीमत का है, मानवीय मस्तिष्क। मनुष्य की आँखें, मनुष्य के कान, नाक, आँख, वाणी एक से एक चीज ऐसी हैं, जिनकी रुपयों में कीमत नहीं आँकी जाती है। मनुष्य के सोचने का तरीका इतना बेहतरीन है, जिसके ऊपर सारी दुनिया की दौलत न्योछावर की जा सकती है।
    
ऐसा कीमती मनुष्य और ऐसा समर्थ मनुष्य- जिस भगवान् ने बनाया है, उस भगवान् की जरूर ये आकांक्षा रही है कि मेरी इस दुनिया को समुन्नत और सुखी बनाने में यह प्राणी मेरे सहायक के रूप में, और मेरे कर्मचारी के रूप में, मेरे असिस्टेण्ट के रूप में मेरे राजकुमार के रूप में काम करेगा और मेरी सृष्टि को समुन्नत रखेगा।
    
मानव जीवन की विशेषताओं का और भगवान् के द्वारा विशेष विभूतियाँ मनुष्य को देने का एक और भी उद्देश्य है। जब मनुष्य इस जिम्मेदारी को समझ ले और ये समझ ले कि ‘मैं क्यों पैदा हुआ हूँ, और यदि मैं पैदा हुआ हूँ? तो मुझे अब क्या करना चाहिए?’ यह बात अगर समझ में आ जाए, तो समझना चाहिए कि इस आदमी का नाम मनुष्य है और इसके भीतर मनुष्यता का उदय हुआ और इसके अंदर भगवान् का उदय हो गया और भगवान् की वाणी उदय हो गयी, भगवान् की विचारणाएँ उदय हो गयीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

👉 अपनी श्रद्धा को उर्वर एवं सार्थक बनने दें

कभी हमने पूर्व जन्मों के सत् संस्कार वालों और अपने साथी सहचरों को बड़े प्रयत्नपूर्वक ढूंढा है और 'अखण्ड- ज्योति परिवार की शृद्खला में गूंथकर एक सुन्दर गुलदस्ता तैयार किया था। मंशा थी इन्हें देवता के चरणों में चढ़ा येंगे। पर अब जब जब कि बारीकी से नजर डालते हैं कि कभी के अति सुरम्य पुष्प अब परिस्थितियों ने बुरी तरह विकृत कर दिये है। वे अपनो कोमलता, शोभा और सुगंध तोनों ही खोकर बुरी तरह इतनी मुरझा गये कि हिलाते- दुलाते हैं तो भी सजीवता नहीं आती उलटी पंखड़ियाँ भर जाती हैं। ऐसे पुष्पों को फेंकना तो नहीं है क्योंकि मूल संस्कार जब तक विद्यमान हैं तब तक यह आशा भी है कि कभी समय आने पर इनका भी कुछ सदुपयोग सम्भव होगा, किसी औषधि में यह मुरझाये फूल भी कभी काम आयेंगे। पर आज तो देव देवो पर चढ़ाये जाने योग्य सुरभित पुष्पों की आवश्यकता है सो उन्हीं की छांट करनी पड़ रही है। अभी आज तो सजीवता ही अभीष्ट है और वस्तुस्थिति की परख तो कहने- सुनने- देखने- मानने से नहीं वरन् कसौटी पर कसने से ही होता है। सो परिवार को सजोवता- निर्जीवता- आत्मीयता, विडम्बना के अंश परखने के लिए यह वर्तमान प्रक्रिया प्रस्तुत की है। बेकार की घचापच छट जाने से अपने अन्तरिम परिवार को एक छोटी सीमा अपने लिए भी हलकी पड़ेगी बौर अधिक ध्यान से सींचे- पोसे जाने के कारण वे पौधे भी अधिक लाभान्वित होंगे

नव- निर्माण के लिए अभी बहुत काम करना बाकी है। विचार- प्रसार तो उसका बीजारोपण है। इसके बिना कोई गति नहीं। अक्षर ज्ञान की शिक्षा पाये बिना ऊंची पढ़ाई की न तो आशा है न सम्भावना है। इसलिए प्रारम्भ में हर किसी को अक्षर ज्ञान कराना अनिवार्य है। पीछे जिसकी जैमी अभिरुचि हो शिक्षा के विषय चुनना रह सकता है पर अनिवार्य में छूट किसी को नहीं मिल सकती। प्रारम्भिक अक्षर सबको समान रूप में  पढ़ने पड़ेगे। विचारों की उप-योगिता, महत्ता, शक्ति और प्रमुखता का रहस्य हर किसी के मस्तिष्क में कूट- कूट कर भरा जाना है और बताया जाना है कि व्यक्ति की महानता और समाज की प्रखरता उसमें सक्षिप्त विचार पद्धति पर ही सन्निहित है। परिस्थितियों के बिगड़ने- बनने का एकमात्र आधार विचारणा ही है। विवेक के प्रकाश में यह परखा जाना चाहिये कि हमने अपने ऊपर कितने अवांछनीय और अनुपयुक्त  विचार अंट रखे है और उनने हमारी कितनी लोमहर्षक दुर्गति की है। हमें तत्त्वदर्शी की तरह वस्तुस्थिति का विश्लेषण करना होगा और निर्णय करना होगा कि किन आदर्शों और उत्कृष्टताओं को अपनाने के लिए कठिबद्ध हों ताकि वर्तमान के नरक को हटाकर उज्ज्वल भविष्य की स्वर्गीय सम्भावनाओं को मूर्तिमान् बना सकना सम्भव हो सके। विचार- क्रान्ति का मूल यही रत्रतन्त्र चिन्तन है। जन- मानस को उसी की प्राथमिक शिक्षा दी जानी है। अभी हमारी योजना का प्रथम चरण यही है। अगले चरणों में तो अनेक रचनात्मक और अनेक संघर्षात्मक काम करने को पड़े हैं। युग परिवर्तन और घरती पर स्वर्ग का अवतरण अगणित प्रयासों की अपेक्षा रखता है। वह बहुत व्यापक और बहुमुखी योजना हमारे मस्तिष्क में है। उसकी एक हलकी- सी झाकी गत दिनों योजना में करा भी चुके हैं। वह हमारा रचनात्मक प्रयास होगा। संघर्षात्मक पथ एक और ही जिसके अनुसार अवांछनीयता, अनैतिकता एवं अरामाजिकता के विरुद्ध प्रचलित 'घिराव' जैसे भाध्यमों से लेकर समग्र बहिष्कार तक और उतनी अधिक दबाव देने की प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं जिससे दुष्टुता भी बोल जाय और उच्छ्खनता का कचू-मर निकल जाय। सजग, समर्थ लोगों की एक सक्रिय  स्वय- सेवक सेना प्राण हथेली पर रखकर खड़ी हो जाय तो आज जिन अनैतिकताओं का चारों और बोलबाला है और जो न हटने वालो न टलने वाली दीखती हैं। आंधी में उड़ते तिनकों की तरह तिरोहित हो जाँयगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1969

शनिवार, 4 सितंबर 2021

👉 सूक्ष्मीकरण से सम्भावित परिणतियाँ

मई 1984 से हमने अपने स्थूल शरीर से संभव हो सकने वाला स्थूल स्तर का क्रियाकलाप बन्द कर दिया। इसका अर्थ हुआ- भेंट, मिलन वार्तालाप, विचार विनिमय, परामर्श का अब तक चलने वाला सिलसिला एक प्रकार से समाप्त ही हो जाना। कोई विशेष अपवाद हो, तब ही इस प्रक्रिया का व्यक्तिक्रम करेंगे। जड़ नियम जड़ पदार्थों पर लागू होते हैं। चेतना की अपनी विशेष स्थिति है वह जीवित रहते हुए भी मृतक और मृत होते हुए भी जीवितों जैसे आचरण करती पायी जाती है।

हमारी सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया का प्रयोजन पाँच कोशों पर आधारित सामर्थ्यों को अनेक गुनी कर देना है। दो शरीर मिलकर तो गणना में दो ही होते हैं। पर सूक्ष्म-जगत में स्थूल अंक गणित, रेखा गणित, बीज गणित काम नहीं आती। उस लोक का गणना चक्र अलग ही गुणन क्रम से चलता है। स्कूली गणित में 2+2+2+2=8 होंगे। लेकिन सूक्ष्म जगत में 2×2×2×2=16 हो जायेंगे। सूक्ष्मीकृत शक्तियाँ कई बार तो इससे भी बड़े कदम उठाते देखी गई हैं। मनुष्य में पाँच कोश हैं। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय। मोटे तौर से सभी कोशों के जागृत होने पर एक मनुष्य पाँच गुनी सामर्थ्य सम्पन्न माना जाता है। पर दिव्य गणित के हिसाब से 5×5×5×5×5=3125 गुणा हो जाता है। शरीर गत पाँच भौतिक शरीर प्रत्यक्ष गणित के हिसाब से ही कुछ काम कर सकते हैं। चेतना के पाँच प्राण भी शरीर की परिधि में बंधे रहने तक पाँच विज्ञजनों जितना ही होते हैं, पर सूक्ष्मीकृत होने पर गणित की परिपाटी बदल जाती है और एक सूक्ष्म शरीर की प्रखर सत्ता 3125 गुनी हो जाती है।

हनुमान द्वारा रामायण काल में जो अनेकों अद्भुत काम संभव बन पड़े, वे उनके सूक्ष्म शरीर के ही कर्तव्य थे। जब तक वे स्थूल रहे, तब तक उन्हें सुग्रीव का नौकर रहना पड़ा और बातों द्वारा बालि द्वारा सुग्रीव की तरह उन्हें भी अपमानित होना पड़ा। पर सूक्ष्मता का अवलम्बन तो चेतना की सामर्थ्य को कुछ से कुछ बना देता है।

यह कार्य युग परिवर्तन प्रयोजन में भगवान की सहायता करने के लिए मिला है। युग संधि का समय सन् 2000 तक चलेगा। इस अवधि में हमें न बूढ़ा होना है, न मरना। अपनी 3125 गुनी शक्ति के अनुसार काम करना है। कालक्षेत्र के नियमों का भी सीमा बंधन नहीं रहेगा। इसलिए जो काम अभी हाथ में हैं, वे अन्य शरीरों के माध्यम से चलते रहेंगे। लेखन हमारा बड़ा काम है, वह अनवरत रूप से सन् 2000 तक चलेगा। यह दूसरी बात है कि कलम जो हाथ में जिन अंगुलियों द्वारा पकड़ी हुई है वे ही कागज काला करेंगी या दूसरी। वाणी हमारी रुकेगी नहीं। यह प्रश्न अलग है जो जीभ इन दिनों बोलती चालती है, वही बोलेगी या किन्हीं अन्यों को माध्यम बनाकर काम करने लगेगी। अभी हमारा कार्य क्षेत्र मथुरा, हरिद्वार रहा है और हिन्दू धर्म के क्षेत्र में कार्य चलता रहा है। आगे वैसा देश, जाति, लिंग, धर्म, भाषा आदि का कोई बन्धन न रहेगा जहाँ जब जैसी उपयोगिता आवश्यकता प्रतीत होगी वहाँ इन इन्द्रियों की क्षमताओं से समयानुकूल कार्य लिया जाता रहेगा।

सन् 2000 तक किसी अनाड़ी को ही हमारे मरण की बात सोचनी चाहिए। विज्ञजनों को स्मरण रख लेना चाहिए कि इस दृश्यमान शरीर से भेंट दर्शन, परामर्श, हो या नहीं, हमारे अपने कार्य क्षेत्र में उत्तरदायित्वों की पूर्ति में अनेक गुनी तत्परता से काम होते रहेंगे। सहकार और अनुदान क्रम भी चलता रहेगा। हमारे मार्गदर्शक की आयु 600 वर्ष से ऊपर है। उनका सूक्ष्म शरीर ही हमारी रूह में है। हर घड़ी पीछे और सिर पर उनकी छाया विद्यमान है। कोई कारण नहीं कि ठीक इसी प्रकार हम अपनी उपलब्ध सामर्थ्य का सत्पात्रों के लिए सत्प्रयोजनों में लगाने हेतु वैसा ही उत्साह भरा उपयोग न करते रहें। पाठकों-आत्मीय परिजनों को सन् 2000 तक सतत् हमारे विचार ‘ब्रह्मवर्चस’ नाम से पत्रिकाओं पुस्तिकाओं फोल्डरों के माध्यम से मिलते रहेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई1984 पृष्ठ 1   

बुधवार, 25 अगस्त 2021

👉 सतयुग कैसे आवेगा?

(परम पूज्य गुरुदेव ने ७९ साल पहले इस लेख द्वारा समय परिवर्तन की भावी रूपरेखा इंगित की है। ७९ साल पूर्व इस लेख से भविष्य दर्शाने वाले परम पूज्य गुरुदेव का युगद्रष्टा ऋषिरुप व्यक्त होता है।)
    
अब कलियुग समाप्त होकर सतयुग आरम्भ हो रहा है, ऐसा अनेक तर्कों, प्रमाणों, युक्तियों, अनुभवों और भविष्यवाणियों से प्रकट है। पापों का नाश होकर धर्म का उदय होगा। अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि सतयुग कैसे आवेगा? यह कार्य एक दिन में पूरा नहीं हो जावेगा, वरन इसके लिए कुछ समय लगेगा। यह समय एक सौ वर्ष का हो सकता है। कई महात्माओं का विश्वास है कि संवत् बीस सौ से लेकर इक्कीस सौ तक यह परिवर्तन कार्य पूरा हो जायेगा। इस एक शताब्दी में कलियुग के अस्त और सतयुग के आरंभ की संध्या रहेगी। बुराई क्रमशः घटती जायेगी और भलाई क्रमशः बढ़ती जायेगी। यह भी संभव है कि इस बीच में कभी-कभी पाप कर्मों के कुछ बड़े-बड़े कार्य दीख पड़ें क्यों कि जब दीपक बुझने को होता है, तो उसकी लौ एक बार जोर से बढ़ती है, फिर वह बुझ जाती है। रोगी मरने से पूर्व जोर की हिचकी लेता है और प्राण त्याग देता हे। सूर्योदय से पूर्व जितना अँधेरा होता है, उतना रात्रि के और किसी भाग में नहीं होता। वर्षा से पहले बड़े जोर की गर्मी पड़ती है या यों कहिये कि अधिक गर्मी पड़ना ही वर्षा का कारण होता है। जब चींटी के पर आते हैं, तो कहते हैं बस, अब बेचारी का अंत आ गया। गरदन कटते समय बकरा जितना शोर मचाता और पाँव पीटता है, उतना जीवन भर में कभी भी नहीं करता। कलियुग की गर्दन अब सत्य की छुरी से कटने जा रही है, हो सकता है कि वह इन अंतिम दिनों में खूब चिल्लाये, फड़फड़ाये और पाँव पीटे।
    
संवत् दो हजार समाप्त होते ही एकदम सतयुग फट नहीं पड़ेगा और न यह धरती आसमान बदल जायेंगे। सब यही रहेगा। मनुष्य भी यही रहेंगे। डरना या घबड़ाना न चाहिये, यह कल्पांत नहीं है, युगांत है। इस समय युद्धों, महामारियों और दुर्भिक्षों का जोर रहने से जनसंख्या घट जायेगी, पर प्रलय नहीं होगी। गत महायुद्ध में जितने मनुष्य मरे थे, इस युद्ध में उससे अधिक मरेंगे पर यह संहार रुपये में दो आने भर, अष्टमांश से अधिक न होगा। इतनी जनसंख्या घटने बढ़ने से सामूहिक दृष्टि से कोई बड़ा भारी अनिष्ट नहीं समझना चाहिए। यह कमी अगली एक शताब्दी में ही पूरी हो जायेगी।
    
सतयुग आरंभ में स्वः लोक में आवेगा, फिर भुवः लोक में तत्पश्चात् भूः लोक में दृष्टिगोचर होगा। स्वः लोक का अर्थ मन, भुवः लोक का अर्थ वचन, भूः लोक का अर्थ कर्म है। सबसे प्रथम जनता के मनों में शुभ संकल्पों के प्रति आकर्षण उत्पन्न होगा। बुरे कर्म करने वाले भी सत्य की प्रतिष्ठा करेंगे, आदतों के कारण कोई चाहे चोरी करता रहे, पर उसका मन अवश्य ही धर्म की महत्ता को समझेगा। कुकर्मी लोग मन ही मन पछताते जायेंगे और कभी-कभी एकान्त में दुखी हृदय से भगवत् प्रार्थना करते रहेंगे कि हे प्रभो! हमें सद्बुद्धि दो, हमें दुष्ट कर्मों के पंजे से छुड़ाओ। दूसरों को शुभ कर्म करते देख कर मन में प्रसन्नता होगी। ज्ञान चर्चा सुनने को जी चाहेगा। छोटे बालक भी हरिकथा, कीर्तन और सत्संग से प्रेम करेंगे। घर और कमरे आदर्श वाक्यों, आदर्श चित्रों से सजाये जायेंगे, फैशन में कमी हो जायेगी, बाबू लोग मामूली पोशाक पहनने लगेंगे, प्रभुता और ऐश्वर्य प्राप्त लोगों को भोगों से अरुचि होकर धर्म में प्रवृत्ति बढ़ेगी। मन ही मन लोग सत्य-नारायण की उपासना करेंगे, झूठ और पाखण्ड देख कर मन ही मन चिढ़ेंगे। असत्य द्वारा चाहे अपना ही हित होता हो, पर लोग उससे घृणा करेंगे। सत्य पक्ष द्वारा यदि अपना अहित हुआ हो तो भी बुरा न मानेंगे। जब इस प्रकार के लक्षण दिखाई देने लगें तो समझना चाहिए कि सतयुग स्वः लोक में, ब्रह्म लोक में आ गया। पूरा सतयुग तो कभी भी नहीं आता क्योंकि सृष्टि की रचना सत्, रज, तम तीनों गुणों से हुई है। यदि एक भी गुण समाप्त हो जाय तो सृष्टि का ही नाश हो जायेगा। युगों में तत्वों की न्यूनाधिकता होगी। सतयुग के आरंभ में सत् की अधिकता होगी। स्वः लोक में मनों में, मस्तिष्कों में, सत् की झाँकी मिलेगी। कहीं-कहीं वचन और कर्म में भी दिखाई देगा, पर बहुत कम। वचन और कर्म तो वैसे ही रहेंगे। स्वः लोक में सतयुग का आगमन उच्च आध्यात्मिक भूमिका में जागृत हुए मनुष्यों को दिखाई देगा, सर्व साधारण को उसको पहिचानना कठिन होगा।
    
स्वः लोक में नीचे उतर कर जब सत् युग भुवः लोक में आवेगा तो मन और वचन दोनों में सत्यता प्रकट होने लगेगी। केवल मन में ही सत्य के प्रति आदर न रहेगा वरन् वाणी से भी प्रशंसा होने लगेगी। आज कल जैसे धर्म के लिए कष्ट उठाने वाले और तपोनिष्ठ लोगों को मूर्ख कहा जाता है, उस समय वैसा न कहा जायेगा। तब खुले आम सत्कर्मियों की प्रशंसा की जायेगी। लेखनी और वाणी से प्रेस और प्लेट-फार्म द्वारा सत्य का खूब प्रचार होगा। यद्यपि करने वालों की अपेक्षा कहने वाले ही उस समय भी अधिक होंगे, पर कोई-कोई अपने विचारों को कार्य रूप में भी प्रकट करेंगे। उपदेश करने वालों की संख्या में वृद्धि होगी। धार्मिक पत्र-पत्रिकाओं को आदर मिलेगा। मामूली व्यापारिक काम-काजों में भी सत्य को स्थान मिलेगा। दुकानदार और ग्राहक ‘‘एक दाम’’ की नीति पसंद करेंगे। झूठ, चुगलखोर, बकवादी, गप्पी जगह-जगह दुत्कारे जायेंगे। तब चालाकी की बातें करने वाले बुद्धिमान नहीं मूर्ख समझे जायेंगे। सत्यवक्ताओं का समाज में आदर होगा। आत्म ज्ञान संबंधी पुस्तकें खूब छपेंगी, उनके पढ़ने-पढ़ाने का क्रम बढ़ेगा। कठोर, अप्रिय, उद्धत्, अश्लील वचन बोलना क्रमशः कम होता जायेगा और विनय, नम्रता, मधुरता लिये हुए बातें करने का प्रचार बढ़ेगा। अश्लील गालियों के विरोध में ऐसा आंदोलन होगा कि यह प्रथा बिलकुल बंद हो जायेगी।
    
भूः लोक में जब सतयुग उतरेगा तो दृश्य ही दूसरे दिखाई देंगे। सत्य, प्रेम और न्याय को आचरण में प्रमुख स्थान मिलेगा। आज कल झूठ बोलने का रिवाज समाज की बिगड़ी हुई दशा के कारण है। जब समाज की आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, शारीरिक और मानसिक दशाएँ सुधर जावेंगी, तो झूठ बोलने से कुछ प्रयोजन न रहेगा। मनुष्य जीवन की सभी आवश्यकताएँ जब सरलतापूर्वक पूर्ण हो जाती हैं, तो झूठ बोलने का पाप कौन करेगा? फिर लोकमत झूठ के विरोध में हो जायेगा, इसलिए बलात् सबको सत्य का मार्ग ग्रहण करना होगा। हर काम  को करते समय मनुष्य सोचेगा, इसमें प्रेम और न्याय है या नहीं। कर्म और अकर्म की तब एक ही कसौटी होगी, वह यह है कि-किया जानेवाला कार्य प्रेम और न्याय से पूर्ण है या नहीं।  अपने हित की अपेक्षा जब दूसरे के हित को अधिक ध्यान में रखने की मनोवृत्ति बन जायेगी तो सच्चा सतयुग प्रकट होगा। राजगद्दी का प्रश्न आवेगा तो उसे भरत-राम को और राम-भरत को देना चाहेंगे। कैकयी की प्रसन्नता के लिये कौशिल्या अपने पुत्र को खुशी-खुशी वन जाने की आज्ञा देगी। सुमित्रा आज्ञा करेंगी कि हे लक्ष्मण! तुम्हारे लिए अवध वहीं है, जहाँ राम रहें। इसलिए बड़े भाई के साथ बन को जाओ। सीताजी अपने को कष्टों के कण्टकों में घिसटाना पसन्द करेंगी किन्तु पति की सेवा का लोभ न त्यागेंगी। उस सतयुग में ऐसे परिवार हो जायँगे। भाई, माता, विमाता, पत्नी इस प्रकार के प्रेम सूत्रों में बँधे होंगे। राजा प्रजा को पुत्र के समान समझेंगे। जब प्रजा कहेगी कि हम राजा की ऐसी पत्नी पसन्द नहीं करते, जिसे कलंकित समझा जाता है, तो राम अपनी छाती पर पत्थर बाँध कर और सीता अपने कलेजे पर शूल रख प्रजा की इच्छा पर अपने को तिल-तिल करके विरह वेदना की भट्टी में जलने के लिए भी तत्पर हो जायेंगे। प्रजा के लिए राम का यह सर्वोत्कृष्ट त्याग है, भावना की दृष्टि से देखा जाय, तो इस त्याग की उपमा इतिहास में मिलना कठिन है। जब भूः लोक में सतयुग आ जायगा, तो ऐसी घटनाओं का मिलना भी कठिन न होगा। एक दो नहीं, हर जगह अनेक घटनायें ऐसी घटित होंगी, जिनमें प्रेम और न्याय का ऊँचा आदर्श झिलमिल करता हुआ दिखाई देगा। फिर भी दुष्ट-कर्मी थोड़ी बहुत मात्रा में बने रहेंगे, क्यों कि प्रकृति त्रिगुणमयी है।
    
लोकों की सूचना आयु के हिसाब से भी मिलेगी। बालकपन सात्विकी अवस्था है, युवा राजसी और वृद्धावस्था तामसी। भूः लोक का सतयुग पहले २५ वर्ष से कम उम्र के, प्रथम अवस्था वाले किशोर बालकों में उतरेगा। २५ वर्ष से कम अवस्था वालों के हृदयों में सब से अधिक सत्य की प्रेरणा होगी। उनके निर्मल जल में किसी वस्तु की परछाई साफ-साफ दिखाई देती  है। इन नव-युवकों के हृदय में स्वभावतः श्रद्धा और भक्ति होगी। वे कलियुगी बड़े उम्र वालों के क्रोध के भाजन बनेंगे, डाट फटकार और दुख-दण्ड सहेंगे। पर युग का प्रभाव उन्हें विचलित न होने देगा। प्रहलाद की तरह यह बालक बड़े दृढ़, निर्भीक और सत्यनिष्ट होंगे, धु्रव की तरह ये तपस्या करेंगे और हकीकतराय की तरह प्राणों को तुच्छ समझेंगे, पर सत्य की ही रट लगावेंगे। असुरों के घरों में से ऐसे देव बालकों की सेना की सेना निकल पड़ेगी और संसार को आश्चर्य से चकित कर देगी। यह सतयुग की पहली तिहाई में ही दिखलाई देना लगेगा। संवत् दो हजार से लेकर संवत् २०३३ वि. तक इन बालकों का ही प्रचंड आन्दोलन रहेगा यद्यपि कर्म में बहुत ही कम परिवर्तन दिखाई देगा। कोई कोई मूर्ख इसे बालक्र्रीड़ा समझ कर उपहास करेंगे और बालकों के हृदय परिवर्तन को कुछ महत्व न देगें, पर उन्हें शीघ्र ही अपनी भूल प्रतीत हो जायगी।
    
जब सतयुग भुवः लोक में उतरेगा तो सत्य का प्रकाश बढ़ेगा और तरुण को २५ से ५० वर्ष की आयु वालों को भी इसमें सम्मिलित होना पड़ेगा। वे सत्य, प्रेम और न्याय का विरोध करने का साहस न करेंगे एवं वाणी द्वारा उसका समर्थन करने लगेंगे। बालक और तरुण मिलकर इस आन्दोलन का नेतृत्व करेंगे। मन और वचन में सत्य गुंज्जित हो जावेगा। किन्तु कर्म फिर भी अधूरे रहेंगे। मरणोन्मुख कलियुग बार-बार जीवित हो जायेगा। उसकी चिंता में बार-बार दुखदायी चिनगारियाँ उड़ेगी, कभी-कभी तो सतयुग के आगमन पर लोगों को अविश्वास तक होगा, पर भविष्य उनके भ्रम का निवारण कर देगा। सत्य की हमेशा विजय ही होती है।
    
वृद्ध लोग अपने पुराने-धुराने, सड़े-गले, गन्दे-सन्दे विचारों की चहारदीवारी में बंद पड़े-पड़े बड़बड़ाते रहेंगे। आरंभ में वे बालकों के हृदय परिवर्तन का उपहास करेंगे, जब तरुण भी उनके पक्ष में आ जावेंगे, तो वे अपने स्वभाव के कारण उनका विरोध करेंगे, किंतु अंत में युग का प्रभाव उन पर भी पड़ेगा। मृत्युलोक में जब सतयुग आवेगा, तो उन्हें भी अपने विचार बदलने पड़ेंगे और असत्य को तिलांजलि देकर सत्य की शरण में आ जावेंगे। कलियुग जब बिलकुल ही निर्बल हो जायेगा, तो वृद्धों की भी मनोदशा बदल जायेगी। फिर वे अधिक उम्र के कारण अर्ध विक्षिप्त न होंगे, रोग शोक के घर न रहेंगे। अपमान के स्थान पर सर्वत्र उनका मान होगा। ‘‘साठा सो पाठा’’ वाली उक्ति कहावत चरितार्थ होगी। आज जैसे वृद्धों को ‘‘रिटायर्ड’’ कह कर एक कोने में पटक दिया जाता है, तब ऐसा न होगा। उस समय वयोवृद्ध अपने सद्ज्ञान के कारण बहुत ही उन्नत दशा में होंगे, सतयुग का मर्म समझ जायेंगे और अपने पुत्र-पौत्रों को सत्य-मार्ग में प्रवृत्त होने का उपदेश देंगे। संवत् २१०० (सन् २०४४) में यह पूरा हो जायेगा। उस समय सतयुग भूः लोक में प्रकट हुआ समझा जायेगा।
    
स्त्रियाँ बुद्धिजीवी नहीं होती, उनमें भावना ही प्रधान है। इसलिए वे सतयुग के आगमन की चर्चा को आश्चर्य के साथ सुनेंगी। उनके कान पुराने संस्कारवश इस बात को स्वीकार न करना चाहेंगे, पर हृदय में भीतर ही भीतर कोई उन्हें प्रेरणा करता हुआ प्रतीत होगा कि यह सब सत्य है। सतयुग अब आ गया है। स्त्रियों का सतीत्व, पतिव्रत जागृत रहेगा। उनका हृदय दया, क्षमा, करुणा और प्रेम से भर जायेगा। पति और पुत्रों के लिए बहुत आत्म त्याग करेंगी। दीन-दुखियों को देख कर उनके हृदय पसीज जावेंगे। ऐसी स्त्रियाँ बहुत देखने में आवेंगी, जो पुरुषों के कठोर होते हुए भी दान, धर्म में श्रद्धा रखेंगी। सत्य, प्रेम और न्याय की भावना स्त्रियों में बड़ी आसानी से प्रवृष्ट हो जायेगी और वे पुरुषों की अपेक्षा जल्दी सतयुगी बन जावेंगी।
    
ऐसा नहीं है कि आयु के उपरोक्त प्रतिबन्ध सभी पर लागू हों। यह तो साधारण श्रेणी के अचेतन जीवों की बात कही गई है। जाग्रत, नैष्ठिक, उन्नत और जिनको भगवान ने इसी निमित्त भेजा है एवं जिनके भाग्य में सतयुगी अवतार बनना लिखा है, वे बहुत पहले, सतयुग के आदि में ही, संवत् दो हजार के आसपास से ही वरन् इससे भी बहुत पूर्व सावधान हो जायेंगे और नवीन युग के स्वर्ग रथ को स्वर्ग से भूमण्डल पर लाने के लिए अपना सर्वस्व त्याग कर उस रथ में जुतकर सूर्य के सप्तमुखी घोड़ों के समान कार्य करेंगे। सतयुग तो आने ही वाला है, वह किसी के रोकने से किसी भी प्रकार रुक नहीं सकता, पर इस स्वर्ग अवसर से लाभ उठाने का, अपनी कीर्ति को अमर कर जाने का सौभाग्य उन्हें ही मिलेगा, जो बड़े भाग्यवान हैं, जिन पर ईश्वर की विशेष कृपा है। शेष तो यहीं कुत्तों की मौत मरेंगे और पीछे अपनी भूल पर सिर धुन-धुन कर पछताते रहेंगे।

✍🏻 परम पूज्य गुरुदेव पं श्री राम शर्मा आचार्य जी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी १९४२

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

👉 अपनी श्रद्धा को उर्वर एवं सार्थक बनने दें (अंतिम भाग)

विचार- क्रान्ति का मूल यही रत्रतन्त्र चिन्तन है। जन- मानस को उसी की प्राथमिक शिक्षा दी जानी है। अभी हमारी योजना का प्रथम चरण यही है। अगले चरणों में तो अनेक रचनात्मक और अनेक संघर्षात्मक काम करने को पड़े हैं। युग परिवर्तन और घरती पर स्वर्ग का अवतरण अगणित प्रयासों की अपेक्षा रखता है। वह बहुत व्यापक और बहुमुखी योजना हमारे मस्तिष्क में है। उसकी एक हलकी- सी झाकी गत दिनों योजना में करा भी चुके हैं। बह हमारा रचनात्मक प्रयास होगा। संघर्षात्मक पथ एक और ही जिसके अनुसार अवांछनीयता, अनैतिकता एवं अरामाजिकता के विरुद्ध प्रचलित 'घिराव' जैसे भाध्यमों से लेकर समग्र बहिष्कार तक और उतनी अधिक दबाव देने की प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं जिससे दुष्टुता भी बोल जाय और उच्छ्खनता का कचू- मर निकल जाय। सजग, समर्थ लोगों की एक सक्रिय  स्वय- सेवक सेना प्राण हथेली पर रखकर खड़ी हो जाय तो आज जिन अनैतिकताओं का चारों और बोलबाला है और जो न हटने वालो न टलने वाली दीखती हैं। आंधी में उड़ते तिनकों की तरह तिरोहित हो जाँयगी।

वे बातें पीछे की हैं आज तो बिचार- क्रान्ति का प्रथम चरण उठाया जाना आवश्यक है ! अभी तो गहरी खुमारी में अवांछनीय रूप से देखने वालों को जगाया जाना ही प्रथम कार्य है जिसके बाद और कुछ सोचा और किया जाना सम्भव है। इसलिए लोक- शिक्षण को अनिवार्य आव श्यकता की पूर्ति के लिए अभी अपना प्रथम अभियान चल रहा है। इसके अन्तर्गत हमें अशुद्ध विचारों के दुष्परिणाम और सद्विचारों की उपयोगिता तथा स्वतन्त्र चिन्तन को पद्धति मात्र मिखानी बतानी है। इसी का क्षेत्र व्यापक बनाना है। परिजनों के समक्ष इस अंक में प्रस्तुत योजना इसी उद्देश्य के लिए उपस्थित की गई है जो सचमुच हमें प्यार करते हों- जो सचमुच हमारे निकट हों- जिन्हें सचमुच हमसे दिलचस्पी हो- उन्हें इसके लिए प्रस्तुत योजना को कार्यान्वित करने के लिए बीस महीने की इम तप- साधना में संलग्न होना ही चाहिये। हमारे लिए यदि कोई कुछ विदाई उपहार देना चाहते हों तो वह इस योजना में सम्मिलित होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं दे सकता।

विचार- क्रान्ति के प्रथम चरण की प्रस्तुत योजना के दो आधार हैं। प्रति दिन थोड़ा- थोड़ा अथवा छुट्टी के दिन पूरा समय देना। दूसरी अपनी आजीविका का एक अंश इस पुण्य प्रयोजन में नियमित रूप से लगाना। महीने में एक दिन उपवास ही क्यों न करना पड़े- चाहे किसी आवश्यकता में कटौती ही क्यों न करनी पड़े पर इतना त्याग बलिदान तो किया ही जाना चाहिये। नियमितता से स्वभाव एवं अभ्यास का निर्माण होता है इसलिए एक बार थोड़ा समय या थोड़ा पैसा दे देने से काम न चलेगा इसमें नियमितता जुड़ी रहनी चाहिये। लगातार की नियमितता को ही साधना कहते हैं। जो कम ज्यादा समय या धन खर्च करना चाहें वे वैसा कर सकते हैं। पर होना सब कुछ नियमित हो चाहिये। लगातार चलने से मंजिल पार होती है। एक क्षण की उछाल चमत्कृत तो करती है पर उससे लम्बी मंजिल का पार होना सम्भव नहीं। इसलिए किसी से बड़ी धन राशि की याचना नहीं की है भले ही योड़ा- थोड़ा हो पर नियमित रूप से कुछ करते रहने के लिए कहा गया है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1986

गुरुवार, 4 मार्च 2021

👉 अपनी श्रद्धा को उर्वर एवं सार्थक बनने दें (भाग २)

कभी हमने पूर्व जन्मों के सत् संस्कार वालों और अपने साथी सहचरों को बड़े प्रयत्नपूर्वक ढूंढा है और 'अखण्ड- ज्योति परिवार की शृद्खला में गूंथकर एक सुन्दर गुलदस्ता तैयार किया था। मंशा थी इन्हें देवता के चरणों में चढ़ा येंगे। पर अब जब जब कि बारीकी से नजर डालते हैं कि कभी के अति सुरम्य पुष्प अब परिस्थितियों ने बुरी तरह विकृत कर दिये है। वे अपनो कोमलता, शोभा और सुगंध तोनों ही खोकर बुरी तरह इतनी मुरझा गये कि हिलाते- दुलाते हैं तो भी सजीवता नहीं आती उलटी पंखड़ियाँ भर जाती हैं। ऐसे पुष्पों को फेंकना तो नहीं है क्योंकि मूल संस्कार जब तक विद्यमान हैं तब तक यह आशा भी है कि कभी समय आने पर इनका भी कुछ सदुपयोग सम्भव होगा, किसी औषधि में यह मुरझाये फूल भी कभी काम आयेंगे। पर आज तो देव देवो पर चढ़ाये जाने योग्य सुरभित पुष्पों की आवश्यकता है सो उन्हीं की छांट करनी पड़ रही है। 

अभी आज तो सजीवता ही अभीष्ट है और वस्तुस्थिति की परख तो कहने- सुनने- देखने- मानने से नहीं वरन् कसौटी पर कसने से ही होता है। सो परिवार को सजोवता- निर्जीवता- आत्मीयता, विडम्बना के अंश परखने के लिए यह वर्तमान प्रक्रिया प्रस्तुत की है। अगले बीस महीनों में यथार्थता आजायगो और जन- सम्पर्क की दिशा में किये हुए अपने  प्रयासों की सफलता- असफलता का एक सही निष्कर्ष साथ लेकर हम विदा हो सकेंगे यह इसलिए भी आवश्यक है कि यहाँ से जाने के बाद हमें किसके लिए क्या और कितना करना है इसके सम्बन्ध में भी अपनी दृष्टि साफ हो जायगी। बेकार की घचापच छट जाने से अपने अन्तरिम परिवार को एक छोटी सीमा अपने लिए भी हलकी पड़ेगी बौर अधिक ध्यान से सींचे- पोसे जाने के कारण वे पौधे भी अधिक लाभान्वित होंगे 

नव- निर्माण के लिए अभी बहुत काम करना बाकी है। विचार- प्रसार तो उसका बीजारोपण है। इसके बिना कोई गति नहीं। अक्षर ज्ञान की शिक्षा पाये बिना ऊंची पढ़ाई की न तो आशा है न सम्भावना है। इसलिए प्रारम्भ में हर किसी को अक्षर ज्ञान कराना अनिवार्य है। पीछे जिसकी जैमी अभिरुचि हो शिक्षा के विषय चुनना रह सकता है पर अनिवार्य में छूट किसी को नहीं मिल सकती। प्रारम्भिक अक्षर सबको समान रूप में  पढ़ने पड़े गे। विचारों की उप- योगिता, महत्ता, शक्ति और प्रमुखता का रहस्य हर किसी के मस्तिष्क में कूट- कूट कर भरा जाना है और बताया जाना है कि व्यक्ति की महानता और समाज की प्रखरता उसमें सक्षिप्त विचार पद्धति पर ही सन्निहित है। परिस्थितियों के बिगड़ने- बनने का एकमात्र आधार विचारणा ही है। विवेक के प्रकाश में यह परखा जाना चाहिये कि हमने अपने ऊपर कितने अवांछनीय और अनुपयुक्त  विचार अंट रखे है और उनने हमारी कितनी लोमहर्षक दुर्गति की है। हमें तत्त्वदर्शी की तरह वस्तुस्थिति का विश्लेषण करना होगा और निर्णय करना होगा कि किन आदर्शों और उत्कृष्टताओं को अपनाने के लिए कठिबद्ध हों ताकि वर्तमान के नरक को हटाकर उज्ज्वल भविष्य की स्वर्गीय सम्भावनाओं को मूर्तिमान् बना सकना सम्भव हो सके। 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1986 

मंगलवार, 2 मार्च 2021

👉 अपनी श्रद्धा को उर्वर एवं सार्थक बनने दें (भाग १)

जीवन की गति एक ही दिशा में चलते- चलते -- विचार और प्रक्रिया का एक ही प्रवाह बहते रहने- आत्मा और परमात्मा की एक ही सम्मिलित प्रेरणा अनुभव करते- करते कर्तव्य और धर्म का एक ही निर्देश- संकेत देखते- देखते अब हमारा व्यक्तित्व निर्दिष्ट लक्ष्य में एक प्रकार से तन्मय एवं सघन हो गया है। अलग से अपनी कोई हस्ती कोई सत्ता सही नहीं। जो हमें प्यार करता हो- उसे हमारे मिशन से भी प्यार करना चाहिए। जो हमारे मिशन की उपेक्षा, तिरस्कार करता है लगता है वह हमें ही उपेक्षित तिरस्कृत कर रहा है। व्यक्तिगत रूप से कोई हमारी कितनी ही उपेक्षा करे पर यदि हमारे मिशन के प्रति श्रद्धावान् उनके लिए कुछ करता, सोचता है तो लगता है मानो हमारे ऊपर अमृत बिखेर रहा है और चन्दन लेप रहा है। किन्तु यदि केवल हमारे व्यक्तित्व के प्रति ही श्रद्धा है- शरीर से ही मोह है- उसी की प्रशिस्त पूजा को जाती है। यदि मिशन की बात उठाकर ताक पर रख दी जाती है तो लगता है हमारे प्राण का तिरस्कार करते हुए केवल शरीर पर पंखा रुलाया जा रहा हो। 

अपनी- अपनी मनोदशा हो तो है। लोगों की दृष्टि में व्यक्ति पूजा पर्याप्त है- मिशन के झंझट में पड़ने की जरूरत नहीं। अपनी दृष्टि में शरीर- पूजा बुत परस्ती मात्र है, देव- पूजा तो श्रद्धास्पद प्राण प्रवाह के साथ बहने से है लोग अपनी जिस अभिव्यंजना को पर्याप्त मानते हैं हमारे लिए वह निरर्थक है क्योंकि शरीर के साथ किये हुए सद्व्यवहार आत्मा के गहरे परतों तक पहुँचते- पहुँचते बीच में ही क्षीण विलीन हो जाते हैं। अपनी मनोदशा मिशन को आगे बढ़ते देख कर प्रसन्न और सन्तुष्ट होने की है, अब उसी में अपना सारा आनन्द, उल्लास केन्द्रीभूत हो गया है। सो जो कोई उस दिशा में आगे बढ़ता दीखता है, लगता है अपने कर्तव्य के लिए ही नहीं हमारे लिए भी बहुत कुछ करने में संलग्न है। ऐसे लोगों के प्रति हमारी श्रद्धा, कृतज्ञता, ममता और सहानुभूति का अन्तः प्रवाह अनायास ही प्रवाहित होने लगता है। बाहर से संकोचवश कुछ न कह सकें पर भीतर ही भीतर ऐसा कुछ उमड़ता उमड़ता रहता है जो कहता है कि इस पर कितना प्यार बखेर दें, कितनी आत्मीयता उड़ेल दें, जो कुछ अपने पास है सो सब कुछ उसके ऊपर निछावर करने को जी करता है। 

वस्तुतः अब शरीर की सेवा समीपता से नहीं भावना और आदर्शों की प्रखरता ही से अपने को शान्ति और सन्तुष्टि मिलती है किसी से हमारी कितनों निकटता है उसकी परख अब इसी कसौटी पर कसने हैं कि उसने हमारे कन्धे से कन्धा मिलाकर कितना भार बँटाया और हमारे कदमों से कदम मिलाकर कितनी सह यात्रा की। निन्दा, स्तुति अपने लिए समान हैं। जब व्यक्तित्व रहा ही नहीं- मिशन में घुल गया तो उस मृतप्राय सत्ता से शरीर कलेवर से अपना मोह हो क्या है ?? फिर उसकी पूजा- प्रशंसा और अभ्यर्थना का अपने ऊपर क्या प्रभाव पड़े। कामनाओं, आकांक्षाओं और अभावों की सांसारिक सीमा समाप्त हो गई तो उसकी उपलब्धि में रस भी क्या ?? अपनी सारी सरसता अब अपने लक्ष्य मिशन में है, उसी क्षेत्र की उत्साहवर्धक हलचल आशा, उल्लास और सन्तोष की भूमिका प्रस्तुत करती है। सो अपने विशाल परिवार में कहीं सच्ची आत्मीयता का कितना अंश विद्यमान है यह जानने की इच्छा होती है तो इसी कसौटी पर कसकर वस्तुस्थिति जान लेते हैं कि हमारा दर्द किस- किस की नसों में और कितनी मात्रा में भर चला और हमारी आग की कितनी चिनगारियाँ कितने अंशों में किसके कलेजे में सुलगने लगीं। अपनी- अपनी मनोदशा ही तो है। लोगों के सोचने का ढंग जो भी हो अपनी- अपनी तो यही प्रकृति बन गई। मजबूरी अपनी भी है जो अपने को हमारे सम्मुख अपने लौकिक व्यवहार से प्रियजन सिद्ध करना चाहते हैं वे हमें निरर्थक लगते हैं किन्तु जो कभी मिलते भी नहीं, पत्र भी नहीं लिखते, प्रशंसा- पूजा का हलका- सा भी प्रयत्न नहीं करते वे प्राणप्रिय और अति समीप लगते हैं यदि मिशन के लिए कुछ काम कर रहे हैं। 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1969 

शनिवार, 19 दिसंबर 2020

👉 आप समर्पित हो जाइए

मित्रो! एक बार लैला ने मजनूँ की परीक्षा लेनी चाही और जानना चाहा कि मजनूँ कैसा है? पहले तो उसने ऐसा इंतजाम कर दिया कि उसको कुछ पैसे मिल जाया करें, दुकानदारों से खाने को मिल जाया करे। फिर उसने सोचा, ऐसा तो नहीं कि वह हरामखोर हो और फोकट का खा रहा हो। उसने अपनी बाँदी से यह कहला भेजा कि लैला बहुत बीमार है। सुनकर मजनूँ बड़ा दुःखी हुआ। बाँदी ने कहा-दुःखी होने से क्या फायदा? आप कुछ मदद कीजिए न उनकी। उसने कहा-लैला को हम बहुत प्यार करते हैं। प्यार करते हो तो कुछ दीजिए न। मजनूँ ने कहा-मैं क्या दूँ? बाँदी ने कहा-डॉक्टरों ने यह कहा है कि लैला की नसों में खून का एक प्याला चढ़ाया जाएगा, आप अपना खून देंगे क्या, जिससे कि लैला की जिन्दगी बचायी जा सके। मजनूँ फौरन तैयार हो गया। उसने जो कटोरा बाँदी लेकर आयी थी, खून से लबालब भर दिया। बाँदी जब खून लेकर चली, तब उसने बाँदी से एक और बात कही-बाँदी जल्दी आना, अभी कई कटोरे खून मेरे शरीर में है। वह मैं उसके सुपुर्द करूँगा, क्योंकि उससे मैं मुहब्बत करता हूँ और मुहब्बत का मतलब होता है-देना। बाँदी जब एक कटोरा खून लेकर के गयी, तो नकली मजनूँ जो थे, सब भगा दिए गये। लैला ने अपने बाप से कह दिया-जो मुझसे इतनी मुहब्बत करता है और जो मुहब्बत की कीमत को समझता है, उसके ही साथ मैं रहूँगी। लैला और मजनूँ की शादी हो गई। 

आपकी भी शादी भगवान के साथ में हो सकती है, लेकिन करना क्या चाहिए? सिर्फ एक बात करनी चाहिए कि भगवान की मर्जी पर चलने के लिए आप आमादा हो जाइए। भगवान जो आपसे चाहते हैं, उसको कीजिए। आपका चाहना भी ठीक है, लेकिन आप जो चाहते हैं, उससे पहले बहुत कुछ दे दिया है भगवान ने। आपको इनसान की जिन्दगी दी है और ऐसी जिन्दगी दी है कि आप अपनी मनमर्जी पूरी कर सकते हैं। मनमर्जी के लिए कोई कमी नहीं है। आपके हाथ कितने बड़े हैं, आपकी जुबान और आँखें कितनी शानदार हैं, इसमें आप संतोष कर सकते हैं। अपनी दैनिक जरूरतों की भगवान से अपेक्षा मत कीजिए। आप अपनी हविश, अपनी तमन्नाओं, इच्छाओं, महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए भगवान को मजबूर करेंगे कि कर्तव्य की बात को छोड़कर वह पक्षपात करने लगे और कर्मफल की महत्ता का परित्याग कर दे? आप ऐसा मत कीजिए, उनको न्यायाधीश रहने दीजिए। 

आप अपने घिनौने चिन्तन को बदल दीजिए, अपने छोटे दृष्टिकोण को परिवर्तित कर दीजिए, लोभ और लालच से बाज आइए और भगवान की सुन्दर दुनिया को ऊँचा बनाने के लिए, शानदार बनाने के लिए राजकुमार के तरीके से कमर बाँधकर खड़े हो जाइए। आप समर्पित हो जाइए, शरणागति में आइए, विराजिए, विसर्जन कीजिए, फिर देखिए आप क्या पाते हैं? आज मुझे यही निवेदन करना था आप लोगों से। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय-नं-६८-पेज-१.१४

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

👉 हमारे अंग बन जाओ

मित्रो ! हमारी एक ही महत्त्वाकांक्षा है कि हम सहस्रभुजा वाले सहस्रशीर्षा पुरुष बनना चाहते हैं। तुम सब हमारी भुजा बन जाओ, हमारे अंग बन जाओ, यह हमारी मन की बात है। गुरु-शिष्य एक-दूसरे से अपने मन की बात कहकर हल्के हो जाते हैं। हमने अपने मन की बात तुमसे कह दी। अब तुम पर निर्भर है कि तुम कितना हमारे बनते हो? पति-पत्नी की तरह, गुरु व शिष्य की आत्मा में भी परस्पर ब्याह होता है, दोनों एक-दूसरे से घुल-मिलकर एक हो जाते हैं। समर्पण का अर्थ है-दो का अस्तित्व मिटाकर एक हो जाना। तुम भी अपना अस्तित्व मिटाकर हमारे साथ मिला दो व अपनी क्षुद्र महात्त्वाकांक्षाओं को हमारी अनन्त आध्यात्मिक महात्त्वाकांक्षाओं में विलीन कर दो। जिसका अहं जिन्दा है, वह वेश्या है। जिसका अहं मिट गया, वह पवित्रता है। देखना है कि हमारी भुजा, आँख, मस्तिष्क बनने के लिए तुम कितना अपने अहं को गला पाते हो? इसके लिए निरहंकारी बनो। स्वाभिमानी तो होना चाहिए, पर निरहंकारी बनकर। निरहंकारी का प्रथम चिह्न है वाणी की मिठास। 

वाणी व्यक्तित्व का हथियार है। सामने वाले पर वार करना हो तो तलवार नहीं, कलाई नहीं, हिम्मत की पूछ होती है। हिम्मत न हो तो हाथ में तलवार भी हो, तो बेकार है। यदि वाणी सही है तो तुम्हारा व्यक्तित्व जीवन्त हो जाएगा, बोलने लगेगा व सामने वाले को अपना बना लेगा। अपनी विनम्रता, दूसरों का सम्मान व बोलने में मिठास, यही व्यक्तित्व के प्रमुख हथियार हैं। इनका सही उपयोग करोगे तो व्यक्तित्व वजनदार बनेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय-नं-६८-पेज-१.१४

रविवार, 9 अगस्त 2020

👉 खरे खोटे की कसौटी

जिनकी दृष्टि से विराट् ब्रह्म की उपासना का वास्तविक स्वरूप विश्व-मानव की सेवा के रूप में आ गया हों वे हमारी कसौटी पर खरे उतरेंगे। जिनके मन में अपनी शक्ति सामर्थ्य का एक अंश पीड़ित मानवता को ऊँचा उठाने के लिये लगाने की भावना उठने लगी हो उन्हीं के बारे में ऐसा सोचा जा सकता है कि मानवीय श्रेष्ठता की एक किरण उनके भीतर जगमगाई है। ऐसे ही प्रकाश पुँज व्यक्ति संसार के देवताओं में गिने जाने योग्य होते हैं। उन्हीं के व्यक्तित्व का प्रकाश मानव-जाति के लिये मार्ग-दर्शक बनता हैं। उन्हीं का नाम इतिहास के पृष्ठों पर अजर अमर बना हुआ हैं। प्रतिनिधियों के चुनाव में हम अपने परिवार में से इन्हीं विशेषताओं से युक्त आत्माओं की खोज कर रहे हैं। हमारे गुरुदेव ने हमें इसी कसौटी पर कसा और जब यह विश्वास कर लिया कि प्राप्त हुई आध्यात्मिक उपलब्धियों का उपयोग यह व्यक्ति लोक कल्याण में ही करेगा तब उन्होंने अपनी अजस्र ममता हमारे ऊपर उड़ेली और अपनी गाढ़ी कमाई का एक अंश प्रदान किया। वैसा ही पात्रत्व का अंश उन लोगों में होना चाहिए जो हमारे उत्तराधिकारी का भार ग्रहण करें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी १९६५

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

👉 मनुष्य जाति को बचाना है

इन दिनों जन-मानस पर छाई हुई दुर्बुद्धि जीवन के हर क्षेत्र को बुरी तरह संकटापन्न बना रही है। स्वास्थ्य, सन्तुलन, परिवार, अर्थ-उपयोग, पारस्परिक सद्भाव, समाज, राष्ट्र, धर्म, अध्यात्म जैसे किसी भी क्षेत्र को उसने विकृतिग्रस्त बनाने से अछूता छोड़ा नहीं है। फलतः बाहर ठाठ-बाट बढ़ जाने पर भी सर्वत्र खोखलापन और अधःपतन ही दृष्टिगोचर हो रहा है। विश्व की विभिन्न समस्याओं की जड़ में यह विकृत बुद्धि ही काम कर रही है। हमें अपने युग के इसी असुर से लोहा लेना है। यह अदृश्य दानव भूतकाल के रावण, कंस, हिरण्यकश्यप, वृत्रासुर, महिषासुर आदि सभी से बढ़ा-चढ़ा है। उनने थोड़े से क्षेत्र को ही प्रभावित किया था, इसने मनुष्य जाति के अधिकाँश सदस्यों को जकड़ लिया है। बात भलमनसाहत की भी खूब चलती है, पर भीतर ही भीतर जो पकता है उसकी दुर्गन्ध से नाक सड़ने लगती है।

यदि मनुष्य जाति के भविष्य को बचाना है तो अवाँछनीयता, अनैतिकता, मूढ़ता और दुष्टता से पग-पग पर लोहा लेना पड़ेगा। ज्ञान-यज्ञ का, विचार क्रान्ति अभियान का, युग-निर्माण योजना का, युगान्तर चेतना का अवतरण इसी प्रयोजन के लिए हुआ है। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण प्रत्यक्ष देखने के लिए हमारे प्रयास चल रहें हैं। यह सार्वभौम और सर्वजनीन प्रयास है। उथली राजनीति वर्गगत, फलगत, क्षुद्र प्रयोजनों से हमारा दूर का भी नाता नहीं है। हमें दूरगामी और मानवी चेतना को परिष्कृत करने वाली सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को बोना, उगाना और परिपुष्ट करना है। इसके लिए अनेकों प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं सुधारात्मक कार्य करने के लिए पड़े हैं। जो हो रहा है उससे अनेकों गुनी सामर्थ्य, साहस और साधन समेट कर आगे बढ़ चलने की आवश्यकता है और यह प्रयास हमीं अग्रदूतों को आगे बढ़कर अपने कन्धों पर उठाना चाहिए।

यह कार्य तभी सम्भव है जब हममें से प्रत्येक अपनी अन्यमनस्कता एवं उपेक्षा पर लज्जित हो और अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करने का साहस समेटे। समय दिये बिना-आर्थिक अंशदान के लिए उत्साह सँजोये बिना यह कार्य और किसी तरह हो ही नहीं सकता। धर्म-मंच से लोक-शिक्षण प्रक्रिया के अन्तर्गत बीस सूत्री कार्यक्रम बताये जाते रहे हैं। अन्य सामयिक कार्यक्रमों के लिए पाक्षिक युग-निर्माण योजना में निर्देश एवं समाचार छपते रहते हैं। स्थानीय आवश्यकता एवं अपनी परिस्थिति को देखकर इनमें से कितने ही कार्य हाथ में लिये जा सकते हैं। यह पूछना व्यर्थ है कि आदेश दिया जाय कि हम क्या करें?

अपने घर से आरम्भ करके सार सम्पर्क क्षेत्रों में ज्ञान-घटों की स्थापना और उनका सुसंचालन, झोला पुस्तकालय, चल पुस्तकालय, जन्म-दिन, पर्व संस्कारों के आयोजन, तीर्थयात्रा, शाखा का वार्षिकोत्सव, महिला शाखा की स्थापना जैसे कितने ही कार्य ऐसे हैं जिन्हें आलस्य छोड़ने और थोड़ा उत्साह जुटा लेने से ही तत्काल आरम्भ किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त प्रौढ़ पाठशालाएँ, व्यायामशालाएँ, वृक्षारोपण, पुस्तकालय स्थापना जैसे अनेकों रचनात्मक और दहेज, मृत्युभोज, नशा, जाति और लिंग भेद के नाम पर चलने वाली असमानता, भिक्षा व्यवसाय, आर्थिक भ्रष्टाचार, अनाचार, प्रतिरोध जैसे अनेकों सुधारात्मक काम करने के लिए पड़े हैं। जिन्हें कभी भी कोई भी आरम्भ कर सकता है और अपने साथी जुटा कर इन्हें सफल अभियान का रूप दे सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर १९७६

सोमवार, 27 जुलाई 2020

👉 अपना परिवार

अपने परिवार में बुद्धिमानों की, भावनाशीलों की, प्रतिभावानों की, साधना सम्पन्नों की कमी नहीं। पर देखते हैं कि उत्कृष्टता को व्यवहार में उतारने के लिए जिस साहस की आवश्यकता है उसे वे जुटा नहीं पाते। सोचते बहुत हैं, पर करने का समय आता है तो बगलें झाँकने लगते हैं। यदि ऐसा न होता तो अब तक अपने ही परिवार में से इतनी प्रतिभाएँ निकल पड़तीं जो कम से कम भारत भूमि को नर-रत्नों की खदान होने का श्रेय पुनः दिला देतीं। व्यस्तता, अभावग्रस्तता, उलझन, अड़चन आदि के बहाने उपहासास्पद हैं। वे उन्हीं कार्यों के लिए प्रयुक्त होते हैं जिन्हें निरर्थक समझा जाता है। जो महत्वपूर्ण समझा जाता है उसे सदा प्रमुखता मिलती है और समय, साधन, मनोयोग आदि जो कुछ पास है सब उसी में लग जाता है।

यदि युग पुकार को-जीवनोद्देश्य को महत्व दिया गया होता तो किसी को भी वैसी बहाने-बाजी न करनी पड़ती जैसी कि असमर्थता सिद्ध करने के लिए आमतौर से कही या गढ़ी जाती है। इससे आत्म-प्रवंचना के अतिरिक्त और कुछ बनता नहीं। जिन्हें कुछ करने की उत्कट अभिलाषा होती है वे उसके लिए कठिनतम परिस्थितियों के बीच रहते हुए भी इतना कुछ कर सकते हैं जितना साधन सम्पन्नों से भी नहीं बन पड़ता।

दो-पाँच मालाएँ उलटी-पुलटी घुमाकर-समस्त संकट दूर होने से लेकर प्रचुर धन सम्पदा मिलने तक की ऋद्धि-सिद्धियों में कमी पड़ने की शिकायतें तो आये दिन सुनने को मिलती हैं, पर यह बताने कोई नहीं आता कि उपासना बीज को खाद, पानी देने वाली जीवन-साधना में कोई रुचि है या नहीं। साधना के अविच्छिन्न अंग स्वाध्याय, संयम और सेवा की ओर भी ध्यान दिया गया है या नहीं। शिष्य होने का दावा करते और जिह्वाग्र भाग से गुरुदेव कहते तो कितने ही सुने जाते हैं, पर अपने परिवार में प्रवेश करने की पहली और अनिवार्य शर्त न्यूनतम एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य ज्ञान-यज्ञ के लिए निकालते रहने को कितने लोग पालन करते हैं, यह जाँचने पर भारी निराशा होती है। लगता है कर्मनिष्ठा का युग लद गया और वाचालता ने उसका स्थान हथिया लिया है।

परिजनों ने यदि स्वार्थ परमार्थ का समन्वय किया होता तो निश्चय ही वे व्यक्तिगत लोभ, मोह के लिए जितनी भाग दौड़ करते और चिन्तित रहते हैं उतना ही उत्साह लोक-निर्माण के क्रिया-कलापों में भी प्रस्तुत करते। ढेरों समय आवारागर्दी और आलस्य में गुजर जाता है, उतना यदि नव-निर्माण प्रयोजनों में लग सका होता तो जीवन का स्वरूप ही दूसरा होता। विलासिता, फिजूलखर्ची और जमाखोरी में लगने वाले पैसे का उपयोग यदि रचनात्मक प्रवृत्तियों के परिपोषण में लग सका होता तो अपना छोटा-सा परिवार ही राष्ट्र की महती समस्याओं को सुलझा सकने के उपयुक्त साधन अपने घर से अपने ही हाथों जुटा सकते थे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर १९७६

रविवार, 26 जुलाई 2020

👉 परिजनों से हमारी अपेक्षा

युग-परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर कुछ महत्वपूर्ण व्यक्ति अग्रिम भूमिका निभाते हैं, पर उनके पीछे एक दिव्य समुदाय पहले से ही किसी अदृश्य सूत्र शृंखला में बँधा आता है और उसी के समन्वित प्रयासों से महत्वपूर्ण परिवर्तन प्रस्तुत होते हैं। राम के साथ रीछ, वानरों की भूमिका रही। कृष्ण के गोवर्धन उठाने में गोप-बालकों का और महाभारत में पाण्डवों का योगदान रहा। बुद्ध की भिक्षु मण्डली में लाखों नर-नारी थे। गाँधी के सत्याग्रहियों की सेना का परिचय सभी को है। समय की महत्वपूर्ण भूमिका पूरी करने के लिए ऐसी ही सामूहिक शक्तियाँ अवतरित होती हैं, भले ही उसके नेतृत्व का श्रेय किसी को भी मिले।

अपना विशिष्ट समय है। इन्हीं क्षणों मानव जाति के भविष्य का भला या बुरा फैसला होने जा रहा है। या तो मनुष्य जाति को युद्ध विभीषिका, बढ़ती जनसंख्या एवं निकट स्तर की आपाधापी में उलझ कर सामूहिक आत्महत्या करनी पड़ेगी या फिर लोक-एकता, समता, ममता, शुचिता जैसे उच्च आदर्शों को अपनाकर मनुष्य में देवत्व के अवतरण और धरती पर स्वर्ग के वातावरण का आनन्द लेंगे। इन निर्णायक घड़ियों में विशिष्ट आत्माओं को विशिष्ट परिश्रम करना पड़ेगा- विशेष कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्व निभाना होगा। इतने बड़े कार्य अनायास ही नहीं हो जाते। उसके लिए जन-मानस का प्रखर मार्ग-दर्शन करने के लिए जागृत आत्माओं को वाणी से नहीं अपने अनुकरणीय आचरण प्रस्तुत करने होते हैं। अखण्ड-ज्योति परिजनों से ऐसी ही अपेक्षा की जा सकती है। उन्हें युग-परिवर्तन की इस विशिष्ट वेला में अपनी जीवन नीति इस प्रकार प्रस्तुत करनी चाहिए जो जनसामान्य के लिए अनुकरणीय बन सके।

हम बारीकी से इस सन्दर्भ में तीखी दृष्टि परिजनों पर डालते रहते हैं। कथनी नहीं करनी से ही किसी का मूल्याँकन होता है। इस दृष्टि से अपने परिजन हमारी अपेक्षा, आकाँक्षा के अनुरूप वजनदार नहीं बैठते तो वह हलकापन हमें अखरता है। पेट और प्रजनन में तो नर-कीटक भी लगे रहते हैं। लोभ और मोहग्रसित आपा-धापी में नर-पशुओं को भी प्रवृत्त देखा जा सकता है। वासना, तृष्णा से प्रेरित नर-वानरों के क्रीड़ा-कौतुक तो पिछड़े क्षेत्रों में भी देखे जा सकते हैं। हम भी उसी स्तर की इच्छा और क्रिया अपनायें रहें तो फिर विशिष्ट समय में विशेष उत्तरदायित्व निभाने के लिए भेजी गई विशेष-आत्माओं का अवतरण ही निरर्थक हो गया। यह कैसी कष्टकर स्थिति है।

परिजनों से हमारी अपेक्षा रही है कि वे वित्तेषणा, पुत्रेषणा, लोकेषणा के दल-दल से अपने को निकालें। सुविस्तृत परिवार पर जब इस दृष्टि से नजर डालते हैं तो सन्तोष स्वल्प और असन्तोष बड़े परिमाण में सामने आ खड़ा होता है। दूसरों की दृष्टि में युग-निर्माण परिवार के सदस्य नव-निर्माण की मूक साधना में अत्यन्त निष्ठापूर्वक संलग्न रहकर मानवी आदर्शों का अभिवर्धन करने वाले, रचनात्मक कार्यों में कीर्तिमान स्थापित करते हुए कहे जाते हैं। किसी हद तक यह मूल्याँकन सही भी है। पर इतने से हमें तो सन्तोष नहीं होता। हमें अधिक चाहिए। परिजनों की जीवन विद्या प्रकाशपूर्ण, अनुकरणीय और प्रेरणाप्रद बन सके, यही अपनी अपेक्षा है। इससे कम में युग की पुकार को पूरा कर सकने वाले प्रयास बन ही नहीं पड़ेंगे। ज्यों-ज्यों कुछ आधा-अधूरा, काना-कुबड़ा चलता भी रहा तो उतने से कितनी देर में-क्या कुछ बन पड़ेगा?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर १९७६

शनिवार, 25 जुलाई 2020

👉 साँचे बनें, सम्पर्क करें

क्रान्तियों में आँधी जैसा वेग चाहिये। अक्सर उखाड़ फेंकने वाले आन्दोलनों को ही क्रान्ति कहा जाता है। पर जिसका लक्ष्य सृजन हो, उत्पादन हो, अभिवर्धन हो, काया-कल्प जैसा परिवर्तन हो वह देवत्व की पक्षधर क्रान्ति तो और भी कठिन होती है। एक मशाल लेकर समूचे  गाँव को एक घंटे में जलाया जा सकता है, फिर उस गाँव में लगे क्षेत्र में सिंचाई का प्रबन्ध करके हरीतिमा की मखमली चादर बिछाना कितना श्रम साध्य और समय साध्य होता है, इसे सभी जानते हैं। अग्निकाण्ड के लिये एक पागल का उद्धत आचरण भी पर्याप्त है, पर लह-लहाती फसल उगाने या भव्य भवन बनाने के लिये तो कुशल कारीगरों की सुविकसित योग्यता और अगाध श्रम निष्ठा चाहिये।

प्रज्ञा परिवार सृजन का संकल्प लेकर चला है। उसके सदस्यों सैनिकों का स्तर ऊंचा चाहिये। ऐसा ऊंचा इतना अनुशासित कि उसके कर्तृत्व को देखकर अनेकों की चेतना जाग पड़े और पीछे चलने वालों की कमी न रहे। बढ़िया साँचों में ही बढ़िया आभूषण पुर्जे या खिलौने ढलते हैं। यदि साँचे ही आड़े-तिरछे हों तो उनके संपर्क क्षेत्र में आने वाले भी वैसे ही घटिया- वैसे ही फूहड़ होंगे। इसी प्रयास को सम्पन्न करने के लिये कहा गया है। इसी को उच्चस्तरीय आत्म परिष्कार कहा गया है। यही महाभारत जीतना है। जन-नेतृत्व करने वालों को आग पर भी, कसौटी पर भी खरा उतरना चाहिये। लोभ, मोह और अहंकार पर जितना अंकुश लगाया जा सके लगाना चाहिये। तभी वर्तमान प्रज्ञा परिजनों से यह आशा की जा सकेगी कि वे अपनी प्रतिभा से अपने क्षेत्र को आलोकित कर सकेंगे और सृजन का वातावरण बना सकेंगे।

दूसरा कार्य यह है कि नवयुग के सन्देश को और भी व्यापक बनाया जाय। इसके लिये जन-जन से संपर्क साधा जाय। घर-घर अलख जगाया जाय। मिशन की पृष्ठभूमि से अपने समूचे संपर्क क्षेत्र को अवगत कराया जाय। पढ़ाकर भी और सुनाकर भी। इन अवगत होने वालों में से जो भी उत्साहित होते दिखाई पड़े उन्हें कुछ छोटे-छोटे काम सौंपे जांय। भले ही वे जन्म मनाने जैसे अति सुगम और अति साधारण ही क्यों न हों। पर उनमें कुछ श्रम करना पड़ता, कुछ सोचना और कुछ कहना पड़ता है। तभी वह व्यवस्था जुटती है। ऐसे छोटे आयोजन सम्पन्न कर लेने पर मनुष्य की झिझक छूटती है, हिम्मत बढ़ती और वह क्षमता उदय होती है, जिसके माध्यम से नव सृजन प्रयोजन के लिये जिन बड़े-बड़े कार्यों की आवश्यकता है, उन्हें पूरा किया जा सके। जो कार्य अगले दिनों करने हैं, वे पुल खड़े करने, बाँध बाँधने, बिजली घर तैयार करने जैसे विशालकाय होंगे। इसके लिये इंजीनियर नहीं होंगे, और न ऊंचे वेतन पर उनकी क्षमता को खरीदा जा सकेगा। वे अपने ही रीछ वानरों में से होंगे। समुद्र पर पुल बाँधने जैसे कार्य में नल-नील जैसे प्रतिभावान भावनाशील ही चाहिये। इसके लिए बुद्ध, गाँधी, विनोबा जैसा चरित्र भी चाहिये और प्रयास भी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त १९८५

सोमवार, 6 जुलाई 2020

👉 गुरु पूर्णिमा-’युग निर्माण योजना’ का अवतरण पर्व (अंतिम भाग)

एक घंटा समय किस कार्य में लगाया जाय? इसका उत्तर यही है- ‘जन जागृति में’-विचार क्रान्ति का अलख जगाने में। बौद्धिक कुण्ठा ही राष्ट्रीय अवसाद का एकमात्र कारण है। भावनाएं जग पड़े तो सब ओर जागृति ही जागृति होगी। सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश दृष्टिगोचर होगा। अन्तःकरण न जगे तो बाहरी हलचलें कुछ ही दिन चमक कर बुझ जाती हैं। जो भीतर से प्रकाशवान है वह आँधी तूफान में भी ज्योतिर्मय बना रहता है, इसलिये हमें दीपक से दीपक जलाने की धर्म परम्परा प्रचलित करने के लिये अपने समय दान का सदुपयोग करना चाहिये। अपने मित्रों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों, परिचित-अपरिचितों के नामों में से छाँटकर एक लिस्ट ऐसे लोगों की बनानी चाहिये जिनमें विचारशीलता एवं सद्भावना के बीजाँकुर पहले से ही किसी अंश में मौजूद हैं। उन लोगों से संपर्क बनाकर उन तक नव निर्माण की प्रौढ़ विचारधारा पहुँचाने का प्रयत्न करना चाहिये। इस अभिनव ज्ञान दान द्वारा हम उन स्वजनों की सच्ची सेवा करते हैं। भाव जागृति द्वारा किसी व्यक्ति में उत्कृष्टता उत्पन्न कर देना ऐसा परोपकार है जिससे बढ़कर और कुछ अनुदान दिया ही नहीं जा सकता। राष्ट्र की तीन आवश्यकताएं नैतिक, क्रान्ति, बौद्धिक क्रान्ति एवं सामाजिक क्रान्ति का सूत्रपात यहीं से होता है। भाव जागृति के बिना मानव जाति की कुण्ठाओं और विकृतियों को और किसी प्रकार दूर नहीं किया जा सकता।

लिस्ट में अंकित व्यक्ति प्रथम बार में भी कम से कम दस तो होने ही चाहिये। उनके पास जाने एवं संपर्क बनाने की पहल अपने को ही करनी चाहिये। मीटिंग में जिन्हें बुलाया जाता है, उन आने वालों का अपने ऊपर अहसान होता है और जिनके घर हम स्वयं जाते हैं वे हमारी सद्भावना से प्रभावित होते हैं। इस मनोवैज्ञानिक तथ्य को हमें समझ ही लेना चाहिये। इसलिये जिन्हें प्रेरणा देनी हो, उनके पास स्वयं जाने का क्रम बनाना ही होगा। मीटिंग में इकट्ठे करने से यह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता। धर्म फेरी का पुण्य हमें ही लेना चाहिये। जन-जागरण के लिए लोगों से संपर्क बनाने एवं उनके घरों पर जाने का क्रम हमें ही बनाना चाहिये।

जिनके घर जाया जाय उनसे कुशल क्षेम पूछने के साधारण शिष्टाचार के उपरान्त अभीष्ट उद्देश्य के लिये आवश्यक प्रेरणा देनी आरंभ कर देनी चाहिये। जो पढ़े-लिखे हैं उन्हें अपनी अखण्ड-ज्योति व युग निर्माण योजना के पिछले अंक पढ़ने को देना चाहिये। जो पढ़े नहीं हैं उन्हें प्रेरणाप्रद लेख, समाचार एवं प्रसंग सुनाने चाहिये। अवसर हो तो उन विषयों पर चर्चा भी आरंभ करनी चाहिये। पुरानी अखण्ड-ज्योति की प्रतियाँ युग निर्माण योजना के अंक सभी के पास होंगे, उनके ऊपर अच्छे मोटे कवर चढ़ा चिपका लेने चाहिये ताकि अनेक लोगों में पढ़े जाने पर वे खराब न हों। आदर्शवादी विचार आमतौर से रूखे और नीरस माने जाते हैं। उन्हें पढ़ना, सुनना बहुत कम लोग पसंद करते हैं। यह काम अपना है कि विषय की महानता एवं गरिमा को आकर्षक तथा प्रभावशाली ढंग से समझा कर लोगों में यह अभिरुचि उत्पन्न करें। व्यापक दृष्टिकोण को समझने और विचारने की आकांक्षा जब जागृत हो जाय तब समझना चाहिये कि यह व्यक्ति राष्ट्र के लिये कुछ उपयोगी सिद्ध हो सकने की स्थिति में पहुँचा। इतनी सफलता मिल जाने पर आगे की प्रगति बहुत सरल हो जाती है। जिसके मनोभाव सोये पड़े हैं उसमें विचारशीलता की अभिरुचि जागृत कर देना हमारे लिये भारी गौरव, गर्व एवं संतोष की बात होगी।

गुरु पूर्णिमा पर्व पर (जो रविवार 5 जुलाई सन् 2020 को पड़ेगा) गुरु दक्षिणा में देने के लिए इस वर्ष हमें एक घंटा समय और एक रुपया प्रतिदिन दान करने का व्रत लेना चाहिए। एक रुपया प्रतिदिन देने से एक महीने में 30 होता है। वर्ष भर में 365 रुपये होते है। 220 की अखण्ड-ज्योति 110 की युग-निर्माण योजना आती है। यह खर्च भी हमें नव-निर्माण के लिए करना ही चाहिए। यह पैसे बाहर किसी को देने नहीं हैं। वरन् इन्हें अत्यन्त सस्ते लागत से भी कम मूल्य में मिलने वाले सत्साहित्य के रूप में परिणित कर लेना है। यह अमानत अपने ही पास जमा रहती है। भण्डार बढ़ता रहेगा और उसका लाभ अब से लेकर आगामी पचास सौ वर्ष तक अनेक लोग उठाते रहेंगे। विवेक सम्पन्न दान का यह सर्वश्रेष्ठ तरीका है। छोटे बच्चे भी आमतौर से स्कूल जाते समय एक आना जेब खर्च ले जाते हैं। समझना चाहिए कि युग-निर्माण अभियान भी हमारा एक बच्चा है। चाहे तो ऐसा भी मान सकते हैं कि आचार्य जी हमारे एक बच्चे हैं और उन्हें एक आना प्रतिदिन जेब खर्च के लिए दिया जाता है। मन को समझाने के हजार प्रकार हो सकते हैं। भावना यदि विद्यमान हो तो इतना खर्च कर सकना गरीब से गरीब के लिए भी भारी नहीं पड़ता। एक आने का अनाज तो हर घर में चूहे, कीड़े भी खा जाते हैं। इतना तो सभी को सहन करना पड़ता है। भावना जाग पड़े तो इतना छोटा खर्च भी क्या किसी को भारी पड़ेगा।

अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रबुद्ध सदस्यों को इस गुरु पूर्णिमा से यह व्रत लेना चाहिये। एक घण्टा समय, एक आना नकद, यह त्याग कुछ इतना बड़ा नहीं है, जिसे लक्ष्य की महानता को देखते हुए, कर सकना हमारे लिए कठिन होना चाहिये। नियमितता में बड़ी शक्ति होती है। महीने में 30 घण्टे यदि जन संपर्क के लिए सुरक्षित रख लिये जायें और प्रतिदिन या साप्ताहिक अवकाश के दिन उन्हें ठीक तरह प्रचार कार्य में लगाया जाय तो इसका चमत्कारी परिणाम कितना महान होता है इसे कोई भी प्रत्यक्ष देख सकता है। दान अनेक प्रकार करने पड़ते हैं पर यह प्रेरक साहित्य संग्रह करने के लिए किया गया साहस विश्व मानव का भाग्य बदलने के लिए कितना उपयोगी सिद्ध होता है इसे कुछ ही दिनों में मूर्तिमान देखा जा सकेगा।

आगे हमें बहुत कुछ करना है। अनैतिकता, मूढ़ता, अन्ध परम्परा, अस्वस्थता, अशिक्षा, दरिद्रता, अकर्मण्यता आदि अगणित विकृतियों से डटकर लोहा लेना है। हमारा देश किसी समय सर्वश्रेष्ठ मानवों का निवास स्थान, समस्त संसार का मार्ग दर्शक, देवलोक के लिये भी स्पर्धा का विषय माना जाता था। पर इन्हीं कुरीतियों, हानिकारक अन्ध परम्पराओं के कारण आज वह निकृष्ट, दीन−हीन स्थिति को प्राप्त हो गया है। यदि हमको इस दुरावस्था से बाहर निकल फिर दुनिया के प्रगतिशील देशों की श्रेणी में अपनी गणना करानी है तो हमको अवश्य ही इन हीन प्रवृत्तियों से छुटकारा पाना चाहिये। उसके लिए अगले दिनों व्यापक योजनाएं बनाई जानी हैं और उन्हें कार्य रूप में परिणित किया जाना है। पर इसके लिए आवश्यक जन-शक्ति तो अपने पास होनी चाहिए। इस आवश्यकता की पूर्ति हमारी यह प्रथम प्रक्रिया ही पूर्ण करेगी। एक घण्टा समय, एक आना नकद की माँग को पूरा करने के लिए यदि हम साहस कर सकें तो इस अवसर पर बढ़ा हुआ शौर्य आगे की कठिन मंजिलों को भी पार कर सकने में समर्थ होगा। पर यदि इतना भी न बन पड़ा तो हमारी वाक्शूरता ऊसर में डाले गये बीज की तरह ही नपुंसक सिद्ध होगी।

अब समय कम ही रह गया है। इसलिए आज से ही विचारना आरम्भ कीजिए कि इस पुण्य पर्व के उपलक्ष में उपरोक्त प्रथम आवश्यकता की पूर्ति के लिये ‘एक घण्टा एक आना’ की माँग पूरी करेंगे क्या? यदि कर सके तो उसकी सूचना गुरुपूर्णिमा को श्रद्धाञ्जलि के रूप में समय से पूर्व ही भेज दें ताकि उस दिन उन्हें छाती से लगाकर अपार आनन्द प्राप्त किया जा सके।
आगामी गुरु पूर्णिमा हमारी परीक्षा लेने आ रही है। क्या करना है, क्या करेंगे, इसका निर्णय करने के लिये अभी से सोच विचार आरम्भ कर देना चाहिये।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1965 पृष्ठ 50, 51

शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

👉 हमारी वास्तविकता को परखने फिर आ पहुँचा (भाग २)

जो जितना प्रबुद्ध है उसकी उतनी ही अधिक जिम्मेदारी है। ईश्वर, आत्मा और समाज के सामने उनके उत्तरदायित्व बहुत कुछ बढ़े-चढ़े होते हैं। मूढ़ता और पशुता की स्थिति में पड़े हुए मनुष्यों की न कोई भर्त्सना है और न महिमा। वे जीते भर हैं। खाने और कमाने भर तक उनकी गतिविधियाँ सीमित रहती हैं। ऐसे लोग कुछ बड़ी बात सोच नहीं पाते, इसलिए कुछ बड़ा काम कर सकना भी उनके लिए संभव नहीं होता। संसार उनकी इस विवशता को जानता है इसलिए उन्हें कुछ श्रेय, दोष भी नहीं देता। पर जिन्हें भगवान ने विचारणा दी है, उनकी स्थिति भिन्न है। प्रबुद्ध लोग यदि अपने समय की समस्याओं की उपेक्षा करने लगें तो उनका अपराध अक्षम्य माना जायगा। फौजी अधिकारियों की छोटी-सी भूल राष्ट्रीय स्वाधीनता को खतरे में डाल सकती है। इसलिए उनसे अधिक सतर्कता एवं जिम्मेदारी की आशा की जाती है। यदि वह थोड़ा भी प्रमाद करता है तो उसे सहन नहीं किया जा सकता। सरकारी अन्य विभागों के कर्मचारी ढील-पोल बरतने पर चेतावनी या नगण्य-सा अर्थ दंड पाकर छुटकारा पा जाते हैं पर फौजी अफसर का तो ‘कोर्ट मार्शल’ ही होता है। उसे अपनी छोटी-सी लापरवाही के लिए मृत्यु दंड भुगतना पड़ता है।

सौभाग्य या दुर्भाग्य से ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सदस्यों को ऐसी ही उत्तरदायित्वपूर्ण परिस्थिति प्राप्त हुई हैं। भगवान ने उन्हें प्रबुद्धता की चेतना दी है। साथ ही कुछ जिम्मेदारी भी सौंपी है। उनके लिए लापरवाही बरतने का अवसर नहीं। बेशक सामाजिक नागरिकों की तरह हम लोगों को भी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ उठानी पड़ती हैं। यह अर्थ उपार्जन आदि का प्रबन्ध करना पड़ता है। पर इसका यह अर्थ किसी प्रकार भी नहीं होता कि नव-निर्माण के कार्यों में भाग लेने के लिए उसे तनिक भी अवकाश नहीं मिलता। इस बहानेबाजी को कोई स्वीकार नहीं कर सकता। संसार के प्रायः सभी महापुरुष गृहस्थ थे और उन्हें पारिवारिक व्यवस्था जुटाने का भी ध्यान रखना पड़ता था। पर उनमें से किसी ने यह बहाना नहीं बनाया कि राष्ट्रीय कर्तव्यों की पूर्ति के लिए हमारे पास तनिक भी अवकाश नहीं। इस प्रकार की झूठी धोखेबाजी से केवल अपनी अन्तरात्मा को झुठलाया जा सकता है और किसी को नहीं। जिसकी आत्मा में थोड़ी भी समाज निष्ठा एवं कर्तव्य-निष्ठा होगी वह बुरी से बुरी परिस्थितियों में रहते हुए भी विश्व मानव की किसी न किसी प्रकार सेवा कर ही सकेगा। जहाँ इच्छा हो वहाँ रास्ता निकलता ही है। जिस ओर सच्ची आन्तरिक श्रद्धा होगी उस ओर चलने का भी कुछ न कुछ प्रबन्ध बन जाना निश्चित है।

अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य उस कसौटी पर खोटे नहीं खरे उतरते रहे हैं। हम सभी गृहस्थ हैं और व्यस्तता के बीच भी अवकाश निकालकर इतना कुछ करते रहे हैं कि सारा राष्ट्र आश्चर्यचकित है। यदि फुरसत वाले साधु सन्त हम लोग होते तो शायद इतना भी न कर पाते जितना अब करते हैं। तब संभवतः संसार को माया मिथ्या बताकर आलस्य और अवसाद में पड़े रहने को ही मन करता। प्रश्न परिस्थितियों का नहीं भावना का है। युग के उत्तरदायित्वों के समझने की-अनुभव करने की— चेतना जिनके अन्तःकरण में जागृत हो चुकी है, उन्हें न समय का अभाव रहता है, न कठिनाइयों का रोना, रोना पड़ता है। आकाँक्षा अपना रास्ता बनाती है। यह तथ्य कितना सत्य है, इसका अनुभव हम सब इन दिनों भली प्रकार करते रहते हैं। वर्तमान काल की आर्थिक तंगी तथा पारिवारिक जीवन की उलझनों से जूझते हुए भी नव-निर्माण के लिए कितना अधिक कर लेते हैं। इस प्रयोग ने उन लोगों का मुँह बन्द ही कर दिया है जो सामयिक उत्तरदायित्वों के प्रति निष्ठावान न होने के कारण उत्पन्न हुई अकर्मण्यता को फुरसत न मिलने, अमुक कठिनाई रहने जैसे बहानों की चादर उठाने की उपहासास्पद चेष्टा करते रहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1965 पृष्ठ 47

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/June/v1.47

गुरुवार, 2 जुलाई 2020

👉 गुरु पूर्णिमा-’युग निर्माण योजना’ का अवतरण पर्व (भाग १)

हमारी वास्तविकता को परखने फिर आ पहुँचा

‘युग-निर्माण योजना’ की जन्म तिथि गुरु पूर्णिमा है। इसी दिन इस युग के इस महान अभियान का शुभारम्भ उस परम प्रेरक दिव्य शक्ति के द्वारा किया गया था। बसन्त पंचमी के दिन अखण्ड-ज्योति प्रारम्भ हुई और गुरु पूर्णिमा के दिन ‘युग-निर्माण योजना’। अपने परिवार के लिए ये दो कौटुम्बिक पर्व हैं। यों इनका व्यापक महत्व है। भारतीय संस्कृति की सुविस्तृत प्रक्रिया इन दो के ऊपर निर्भर है। ज्ञान और कर्म के यह दो पुनीत पर्व हैं। माता सरस्वती का जन्म दिन हमारा ज्ञान पर्व है और उस ज्ञान को कर्म रूप में परिणित करने की प्रेरणा देने वाले परम गुरु भगवान व्यास का जन्म दिन-गुरु पूर्णिमा-कर्म पर्व है। ज्ञान और कर्म का मानव जीवन में असाधारण महत्व है। प्रतीक रूप से वही महत्व इन दो पर्वों का भी है। यों हमारे सभी पर्व एक से एक बढ़कर हैं पर जहाँ तक अपने परिवार की गतिविधियों का संबंध है इन दो को हम विशेष महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि अपनी गतिविधियों की प्रेरणा इन दो से ही हम विशेष रूप से प्राप्त किया करते हैं।

सरकारी विकास-योजनाओं का अपना महत्व है। ‘युग-निर्माण योजना’ का संचालन भले ही छोटे समझे जाने वाले और अर्थ साधनों से विहीन लोगों द्वारा किया जा रहा हो, पर उसका भी अपना महत्व है। भौतिक समृद्धि की अपेक्षा मानवीय उत्कृष्टता कहीं अधिक मूल्यवान है। उसकी अभिवृद्धि अगणित समृद्धियों को जन्म देती है। इसलिए जब कभी कार्य पद्धतियों का विश्लेषण एवं मूल्याँकन किया जायगा, युग-निर्माण योजना को अपने समय की एक अनुपम घटना ठहराया जायगा। इतनी विशालकाय संभावनाओं से परिपूर्ण प्रक्रिया को आरम्भ कर सकने के साहस का श्रेय अखण्ड-ज्योति परिवार को मिलता है। उसका हर सदस्य गर्वोन्नत मस्तक से यह कह सकेगा कि अपने युग की चुनौती और जिम्मेदारी को उसने समझा और स्वीकार किया। राष्ट्र की पुकार का समुचित प्रत्युत्तर देने का आत्म संतोष उसे मिलता ही है। देश, धर्म, समाज और संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए जो अनुपम प्रयत्न किया गया है, उस महान यज्ञ का होता— अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य—अपनी जीवन साधना को सार्थक समझे तो यह उचित ही होगा। भले ही छोटे दिखाई पड़ें पर हमारे प्रयत्न निस्संदेह महान हैं।

पिछले हजार वर्ष तक राष्ट्र को अज्ञानांधकार में भटकना पड़ा है। उन दिनों हमने बहुत कुछ खोया है। अनेकों दोष दुर्गुण उन्हीं दिनों हमारे पीछे लग गये हैं। अब समय आ गया है कि उनका प्रतिकार और परिष्कार करें। दुर्बलताओं को भगावें और समर्थ प्रबुद्ध व्यक्तियों जैसी गतिविधियाँ अपनावें। भारतीय राष्ट्र को यही गतिविधियाँ अपनानी पड़ेंगी। इसके बिना उसे न तो वर्तमान विपन्नताओं से त्राण मिलेगा और न उज्ज्वल भविष्य की ज्योतिर्मय आभा ही दृष्टिगोचर होगी। जीवन-मरण की समस्या सामने हैं। यदि हम पुनरुत्थान के लिए, नव-निर्माण के लिए प्रयत्न नहीं करते तो प्रगति के पथ पर बढ़ रहे संसार की घुड़दौड़ में इतने पिछड़ जायेंगे कि दूसरों के समकक्ष पहुँच सकना कभी भी संभव न रहेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1965 पृष्ठ 47

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/June/v1.47

बुधवार, 10 जून 2020

👉 विचारक्रान्ति की आवश्यकता एवं उसका स्वरूप

आज की सुविधा, संपन्नता की प्राचीनकाल से तुलना की जाए और मनुष्य के सुख-संतोष को भी दृष्टिगत रखा जाए तो पिछले जमाने की असुविधा भरी परिस्थितियों में रहने वाले व्यक्ति अधिक सुखी और संतुष्ट जान पड़ॆंगे। इन पंक्तियों में भौतिक प्रगति तथा साधन-सुविधाओं की अभिवृद्धि को व्यर्थ नहीं बताया जा रहा है, न उनकी निन्दा की जा रही है। कहने का आशय इतना भर है कि परिस्थितियाँ कितनी भी अच्छी और अनुकूल क्यों न हों, यदि मनुष्य के आन्तरिक स्तर में कोई भी सुधार नहीं हुआ है तो सुख-शांति किसी भी उपाय से प्राप्त नहीं की जा सकती है।

सर्वतोमुखी पतन और पराभव के इस संकट का निराकरण करने के लिए एक ही उपाय कारगर हो सकता है। वह है – व्यक्ति और समाज का भावनात्मक परिष्कार। भावना स्तर में अवांछनीयताओं के घुस पड़ने से ही तमाम समस्याएं उत्पन्न हुई हैं, इन समस्याओं का यदि समाधान करना है तो सुधार की प्रक्रिया भी वहीं से प्रारम्भ करनी पड़ेगी, जहाँ से ये विभीषिकाएं उत्पन्न हुई हैं। अमुक-अमुक समाधान-सामयिक उपचार तो हो सकता है, पर चिरस्थाई समाधान के लिए आधार को ही ठीक करना पड़ता है।

अधर्म का आचरण करने वाले असंयमी, पापी, स्वार्थी, कपटी, धूर्त और दुराचारी लोग शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य एवं धन-संपत्ति, यश-वैभव आदि सब कुछ खो बैठते हैं। उन्हें बाह्य जगत में घृणा और तिरस्कार तथा अंतरात्मा में धिक्कार ही उपलब्ध होते हैं। ऐसे लोग भले ही उपभोग के कुछ साधन इकट्ठे कर लें, पर अनीति का मार्ग अपनाने के कारण उनका रोम-रोम अशांत तथा आत्म-प्रताड़ना की आग में झुलसता रहता है। चारों ओर घृणा, तिरस्कार एवं असहयोग ही मिलता है। आतंक के बल पर यदि वे कुछ पा भी लेते हैं तो उपभोग के पश्चात् उनके लिए विषतुल्य-दुखदायक ही सिद्ध होता है। आत्मशान्ति पाने,  सुसंयमित जीवन व्यतीत करने वाले मनुष्य को धर्ममय जीवनक्रम अपनाने के लिए तत्पर होना पड़ता है। नैतिकता, मानवता एवं कर्तव्यपरायणता को ही अपने जीवन में समाविष्ट करना होता है। इस प्रवृत्ति का व्यापक प्रसार करने के लिए किए गए प्रयत्नों को नैतिक क्रान्ति की संज्ञा दी जाती है। बुद्ध धर्म के प्रथम मंत्र 'धम्मं शरणं गच्छामि' में इसी नैतिक क्रान्ति की चिनगारी निहित है, इस मंत्र को लोकव्यापी बनाने के लिए जो प्रयत्न बौद्ध धर्मावलम्बियों ने किया था, उसे विशुद्ध नैतिक क्रान्ति ही कहा जएगा।

आज की परिस्थितियां लगभग बुद्धकाल जैसी ही हैं। अनीति, अनाचार, अविवेक आदि दुर्गुण व्यापक जन-मानस में जड़ जमाए बैठे हैं। ऐसी ही विषम बेला में महाकाल की प्रेरणा जाग्रत आत्माओं को झकझोरती है, विशिष्ट आत्माएं ऐसी ही विपन्न परिस्थितियों में अवतरित होकर, लोकव्यापी संगठन खड़ा कर समाधान करने में जुट पड़ती देखी जाती हैं। महाकाल की प्रबल प्रेरणा से जागृत आत्माओं को नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति में संलग्न देखा और समझा जा सकता है। दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन की गति विधियाँ दृष्टिगोचर होने लगती हैं। समझ लेना चाहिए कि नैतिक क्रान्ति का चक्र तेजी से गतिशील हो गया है और युग परिवर्तन सन्निकट ही है। जनमानस में संव्याप्त निकृष्ट चिन्तन एवं भ्रष्ट आचरण का अब अंत ही समझना चाहिए। मानवी पुरुषार्थ जब संतुलन बनाए रहने में असफल होता है तो व्यवस्था को भगवान स्वयं संभालते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 2 जून 2020

👉 Yug Parivartan युग परिवर्तन की पृष्ठभूमि और रूपरेखा

आज की परिस्थितियों में सभी परिवर्तन चाहते हैं। अभावों के स्थान पर संपन्नता, अनिश्चितता के स्थान पर स्थिरता, आशांकाओं के स्थान पर आश्वासन अभीष्ट है। द्वेष का स्थान श्रद्धा को मिले – अविश्वास की जड़ ही कट जाय । ऐसी मुखर परिस्थितियों की कल्पना करने भर से आँखें चमकने लगती हैं।

सुविधा-साधन की दृष्टि से हम पूर्वजों की तुलना में कहीं आगे हैं। विज्ञान और बुद्धिवाद की संयुक्त प्रगति ने अनेकानेक साधन ऐसे प्रस्तुत किए हैं, जिनकी सहायता से अधिक सुखी जीवन जी सकते हैं। पूर्वजों की शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, संचार, यातायात,  बिजली, तार, डाक, जहाज आदि अनेकों ऐसे सुविधा-साधन उपलब्ध नहीं थे, जैसे आज हैं। इन उपलब्धियों के आधार पर हमें अधिक सुखी होना चाहिए था, पर देखते है‌ कि स्थिति और भी गई गुजरी हो गई है। चिकित्सा और पौष्टिक खाद्यों की सुविधा वाले दिन-दिन और भी रुग्ण बनते जा रहे हैं। उच्च शिक्षित व्यक्ति भी संतुलन और विवेक से रहित चिंतन करते और विक्षुब्ध रहते देखे जाते हैं। गरीबों का उठाईगीरी करना समझ में आ सकता है, पर जो संपन्न हैं वे क्यों अन्याय-अपहरण की नीति अपनाते हैं, यह समझ सकना कठिन है।

शिष्टाचार और आडम्बर तो बढ़ा, पर आत्मीयता और शालीनता की जड़ें खोखली होती जा रही हैं। चिन्तन और चरित्र के अवमूल्यन ने व्यक्ति और समाज के सामने असंख्य समस्याएं उत्पन्न कर दी हैं। उपलब्ध क्षमताओं का एवं साधनों के एक बड़े भाग का, उपयोग करने तथा उससे बचने की योजना पर ही खर्च होता रहता है। रचनात्मक कार्यों में लग सकने वाले साधन समस्याओं के कारण उत्पन्न उद्विग्नता में ही खप जाते हैं, फिर भी कोई समाधान दीखता नहीं। एक उलझन सुलझने नहीं पाती कि दूसरी नई उठकर खड़ी हो जाती है।. . . आदमी अपनी ही दृष्टि में घिनौना बनता जा रहा है तो फिर दूसरों से श्रद्धा, सम्मान, सद्भाव एवं सहयोग की अपेक्षा कैसे की जाए?   
    
वर्तमान की अवांछनीयताओं से निपटने और भविष्य को उज्जवल बनाने के दोनो ही उद्देश्य विचार क्रान्ति अभियान से संभव होंगे। लाल मशाल ने इसी का प्रकाश फैलाने, वातावरण बनाने और भ्रान्तिओं की लंका को जलाने में हनुमान् की जलती पूँछ बनने का निश्चय किया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( भाग 2)

पुण्य परमार्थ की इस आवश्यकता को प्रायः सज्जन व्यक्ति अनुभव करते हैं। किन्तु उसको कार्यान्वित करने में प्रमाद बरतते हैं। इस प्रमाद का व्यवहार...