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गुरुवार, 5 अक्टूबर 2023

👉 मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है

जब तक आप दूसरों पर आश्रित रहते हैं या समझते हैं कि हमारे कष्टों को कोई और दूर करेगा, तब तक बहुत बड़े भ्रम में हैं। जो उलझनें आपके सामने हैं, उनका दु:खदायी रूप अपनी त्रुटियों के कारण है। उन त्रुटियों को दूर करके आप स्वयं ही अपनी उलझनें सुलझा सकते हैं।

संसार में सफलता प्राप्त करने की आकांक्षा के साथ ही अपनी योग्यता में वृद्धि करना भी आरंभ कीजिए। आपका भाग्य किस प्रकार लिखा जाए, इसका निर्णय करते समय विधाता आपकी आतंरिक योग्यताओं की परख करता रहता है। उन्नति करने वाले गुणों को यदि अधिक मात्रा में जमा कर लिया गया है, तो भाग्य में उन्नति का लेखा लिखा जाएगा और यदि उन्नायक गुणों को अविकसित पड़ा रहने दिया गया है, दुर्गुणों को, मूर्खताओं को अंदर भर कर रखा गया है, तो भाग्य की लिपि दूसरी होगी।

विधाता लिख देगा कि `इसे तब तक दु:ख-दुर्भाग्यों में ही पड़ा रहना होगा, जब तक कि योग्यताओं का संपादन न करे।’ अपने भाग्य को जैसा चाहें वैसा लिखाना, अपने हाथ की बात है। यदि आप आत्मनिर्भर हो जाएँ, जैसा होना चाहते हैं उसके अनुरूप अपनी योग्यताएँ बनाने में प्रवृत्त हो जाएँ, तो विधाता को विवश होकर अपनी मनमरजी का भाग्य लिखना पड़ेगा। जब आत्मविश्वास के साथ सुयोग्य मार्ग की तलाश करेंगे, तो वह किसी न किसी प्रकार मिल कर ही रहेगा।

📖 अखण्ड ज्योति -सितम्बर 1943

सोमवार, 24 जुलाई 2023

👉 शेखी मत बघारो

अभिमान और तुच्छता, आत्मप्रशंसा और शेखी के रूप में प्रकट होते हैं, जिससे आप का सामाजिक जीवन सबके लिए असह्य और अनाकर्षक बन जाता है। जनता आप की प्रशंसा कर सकती है, किंतु वह उसको के मुख से सुनना नहीं चाहती। यदि आप अपनी प्रशंसा न्याय और सत्य के अनुसार भी करते हों, तो भी जनता विरोधी हो जाती है और आप के दोषों को ही देखने लगती है। अपनी सफलता को ऐतिहासिक स्त्री- पुरुषों के कार्यों से तुलना करके नम्रता सीखो।   

ऊँट तभी तक अपने को ऊँचा समझता है, जब तक पहाड़ के नीचे नहीं आता। अपने से बड़े प्रसिद्ध पुरुषों से मिलते- जुलते रहने का उद्योग करो। इस प्रकार की मित्रता आप को अत्यंत प्रभावपूर्ण नम्रता की शिक्षा देगी। इस बात को स्मरण रखो कि अभिमान से आप बहुत कुछ खो देते हो। अभिमानी की बहुत से मनुष्य न प्रशंसा करते, न सहायता करते और न प्रेम करते हैं। अभिमान आप के व्यक्तिगत विकास को भी रोकता है।

यदि आप अपने को सबसे बड़ा समझने लगोगे तो आप अधिक बड़ा बनने का यत्न करना छोड़ दोगे। यदि आपने कोई कार्य ख्याति तथा विज्ञापन योग्य किया है, तो उसके विषय में स्वयं कुछ मत कहो। आप को पता लगेगा कि उसके विषय में दूसरे भी किसी न किसी प्रकार कुछ अवश्य जानते हैं। आप के गुण अधिक समय तक छिपे नहीं रहेंगे। आप को स्वयं उनकी घोषणा करने  की आवश्यकता नहीं है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अग. 1945 पृष्ठ 20

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गुरुवार, 12 जनवरी 2023

👉 आत्मनिर्माण सबसे बड़ा पुण्य-परमार्थ है

इस संसार में अनेक प्रकार के पुण्य और परमार्थ हैं। दूसरों की सेवा-सहायता करना पुण्य कार्य है, इससे कीर्ति, आत्मसंतोष तथा सद्गति की प्राप्ति होती है। इन सबसे भी बढ़कर एक पुण्य-परमार्थ है और वह है-`आत्मनिर्माण’। अपने दुर्गुणों को, विचारों को, कुसंस्कारों को, ईर्ष्या, तृष्णा, क्रोध, द्रोह, चिंता, भय एवं वासनाओं को, विवेक की सहायता से आत्मज्ञान की अग्नि में जला देना इतना बड़ा धर्म है, जिसकी तुलना सहस्र अश्वमेधों से नहीं हो सकती।

अपने अज्ञान को दूर करके मन-मंदिर में ज्ञान का दीपक जलाना, भगवान की सच्ची पूजा है। अपनी मानसिक-तुच्छता, दीनता, हीनता, दासता को हटाकर निर्भयता, सत्यता, पवित्रता एवं प्रसन्नता की आत्मिक प्रवृत्तियाँ बढ़ाना, करोड़ मन सोना दान करने की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है।

हर मनुष्य अपना-अपना आत्मनिर्माण करे, तो यह पृथ्वी स्वर्ग बन सकती है। फिर मनुष्यों को स्वर्ग जाने की इच्छा करने की नहीं, वरन् देवताओं को पृथ्वी पर आने की आवश्यकता अनुभव होगी। दूसरों की सेवा-सहायता करना पुण्य है, पर अपनी सेवा-सहायता करना, इससे भी बड़ा पुण्य है। अपनी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक नैतिक और आध्यात्मिक स्थिति को ऊँचा उठाना, अपने को एक आदर्श नागरिक बनाना, इतना बड़ा धर्म-कार्य है, जिसकी तुलना अन्य किसी भी पुण्य-परमार्थ से नहीं हो सकती।

~ पं श्रीराम शर्मा आचार्य
~ अखण्ड ज्योति-फरवरी 1947 पृष्ठ 1

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👉 इन्द्रियों के गुलाम नहीं, स्वामी बनिए!

जो आदमी केवल इन्द्रिय सुखों और शारीरिक वासनाओं की तृप्ति के लिए जीवित है और जिस के जीवन का उद्देश्य ‘खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ’ है। निस्संदेह वह आदमी परमात्मा की इस सुन्दर पृथ्वी पर एक कलंक है, भार है। क्योंकि उसमें सभी परमात्मीय गुण होते हुए भी वह एक पशु के समान नीच वृत्तियों में फंसा हुआ है। जिस आदमी में ईश्वरीय अंश विद्यमान है, वही अपने सुख से हमें अपने पतित जीवन को दुख भरी गाथा सुनाता है!! यह कितने दुख की बात है। जिस आदमी का शरीर सूजा हुआ, भद्दा लज्जा युक्त दुखी और रुग्ण है व इस सत्य की घोषणा करता है कि जो आदमी विषय वासनाओं की तृप्ति में अंधा धुँध, बिना आगा पीछा देखे, लगा रहता है वही शारीरिक अपवित्रताओं, यातनाओं को सहता है।  

वास्तव में आदर्श मनुष्य वही है जो समस्त पाशविक वृत्तियों तथा विषय वासनाओं को रखता हुआ भी उनके ऊपर अपने सुसंयता तथा सुशासक मन से राज्य करता है, जो अपने शरीर का स्वामी है, जो अपनी समस्त विषय वासनाओं की लगाम को अपने दृढ़ तथा धैर्य युक्त हाथों में पकड़ कर अपनी प्रत्येक इन्द्रिय से कहता है कि तुम्हें मेरी सेवा करनी होगी न कि मालिकी। मैं तुम्हारा सदुपयोग करूंगा दुरुपयोग नहीं। ऐसे ही मनुष्य अपनी समस्त पाशविक वृत्तियों तथा वासनाओं की शक्तियों को देवत्व में परिणित कर सकते हैं, विलास मृत्यु है और संयम जीवन है। सच्चा रसायन शास्त्री वही है जो विषम वासनाओं के लोहे को आध्यात्मिक तथा मानसिक शक्तियों के स्वर्ण में पलट लेता है।

~ पं श्रीराम शर्मा आचार्य
~  अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1945 पृष्ठ 1

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👉 जीवन की बागडोर आपके हाथ में

भाष्य ने जहाँ छोड़ दिया, वहीं पड़ गए और कहने लगे कि हम क्या करें, किस्मत साथ नहीं देती, सभी हमारे खिलाफ हैं, प्रतिद्वन्द्विता पर तुले हैं, जमाना बड़ा बुरा आ गया है। यह मानव की अज्ञानता के द्योतक पुरुषार्थहीन विचार हैं, जिन्होंने अनेक जीवन बिगाड़े हैं। मनुष्य भाग्य के हाथ की कठपुतली है, खिलौना है, वह मिट्टी है, जिसे समय-असमय यों ही मसल डाला जा सकता है, ये भाव अज्ञान, मोह एवं कायरता के प्रतीक हैं।

अपने अंत:करण में जीवन के बीज बोओ तथा साहस, पुरुषार्थ, सत्संकल्पों के पौधों को जल से सींचकर फलित-पुष्पित करो। साथ ही अकर्मण्यता की घास-फूस को छाँट-छाँट कर उखाड़ फेंको। उमंग उल्लास की वायु की हिलोरें उड़ाओ।

आप अपने जीवन के भाग्य, परिस्थितियों, अवसरों के स्वयं निर्माता हैं। स्वयं जीवन को उन्नत या अवनत कर सकते हैं। जब आप सुख-संतोष के लिए प्रयत्नशील होते हैं, वैसी ही मानसिक धारा में निवास करते हैं, तो संतोष और सुख आप के मुखमंडल पर छलक उठता है। जब आप दु:खी, क्लांत रहते हैं, तो जीवनवृत्त मुरझा जाता है और शक्ति का ह्रास हो जाता है।

शक्ति की, प्रेम की, बल और पौरुष की बात सोचिए, संसार के श्रेष्ठ वीर पुरुषों की तरह स्वयं परिस्थितियों का निर्माण कीजिए। अपनी दरिद्रता, न्यूनता, कमजोरी को दूर करने की सामर्थ्य आप में है। बस केवल आंतरिक शक्ति प्रदीप्त कीजिए।

🌹 ~अखण्ड ज्योति-सितं. 1946 पृष्ठ 21

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बुधवार, 4 जनवरी 2023

👉 साधक की दो विपत्तियाँ

तमोगुण की प्रधानता रखने वाला व्यक्ति दो प्रकार की विपत्तियों में फँस सकता है। पहली विपत्ति है अपने को हीन समझना- मैं दुर्बल हूँ, घृणित हूँ, अकर्मण्य हूँ, आदि भावनायें उठने से वह समझने लगता है कि मैं सबसे नीच हूँ भगवान मुझ जैसे नीच का कैसे उद्धार कर सकते हैं। ऐसा मालूम होता है कि सोचने वाला भगवान की शक्ति का सीमित मानता है और भगवान गूँगे को बोलने की शक्ति तथा लंगड़े को चलने की शक्ति दे देते हैं यह बात असत्य समझता है। दूसरी विपत्ति है जरा सी सिद्धि पा जाने पर साधना से मुँह मोड़ लेना और प्राप्त सिद्धि को सब कुछ समझ कर उसी के भोग में लग जाना। साधना की ये दोनों ही विपत्तियाँ विघ्न हैं।

इसलिए साधक को सदा इस बात का ध्यान रखने की आवश्यकता है कि वह भी भगवान का अंश है और भगवती महा माया आदि शक्ति उसके अन्तराल में बैठी हुई उसका संचालन कर रहीं हैं। सर्व शक्तिमान भगवान की लीला के अधीन होकर चुपचाप बैठे रहना साधक के लिए उचित नहीं है। यह तो उसके अहंकार की विद्यमानता का फल है जब तक अहंकार रहता है तब तक वास्तविक धारणा का उत्पन्न होना ही सम्भव नहीं है इस लिए अहंकार को निर्मूल कर देने पर ही साधक उन विपत्तियों से बच सकता है।

श्री अरविन्द
अखण्ड ज्योति 1948  नवम्बर पृष्ठ 5

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रविवार, 4 दिसंबर 2022

👉 आध्यात्मिकता की कसौटी

कोई भी मनुष्य इसलिए बड़ा नहीं कि वह अधिक से अधिक सांसारिक पदार्थों का उपभोग कर सकता है। अधिक से अधिक ऐश्वर्य जुटाने वाले तो बहुधा लुटेरे होते हैं। वे संसार को जितना देते हैं, उससे कहीं अधिक उससे छीन लेते हैं।

हम मनुष्य की सेवा-शक्ति को दृष्टि में रख कर ही उसे महान नहीं कह सकते। उसकी महानता की कसौटी यह नहीं हो सकती, क्योंकि इसके द्वारा परखे जाने पर तो अनेक पशु-पक्षी भी उसकी श्रेणी में आ विराजेंगे। सभी जानते हैं कि चूहे, शृगाल, सुअर, कुत्ते, कौए, गिद्ध आदि पशु-पक्षी भी सड़े-गले और मल-मूत्रादि पदार्थों को खाकर वातावरण को शुद्ध कर देते हैं। यह भी प्रकट है कि सड़े-गले पदार्थों को शीघ्र ही हटा देने का जो उत्साह इन पशु-पक्षियों में पाया जाता है, वह प्राय: हम मनुष्य कहलाने वालों में भी नहीं पाया जाता। अतएव न तो कर्म का परिणाम और न कर्मोत्साह ही महानता की कसौटी हो सकता है।

अत: मनुष्य की परख उसके कार्य के परिणाम से नहीं, किन्तु उस कार्य को प्रेरणा देने वाली भावनाओं से की जानी चाहिए। जैसा मनुष्य का भाव हो, उसे वैसा ही समझना चाहिए। भगवान कृष्ण ने भी तो कहा है कि `सभी मनुष्यों की भावना (श्रद्धा) उनके अंत:करण के अनुरूप होती है। इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धा वाला है, वह स्वयं भी वही है।’

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति-मार्च 1948 पृष्ठ 17   

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गुरुवार, 24 नवंबर 2022

👉 गुण-ग्राहक दृष्टि को जाग्रत कीजिए

🔴 जिसके दोष देखने को हम बैठते हैं, उसके दोष ही दोष दिखाई पड़ते हैं। ऐसा मालूम पड़ता है कि इस प्राणी या पदार्थ में दोष ही दोष भरे हुए हैं, बुराइयाँ ही बुराइयाँ उसमें संचित हैं, पर जब गुण-ग्राहक दृष्टि से निरीक्षण करने लगते हैं, तो हर प्राणी में, हर पदार्थ में कितनी ही अच्छाइयाँ, उत्तमताऐ, विशेषताएँ दीख पड़ती हैं।

🔵 वस्तुत: संसार का हर प्राणी एवं पदार्थ तीन गुणों से बना हुआ हैं उसमें जहाँ कई बुराइयाँ होती हैं, वहाँ कई अच्छाइयाँ भी होती हैं। अब यह हमारे हाथ में है कि उसके उत्तम तत्त्वों से लाभ उठाएँ या दोषों को स्पर्श कर दु:खी बनें। हमारे शरीर में कुछ अंग बड़े मनोहर होते हैं, पर कुछ ऐसे कुरूप और दुर्गंधित हैं कि उन्हें ढके रहना ही उचित समझ जाता है।

🔴 इस गुण-दोषमय संसार में से हम उपयोगी तत्त्वों को ढूँढ़ें, उन्हें प्राप्त करें और उन्हीं के साथ विचरण करें, तो हमारा जीवन सुखमय हो सकता है। बुराइयों से शिक्षा ग्रहण करें, सावधान हों, बचें और उनका निवारण करने का प्रयत्न करके अपनी चतुरता का परिचय दें, तो बुराइयाँ भी हमारे लिए मंगलमय हो सकती हैं। चतुर मनुष्य वह है जो बुराइयों से भी लाभ प्राप्त कर लेता है। गुण-ग्राहक दृष्टि को जाग्रत करके हम हर स्थिति से लाभ उठा सकते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति-अप्रैल 1948 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/April/v1.1

बुधवार, 19 अक्टूबर 2022

👉 मानसिक विकास का अटल नियम

जिस प्रकार के विचार हम नित्य किया करते हैं, उन्हीं विचारों के अणुओं का मस्तिष्क में संग्रह होता रहता है। मस्तिष्क का उपयोग उचित और सत्कार्यों में करने से, उसे आलसी निकम्मा न छोड़ने से, मानसिक शक्ति का विकास होता है।

मस्तिष्क को उत्तम या निकृष्ट बनाना तुम्हारे हाथ में ही है। सोचो, विचारो तथा मनन करो। क्रोध करने से क्रोध वाले अणुओं की संख्या में वृद्धि होती है। चिंता, शोक, भय व खेद करने से इन्हीं कुविचारों के अणुओं का तुम पोषण करते हो और मस्तिष्क को निर्बल बनाते हो। भूतकाल की दुर्घटनाओं या दु:खद प्रसंग को स्मरण कर, खेद या शोक के वशीभूत होकर मस्तिष्क को निर्बल मत बनाओ। शरीर में बल होते हुए भी उसका उपयोग न करने से बल क्षीण होता है।

इसी प्रकार बिना विचार के मस्तिष्क भी क्षीण होता है। नवीन विचारों का मन में स्वागत करने से मस्तिष्क का मानस-व्यापार व्यापक होता है तथा मन प्रफुल्लित हो जाता है, जीवन व बल की वृद्धि होती है, मन व बुद्धि तेजस्वी बनते हैं। जो विचार हमारे मस्तिष्क में हैं, वे ही हमारे जीवन को बनाने वाले हैं। जिस कला के विचार तथा अभ्यास करोगे, उसी में निपुणता मिलेगी। मस्तिष्क के जिस भाग का उपयोग करोगे, उसी की शक्तियों का विकास होगा।

📖 अखण्ड ज्योति-जुलाई 1946 पृष्ठ 10

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1946/July/v1.10

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👉 जीने योग्य जीवन जियो

धिक्कार है उस जिंदगी पर, जो मक्खियों की तरह पापों की विष्ठा के ऊपर भिनभिनाने में और कुत्ते की तरह विषय भोगों की जूठन चाटने में व्यतीत होती है। उस बड़प्पन पर धिक्कार है, जो खुद खजूर की तरह बढ़ते हैं, पर उनकी छाया में एक प्राणी भी आश्रय नहीं पा सकता। सर्प की तरह धन के खजाने पर बैठकर चौकीदारी करने वाले लालची किस प्रकार सराहनीय कहे जा सकते हैं?

जिनका जीवन तुच्छ स्वार्थों को पूरा करने की उधेड़बुन में निकल गया, हाय! वे कितने अभागे हैं। सुरदुर्लभ देह रूपी बहुमूल्य रत्न, इन दुर्बुद्धियों ने काँच और कंकड़ के टुकड़ों के बदले बेच दिया। किस मुख से वे कहेंगे कि हमने जीवन का सद्व्यय किया। इन कुबुद्धियों को तो अंत में पश्चाताप ही प्राप्त होगा। एक दिन उन्हें अपनी भूल प्रतीत होगी, पर उस समय अवसर हाथ से चला गया होगा और सिर धुन-धुन कर पछताने के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगेगा।

मनुष्यों! जियो और जीने योग्य जीवन जियो। ऐसी जिंदगी बनाओ जिसे आदर्श और अनुकरणीय कहा जा सके। विश्व में अपने ऐसे पदचिह्न जोड़ जाओ, जिन्हें देखकर आगामी संतति अपना मार्ग ढूँढ़ सके। आप का जीवन सत्य से, प्रेम से, न्याय से, भरा हुआ होना चाहिए। दया, सहानुभूति, आत्मनिष्ठा, संयम, दृढ़ता, उदारता, आप के जीवन के अंग होने चाहिए। हमारा जीवन मनुष्यता के महान् गौरव के अनुरूप ही होना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1946 पृष्ठ 1


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सोमवार, 17 अक्टूबर 2022

👉 बहुमूल्य वर्तमान का सदुपयोग कीजिए

मृत्यु और निर्माण के बीच में हम ठहरे हुए हैं। वर्तमान बड़ी तेजी से भूत की ओर दौड़ता है। भूत और मृत्यु एक ही बात है। कहते हैं कि मरने के बाद मनुष्य भूत बनता है। मनुष्य ही नहीं हर चीज मरती है और वह भूत बन जाती है। जब किसी वस्तु की सत्ता पूर्णत: समाप्त हो जाती है तो उसकी पूर्ण मृत्यु कही जाती है, पर आंशिक मृत्यु जन्म के साथ ही आरंभ हो जाती है। बालक जन्म के बाद बढ़ता है, विकास करता है, उसकी यह यात्रा मृत्यु की ओर ही है।

संसार की हर वस्तु का, मनुष्य शरीर का भी निर्माण उन्हीं तत्त्वों से हुआ है, जो हर क्षण बदलते हैं। उनका चक्र भूत को पीछे छोड़ता हुआ, भविष्य को पकड़ता हुआ प्रतिक्षण तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है। विश्व एक पल के लिए भी स्थिर नहीं रहता। अणु-परमाणु से लेकर विशालकाय ग्रह-पिंड तक अपनी यात्रा विश्रांत गति से कर रहे हैं।

हमारा जीवन भी हर घड़ी थोड़ा-थोड़ा करके मर रहा है। इस दीपक का तेल शनै: शनै चुकता चला जा रहा है। भविष्य की ओर हम चल रहे हैं और वर्तमान को भूत की गोदी में पटकते जाते हैं। यह सब देखते हुए भी हम नहीं सोचते कि क्या वर्तमान का कोई सदुपयोग हो सकता है। जो बीत गया सो गया, जो आने वाला है, वह भविष्य के गर्भ में है। वर्तमान हमारे हाथ में है। यदि हम चाहे तो उसका सदुपयोग करके इस नश्वर जीवन में से कुछ अनश्वर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-जनू-1947 पृष्ठ 1

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1947/June/v1



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👉 अपनी दुनिया अपनी दृष्टि में

अपने आप में, अपने अंत:करण में एक जबरदस्त लोक मौजूद है। उस लोक की स्थिति इतनी महत्त्वपूर्ण है कि उसके सामने भूगोल और भुव: लोक तुच्छ हैं। नि:संदेह बाहर की परिस्थितियाँ मनुष्य को आंदोलित, तरंगित तथा विचलित करती हैं, परंतु संसार के समस्त पदार्थों द्वारा जितना भला या बुरा प्रभाव होता है, उससे अनेक गुना प्रभाव अपने निजि के विचारों तथा विश्वासों द्वारा होता है।

गीता में कहा गया है कि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र और स्वयं ही अपना शत्रु है। कोई मित्र इतनी सहायता नहीं कर सकता, जितनी कि मनुष्य स्वयं अपनी सहायता कर सकता है। इसी प्रकार कोई दूसरा उतनी शत्रुता नहीं कर सकता, जितनी कि मनुष्य खुद अपने आप अपने से शत्रुता करता है। अपनी कल्पना शक्ति, विचार और विश्वास के आधार पर मनुष्य अपनी एक दुनिया निर्माण करता है। वही दुनिया उसे वास्तविक सुख-दु:ख दिलाया करती है।

मनुष्य के मन में प्रचंड शक्ति भरी हुई है। वह इस शक्ति द्वारा अपने लिए अत्यंत अनिष्टकर अथवा अत्यंत उपयोगी तथ्य निर्मित कर सकता है। हर मनुष्य की अपनी एक अलग दुनिया होती है। भीतरी मन की दुनिया जैसी होती है, बाहर की दुनिया भी उसी के अनुरूप दिखाई देने लगती है। अंदर की दुनिया सुन्दर बनाओ।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-सितं. 1947 पृष्ठ 5

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1947/September/v1.5


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शनिवार, 15 अक्टूबर 2022

👉 निराशा एक प्रकार की-नास्तिकता है।

जो व्यक्ति संध्या के डूबते हुए सूर्य को देखकर दुखी होता है और प्रातःकाल के सुन्दरी अरुणोदय पर विश्वास नहीं करता, वह नास्तिक है। जब रात के बाद दिन आता है, मरण के बाद जीवन होता है, पतझड़ के बाद बसन्त आता है, ग्रीष्म के बाद वर्षा आती है। सुख के बाद दुख आता है, तो क्या कारण है कि हम अपनी कठिनाईयों को स्थायी समझें? जो माता के क्रोध को स्थायी समझता है और उसके प्रेम पर विश्वास नहीं करता, वह नास्तिक है और उसे अपनी नास्तिकता का दण्ड रोग, शक्ति विपत्ति, जलन, असफलता और अल्पायु के रूप में भोगना पड़ता है।

लोग समझते हैं कि कष्टों के कारण निराशा आती है, परन्तु यह भ्रम है। वास्तव में निराशा के कारण कष्ट आते हैं। जब विश्व में चारों ओर प्रसन्नता, आनन्द, प्रफुल्लता, आनन्द और उत्साह का समुद्र लहलहा रहा है, तो मनुष्य क्यों अपना सिर धुने और पछताये? मधु-मक्खी के छत्ते में से लोग शहद निकाल ले जाते हैं, फिर भी वह निराश नहीं होती। दूसरे ही क्षण वह पुनः शहद इकट्ठा करने का कार्य आरम्भ कर देती है। क्या हम इन मक्खियों से कुछ नहीं सीख सकते? धन चला गया, प्रियजन मर गये, रोगी हो गये, भारी काम सामने आ पड़ा, अभाव पड़ गये, तो हम रोये क्यों? कठिनाइयों का उपचार करने में क्यों न लग जावें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति - नव. 1947 पृष्ठ 1

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1947/November/v1.1


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👉 पराजय, विजय की पहली सीढ़ी है

यदि सच्चा प्रयत्न करने पर भी तुम सफल न होओ तो कोई हानि नहीं। पराजय बुरी वस्तु नहीं है, यदि वह विजय के मार्ग में अग्रसर होते हुए मिली हो। प्रत्येक पराजय, विजय की दिशा में कुछ आगे बढ़ जाता है। यह उच्चतर ध्येय की ओर पहली सीढ़ी है।

हमारी प्रत्येक पराजय यह स्पष्ट करती है कि अमुक दिशा में हमारी कमजोरी है, अमुक तत्त्व में हम पिछड़े हुए हैं या किसी विशिष्ट उपकरण पर हम समुचित ध्यान नहीं दे रहे हैं। पराजय हमारा ध्यान उस ओर आकर्षित करती है, जहाँ हमारी निर्बलता है, जहाँ मनोवृत्ति अनेक ओर बिखरी हुई है, जहाँ विचार और क्रिया परस्पर विरुद्ध दिशा में बह रहे हैं, जहाँ दु:ख, क्लेश, शोक, मोह इत्यादि परस्पर विरोधी इच्छाएँ हमें चंचल कर एकाग्र नहीं होने देती।

किसी न किसी दिशा में प्रत्येक पराजय हमें कुछ सिखा जाती है, मिथ्या कल्पनाओं को दूर कर हमें कुछ-न-कुछ सबल बना जाती है, हमारी विच्छृंखल वृत्तियों को एकाग्रता का रहस्य सिखा जाती है। अनेक महापुरुष केवल इसी कारण सफल हुए क्योंकि उन्हें पराजय की कड़वाहट को चखना पड़ा था।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-फर. 1948 पृष्ठ 1  


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गुरुवार, 13 अक्टूबर 2022

👉 अपने ऊपर विश्वास कीजिए

विश्वास कीजिये कि वर्तमान निम्न स्थिति को बदल देने की सामर्थ्य प्रत्येक मनुष्य में पर्याप्त मात्रा में विद्यमान है। आप जो सोचते हैं, विचारते हैं, जिन बातों को प्राप्त करने की योजनाएँ बनाते हैं, वे आन्तरिक शक्तियों के विकास से अवश्य प्राप्त कर सकते हैं।

विश्वास कीजिए कि जो कुछ महत्ता, सफलता, उत्तमता, प्रसिद्ध, समृद्धि अन्य व्यक्तियों ने प्राप्त की है, वह आप भी अपनी आन्तरिक शक्तियों द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। आपमें वे सभी उत्तमोत्तम तत्व वर्तमान हैं, जिनसे उन्नति होती है। न जाने कब, किस समय, किस अवसर किस परिस्थिति में आपके जीवन का आन्तरिक द्वार खुल जाय और आप सफलता के उच्च शिखर पर पहुँच जायं।

विश्वास कीजिये कि आपमें अद्भुत आन्तरिक शक्तियाँ निवास करती हैं। अज्ञानवश आप की अज्ञात, विचित्र, और रहस्यमय शक्तियों के भंडार को नहीं खोलते। आप जिस मनोबल आत्मबल या निश्चयबल का करिश्मा देखते हैं, वह कोई जादू नहीं, वरन् आपके द्वारा सम्पन्न होने वाला एक दैवी नियम है। सब में से असाधारण एवं चमत्कारिक शक्तियाँ समान रूप से व्याप्त हैं। संसार के अगणित व्यक्तियों ने जो महान् कार्य किये हैं, वे आप भी कर सकते हैं।

✍🏻  पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1948 अक्टूबर पृष्ठ 1


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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...