शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११३)


बिन इन्द्रिय जब अनुभूत होता है सत्य
    
इस सूत्र में उलट बासी तो है, थोड़ा अटपटा सा भी है। पर है एक दम खरा। पर जो समझे उसके लिए। यहाँ तक कि वैज्ञानिकों के लिए भी यह काफी दिनों तक एक गणितीय पहेली बना रहा। हालाँकि इन दिनों उन्होंने फोटान की भाषा सीख ली है और कम्प्यूटर नेटवर्क के जरिए वे उसका इस्तेमाल करने लगे हैं। फिर भी एक पहेली तो उनके सामने बची हुई है ही कि एक साथ सब कुछ एक समय में कैसे जाना जा सकता है। फोटान की भाषा सीखने के बाद उनकी मानसिक चेतना तो सीमित ही है। यदि उनसे आत्मविकास की साधना हो सके, तो शायद जान पाएंगे कि आध्यात्मिक अनुभव में आत्मचेतना के विस्तार में सब कु छ एक साथ एक समय में जान लिया जाता है।
    
योगियों को ऐसे अनुभव होते रहे हैं। स्वामी विवेकानंद जी महाराज के जीवन का एक आध्यात्मिक प्रसंग है, उन दिनों वे अल्मोड़ा में रहकर साधना कर रहे थे। निपट एकाकी वन में एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए थे। इन्द्रिय चेतना प्रत्याहार में विलीन हो गयी थी। निराकार सर्वव्यापी परम सत्ता क ी धारणा ध्यान की लय पा चुकी थी। यह ध्यान उत्तरोत्तर प्रगाढ़ होता हुआ कब समाधि के सोपान चढ़ने लगा यह काल को भी पता न चला। और उन्हें इसी मध्य एक अनुभव हुआ पिण्ड के ब्रह्माण्ड का। व्यक्ति चेतना में समष्टि चेतना का अनुभव और धीरे-धीरे यह अनुभव ब्रह्माण्ड बोध में बदल गया।
    
जब उच्चस्तरीय समाधि की भाव भूमि से दैहिक चेतना में लौटे तो उन्होंने अपने गुरूभाई स्वामी तुरीयानंद से इसकी चर्चा की। बोले-हरी भाई मैं जान लिया। मुझे हो गया अनुभव अस्तित्व व्यापी चैतन्यता का। इसी को तो योगेश्वर कृ ष्ण कहते है, कि क ोई इसे आश्चर्य से सुन कहता है और कोई इसे आश्चर्य से सुनता है और कोई विरला इस आश्चर्य को सम्पूर्ण रूप से जानता है। योगी के उल्लास में से ये सभी आश्चर्य एक साथ अंकुरित-पल्लवित होते है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

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