बुधवार, 3 मई 2017

👉 प्रभु इच्छा सर्वोपरि

🔵 घटना १४ जुलाई १९८९ की है। विनोदानंदजी की शादी शांतिकुंज के यज्ञशाला प्रांगण में होना निश्चित हुई। श्रद्धेय आचार्यगण द्वारा विवाह संस्कार के वेदमंत्रों के छन्दबद्ध उच्चारण और उनकी सारगर्भित व्याख्याएँ श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर रही थीं। शांतिपाठ- विसर्जन के उपरांत वर- वधू को वंदनीया माताजी एवं परम पूज्य गुरुदेव के आशीर्वचनों के लिये उनके कक्ष में जाना था। तब पूज्य गुरुदेव के कक्ष में उनसे मिलने हेतु आवश्यक अनुमति लेनी पड़ती थी। परिजन दूर झरोखे से ही गुरुवर के दर्शन कर लिया करते थे। वर- वधू के आर्शीवचन हेतु गुरुवर के कक्ष में जाने की अनुमति तो मिली, लेकिन फोटो लेने की नहीं अनुमति मिली। अब हमारे मन में मचलती सी भावना थी कि शादी के इतने फोटो खींचे गए पर हमारे परम आराध्य के सान्निध्य के बिना तो वर- वधू के सारे फोटो अधूरे ही माने जाएँगे।

🔴 अब गुरुदेव के आशीर्वाद वाले पल के फोटो कैसे लिये जाएँ? यह प्रश्र हम सब के मन में बार- बार कौंधने लगा- बुद्धि उपाय ढूँढ़ने लगी। हृदय कचोटने लगा कि गुरुदेव के फोटो नहीं लेंगे तो सब चौपट। तुरंत मेरे पति (विजय कुमार शर्मा) के मन में एक उपाय सूझा कि अगर श्रद्धेय शिव प्रसाद मिश्रा जी के द्वारा फोटो लेने की अनुमति स्वीकार करवा ली जाय तो यह संभव हो सकता है। मैं और मेरे पतिदेव गुरुवर के फोटो लेने की अभिलाषा को पूर्ण करना चाहते थे। लेकिन मिश्रा जी ने स्पष्ट कहा कि गुरुदेव की अनुमति के बिना फोटो लेना संभव नहीं है। उन्होंने भी फोटो लेने से मना कर दिया।

🔵 निराश होकर हम सब वंदनीया माताजी के कमरे की ओर वर- वधू के साथ बढ़े। नीचे के कमरे में वंदनीया माताजी से आशीर्वाद लेकर ऊपर के कमरे में गुरुदेव के आशीष हेतु जाना था। मेरे पति भी कैमरा लेकर वर- वधू के साथ गुरुवर के पास पहुँच गए। गुरुदेव ने बड़े प्यार से भावभरे आशीष वचन कहे। तभी मेरे पति ने कैमरे से दो फोटो फटाफट खींच लिए। गुरुदेव एक भेदक दृष्टि डालकर मुस्कुराए भी। हम सब बड़े प्रसन्न थे कि गुरुदेव की यादगार हमारे साथ होगी। हम सब खुशी- खुशी घर लौटे।

🔴 अपने घर जमालपुर (मुंगेर) पहुँचकर जब मेरे पति ने कैमरे की रील साफ कराई तो वे स्तब्ध रह गए। मैं भी देखकर हैरान थी कि वंदनीया माताजी के फोटो तो कैमरे में स्पष्ट आए थे, पर गुरुदेव के लिये गए दोनों चित्र बिल्कुल सादे आए थे। तब मैं गुरुदेव की उस भेदक दृष्टि और मुस्कुराहट का अर्थ समझी। वस्तुतः जाग्रत चेतना के प्रज्ञा- पुरुष की इच्छा से भौतिक (कैमरा) भी नियंत्रित हुआ। उनकी आज्ञा की अवहेलना कर कैमरा भी फोटो नहीं ले पाया। सच ही कहा गया है- संसार में प्रभु की इच्छा ही सर्वोपरि है। परमात्मा की इच्छा ही विजयी होती है। तब ये भौतिक यंत्र और संसार उनकी इच्छा को कैसे टाल सकते हैं।  
  
🌹 आशा देवी शर्मा जमालपुर, मुंगेर (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/prabhu

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 92)

🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती

🔴  लोक साधना का महत्त्व तब घटता है, जब उसके बदले नामवरी लूटने की ललक होती है। यह तो अखबारों में इश्तहार छपा कर विज्ञापन बाजी करने जैसा व्यवसाय है। एहसान जताने और बदला चाहने से भी पुण्यफल नष्ट होता है। दोस्तों के दबाव से किसी भी काम के लिए चंदा दे बैठने से भी दान की भावना पूर्ण नहीं होती। देखा यह जाना चाहिए कि इस प्रयास के फलस्वरूप सद्भावनाओं का सम्वर्धन होता है या नहीं, सत्प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाने में जो कार्य सहायक हों उन्हीं की सार्थकता है। अन्यथा मुफ्तखोरी बढ़ाने और छल प्रपंच से भोले-भाले लोगों को लूटते खाते रहने के लिए इन दिनों अगणित आडम्बर चल पड़े हैं।

🔵 उनमें धन या सम्मान देने से पूर्व हजार बार यह विचार करना चाहिए कि अपने प्रयत्नों की अंतिम परिणति क्या होगी? इस दूरदर्शी विवेकशीलता का अपनाया जाना इन दिनों विशेष रूप से आवश्यक है। हमने ऐसे प्रसंगों में स्पष्ट इनकारी भी व्यक्त की है। औचित्य-सनी उदारता के साथ-साथ अनौचित्य की गंध पाने पर अनुदारता अपनाने और नाराजी का खतरा लेने का साहस किया है। आराधना में इन तथ्यों का समावेश भी नितांत आवश्यक है। 

🔴 उपरोक्त तीनों प्रसंगों में हमारे जीवन दर्शन की एक झलक मिलती है। यह वह मार्ग है, जिस पर सभी महामानव चले एवं लक्ष्य प्राप्ति में सफल हो यश के भागी बने हैं। किसी प्रकार के ‘‘शार्ट कट’’ का इसमें कोई स्थान नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivan.5

👉 पूर्ण शांति की प्राप्ति

🔴 जिस क्षण हम भगवान के साथ अपनी एकता का अनुभव करना प्रारंभ कर देते हैं, उसी क्षण हमारे हृदय में शांति का स्रोत बहने लगता है। अपने को सदा सुंदर, स्वस्थ, पवित्र एवं आध्यात्मिक विचारों से ओतप्रोत रखना, वस्तुत: जीवन और शांति की प्राप्ति का मार्ग है। इस सत्य को सदा अपने हृदयपट पर अंकित करना कि ``मैं आत्मा हूँ, भगवान का अंश हूँ’’ और हमेशा ही इसी विचारधारा में रहना, शांति का मूल तत्त्व है। कितना करुणाजनक और आश्चर्यप्रद दृश्य है कि संसार में हमें हजारों व्यक्ति चिंतित, दु:खी, शांति की प्राप्ति के लिए इधर-उधर भटकते हुए तथा विदेशों की खाक छानते हुए नजर आते हैं, परंतु उन्हें शांति के दर्शन नहीं होते।

🔵  इसमें तिल मात्र भी संदेह नहीं कि इस प्रकार वे कदापि शांति नहीं प्राप्त कर सकते, चाहे वर्षों तक वे प्रयत्न करते रहें, क्योंकि वे शांति को वहाँ खोज रहे हैं जहाँ कि उसका सर्वथा अभाव है। वे भोले मनुष्य बाह्य पदार्थों की ओर तृष्णा भरी निगाहों से देख रहे हैं, जबकि शांति का स्रोत उनके अपने अंदर बह रहा है। कस्तूरी मृग की नाभि में विद्यमान है, परंतु मृग अज्ञानतावश उसे खोजता फिरता है। जीवन में सच्ची शांति अपने अंदर झाँकने से ही मिल सकती है।

🔴 पूर्ण शांति की प्राप्ति के लिए आवश्यकता है, अपने मन पर नियंत्रण की। हमें मन और इंद्रियों का दास नहीं अपितु उनका स्वामी बनना चाहिए।

🌹 ~अखण्ड ज्योति-मार्च 1947 पृष्ठ 2


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1947/March/v1.2

👉 आज का सद्चिंतन 4 May 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 May 2017


👉 MANAN (Part 3)

(motivating the self-being for present & future period) & its Significance.

🔴 They are also your part, aren’t they? Make up them also. What to make up in them? Only one thing is to be made up in them. Make up in them generousness, good habits, ideals and a tendency to maintain their characters? It hardly matters whether they become rich or not. There are people who have live a magnificent life despite the fact that they were poor ones whereas there are also such rich people who have created only disputes leading to their and others’ deaths. That is why I do not talk about & emphasis on ensuring prosperity. By ‘INCULCATION’ I mean is merit, action and temperament. You please do all that you can do to change these specifications, habits, traits in order to maintain the dignity of a man. 

🔵 The five basic principles of family-conduct include laboriousness, orderliness, thriftiness and co-operation. You must inculcate these specifications in your life and motivate your family members to do the same. This is a very tremendous way of building a personality, character and thinking-style. You must configure how you can implement that when you are exercising stages of CHINTAN & MANAN.

🌹 to be continue...
🌹 ~Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 शंकर मिश्र की माँ की प्रतिज्ञा

🔵 दरभंगा में एक तालाब है। उसे 'दाई का तालाब' कहते है। तालाब के निर्माण का इतिहास सज्जनता और ईमानदारी, कर्तव्यपरायणता और नैतिकता का जीता-जागता आदर्श है। उसे पढ़कर जीवन के निष्काम प्रेम की अनुभूति का आनंद मिलता है।

🔴 शंकर मिश्र जन्मे तब इनकी माता जी के स्तनों में दूध नहीं आता था। बच्चे को प्रारंभ से ही ऊपर का दूध दिया नही जा सकता था, इसलिए उसे किसका दूध दिया जाए? यह एक संकट आ गया।

🔵 एक धाय रखनी पड़ी। इस धाय ने शंकर को अपना बच्चा समझकर दूध पिलाया। मातृत्च का जो भी लाड़ और स्नेह एक माँ अपने बच्चे को दे सकती है, धाय ने वही स्नेह और ममता बच्चे को पिलाई। आज के युग में जब भाई-भाई एक-दूसरे को स्वार्थ और कपट की दृष्टि सें देखते हैं, तब एक साधारण स्त्री का यह भावनात्मक अनुदान स्वर्गीय ही कहा जा सकता है। संसार के सब मनुष्य जीवन के कठोर कर्तव्यों का पालन करते हुए भी यदि इस सुरह प्रेम कर्तव्यशीलता का व्यवहार कर सकें तो संसार स्वर्ग बन जाए।

🔴 शंकर मिश्र बढ़ने लगे। धाय उनकी सब प्रकार सेवा सुश्रूषा करती, नीति और सदाचार की बातें भी सिखाती। सामान्य कर्तव्य पालन में कभी ऐसा समझ में नहीं आया, जब बाहर से देखने वालों को यह पता चला हो कि यह असली माँ नही है। धाय के इस आत्म-भाव से शंकर की माँ बहुत प्रभावित हुई। एक दिन उन्होंने धाय की सराहना करते हुए वचन दिया तुमने मेरे बच्चे के अपने बच्चे जैसा पाला है, जब वह बडा हो जायेगा तो इसकी पहली कमाई पर तुम्हारा अधिकार होगा।'' कुछ दिन यह बात आई गई हो गई।

🔵 शंकर मिश्र बाल्यावस्था से ही संस्कृत के प्रकाड विद्वान् दिखाई देने लगे। बाद में तो उनकी प्रतिभा ऐसी चमकी कि उनका यश चारों ओर फैलता गया। उनकी एक काव्य-रचना पर तल्ललीन दरभंगा नरेश बहुत ही प्रभावित हुए। उन्होंने दरबार में बुलाकर उनका बडा सम्मान किया और उपहार स्वरूप एक हार भेंट किया। इसे लेकर शंकर घर आए और हार अपनी माँ को सौंप दिया।

🔴 हार बहुत कीमती था उसे देखकर किसी के भी मन में लोभ और लालच आ सकता था, पर यह सब सामान्य मनुष्यों के आकर्षण की बातें है। उदार हृदय व्यक्ति, कर्तव्यपरायण और आदर्शों को ही जीवन मानने वाले सज्जनों के लिए रुपये पैसे का क्या महत्व, मानवता जैसी वस्तु खोकर धन, संपत्ति, पद, यश प्रतिष्ठा कुछ भी मिले निरर्थक है, उससे आत्मा का कभी भला नही होता।

🔵 शंकर मिश्र की माता ने धाय को बुलाया और अपनी प्रतिज्ञा की याद दिलाते हुए हार उसे दे दिया। धाय हार लेकर घर आई। उसे शक हुआ हार बहुत कीमती है, तो उसकी कीमत जंचवाई। जौहरियों से पता चला कि उसकी कीमत लाखों रुपयों की है। लौटकर धाय ने कहा- माँ जी मुझे तो सौ-दो सौ की भेंट ही उपयुक्त थी। इस कीमती हार को लेकर मैं क्या करूँगी ? कहकर हार लौटाने लगी।

🔴 पर शंकर की माँ ने भी दृढता से कहा- जो भी हो एक बार दे देने के बाद चाहे वह करोड़ की संपत्ति हो मेरे लिए उसका क्या महत्व ? हार तुम्हारा हो गया-जाओ। उन्होंने किसी भी मूल्य पर हार स्वीकार न किया।

🔵 विवश धाय उसे ले तो गई पर उसने कहा- जो मेरे परिश्रम की कमाई नहीं उसका उपयोग करूँ तो वह पाप होगा। अतएव उसने उसे बेचकर एक पक्का तालाब बनवा दिया।

🔴 यही तालाब 'धाय का तालाब' के नाम से शंकर की माँ के वचन और धाय की उत्कृष्ट नैतिकता के रूप में आज भी लोगों को प्रेरणा देता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 146, 147

👉 सद्गुरु के स्वर

🔵 अन्तःकरण के मौन में गुरुदेव की परावाणी गूँजती है- अहो! मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ। तुम चाहे जहाँ जाओ, वहाँ मैं उपस्थित हूँ ही। मैं तुम्हारे लिए ही जीता हूँ। अपनी अनुभूति के फल मैं तुम्हें देता हूँ। तुम मेरे हृदय-धन हो। मेरी आँखों के तारे हो। प्रभु में हम एक हैं। मैं सदा-सर्वदा तुमसे एकता की अनुभूति करता हूँ। तुम्हें कठिन संघर्षों की धधकती-च्वालाओं में झोंक देने में मुझे भय नहीं होता, यह इसलिए क्योंकि मैं तुम्हारी शक्ति की मात्रा को जानता हूँ। मैं तुम्हें अनुभवों के बाद अनुभवों में भेजता हूँ, किन्तु तुम्हारे इस भ्रमण में मेरी दृष्टि सदैव तुम्हारा पीछा करती रहती है। तुम जो भी करते हो, वह सब मेरी उपस्थिति में करते हो।

🔴 मेरे विचारों में, मेरे साहित्य में मेरी इच्छाओं को ढूँढ़ो। उन शिक्षाओं का अनुसरण करो, जो मेरे गुरु ने मुझे दी थीं और जिसे मैंने तुम्हें दिया है। जो एक है, उसी का दर्शन करो, तब तुम मेरे सहस्रों शरीरों के साथ रहकर जितनी एकता का अनुभव करते, उससे कहीं अधिक एकता का अनुभव करोगे। मेरी इच्छा और विचारों के प्रति जागरूकता, स्थिरता और भक्ति में ही शिष्यत्व है, हम दोनों के बीच असीम प्रेम है। गुरु और शिष्य का सम्बन्ध वज्र से भी अधिक दृढ़ होता है। वह मृत्यु से भी अधिक सशक्त होता है।
  
🔵 इस सत्य को अनुभव करते हुए यह ध्यान रखो वत्स! इन्द्रियाँ सदैव आत्मा के विरुद्ध संघर्ष करती हैं। अतः सतत सावधान रहो, इन्द्रियों पर विश्वास न करो। ये सुख तथा दुःख के द्वारा विचलित होती रहती हैं। उनके ऊपर उठ जाओ। तुम आत्मा हो, मेरे अविनाशी अंश हो। शरीर का किसी भी क्षण नाश हो सकता है। सचमुच कौन उस क्षण को जानता है। इसलिए सदैव अपनी दृष्टि लक्ष्य पर स्थिर रखो, अपने मन को मेरे विचारों से परिपूर्ण कर लो। मृत्यु के क्षणों में नहीं, किन्तु जीवन के इन्हीं क्षणों में अपने मन को मुक्त और पवित्र रखो। तब यदि मृत्यु अकस्मात् तुम्हें ग्रास बना ले, तो भी तुम प्रस्तुत हो। इस प्रकार जीवन जिओ, मानो इसी क्षण तुम्हारी मृत्यु होने वाली है, तभी तुम सच्चा जीवन जी सकोगे। समय भाग रहा है। यदि तुम शाश्वत तथा अमर विचारों में डूबे रहो, तभी भागते समय को शाश्वत बना सकोगे।

🔴 हर किसी को अपने आदर्श के लिए अनेकों तरह के कष्ट सहने पड़ते हैं तुम भी सभी प्रकार की कसौटियों को सहो, विपत्तियों का सामना करो। आदर्श का जीवन जिओ तथा ईश्वर के नाम पर निर्भीक बनो। भगवान् पर सच्ची निर्भरता सभी भयों को भगा देती है। तुम मेरी सन्तान हो। जीवन में या मृत्यु में, सुख या दुःख में, भले या बुरे में जहाँ भी तुम जाओ, जहाँ भी तुम रहो, मैं तुम्हारे साथ हूँ। मैं तुम्हारी रक्षा करता हूँ। मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ, क्योंकि मैं तुमसे बँधा हूँ। ईश्वर के प्रति मेरा प्रेम तुम्हारे साथ एक कर देता है। मैं तुम्हारी आत्मा हूँ। वत्स! तुम्हारा हृदय मेरा निवास स्थान है। फिर चिन्ता किस बात की निश्चिन्त रहो, निर्भीक बनो।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 53

👉 आत्मचिंतन के क्षण 4 May

🔴 सुना है कि आत्मज्ञानी सुखी रहते हैं और चैन की नींद सोते हैं। अपने लिए ऐसा आत्मज्ञान अभी तक दुर्लभ ही बना हुआ है। ऐसा आत्मज्ञान कभी मिल भी सकेगा या नहीं, इसमें पूरा-पूरा सन्देह है। जब तक व्यथा-वेदना का अस्तित्व इस जगती में बना रहे, जब तक प्राणियों को कश्ट और क्लेष की आग में जलना पड़े, तब तक हमें भी चैन से बैठने की इच्छा न हो। जब भी प्रार्थना का समय आया तब भगवान से निवेदन यही किया कि हमें चैन नहीं, वह करुणा चाहिए, जो पीड़ितों की व्यथा को अपनी व्यथा समझने की अनुभूति करा सके। हमें समृद्धि नहीं, वह षक्ति चाहिए, जो आँखों से आँसू पोंछ सकने की अपनी सार्थकता सिद्ध कर सके।

🔵 लोगों की आँखों से हम दूर हो सकते हैं, पर हमारी आँखों से कोई दूर न होगा। जिनकी आँखों में हमारे प्रति स्नेह और हृदय में भावनाएँ हैं, उन सबकी तस्वीरें हम अपने कलेजे में छिपाकर ले जायेंगे और उन देव प्रतिमाओं पर निरन्तर आँसुओं का अध्र्य चढ़ाया करेंगे। कह नहीं सकते उऋण होने के लिए प्रत्युपकार का कुछ अवसर मिलेगा या नहीं; पर यदि मिला तो अपनी इन देव प्रतिमाओं को अलंकृत और सुसज्जित करने में कुछ उठा न रखेंगे। लोग हमें भूल सकते हैं, पर हम अपने किसी स्नेही को नहीं भूलेंगे।                       

🔴 हमारी कितनी रातें सिसकते बीती हैं। कितनी बार हम बालकों की तरह बिलख-बिलख कर फूट-फूट कर रोये हैं। इसे कोई कहाँ जानता है? लोग हमें संत, सिद्ध, ज्ञानी मानते हैं, तो कोई लेखक, विद्वान, वक्ता, नेता समझते हैं; पर किसने हमारा अन्तःकरण खोलकर पढ़ा-समझा है ? कोई इसे देख सका होता तो उसे मानवीय व्यथा-वेदना की अनुभूतियों से, करुण कराह से हाहाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इस हड्डियों के ढाँचें में बैठी बिलखती ही दिखाई पड़ती है। हमें चैन नहीं, वह करुणा चाहिए; जो पीड़ितों की व्यथा को अपनी व्यथा समझने की अनुभूति करा सके।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 20)

🌹 समय के सदुपयोग का महत्व समझिए

🔴 जीवन का हर क्षण एक उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना लेकर आता है। हर घड़ी एक महान् मोड़ का समय हो सकती है। मनुष्य यह निश्चयपूर्वक  नहीं कह सकता कि जिस वक्त, जिस क्षण और जिस पल को यों ही व्यर्थ में खो रहा है वह ही क्षण—वह ही वक्त-क्या उसके भाग्योदय का वक्त नहीं है? क्या पता जिस क्षण को हम व्यर्थ समझकर बरबाद कर रहे हैं वह ही हमारे लिये अपनी झोली में सुन्दर सौभाग्य की सफलता लाया हो।

🔵 सबके जीवन में एक परिवर्तनकारी वक्त आया करता है। किन्तु मनुष्य उसके आगमन से अनभिज्ञ रहा करता है। इसलिये हर बुद्धिमान मनुष्य हर क्षण को, बहूमूल्य समझकर व्यर्थ नहीं जाने देता। कोई भी क्षण व्यर्थ न जाने देने से निश्चय ही वह क्षण हाथ से छूटकर नहीं जा सकता जो जीवन में वांछित परिवर्तन का संदेशवाहक होगा। सिद्धि की अनिश्चित घड़ी से अनभिज्ञ साधक जिस प्रकार हर समय लौ लगाये रहने से उसको पकड़ लेता है ठीक उसी प्रकार हर क्षण को सौभाग्य के द्वार खोल देने वाला समझकर महत्त्वाकांक्षी कर्मवीर जीवन के एक छोटे से भी क्षण की उपेक्षा नहीं करता और निश्चय ही सौभाग्य का अधिकारी बनता है।

🔴 कोई भी दीर्घसूत्री व्यक्ति संसार में आज तक सफल होते देखा, सुना नहीं गया है। जीवन में उन्नति करने और सफलता पाने वाले व्यक्तियों की जीवनगाथा का निरीक्षण करने पर निश्चय ही उनके उन गुणों में समय के पालन एवं सदुपयोग को प्रमुख स्थान मिलेगा जो जीवन की उन्नति के लिए अपेक्षित होते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्थायी सफलता का राजमार्ग (भाग 2)

🔵 मनुष्य को अपनी कार्य-सिद्धि के लिए जैसा उत्साह होता है वैसा उत्साह उसे कर्म-फल के लिए होता है वैसा ही उत्साह उसे कर्म करने में भी होना चाहिये। लोक-सेवा का स्वाभाविक फल यश की प्राप्ति है। अतएव यदि कोई यश प्राप्त करना चाहता है तो उसे लोक-सेवा में भी वैसी ही रुचि प्रदर्शित करनी चाहिए। यदि कोई दानी कहलाने की उत्कट इच्छा रखता है तो उसे दान देते समय अपना हाथ भी न सिकोड़ना चाहिये। किंतु बहुधा यह देखा जाता है कि मनुष्यों में कर्म-फल-भोग के लिए जो उत्साह देखा जाता है वैसा उत्साह कर्म करने के लिए नहीं। जहाँ कर्मोत्साह नहीं होता और कर्म-फल-भोग की भावना प्रबल होती है, वहाँ मनुष्य भटक जाता है और अधर्म करता है।

🔴 जिस मनुष्य के हृदय में अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए जितनी अधिक बलवती इच्छा होती है वह मनुष्य अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए उतनी ही तीव्रगति से अग्रसर होता है, किंतु यदि उसे अधर्म में प्रवृत्त नहीं होना है तो उसे अपने आपको तीव्रगति से कर्म में नियोजित करना चाहिए। उसे उद्देश्य को “येन केन प्रकारेण” सिद्ध कर लेने की इच्छा को भी अपने वश में रखना होगा। इच्छा की तीव्रता के कारण अन्याय-पूर्वक सफलता पा लेने के लोभ का भी संवरण करना होगा।

🔵 जोश के साथ यह होश भी उसे रखना होगा कि कहीं वह अनीति की राह पर न चल पड़े। उसे अपना कार्य भी सिद्ध करना है पर इसके लिए अनीति-पूर्ण, सरल और छोटे मार्ग पर भी नहीं चलना है। उसे अपना इष्ट साधन करना है पर उसमें आसक्त भी नहीं होना है। अतएव उसे अपने उद्देश्य को सिद्ध करने के लिए केवल इसी शर्त पर आगे बढ़ना चाहिए कि वह केवल न्याय-संगत साधनों का पर उद्देश्य के सरलतापूर्वक मिल जाने पर भी उसे अस्वीकार कर देगा।

🌹 अखण्ड ज्योति-मार्च 1949 पृष्ठ 24
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/March/v1.24

👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...