सोमवार, 10 सितंबर 2018

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 8)

👉 भौतिकवाद की उलटबाँसियाँ  
 
🔶 जब विष को अमृत की मान्यता मिल जाए और उसे प्राप्त करने के लिए हर किसी को लालायित पाया जाए, तब परिवर्तन अति कठिन पड़ता है। हानि को लाभ समझा जाने लगे और लाभ को गहराई तक समझने में कठिनाई पड़े, उसे हानि समझा जाने लगे तो उल्टी समझ को सीधी करना बहुत कठिन पड़ता है। प्राचीन काल में कम से कम मान्यताएँ तो सही थीं। उठते कदम राजमार्ग को अपनाते थे पर अब तो स्थिति ही कुछ दूसरी बन गई है। भटका हुआ अपने आपको सही मानता और सबको अपने साथ ले चलने का आग्रह करता है। तात्कालिक लाभ सब कुछ बन गया है।

🔷 उसका परिणाम कल या परसों क्या हो सकता है, यह सोचने की किसी को फुरसत नहीं। कुकर्म करने में भी समय, श्रम, साहस और पुरुषार्थ नियोजित करना पड़ता है। बिना हिम्मत के तो चोरी-डकैती करते भी नहीं बन पड़ता। खतरा तो व्यभिचार-अनाचार के लिए उद्यत होने वालों के सामने भी रहता है। उस अनाचार में लगे हुए व्यक्ति भी कम जोखिम नहीं उठाते, फिर भी न जाने क्यों मान्यता यह बन गई है कि सच्चाई का, अच्छाई का रास्ता अपनाने वाले घाटे में रहते हैं। फायदा सिर्फ अनाचारियों को होता है। इस मान्यता के पक्ष में उन्हें अपने इर्द-गिर्द ही ऐसे लोग मिल जाते हैं जो कुकर्म करके हाथों-हाथ नफा कमा लेते हैं।

🔶 इतने दूर तक सोचने की उन्हें आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती कि अनुचित रीति से उठाया हुआ लाभ किस प्रकार दुर्व्यसनों में फँसाता, अपयश का भारी वजन लादता और अन्त में ऐसे दुष्परिणाम उत्पन्न करता है जिससे न केवल अपनों को वरन् साथियों समेत समूचे समुदाय को पतन एवं पराभव के गर्त में गिरना पड़ता है। लगता है कि मृगतृष्णा में भटकने वाले, कस्तूरी की तलाश में दौड़ लगाते रहने वाले हिरन खीज, थकान, निराशा और असमंजस के कारण बेमौत मर रहे हैं।
      
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 10

👉 How to Stay Happy? (Part1)

🔶 Why is it that some people are happy while some others are not? - This question has been eluding even the psychologists of the modern day. According to a recent survey, it has been found that people of Finland are the happiest people in the world. Countries like Denmark, Iceland, Switzerland and Norway are among the Top-5, while India’s position is 133rd in the list of 155 countries. In this survey, every year about 1000 people from each country are asked a few questions and based on their responses, the results are declared on World Happiness Day (20th March).

🔷 Being happy is a state of mind. It is not necessary to be rich to be happy. Practically every survey ever done has shown that those who are happy stay in families. Such people get along very well with their friends and family. According to Daniel Gilbert, the Happiness Expert at Harvard University, we are happy when we are with our family. If we have friends, then it is even better. In some way or the other, everything that contributes to our happiness comes through either family or friends. The biggest factor for one’s happiness and fulfillment in life is, basically, love. A scientific study has shown that having someone to rely on helps a person’s nervous system relax, helps his brain stay healthier for a longer time, and reduces both emotional as well as physical pain.

🔶 A long-time researcher on this topic, George Vaillant says – ‘What influences life the most is the quality of our relationships with others’. It is these precious relationships that bind us together and hence influence our happiness to a large extent.
It is also evident that material prosperity has made man hollow from within. In fact, man spends his entire life earning money and realizes at the end that the desire for money is never-ending and the joys of life cannot be bought with money. So, to whatever extent possible, we should spend our time in lovingly strengthening our social life and thus making it prosperous.

To be continued...

👉 मन को उद्विग्न न कीजिए (भाग 1)

🔶 मानसिक सन्तुलित अवस्था मन की स्थिर बुद्धि सम्पन्न शान्तिमय स्थिति है, जिसमें विवेक पूर्णरूप से जाग्रत रहता है। जैसे तराजू के दोनों पलड़े समान रूप से भारी होने के कारण डण्डी को सन्तुलित रखते हैं, वैसे ही मन की पूर्ण सन्तुलित अवस्था में मानसिक उत्तेजना, वितर्क व्यर्थ की उथल−पुथल चिन्ता वासना आदि से मुक्त रहती है। इस अवस्था में मनुष्य अच्छी तरह विवेक को जाग्रत रख कर सोच विचार कर सकता है।

🔷 यह पूर्ण आनन्द की स्थिति है। इस अवस्था में मनुष्य अपने भले बुरे को अच्छी तरह समझता है। वह अपने शुभ संकल्पों का निर्माण करता है, कर्त्तव्य बुद्धि से उसे अपने भले बुरे का ज्ञान रहता है। उसका आत्म विश्वास बढ़ जाता है। स्थिरता एवं शान्ति के कारण उसकी मानसिक शक्ति में भी अभिवृद्धि होती है। व्यर्थ चिन्ताएँ नष्ट हो जाती हैं। मिथ्या दुःखों से मुक्ति प्राप्त होती है। हम अनुचित माया−मोह के विकारों से बचे रहते हैं।

🔶 पूर्ण सन्तुलित व्यक्ति मानसिक उद्वेगों से मुक्त रहता है। उद्वेग एक प्रकार का उफान है, मन में उठने वाला विद्रोह है। यह मन की असाधारण अशान्त स्थिति है। उद्वेग में मनुष्य का शरीर एक प्रकार की कम्पनों से परिपूर्ण हो उठता है और वह थरथराहट से भरा रहता है। उद्वेग में धैर्य नष्ट हो जाता है, क्रोध ऊँचा उठ आता है और व्यर्थ की शंकाएँ बुद्धि को भ्रष्ट कर देती हैं। भय, चिन्ता, ईर्ष्या, लोभ, वासना के ताण्डव विवेक को अपना कार्य नहीं करने देते। वही मन सन्तुलित हो जाने पर स्थिर बुद्धि ग्रहण करता है, प्रसन्न और उदार बनता है, सन्तुष्ट और शान्त बनता है। उसे भविष्य से बड़ी बड़ी आशाएँ होती हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, फरवरी 1955 पृष्ठ 12

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/February/v1.12

👉 जीवन जीने की कला ही सच्ची साधना

🔶 कलाकार के हाथ अनगढ़ वस्तुओं को पकड़ते हैं और अपने उपकरणों के सहारे उन्हें नयनाभिराम सुन्दरता से भरते और बहुमुल्य बनाते हैं। कुम्हार मिट्टी से सुन्दर खिलौने बनाते हैं- मूर्तिकार पत्थर के टुकड़े को देव प्रतिमा में परिणत करता है। गायक बाँस के टुकड़े से वंशी की ध्वनि निनादित करता है। धातु का टुकड़ा स्वर्णकार केहथौड़े की चोट खाकर आकर्षक आभूषण बनता है। कागज, रंग और कलम से बहुमूल्य चित्र बनाने का कर्तृत्व कितना चमत्कार उत्पन्न करता है, इसे कोई भी देख सकता है।

🔷 क्या वस्तुतः जीवन ऐसा ही है, जिसे रोते- खीझते किसी प्रकार पूरा किया जाना है? उसके उत्तर में इतना ही कहा जा सकता है कि अनाड़ी हाथों पड़कर हीरा भी उपेक्षित होता है, तो बहुमूल्य मनुष्य जीवन भी क्यों न भार बनकर लदा रहेगा। किन्तु यह भी स्पष्ट है कि यदि उसे कलाकार की प्रतिभा से सँभाला- सँजोया जाय, तो उसे निश्चय ही देवोपम स्तर का स्वर्गीय परिस्थितियों से भरा पूरा जिया जा सकता है।

🔶 साधना जीवन जीने की कला का नाम है। जो मानवी अस्तित्व की गरिमा समझ सका और उसे अनगढ़ स्थिति से निकालकर सुसंस्कृत पद्धति से जी सका, उसे सर्वोपरि कलाकार कह सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 10 September 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 September 2018