शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

👉 सबसे अनमोल धरोहर

🔷 बिटिया बड़ी हो गयी, एक रोज उसने बड़े सहज भाव में अपने पिता से पूछा - "पापा, क्या मैंने आपको कभी रुलाया"?

🔶 पिता ने कहा -"हाँ"

🔷 उसने बड़े आश्चर्य से पूछा - "कब"?

🔶 पिता ने बताया - 'उस समय तुम करीब एक साल की थीं, घुटनों पर सरकती थीं।

🔷 मैंने तुम्हारे सामने पैसे, पेन और खिलौना रख दिया क्योंकि मैं ये देखना चाहता था कि, तुम तीनों में से किसे उठाती हो तुम्हारा चुनाव मुझे बताता कि, बड़ी होकर तुम किसे अधिक महत्व देतीं।

🔶 जैसे पैसे मतलब संपत्ति, पेन मतलब बुद्धि और खिलौना मतलब आनंद।

🔷 मैंने ये सब बहुत सहजता से लेकिन उत्सुकतावश किया था क्योंकि मुझे सिर्फ तुम्हारा चुनाव देखना था।

🔶 तुम एक जगह स्थिर बैठीं टुकुर टुकुर उन तीनों वस्तुओं को देख रहीं थीं। मैं तुम्हारे सामने उन वस्तुओं की दूसरी ओर खामोश बैठा बस तुम्हें ही देख रहा था।

🔷 तुम घुटनों और हाथों के बल सरकती आगे बढ़ीं, मैं अपनी श्वांस रोके तुम्हें ही देख रहा था और क्षण भर में ही तुमने तीनों वस्तुओं को आजू बाजू सरका दिया और उन्हें पार करती हुई आकर सीधे मेरी गोद में बैठ गयीं।

🔶 मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि, उन तीनों वस्तुओं के अलावा तुम्हारा एक चुनाव मैं भी तो हो सकता था।

🔷 तभी तुम्हारा तीन साल का भाई आया ओर पैसे उठाकर चला गया, वो पहली और आखरी बार था बेटा जब, तुमने मुझे रुलाया और बहुत रुलाया...

🔶 भगवान की दी हुई सबसे अनमोल धरोहर है बेटी...

🔷 एक पिता ने लिखा है...

🔶 हमें तो सुख मे साथी चाहिये दुख मे तो हमारी बेटी अकेली ही काफी है…

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 18 Feb 2018


👉 एकाग्रता की अदभुद सामर्थ्य

🔶 एकाग्रता एक उपयोगी सत्प्रवृत्ति है। मन की अनियन्त्रित कल्पनाएँ, अनावश्यक उड़ानें उस उपयोगी विचार शक्ति का अपव्यय करती हैं, जिसे यदि लक्ष्य विशेष पर केन्द्रित किया गया होता, तो गहराई में उतरने और महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलता। यह चित्त की चंचलता ही है, जो मन: संस्थान की दिव्य क्षमता को ऐसे ही निरर्थक गँवाती और नष्ट-भ्रष्ट करती रहती है। संसार के वे महामानव जिन्होंने किसी विषय में पारंगत प्रवीणता प्राप्त की है या महत्त्वपूर्ण सफलताएँ उपलब्ध की हैं, उन सबने विचारों पर नियन्त्रण करने उन्हें अनावश्यक चिंतन से हटाकर उपयोगी दिशा में चलाने की क्षमता प्राप्त की है।

🔷 इसके बिना चंचलता की वानरी वृत्ति से ग्रसित व्यक्ति न किसी प्रसंग पर गहराई के साथ सोच सकता है और न किसी कार्यक्रम पर देर तक स्थिर रह सकता है। शिल्प, कला, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, व्यवस्था आदि महत्त्वपूर्ण सभी प्रयोजनों की सफलता में एकाग्रता की शक्ति ही प्रधान भूमिका निभाती है। चंचलता को तो असफलता की सगी बहिन माना जाता है। बाल चपलता का मनोरंजक उपहास उड़ाया जाता है। वयस्क होने पर भी यदि कोई चंचल ही बना रहे- विचारों की दिशा धारा बनाने और चिंतन पर नियंत्रण स्थापित करने में सफल न हो सके, तो समझना चाहिए कि आयु बढ़ जाने पर भी उसका मानसिक स्तर बालकों जैसा ही बना हुआ है। ऐसे लोगों का भविष्य उत्साहवर्धक नहीं हो सकता।
  
🔶 आत्मिक प्रगति के लिए तो एकाग्रता की और भी अधिक उपयोगिता है। इसलिए मेडीटेशन के नाम पर उसका अभ्यास विविध प्रयोगों द्वारा कराया जाता है। इस अभ्यास के लिए कोलाहल रहित ऐसे स्थान की आवश्यकता समझी जाती है, जहाँ विक्षेपकारी आवागमन या कोलाहल न होता हो। एकान्त का तात्पर्य जनशून्य स्थान नहीं, वरन्ï विक्षेप रहित वातावरण है। सामूहिकता हर क्षेत्र में उपयोगी मानी गयी है। प्रार्थनाएँ सामूहिक ही होती हैं। उपासना भी सामूहिक हो, तो उसमें हानि नहीं लाभ ही है। मस्जिदों में नमाज, गरिजाघरों में प्रेयर, मन्दिरों में आरती सामूहिक रूप से ही करने का रिवाज है। इसमें न तो एकांत की कमी अखरती है और न एकाग्रता में कोई बाधा पड़ती है। एक दिशाधारा का चिंतन हो रहा हो, तो अनेक व्यक्तियों का समुदाय भी एक साथ मिल बैठकर एकाग्रता का अभ्यास भली प्रकार कर सकता है। नितांत एकांत में बैठना वैज्ञानिक, तात्त्विक शोध अन्वेषण के लिए आवश्यक हो सकता है, उपासना के सामान्य संदर्भ में एकान्त ढूँढ़ते फिरने की ही कोई खास आवश्यकता नहीं है। सामूहिकता के वातावरण में ध्यान-धारणा और भी अच्छी तरह बन पड़ती है।
  
🔷 कई व्यक्ति एकाग्रता का अर्थ मन की स्थिरता समझते हैं और शिकायत करते हैं कि उपासना के समय उनका मन भजन में स्थिर नहीं रहता। ऐसे लोग एकाग्रता और स्थिरता का अंतर न समझने के कारण ही इस प्रकार की शिकायत करते हैं। मन की स्थिरता सर्वथा भिन्न बात है। उसे एकाग्रता से मिलती-जुलती स्थिति तो कहा जा सकता है, पर दोनों का सीधा संबंध नहीं है। जिसका मन स्थिर हो उसे एकाग्रता का लाभ मिल सके या जिसे एकाग्रता की सिद्धि है, उसे स्थिरता की स्थिति प्राप्त  हो ही जाय, यह आवश्यक नहीं है।
  
🔶 जिस एकाग्रता की आवश्यकता, अध्यात्म प्रगति के लिए बताई गयी है वह मन की स्थिरता नहीं वरन्ï चिंतन की दिशा धारा है। उपासना के समय सारा चिंतन, आत्मा का स्वरूप, क्षेत्र, लक्ष्य समझने में लगाना चाहिए और यह प्रयास करना चाहिए कि ब्राह्मïी चेतना के गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर आत्मा की बहुमूल्य रत्नराशि संग्रह करने का अवसर मिले। उपासना का लक्ष्य स्थिर हो जाने पर उस समय जो विचार प्रवाह अपनाया जाना आवश्यक है, उसे पकड़ सकना कुछ कठिन न रह जायेगा।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवन संग्राम की तैयारी कीजिए (भाग 3)

🔷 जीवन कभी भी शाँत, सुखी और सफल नहीं हो सकता, जब तक उसका समन्वय प्रकृति प्रदत्त प्रतिभा के साथ न हो। एक विद्वान कहता है कि-”बालक जो चाहता है, युवक उसकी प्राप्ति का प्रयत्न करता है और पूर्ण मनुष्य उसे प्राप्त करता है।” सच्चा और स्वतः परिश्रम प्रतिभा से पैदा होता है। नेलसन ने जल युद्ध में अद्वितीय सफलता इसलिए प्राप्त की कि वह बचपन में जहाज का खिलौना खेला करता था। चन्द्रगुप्त मौर्य भारत सम्राट इसीलिए बना कि वह बचपन में खेलने कूदने में राजा का अभिनय किया करता था। यदि सच्ची प्रतिभा है तो जरा सा बल मिलने और मार्ग प्रदर्शन करने पर पूर्ण सफलता प्राप्त करा देती है।

🔶 प्रतिभा को पहचान लेने के बाद, उसके समुचित विकास में अनेक बातों का सहारा लेना पड़ता है। घरेलू परिस्थितियों का इस सम्बन्ध में बहुत अधिक महत्व है क्योंकि मनुष्य जिस माता के गर्भ से जन्म लेता है और जिस पिता के प्यार से पलता है, उसके प्रभाव से उसकी प्रतिभा अछूती नहीं रह सकती। इन्हीं कारणों से प्रायः सभी विद्वानों ने मातृ-प्रभाव को मुक्त कंठ से स्वीकार किया है। वह युवक बड़े भाग्यवान हैं और उनकी सफलता निश्चित है जिन्हें अच्छी माता और अच्छे पिता का संरक्षण प्राप्त है।

🔷 घरेलू प्रभाव के बाद मनुष्य की प्रतिभा पर सबसे अधिक प्रभाव ‘मित्र’ का पड़ता है। इस प्रकार के कुप्रभाव से बचना मनुष्य के हाथ में है। अच्छी संगति की महिमा इसीलिए बार-बार गाई है कि मनुष्य के जीवन का निर्माण उसके मित्रों के सहयोग से होता है। एक लेखक ने कहा है कि एक सच्चा मित्र मनुष्य की सुरक्षा का सबसे बड़ा साधन है और जिसको ऐसा मित्र मिल गया, उसे मानो एक बड़ा खजाना मिल गया। एक सच्चा मित्र जीवन की दवा है। अपनी प्रतिभा के अनुकूल ही अपने मित्र बनाने चाहिए। अंग्रेजी कवि वायरन के काव्य का अध्ययन करने से स्पष्ट पता चलता है कि उसकी प्रतिभा पर उसके मित्रों के विचारों का रंग खूब चढ़ा हुआ है। शेली के संग में रह कर ही उसने भावों की कोमलता और प्रकृति के प्रति असीम अनुराग प्राप्त किया।

📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1949 पृष्ठ 13
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/October/v1.14

👉 आत्मरक्षा मनोरोगों से भी करनी चाहिए (भाग 4)

🔷 क्रोध का उद्देश्य सामने वाले को अपने रोष, विरोध या पराक्रम का परिचय देकर डराना होता है और यह भाव रहता है कि दबाव देकर उसे वह करने के लिए विवश किया जाय जो चाहा गया है। किन्तु देखा गया है कि यह उद्देश्य कदाचित ही कभी पूरा होता है। क्रोध की अभिव्यक्ति में जिस पर अपना रौद्र रूप प्रकट किया जाता है या जिन असंस्कृत शब्दों का उपयोग किया जाता है, उससे सामने वाले के स्वाभिमान को चोट पहुँचती है। इससे एक नई समस्या खड़ी होती है। सामने वाला क्षुब्ध होता है और प्रतिशोध लेने, नीचा दिखाने की बात सोचता है। विग्रहों में से अधिकांश की जड़ वहीं पाई जाती है। मतभेद दूर करने या अनुरोध को स्वीकारने के लिए यदि सौम्य तरीका अपनाया गया होता तो विग्रह की नौबत न आती और प्रयोजन पूरा न सही, आधा अधूरा तो सध ही जाता। क्रोध उन सभी सम्भावनाओं को परास्त कर देता है।

🔶 क्रोध एक प्रकार का सन्निपात ज्वर है जिससे आक्रान्त व्यक्ति न केवल बेचैन दीखता, हाथ पैर पीटता और अपनी दयनीय स्थिति का परिचय देता है वरन् गलत सोचता और दूसरों से अपशब्द कहता तथा दुर्व्यवहार करता भी पाया जाता है। सन्निपात ग्रस्त को रुग्णता के चंगुल में फँसा हुआ, विवश, निर्दोष भी मान लिया जाता है और दया सहानुभूति का पात्र समझ कर उसका व्यवहार भुला दिया जाता है। किन्तु क्रोध के बारे मे ऐसी बात नहीं है। उसे दरिद्र, दुष्ट, अहंकारी माना जाता है और बदले में प्रतिशोध उभरता है। क्रोधी को न केवल प्रतिशोध का प्रहार सहना पड़ता है वरन् उत्तेजना के उबाल में ढेरों रक्त जलाना पड़ता है और मनःसंस्थान की कार्यकर्त्री मशीन को तोड़-मरोड़ कर रख देने जैसा दुहरा संकट सहना पड़ता है।

🔷 क्रोध किस कारण किया गया इसे कोई नहीं देखता। आक्रोश का उन्माद एक प्रकार का आक्रमण है जिसके कारण पक्ष सही होने पर, कारण का औचित्य रहने पर भी आवेशग्रस्त को अपराधी की पंक्ति में खड़ा होना पड़ता है। न्याय पाने का अवसर चला जाता है। स्वभाव और व्यक्तित्व अनगढ़ होने की मान्यता यदि बनने लगे तो समझना चाहिए कि प्रामाणिकता चली गई। ऐसे लोग न दूसरे की सहानुभूति पाते हैं और न सहयोग का लाभ ले पाते हैं। शरीर जलता रहता है सो अलग, मन उबलता रहता है सो अलग।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Social-Revolution (Part 1)

🔷 The third job that develops internal consciousness is ‘‘Social Revolution’’. Besides opposing & going against minor flaws visible in society there is also a need to induce in life creative things to make a good society. High profile principles are such creative things that make a man society-oriented. The sentiment of ‘‘ATMVAT SARVBHUTESHU’’ must be enlightened in consciences of general masses. Every one of masses must be committed for doing to others what one expects from others. This is the primary condition that must be induced deep within public mind to trigger a social revolution.                                    
                                 
🔶 Each one of us must be convinced about ‘‘VASUDHAIV KUTUMBKAM’’ or that ‘‘the whole world is our abode’’. Not two or three houses rather the whole earth is our home and the way we take care of our home and siblings, the same way we must be careful about peace and harmony the world over and pursue the same. Social revolution can be triggered only with revival of essence of spirituality which underlines such principles that help a man to control over individualism to become society-oriented. If we could wield in our life the principle of ‘‘ATMANAH PRATIKULANI PARESHAAM NAH SAMAACHARET’’, Excellency is bound to descend in social life. If we could develop within us a tendency to mutually share our resources, we can very easily & happily survive with scale of means that we have today with us. We should earn generously and use what is earned and not consume.
                                      
🔷 Evenness must be a part of life-style. Evenness among all societies in which equality between male and female and economical structure must also be put in high steam. Each one of us must become a responsible citizen and manage our family and social affairs on principles of cooperation. We should gather and show courage like that of JATAYU in case of any injustice and impropriety seen anywhere.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 6)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 इसी तरह सूरदास, प्रतिभा वाले और हिम्मत वाले सूरदास जब खड़े हो गए और जो भी दिशा उन्होंने पकड़ ली, उसमें उन्होंने टॉप किया। सूरदास ने जब अपने आपको सँभाल लिया और अपने आपको बदल लिया, तब उन्होंने टॉप किया। टॉप से कम में तो वे रह ही नहीं सकते। वही बिल्वमंगल जब वेश्यागामी था तो पहले नंबर का और जब संत बना तब भी पहले नंबर का। पहले नंबर का क्यों? इसलिए कि वह भगवान् का भक्त हो गया। जब वह भगवान् का भक्त हो गया, तो फिर वह ऐसा मजेदार भक्त हुआ कि उसने वह काम कर दिखाए, जिस पर हमको अचंभा होता है। हिम्मत वाला और दिलेर आदमी जो काम कर सकता है, मामूली आदमी उसे नहीं कर सकता।

🔶 उसने अपनी आँखें गरम सलाखें डालकर फोड़ डालीं। हम और आप कर सकते हैं क्या? नहीं कर सकते। ऐसा कोई दिलेर आदमी ही कर सकता है। उसने दिलेरी के साथ और तन्मयता के साथ ऐसी मजबूत भक्ति की कि श्रीकृष्ण भगवान् को भागकर आना पड़ा और बच्चे के रूप में, जिनको कि वे अपना इष्टदेव मानते थे, उसी रूप में उनकी सहायता करनी पड़ी। आँखों के अंधे सूरदास की लाठी पकड़ करके टट्टी-पेशाब कराने के लिए, स्नान कराने के लिए भगवान् ले जाया करते थे और सारा इंतजाम किया करते थे। भगवान् उनकी नौकरी बजाया करते थे।

🔷 कौन से सूरदास की? उस सूरदास की, जो प्रतिभावान् था। मैं किसकी प्रशंसा कर रहा हूँ? भक्ति की? भक्ति की बाद में, सबसे पहले प्रतिभा की, समझदारी की। प्रतिभा की बात मैं कह रहा हूँ। प्रतिभा अपने आप में एक जबरदस्त वस्तु है। वह जहाँ कहीं भी चली जाएगी, जिस दिशा में भी चली जाएगी, चाहे वह जहाँ कहीं भी जाएगी, पहले नंबर का काम करेगी। तुलसीदास ने क्या काम किया? तुलसीदास ने जब अपनी दिशाएँ बदल दीं, जब उनकी बीबी ने कहा, नहीं, तुम्हारे लिए ये मुनासिब नहीं है। क्या तुम इसी तरीके से वासना में अपनी जिंदगी खत्म कर दोगे?

🔶 तुमको भगवान् की भक्ति में लगा जाना चाहिए और जितना हमको प्यार करते हो, उतना ही भगवान् से करो, तो मजा आ जाए और तुम्हारी जिंदगी बदल जाए। उनको यह बात चुभ गई। हमको और आपको चुभती है क्या? नहीं चुभती। हमारी औरतें सौ गालियाँ देती रहती हैं। और फिर हम ऐसे ही हाथ-मुँह धोकर के आ बैठते हैं। वह फिर गाली सुनाती है और गुस्सा होकर के चले जाते हैं और कहते हैं कि फिर तेरे घर नहीं आएँगे और बस वह जाता है और दुकान पर बैठा बीड़ी पीता रहता है। शाम को घूम-फिरकर फिर आ जाता है। क्यों फिर आ गए? आ गए, क्योंकि उसके अंदर वह चीज नहीं है, जिसे जिंदगी कहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 44)

👉 गुरुचरणों की रज कराए भवसागर से पार

🔷 भारत भर के प्रायः सभी राजा-महाराजा स्वामी जी की चरण धूलि लेने में अपना सौभाग्य मानते थे। स्वयं मार्क ट्वेन ने उनके बारे में अपनी पुस्तक में लिखा था- ‘भारत का ताजमहल अवश्य ही एक विस्मयजनक वस्तु है, जिसका महनीय दृश्य मनुष्य को आनन्द से अभिभूत कर देता है, नूतन चेतना से उद्बुद्ध कर देता है; किन्तु स्वामी जी के समान महान् एवं विस्मयकारी जीवन्त वस्तु के साथ उसकी क्या तुलना हो सकती है।’ स्वामी जी के योग ऐश्वर्य से सभी चमत्कृत थे। प्रायः सभी को स्वामी जी अनेक संकट-आपदाओं से उबारते रहते थे; लेकिन लक्ष्मण मल्लाह के लिए, तो अपनी गुरुभक्ति ही पर्याप्त थी। गुरुचरणों की सेवा, गुरु नाम का जप, यही उसके लिए सब कुछ था।
  
🔶 श्रद्धा से विभोर होकर उसने स्वामी भास्करानन्द की चरण धूलि इकट्ठा कर एक डिबिया में रख ली थी। स्वामी जी के खड़ाँऊ उसकी पूजा बेदी में थे। इनकी पूजा करना, गुरु चरणों का ध्यान करना और गुरु चरणों की रज अपने माथे पर लगाना उसका नित्य नियम था। इसके अलावा उसे किसी और योगविधि का पता न था। कठिन आसन, प्राणायाम की प्रक्रियाएँ उसे नहीं मालूम थी। मुद्राओं एवं बन्ध के बारे में भी उसे बिल्कुल पता न था। किसी मंत्र का उसे कोई ज्ञान न था। अपने गुरुदेव का नाम ही उसके लिए महामंत्र था। इसी का वह जाप करता, यदा-कदा इसी नाम धुन का वह कीर्तन करने लगता।
  
🔷 एक दिन प्रातः जब वह रोज की भाँति गुरुदेव की चरण रज माथे पर धारण करके गुरुदेव का नाम जप करता हुआ उनके चरणों का चिन्तन कर रहा था, तो उसके अस्तित्व में कुछ आश्चर्यकारी एवं विस्मयजनक दृश्यावलि प्रकट हो गयी। उसने अनुभव किया कि दोनों भौहों के बीच गोल आकार का श्वेत प्रकाश बहुत ही सघन हो गया है। यूँ तो यह प्रकाश पहले भी कभी-कभी झलकता था। यदा-कदा सम्पूर्ण साधनावधि में भी यह प्रकाश बना रहता था; पर आज उसकी सघनता कुछ ज्यादा ही थी। उसका आश्चर्य और भी ज्यादा तो तब हुआ, जब उसने देखा कि गोल आकार के श्वेत प्रकाश में एक हलका सा विस्फोट सा हो गया है और उसमें श्वेत कमल की दो पंखुड़ियाँ खुल रही हैं।
  
🔶 गुरु नाम की धुन के साथ ही ये दोनों श्वेत पंखुड़ियाँ खुल गयी और उसके अन्दर से प्रकाश की सघन रेखा उभरी। इसी के पश्चात् उसे अनायास ही अपने आश्रम में  स्वामी भास्करानन्द ध्यानस्थ बैठे हुए दिखाई दिए। योग विद्या से अनभिज्ञ लक्ष्मण मल्लाह को यह सब अचरज भरा लगा। दिन में जब वह गुरुदेव को प्रणाम करने गया, तो उसने सुबह की सारी कथा कह सुनायी। लक्ष्मण की सारी बातें सुनकर स्वामी जी मुस्कराए और बोले- बेटा! इसे आज्ञा चक्र का जागरण कहते हैं। अब से तुम जब भी भौहों के बीच में मन को एकाग्र करके जिस किसी स्थान, वस्तु या व्यक्ति का संकल्प करोगे, वही तुम्हें दिखने लगेगा।
  
🔷 स्वामी जी के इस कथन के उत्तर में लक्ष्मण मल्लाह ने कहा- ‘हे गुरुदेव, मैं तो सदा-सदा आप को ही देखते रहना चाहता हूँ। मुझे तो इतना मालूम है कि मैं आपके चरणों की धूलि को अपनी भौहों के बीच में लगाया करता था। यह जो कुछ भी है, आपकी चरण धूलि का चमत्कार है। अब तो यह नयी बात जानकर मेरा विश्वास हो गया है कि गुरुचरणों की धूलि से शिष्य आसानी से भवसागर पार कर सकता है।’ लक्ष्मण मल्लाह की यह अनुभूति हम सब गुरुभक्तों की अनुभूति भी बन सकती है। बस उतना ही सघन प्रेम एवं उत्कट भक्ति चाहिए। असम्भव को सम्भव करने वाली गुरुवर की चेतना की महिमा अनन्त है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 71

👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...